Wednesday, 25 September 2019

मोदी जी! दोस्त से यह कैसी दुश्मनी?

केंद्र की मोदी सरकार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के चीफ और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार को भी चिदंबरम की तरह जेल भेजने की तैयारी तो नहीं कर रही है? यह सवाल सियासी गलियारों में तैरने लगी है। लेकिन साथ में एक सवाल यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शरद पवार को अपना दोस्त भी तो मानते हैं। तो फिर केंद्र सरकार पवार के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों कर रही है?

याद कीजिए फरवरी 2015 का वो वक्त जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एनसीपी प्रमुख शरद पवार से नजदीकियां बढ़ने पर एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे ने मोदी का कार्टून बनाकर उनकी तीखी आलोचना की थी। तब पीएम मोदी महाराष्ट्र के बारामती में एक कार्यक्रम के दौरान शरद पवार के तारीफों के पुल बांधे थे और उनके सा‌थ दिन का भोजन भी किया था। मीडिया में दोस्ती की नुमाइश वाली कई तस्वीरे तब सामने आई थीं। इतना ही नहीं, तब मोदी जी ने कहा था कि पवार साहब यूपीए सरकार के दौरान गुजरात सरकार की काफी मदद करते थे। शरद पवार को लेकर पीएम मोदी के इस बदले रुख से खफा राज ठाकरे ने मोदी और पवार का कार्टून बनाकर एक-दूसरे को वेलेंटाइन दोस्त बताया था। इससे पहले शरद पवार की पार्टी एनसीपी ने महाराष्ट्र में भाजपा को बिना शर्त समर्थन देने का भी ऐलान किया था जिसके बाद शिवसेना ने काफी हंगामा किया था। तो ऐसी थी मोदी-पवार की दोस्ती। लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि एक झटके में दोस्ती के सारे उसूलों को धता बताते हुए घोटाले का मुकदमा दर्ज करा दिया।

दरअसल एक कहावत काफी प्रचलित है कि राजनीति में स्थायी रूप से न कोई किसी का दोस्त होता है और न ही कोई किसी का दुश्मन। यह सारा खेल शतरंज की बिसात पर नफा और नुकसान का है। सारा खेल लेनदेन का है। सारा खेल अवसरों को भुनाने का है। मालूम हो कि महाराष्ट्र में अगले महीने की 21 तारीख को विधानसभा का चुनाव होने जा रहा है। इस चुनाव में भाजपा और शिवसेना को पटखनी देने के लिए शरद पवार की एनसीपी ने कांग्रेस पार्टी से हाथ मिलाया है। शरद पवार पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि कांग्रेस और एनसीपी 125-125 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी, जबकि 38 सीटों पर सहयोगी पार्टियां लड़ेंगी। बस यही बात मोदी जी को नागवार गुजरी। कांग्रेसमुक्त भारत की बात करने वाले मोदी और शाह को शरद पवार का यह फैसला कुछ रास नहीं आया और फिर बिना देरी किए उनके पीछे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को लगा दिया। अब ईडी ने चाचा-भतीजा (शरद पवार और अजीत पवार) का जो हाल किया वह किसी से छिपा नहीं है। 
प्रवर्तन निदेशालय ने 24 सितंबर को महाराष्ट्र स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक में हुए एक घोटाले के मामले में शरद पवार, अजीत पवार समेत बैंक के 70 पूर्व अधिकारियों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया है। यह मामला करीब एक दशक पुराना है। इसके पीछे की कहानी यह है कि शरद पवार, जयंत पाटिल समेत बैंक के अन्य निदेशकों ने कथित तौर पर चीनी मिलों को कम ब्याज दरों पर कर्ज दिया था और फिर डिफॉल्टर की संपत्तियों को सस्ती कीमतों पर बेच दिया। माना जा रहा है कि सस्ता कर्ज देने, इन संपत्तियों को बेचने और उनका दोबारा भुगतान नहीं होने से बैंक को साल 2007 से 2011 के बीच करीब 1000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। रिकॉर्ड के मुताबिक, महाराष्ट्र के तत्कालीन वित्त मंत्री अजित पवार उस समय को-ऑपरेटिव बैंक के निदेशक थे।

बहरहाल, अपने खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के बाद एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने जेल जाने के कयासों को लेकर जिस तरह की खुशी जताई है और मुंबई में प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर जिस तरह से घोटाले के आरोपों का जवाब दिया है जिसमें उन्होंने साफ तौर से कहा है कि वह प्रवर्तन निदेशालय की जांच में पूरा सहयोग करेंगे और 27 सितंबर को वह खुद ईडी के दफ्तर में जांच के लिए उपस्थित रहेंगे, उससे तो यही लगता है कि मोदी सरकार ने जो जाल बिछाया है उसमें भाजपा कहीं खुद न फंस जाए। क्योंकि अभी तक भाजपा और शिवसेना के बीच सीट बंटवारे को लेकर कोई फैसला नहीं हो पाया है और ऐसे में अगर यह मामला तूल पकड़ता है तो मतदाताओं के दिमाग में निश्चित रूप से यह बात पैठ जमा सकती है कि मोदी सरकार बदले की राजनीति को हवा दे रही है। चूंकि शरद पवार की एनसीपी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने का ऐलान किया है इसलिए यह कार्रवाई की गई है। ऐसे भी इसे ओछी राजनीति ही कही जाएगी कि कोई भ्रष्ट नेता या पार्टी भाजपा के साथ हो तो वह ईमानदार और कांग्रेस के साथ हो तो बेईमान।

Friday, 11 May 2018

कर्नाटक तय करेगा शाह का भविष्य

राजनीतिक गलियारों में इस बात का शोर मचा है कि कर्नाटक चुनाव में अगर भाजपा हारी तो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और भाजपा की चुनावी जीत के चाणक्य अमित शाह की छुट्टी हो जाएगी। लिहाजा कर्नाटक चुनाव शाह के लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है। अमित शाह को करीब से जानने वाले बताते हैं कि भाजपा अध्यक्ष को इतना नर्वस उन्होंने पहले कभी नहीं देखा। इसकी वजहें भी हैं। पहली यह कि भाजपा का आंतरिक सर्वे भी उन्हें कर्नाटक में जीत की गारंटी नहीं दे रहा है और दूसरी आरएसएस के नीति-नियंता कर्नाटक की चुनावी बिसात पर शाह की चली गई चाल से बेहद नाराज हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि अमित शाह वर्तमान में भारतीय राजनीति के कद्दावर नेता हैं। जहां तक देश की सरकार और भाजपा की बात है तो शाह भले ही यूनियन कैबिनेट में शामिल नहीं हैं लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद अगर किसी की चलती है तो वह अमित शाह हैं। लेकिन जहां तक कर्नाटक चुनाव की बात है तो यह ऐसा चुनाव है जिसे अमित शाह अपनी शर्तों पर जीतना चाहते थे और संघ अपने अंदाज में यह चुनाव लड़ना चाहता था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में रसूख रखने वाले सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ दिनों में अमित शाह और संघ के शीर्ष नेतृत्व के बीच तीन मुलाकातें हो चुकी हैं और तीनों ही मुलाकातों में अमित शाह को कुछ बातें सुननी पड़ी हैं। शाह के स्तर पर कर्नाटक में हुए फैसलों से संघ खुद को सहज स्थिति में नहीं पा रहा है और अमित शाह को बार-बार अपने हर फैसले के बारे में सफाई देनी पड़ रही है।

दरअसल, संघ शुरू से ही कर्नाटक को लेकर भाजपा को आगाह कर रहा था। उसके स्वयंसेवकों की रिपोर्ट थी कि कर्नाटक में सिद्धारमैया को कम आंकना बड़ी गलती होगी। लेकिन उस वक्त भाजपा अति-आत्मविश्वास में थी। दिल्ली वालों को कर्नाटक की जमीनी सच्चाई का सही अंदाजा नहीं था और भाजपा के जिन नेताओं को सच्चाई पता थी वे सच बताकर पार्टी आलाकमान को नाराज नहीं करना चाहते थे। इसलिए जब भाजपा चुनावी समर में कूदी तो अचानक जमीन बदली-बदली नजर आई। संघ अब इसी बात से नाराज़ है। आरएसएस नेताओं का कहना है कि भाजपा से एक नहीं कई गलतियां हुई हैं। हर बार भाजपा नेताओं को लगता है कि वो चुनाव जीत जाएंगे तो उनकी गलतियां छिप जाएगी। लेकिन गोरखपुर और फूलपूर के बाद अगर कर्नाटक में भी हार दर्ज हुई तो अमित शाह को इसकी जिम्मेदारी लेनी ही होगी।

आरएसएस के भीतरी सूत्रों की मानें तो संघ शुरू से ही भाजपा को सलाह दे रहा था कि इस बार बीएस येदियुरप्पा का जादू खत्म हो चुका है और केंद्रीय मंत्री अनंत हेगड़े जैसे नए नेता को मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करना चाहिए। संघ की दलील थी कि सिद्धारमैया की पार्टी भले ही कांग्रेस है लेकिन उनकी सोच कांग्रेस से एकदम अलग है। इसलिए उन्हें हराने के लिए भाजपा को भी कुछ अलग सोचना और करना होगा। लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने संघ के मनमाफिक बदलाव करने में रूचि नहीं दिखाई। संघ मुख्यालय में पैठ रखने वाले एक नेता की मानें तो संघ की नाराजगी तब और बढ़ गई जब अमित शाह ने बेल्लारी के रेड्डी भाइयों को भी टिकट दे दिया और बेल्लारी का चुनाव जीतने की कमान भी उन्हें सौंप दी। संघ अमित शाह के इस फैसले को पचा नहीं पा रहा है। संघ को समझ में नहीं आ रहा है कि बेल्लारी की कुछ सीटें जीतने के लिए उन्होंने कर्नाटक के सबसे बड़े चुनावी मुद्दे भ्रष्टाचार से समझौता कैसे कर लिया।

जब तक रेड्डी भाई चुनाव मैदान में नहीं उतरे थे तब तक भाजपा का सबसे बड़ा नारा था- सिद्धारमैया, सिद्धारमैया नहीं सिद्धा-रुपैया हैं। लेकिन अब भ्रष्टाचार का हमला भी भाजपा को ही सहना पड़ रहा है। अमित शाह और संघ नेतृत्व की पिछली मुलाकात तो सिर्फ इसी मुद्दे को लेकर थी। लेकिन शाह अपने जवाबों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को संतुष्ट नहीं कर पाए कि आखिर रेड्डी भाइयों को टिकट देने की जरूरत क्यों पड़ी? संघ के भीतरी सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि पार्टी के फैसलों से संघ इस कदर नाराज है कि कर्नाटक में भाजपा हारी तो अमित शाह को अध्यक्ष पद भी छोड़ना पड़ सकता है।

दरअसल, संघ के ज्यादातर नेताओं को अब भाजपा में नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत महसूस हो रही है। अभी संघ में नंबर दो के नेता भैय्याजी जोशी भी अमित शाह से खुश नहीं बताए जा रहे हैं। कर्नाटक के बाद मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनाव होने हैं। संघ को लगता है कि इन दो राज्यों में भी पार्टी की हालत कुछ अच्छी नहीं है। इसलिए अगर 2019 का चुनाव जीतना है तो बदलाव 2018 में ही करने होंगे। भाजपा अध्यक्ष के तौर पर संघ की पहली पसंद हमेशा से नितिन गडकरी रहे हैं। संघ की नजर में मोदी सरकार में अगर किसी एक मंत्री की छवि सबसे अच्छी है और काम करने का रिकॉर्ड अच्छा है तो वे हैं नितिन गडकरी। इसके अलावा संघ हमेशा सामूहिक नेतृत्व में यकीन रखता है। इस वजह से उसे लगता है कि अब गुजरात के दो नेताओं के भरोसे नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने का वक्त आ गया है। और बात अगर इतनी दूर तलक आ पहुंची है तो यह काम अमित शाह को अध्यक्ष पद से हटाए बिना संभव नहीं।

Friday, 16 March 2018

योगी कभी हारता नहीं

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है- 'योगः कर्मसु कौशलम' यानी जीव कर्म में अपनी संलग्नता के कारण परमात्म तत्व से विमुख न हों, इस कुशलता से कर्म करने वाला व्यक्ति योगी है। यानी जो मन को वश में कर के भौतिक इच्छाओं का त्याग कर देता है और विरागी हो जाता है वह योगी कहलाता है। कहने का मतलब यह कि योगी शब्द की अवधारणा को सार्थक करने वाला शख्स कर्मजीवी होता है, वह कभी हारता नहीं है। और ऐसा व्यक्ति अगर राजनीति में भी दखल रखता हो तो फिर क्या कहने। जी हां! हम यहां बात कर रहे हैं योगी आदित्यनाथ की। उस योगी आदित्यनाथ की जो गोरखपुर स्थित गोरक्षनाथ मठ के महंथ भी हैं और उत्तर प्रदेश के मुख्य सेवक भी। भारतीय राजनीति में इन दिनों अगर सबसे अधिक चर्चा किसी नेता की हो रही है तो उसमें योगी आदित्यनाथ का नाम सबसे ऊपर है। वह इसलिए कि गोरखपुर लोकसभा सीट पर 11 मार्च को हुए उपचुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा। कोई कह रहा है कि यह योगी की हार है, कोई कह रहा है यह भाजपा की हार है तो कोई कह रहा है कि यह मोदी-शाह की हार है। हार किसी की भी हो, वह होती हार ही है। लेकिन जब गोरखपुर की राजनीति के गुना-भाग में जाएंगे तो इस जीत-हार की असलियत खुलकर सामने आती है और उससे यह साफ हो जाता है कि योगी कभी हारता नहीं है। 

गोरक्षनाथ मठ की राजनीति सर्वोपरि
गोरखपुर की सियासत को करीब से जानने वाले इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि यहां मठ की राजनीति सर्वोपरि है। दूसरे नंबर पर यहां की सियासत ब्राह्मण बनाम ठाकुर की चलती है। कई दशक पहले शुरू हुई इस तरह की सियासी जंग आज भी बरकरार है। ऐसा माना जाता है और यही सच भी है कि गोरखपुर में भाजपा की हार की आधी स्क्रिप्ट तो उसी तारीख में लिख दी गई थी जब वहां से उपेंद्र दत्त शुक्ला को उपचुनाव का प्रत्याशी बनाया गया था। वह इसलिए क्योंकि पहली बात कि उपेंद्र शुक्ला गोरक्षनाथ मठ से बाहर के प्रत्याशी थे, दूसरा योगी आदित्यनाथ की पसंद के नहीं थे और तीसरा उनपर ब्राह्मण का ठप्पा लगा था। उपेंद्र शुक्ला को लेकर भगवा राजनीति में कुछ ऐसे हालात पैदा हो गए थे कि अगर वह जीतते तो ये भाजपा, मोदी, शाह और योगी की जीत से ज्यादा गोरखपुर के मठ की हार होती। कहने का मतलब यह कि गोरखपुर में भाजपा की इस हार में कहीं न कहीं 'मठ' की अपनी जीत छिपी है।

बीते तीन दशक में पहली बार ऐसा हुआ जब गोरखपुर सीट पर भाजपा का उम्मीदवार गोरखनाथ मठ का कोई व्यक्ति नहीं था। दरअसल यह लोकसभा सीट योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद खाली हुई थी। उपेंद्र शुक्ला को भाजपा का टिकट दिए जाने को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए एक राजनीतिक झटका माना जा रहा था। योगी के करीबी सूत्र बताते हैं कि योगी की पसंद के उम्मीदवार को पार्टी ने टिकट नहीं दिया। उनके मुताबिक उपेंद्र शुक्ला योगी के नहीं बल्कि केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री शिव प्रताप शुक्ला की पसंद थे। गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव के लिए योगी की पसंद उनकी गैरमौजूदगी में मठ के मुख्य पुजारी कमल नाथ थे। योगी की इच्छा थी कि लोकसभा सीट मंदिर के पास ही रहे। लेकिन स्थानीय स्तर पर कुछ नेता मठ से बाहर पार्टी के किसी सक्रिय कार्यकर्ता को देने की मांग उठा रहे थे। फिर योगी ने अपनी इच्छा को बदलते हुए धर्मेंद्र सिंह को टिकट देने की बात कही, लेकिन पार्टी आलाकमान ने योगी की इच्छा को सिरे से खारिज करते हुए शिवप्रताप शुक्ला के चहेते उपेंद्र शुक्ला को टिकट दिया गया। फिर क्या था, योगी ने मन ही मन उसी वक्त ठान लिया कि भाजपा की हार मंजूर लेकिन मठ की हार किसी सूरत में मंजूर नहीं हो सकती।  

यहीं बड़ा सवाल यह उठता है कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री रहते उनके अपने ही गढ़ में उनपर शिव प्रताप शुक्ला कैसे हावी हो गए? कोई और नहीं, भाजपा के लोगों का ही यह कहना है कि पार्टी के ही कुछ लोग उन्हें अपने ही गढ़ गोरखपुर में कमजोर करना चाहते हैं। पार्टी द्वारा पहले मेयर चुनाव और अब लोकसभा उपचुनाव में उनकी इच्छा के खिलाफ जाकर उम्मीदवार देने से इस बात को बल मिलता है। गोरखपुर में शिव प्रताप शुक्ला भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के काफी भरोसेमंद माने जाते हैं। यह बात वक्त-वक्त पर साबित भी होती रही है। अगर याद हो तो राजनाथ सिंह जब 2013 में दोबारा से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे तो उनकी टीम में अमित शाह बतौर राष्ट्रीय महासचिव आए। उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया और शिव प्रताप शुक्ला तभी से अमित शाह का विश्वास जीतने के लिए काम करते रहे हैं। 2016 में जब भाजपा ने शुक्ला को राज्यसभा भेजा तो उस वक्त भी यही कहा गया था कि अमित शाह की वजह से ही उन्हें सांसदी मिली है।

ठाकुर बनाम ब्राह्मण की सियासी जंग
एक वक्त था जब गोरक्षनाथ मठ के महंथ दिग्विजय नाथ हुआ करते थे। उस वक्त गोरखपुर के ब्राह्मणों में पंडित सुरतिनारायण त्रिपाठी का काफी मान-सम्मान हुआ करता था। कहते हैं कि किसी वजह से दिग्जिवज नाथ ने सुरतिनारायण त्रिपाठी का अपमान किया था और वहीं से ठाकुर बनाम ब्राह्मण के बीच सियासी जंग शुरू हो गई। इसके बाद उस वक्त के युवा नेता हरिशंकर तिवारी ने दिग्विजय नाथ के खिलाफ आवाज उठाई। आगे चलकर ठाकुरों का नेतृत्व वीरेंद्र शाही के हाथ आया, लेकिन हरिशंकर तिवारी का 'हाता' और महंथ अवैद्यनाथ के 'मठ' के बीच गोरखपुर में वर्चस्व की लड़ाई चलती रही। 90 के दशक में योगी आदित्यनाथ के हाथ जब मठ की कमान आई तो योगी ने निरंतर 'मठ' की ताकत बढ़ाई। उनकी हिंदू युवा वाहिनी आसपास के कई जिलों में सक्रिय हुई। इसी बीच 1998 में माफिया डॉन श्रीप्रकाश शुक्‍ला का एनकाउंटर कर दिया गया जिसे ब्राह्मण क्षत्रप कहा जाता था।

गोरखपुर में ब्राह्मणों और ठाकुरों के वोट बराबर-बराबर हैं, लेकिन योगी आदित्यनाथ ने समाज सेवा के रास्ते अपनी ताकत लगातार बढ़ई और ब्राह्मण नेतृत्व कमजोर पड़ता गया। इसके साथ ही 'हाता' का असर भी कम होता गया। उस वक्त शिवप्रताप शुक्ला ब्राह्मणों के सर्वमान्य और ताकतवर नेता थे। लेकिन योगी की बढ़ती ताकत के साथ ही उनका राजनीतिक पतन होता चला गया। हालत ये हो गई कि कुछ वर्षों के लिए शिवप्रताप शुक्ला राजनीतिक पटल से भी ओझल हो गए। इस बीच राज्य से लेकर केंद्र तक योगी आदित्यनाथ का राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। भाजपा में मोदी-शाह युग से पहले आलम ये था कि पूर्वांचल में योगी आदित्यनाथ जिसे चाहते उसे ही टिकट मिलता, जिसे नहीं चाहते वह टिकट पाकर भी हार जाता। मजबूरन भाजपा को उनके आगे घुटने टेकने पड़ते। उनकी हर बात केंद्रीय नेतृत्व को माननी पड़ती। गोरखपुर उपचुनाव में भाजपा की हार से तो यही लग रहा कि हालात आज भी बदले नहीं हैं।

साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की शानदार जीत के बाद मुख्यमंत्री के लिए कई नाम सामने आए थे। मनोज सिन्हा का नाम तो फाइनल भी हो गया था लेकिन ऐन वक्त पर आरएसएस के समर्थन से योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे। उनके मुख्यमंत्री बनते ही उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा नाराजगी ब्राह्मणों में थी। यह बात जब केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंची तो मोदी और शाह ने डैमेज कंट्रोल के लिए महेंद्र नाथ पांडेय को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाया। बात नहीं बनी तो योगी की सीट पर टिकट देने के लिए किसी ब्राह्मण चेहरे की तलाश थी ताकि यहां भी संतुलन बनाया जा सके। उसके तहत भाजपा संगठन और आरएसएस की सहमति से गोरखपुर उपचुनाव के लिए उपेंद्र दत्त शुक्ला मोदी और अमित शाह की पहली पसंद बने। लेकिन योगी आदित्यनाथ को यह नाम पसंद नहीं था। उसकी असली वजह यह थी कि योगी के सामने अपनी सीट बचाने से ज्यादा अहम था गोरखपुर में अपने 'मठ' की ताकत को बचाना।

बहरहाल, मोदी-शाह नीत भाजपा को यह समझना होगा कि पूर्वांचल में भाजपा का मतलब योगी होता है और योगी का मतलब है उनका अपना संगठन। अटल-आडवाणी युग में भी योगी ने 'मठ' की सर्वोच्चता से कभी समझौता नहीं किया और कभी किसी के सामने झुकना मंजूर नहीं किया। यही वजह रही कि योगी आदित्यनाथ को केंद्र या राज्य में कभी किसी मंत्री पद से नहीं नवाजा गया। ऐसे में उनके अहाते किसी भी उम्मीदवार के लिए उनकी मर्जी के बिना जीत हासिल करना नामुमकिन है। मठ की ताकत और ठाकुर बनाम ब्राह्मण की यह सियासी जंग 2019 के लोकसभा चुनाव में क्या गुल खिलाएगी इसका सबको इंतजार रहेगा।

Wednesday, 31 January 2018

संविधान की रक्षा कौन करेगा?

जब हम लोकतांत्रिक सिद्धांतों की बात करते हैं तो वह हमें बताती है कि लोकतंत्र में आम जनता ही केंद्र में होती है, लेकिन व्यवहार में लोकतंत्र एक सांविधानिक व्यवस्था को जन्म देता है जिसमें अधिकारों और कर्तव्यों का बंटवारा कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका में कर दिया जाता है। चूंकि इस व्यवस्था में आम नागरिक अधिकार संपन्न नहीं होते। जाहिर है, जन-सशक्तिकरण के सवाल पर जब लोकतंत्र नाकाम साबित होता है तो इसका ठीकरा संविधान पर फूटता है। आजादी के बाद से लगातार देश इसी व्यवस्था में जीने को अभिशप्त है।

एक वैश्विक रिपोर्ट के मुताबिक, जब देश में साल 2017 में कुल संपत्ति के सृजन का 73 प्रतिशत हिस्सा केवल एक प्रतिशत अमीर लोगों के हाथों में हो तो निश्चित रूप से लोकतांत्रिक ढांचा चरमराएगा और इसकी आंच से संविधान झुलसेगा। जब देश की शीर्ष अदालत के वरिष्ठ जज मीडिया के समक्ष न्यायपालिका की रक्षा की गुहार लगाएं तो यह सोचना बनता है कि देश का लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर हो रहा है। इन जजों का कहना है कि आज देश का लोकतंत्र खतरे में है और कल कोई ये न कहे कि हमने अपनी आत्मा बेच दी है इसलिए हम मीडिया के सामने आए हैं। जजों ने कहा कि जब तक इस संस्था को बचाया नहीं जा सकता, लोकतंत्र को नहीं बचाया जा सकता। जाहिर है लोकतंत्र नहीं बचेगा तो संविधान के अस्तित्व में बने रहने की बात कैसे सोच सकते हैं। आखिर इसी लोकतंत्र की रक्षा के लिए तो संविधान की सत्ता को स्थापित किया गया है।

इससे भी एक कदम बढ़कर पहले पद्मावती और फिर पद्मावत फिल्म को लेकर देश में जिस तरह का हंगामा मचा उसने भी अपनी आंच से संविधान को झुलसाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म पद्मावत को रिलीज करने का आदेश दिया, लेकिन कई राज्यों की सरकारों ने शीर्ष अदालत के आदेश का पालन नहीं किया और करणी सेना के अलावा कई दक्षिणपंथी संगठनों के लोगों ने उत्पात मचाया। इस तरह की समाज व देशविरोधी गतिविधियां सीधे-सीधे संविधान को चुनौती देने जैसी है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट या देश की अन्य अदालतें जब कोई फैसला सुनाती हैं तो वह संविधान में उल्लिखित कानून के आधार पर होता है और अगर विधायिका ही इसको मानने में आनाकानी करने लगे तो फिर इस संविधान को बचाने के लिए देश के लोगों को आगे आना होगा, सरकारों को सोचना होगा, देश के तमाम विपक्षी दलों को इस बारे में रणनीति बनाकर जुटना होगा।

राहुल ने लगाई संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की गुहार
कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पहली बार देशवासियों के नाम खुली चिट्ठी में राहुल गांधी ने कहा कि हम सबके लिए यह याद रखना बेहद जरूरी है कि न्याय, समानता और भाईचारा हमारे संविधान की बुनियाद है। हमारे युवा देश के इतिहास में संविधान के इन अमूल्य धरोहरों की रक्षा करने की इससे ज्यादा जरूरत पहले कभी नहीं रही थी। देशवासियों के नाम अपने खुले पत्र में राहुल ने संविधान के बुनियादी आधारों न्याय और विचारों की स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ी चुनौतियों को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि हमें डर, भय और धमकी से परे अपने विचारों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने का अधिकार है। धर्म, संस्कृति और विचारों की हमारी विविधता हमारे गणतंत्र की ताकत है। इस अहम मौके पर हम सबको एकजुट होकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न्याय के संवैधानिक अधिकार की रक्षा करते हुए गरीबों और उन लोगों के अधिकारों की रक्षा की जाए जिनकी आवाज ऊपर तक नहीं पहुंच पाती। देश में सामाजिक तनाव के वाकयों की ओर इशारा करते हुए राहुल ने कहा कि हमारी पृष्ठभूमि चाहे जैसी हो, सिर्फ यह बात मायने रखती है कि हम सब भारतीय हैं। इसीलिए आर्थिक हैसियत, जाति, धर्म या लिंग के आधार पर केवल कानून के हिसाब से ही सभी के साथ एक समान व्यवहार केवल शब्दों में ही नहीं बल्कि वास्तविक स्वरुप में हो यह हम सब को सुनिश्चित करना चाहिए।

संविधान बचाओ रैली से विपक्षी एकजुटता की आस
पूरा देश 26 जनवरी को जब अपना 69वां गणतंत्र दिवस मना रहा था, वहीं देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में कई राजनीतिक दल एक मंच पर आकर संविधान बचाओ रैली के बहाने विपक्षी एकजुटता का संदेश दे रहे थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में राजग का हिस्सा रहे और अब भाजपा से नाराज स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के मुखिया एवं सांसद राजू शेट्टी ने केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े के संविधान पर दिए विवादित बयान का उल्लेख करते हुए देश के सभी विरोधी दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश की। रैली में एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार के अलावा शरद यादव,  सीताराम येचुरी, नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला, टीएमसी नेता दिनेश त्रिवेदी, कांग्रेस नेता संजय निरूपम और अशोक चह्वाण, गुजरात के पाटीदार नेता हार्दिक पटेल, कांग्रेस नेता अल्पेश ठाकोर, एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल और डीपी त्रिपाठी, भाजपा के बगावती नेता नाना पटोले और सपा नेता अबु आजमी ने शिरकत की। रैली से इतर उमर अब्दुल्ला ने मीडिया से कहा कि हमारे पास जो कुछ भी है, संविधान की वजह से है। संविधान सुरक्षित नहीं रहेगा तो कुछ भी नहीं रहेगा। रैली के माध्यम से एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने यह संकेत भी दिया कि 2019 के लोकसभा चुनाव में वे फिर से आघाड़ी के साथ युति में रहेंगे। शिवसेना के साथ गठबंधन को पवार ने सिरे से नकार दिया। उन्होंने यह भी कहा कि 2019 के चुनाव में कांग्रेस एनसीपी की टक्कर भाजपा-शिवसेना से होगी। पवार ने कहा कि जल्दी ही दिल्ली में सभी विपक्षी दलों की एक बैठक होगी जिसमें आगे की रणनीति तय की जाएगी।

Saturday, 14 October 2017

2019 में रंग लाएगी राहुल की ये तरकीब

लोकसभा चुनाव 2019 के फाइनल की जंग के लिए गुजरात और हिमाचल प्रदेश में सेमीफाइनल का दौर शुरू हो चुका है। खास बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बीच गुजरात विधानसभा चुनाव में फाइनल का रिहर्सल भी शुरू हो गया है। गुजरात में जीत और हार जिसकी भी हो, लेकिन ऐसा लगता है कि चुनाव नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के चेहरे को ही आगे कर लड़ा जा रहा है मानों इन्हीं में से कोई एक गुजरात का मुख्यमंत्री बनने वाले हों। राहुल गांधी के लिए चाहे गुजरात चुनाव हो या फिर लोकसभा-2019 का चुनाव, खोने के लिए कुछ भी नहीं है। कांग्रेस को इन दोनों चुनावों में जो भी हासिल होगा, तय है पहले से बेहतर ही होगा क्योंकि कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन अब और खराब क्या हो सकता है। यह नरेंद्र मोदी और भाजपा के शाह भी जान रहे हैं कि गुजरात और देश दोनों ही स्थानों पर भाजपा नीत सरकार का प्रदर्शन जनता के मनोनुकूल नहीं दिख रहा है। इस बीच कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ने चुनावी शतरंज की बिसात पर कुछ ऐसी चालें चली हैं जिससे नरेंद्र मोदी की भाजपा गुजरात विधानसभा और लोकसभा चुनाव में चारों खाने चित्त हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं।

सोशल मीडिया अबकी राहुल के लिए वरदान
सोशल मीडिया का जो प्लैटफॉर्म 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए वरदान साबित हुआ वहीं सोशल प्लैटफार्म गुजरात विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव 2019 में नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। 'विकास पागल हो गया है' हैशटैग ने भाजपा कैंप में खलबली मचा रखी है। ऊपर से बेरोजगारी, नोटबंदी, जीएसटी और रियल एस्टेट रेगुलेशन डिवेलपमेंट ऐक्ट ने पूरे देश में मंदी का माहौल बनाया है और इसमें सोशल मीडिया ने कांग्रेस के पक्ष में जबरदस्त तरीके से माहौल बनाया है। अगर आपको याद हो तो 2014 में नरेंद्र मोदी ने जिस विकास के मुद्दे को चुनाव जीतने का हथियार बनाया था उसमें सोशल मीडिया ने अहम भूमिका निभाई थी और वही विकास आज अगर पागल हो गया है तो लोगों का भाजपा और नरेंद्र मोदी से मोह भंग होना स्वाभाविक है क्योंकि सवाल पूछने वाले तो पूछेंगे कि नरेंद्र मोदी में इतनी भी प्रशासनिक क्षमता नहीं कि विकास को तीन साल भी ठीक से संभाल नहीं पाए। कहने का मतलब यह कि नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता पाने के लिए विकास शब्द का इस्तेमाल किया और लोगों ने उसपर भरोसा किया। यह सब कुछ हवा में एक जुमले की तरह था। इसकी कोई वास्तविक हैसियत नहीं थी, लेकिन आज की तारीख में कांग्रेस और राहुल गांधी सोशल मीडिया पर जिस तरह से विकास को लेकर मोदी सरकार पर हमले कर रहे हैं वो एक सच्चाई है ना कि जुमला। देश की जनता को यह मसहूस हो रहा है कि राहुल जो बात कर रहे हैं वह हमारा वर्तमान है। इसलिए संभव है 2019 आते-आते 'विकास' इतना पागल हो जाए कि 125 करोड़ लोगों की ताकत वाला देश 'विकास' का पागलपन ठीक करने की जिम्मेदारी राहुल गांधी की कांग्रेस को सौंप दे।

राहुल का नरम हिन्दुत्व कार्ड भी मोदी पर भारी
गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी ने राज्य में जब चुनाव अभियान की शुरुआत राहुल गांधी के जरिए की तो उन्होंने सबसे पहले द्वारकाधीश में जाकर पूजा-अर्चना की। श्रीकृष्ण के चरणों में शीश झुकाकर माथे पर तिलक लगाए अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर कीं। गुजरात दौरे के दरम्यान वह तमाम दूसरे मंदिरों में भी गए और आने वाले दिनों में भी इस काम को करते रहने की योजना है। दरअसल यह राहुल की कांग्रेस की रणनीति का दूसरा हिस्सा है। हाल के वर्षों में कांग्रेस पर जो सबसे बड़ा आरोप लगा था वह यही था कि यह पार्टी अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करती है। यह आरोप गुजरात में भारी ना पड़े इसलिए राहुल गांधी के जरिये कांग्रेस ने नरम हिंदुत्व का दांव खेला है। नरेंद्र मोदी की भाजपा इससे बेहद घबराई हुई है। क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खुद का हिन्दुत्व का सबसे बड़ा झंडाबरदार मानता है। आरएसएस को लगता है कि हिन्दुत्व पर उनका पेटेंट है और हिन्दुत्व की राजनीति करने का अधिकार सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के पास है। लेकिन आरएसएस और भाजपा की दिक्कत यह है कि ये लोग कट्टर हिन्दुत्व की राजनीति करने लगे जो 125 करोड़ की जनता को पसंद नहीं। 2014 में लोगों ने मोदी की भाजपा को वोट इसलिए किया था कि मोदी सरकार हिन्दुत्व को विकास से जोड़कर जीने का एक बेहतरीन हथियार हर भारतवासी के हाथों में सौपेंगे, लेकिन तीन साल में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बड़ी साफ सी बात है कि कट्टरता किसी भी चीज में अच्छी नहीं होती तो फिर हिन्दुत्व के लिए कैसे अच्छी हो सकती। राहुल गांधी ने इसीलिए चुपके-चुपके नरम हिन्दुत्व का कार्ड खेल दिया है और आगे आने वाले दिनों में इस और मजबूती से पेश किया जाएगा।

राहुल की साफगोई से मोदी हो जाएंगे चित्त!
लाखों लोगों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भी मुद्दे को घुमा-फिरा कर इस तरह से पेश करते हैं कि जुमला भी सच जैसा लगने लगता है। देश और दुनिया में घूम-घूम कर नरेंद्र मोदी ने इस बात को स्थापित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी कि पिछले 70 वर्षों में देश में कोई काम नहीं हुआ। लेकिन अब जब कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी देश-दुनिया में घूम-घूम कर मोदी सरकार के साथ-साथ कांग्रेस समेत देश की तमाम सरकारों की बात कर रहे हैं तो अमेरिका से लेकर गुजरात तक लोग कहने लगे हैं कि राहुल की साफगोई का कोई जवाब नहीं। अभी हाल ही में राहुल जब अमेरिकी दौरे पर कैलिफोर्निया और प्रिंसटन विश्वविद्यालय में छात्रों से बात की और कई इंटरव्यू दिए तो पश्चिमी मीडिया ने माना कि राहुल अपने देश भारत की जमीनी हकीकत को नरेंद्र मोदी के मुकाबले बेहतर तरीके से समझते हैं। राहुल की छवि इस रूप में सामने आई कि वह कांग्रेस के गुलाम नहीं हैं। बेरोजगारी के मुद्दे पर राहुल ने कांग्रेस को भी उतना ही दोषी ठहराया जितना मोदी सरकार को। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान भी राहुल मोदी सरकार की आलोचना तो कर रही रहे हैं, साथ ही कांग्रेस को भी क्लीनचिट नहीं दे रहे। कुल मिलाकर कांग्रेस जनता के बीच राहुल गांधी की छवि कुछ इस तरह का बनाना चाहती है कि राहुल सीधा सोचते हैं। उनकी सोच और नीति में किसी तरह की राजनीति नहीं, जुमलेबाजी नहीं। मोदी की सत्ता इस बात से डरी हुई है कि अगर लोगों के दिल और दिमाग में यह बात घर कर गई कि नरेंद्र मोदी नीत भाजपा की सरकार सिर्फ चुनाव जीतने की राजनीति करती है जुमलों के जाल में फंसाकर तो फिर क्या होगा?

बहरहाल, नरेंद्र मोदी और भाजपा के मुकाबले राहुल गांधी और कांग्रेस की चुनावी रणनीति और नई-नई चालें जारी रहीं तो देश में बड़ा राजनीतिक उलटफेर हो सकता है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में फर्क को समझने की जरूरत है। हमें इस बात को स्वीकार करना होगा कि 2014 में जब नरेंद्र मोदी चुनाव के मैदान में उतरे थे तो तब देश में कांग्रेस की सत्ता थी और वो भी 10 साल से। मोदी के हाथ 'विकास' का अमोघ अस्त्र हाथ लग गया था जिसके कंधे पर बैठकर वो नैया पार कर गए। लेकिन आज परिस्थितियां बिलकुल उलट है। जिस विकास को आगे कर नरेंद्र मोदी ने जनता से सैकड़ों वादे कर सत्ता संभाली उसे डिलीवर करने की जब बारी आयी तो भाजपा के नेता व कार्यकर्ता यह कहकर बचकानी हरकत करने लगे कि वो तो जुमला था। चाहे वह कालाधन को विदेश से लाने की बात हो, हर साल 2 करोड़ लोगों को रोजगार देने का हो, महंगाई कम करने का हो हर मोर्चे पर सरकार पिछड़ती नजर आ रही है। ऊपर से नोटबंदी और जीएसटी की मार ने आम आदमी और व्यापारी वर्ग की कमर तोड़ दी है। तो ऐसे में राहुल गांधी के लिए 2019 का चुनाव इस मायने में आसान हो गया है कि 2014 की मोदी की लाठी से ही राहुल की कांग्रेस के लिए मोदी की भाजपा को चारों खाने चित्त करने का अवसर है।

Tuesday, 3 October 2017

न्यू इंडिया के सपने की हकीकत

2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने जो वायदे देश की जनता से किए थे, अगर उसे भी पूरा करने में सरकार सफल रही तो खुद-ब-खुद नया भारत यानी न्यू इंडिया बन जाएगा। एक सुरक्षित, समृद्ध और मजबूत राष्ट्र बनाने का लक्ष्य नया नहीं है। सभी सरकारें सबके लिए रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, बिजली, स्वास्थ्य आदि मुहैया कराने पर जोर देती है और फिर हर प्रधानमंत्री ने अतीत में किसानों की आय बढ़ाने, युवाओं को रोजगार देने, भ्रष्टाचार और आतंकवाद से मुक्ति दिलाने, सामाजिक सद्भाव और सीमा सुरक्षा मजबूत करने का वादा किया है। फर्क सिर्फ इतना है कि अन्य प्रधानमंत्रियों के मुकाबले प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी लोगों को यह यकीन दिलाने में कामयाब दिख रहे हैं कि न्यू इंडिया का यह विजन उनकी पहुंच में है और यदि लोग उनके साथ मिलकर मतलब 2019 में उनकी सरकार को दोबारा चुनते हैं तो इस लक्ष्य को पाना आसान होगा।

न्यू इंडिया मतलब नया भारत। एक ऐसा भारत जहां कोई गरीब नहीं हो, कोई भूखा न हो, कोई अनपढ़ न हो, कोई बेरोजगार न हो, सर्वधर्मसम्भाव का मान हो, जय जवान-जय किसान का नारा बुलंद हो। आजादी के इन 70 सालों में एक के बाद एक आने वाली और जाने वाली सरकारें यह तो करती रही हैं। ऐसा भी नहीं है कि आजादी के समय जो भारत हमें मिली थी, जिस रूप में मिली थी उससे कहीं बेहतर भारत में आज हम रह रहे हैं, लेकिन कहते हैं कि बदलाव हमेशा अपने साथ कुछ विकृतियां भी लाती हैं और यही ध्यान रखने की होती है किसी भी सरकार और देशवासियों के लिए कि बदलाव को स्वीकार कर सामूहिक प्रतिबद्धता के साथ विकृतियों के खिलाफ लड़ाई लड़ें। यहीं आकर सब गड़बड़ हो जाती है। एक ओर जनता जहां अपनी सामूहिकता और प्रतिबद्धता को भूल जाती है और सरकार अपनी सत्ता को बचाने के लिए वोट बैंक की राजनीति में उलझ जाती है, अपनी प्रतिबद्धता को आगे के लिए टाल देती है।

इसे समझने के लिए इस कहानी को याद करना होगा। बात 1965 की है जब एक अमरिकी अखबार को दिए इंटरव्यू में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अमेरिका द्वारा वियतनाम में चलाए गए युद्ध को आक्रामक कार्य बताया था। शास्त्री जी की यह टिप्पणी तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन को नागवार गुजरी थी कि एक भूखा राष्ट्र अमेरिका को आक्रमणकारी कैसे कह सकता है? गुस्से में अमेरिका ने भारत को खाद्यान्न निर्यात पर पाबन्दी लगा दी। भारत की मुश्किलें बढ़ गईं। इस दौरान एक समय ऐसा आ गया था जब देश में मात्र सात दिनों का खाद्य भंडारण बाकी रह गया था। बढ़ते खाद्य संकट को देखते हुए शास्त्री जी ने देशवासियों से सोमवार को उपवास रखने की अपील की थी। साथ ही देश में खाद्य आत्म-निर्भरता लाने में किसानों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को समझाते हुए उन्होंने 'जय जवान जय किसान' का लोकप्रिय नारा उद्घोषित किया था। देश की जनता शास्त्री जी के एक आह्वान पर मुट्ठी बांध ली थी और हरित क्रांति तथा श्वेत क्रांति के रास्ते हमारा देश खाद्य व दुग्ध उत्पादन में इतना आत्मनिर्भर हो गया कि भारत खाद्यान्न का निर्यात करने लगा।

तो ये होती है जनता की सामूहिकता और सरकार की प्रतिबद्धता। आज देश की हालत यह है कि खेत में किसान अपनी जान देने को मजबूर हैं तो सरहद पर जवान आतंकवादियों के हाथों मर रहे हैं। किसान और जवान का इस तरह से मरना किसी भी राष्ट्र की सेहत के लिए बहुत ही खराब स्थिति होती है। अगर किसान नहीं बचे तो देश की 125 करोड़ जनता का पेट कौन भरेगा? सरहद की सुरक्षा में तैनात जवान अगर इसी तरह से आतंकियों के हाथों मरते रहे तो जब चीन या पाकिस्तान हमले कर देगा तो कौन लड़ेगा देश के लिए? और फिर इस हालात में न्यू इंडिया तो बनेगा लेकिन वह कैसा न्यू इंडिया बनेगा इसकी कल्पना से भी रूह कांप जाती है। इसलिए सरकार को यह तय करना होगा कि जिस नए भारत का सपना आजादी के वीर सपूतों ने देखा था उस सपने को साकार करने के लिए, एक नया भारत बनाने के लिए किसान और जवान दोनों की ताकत को बढ़ाना होगा। रोटी, कपड़ा और मकान के बाद शिक्षा का अधिकार, रोजगार की गारंटी, बेहतर स्वास्थ्य सेवा, महिलाओं की सुरक्षा, जातीय संघर्ष को जड़ से मिटाना और सामाजिक सद्भाव ये ऐसे बुनियादी मसले हैं जिसको मजबूती देकर हम एक नए भारत का निर्माण कर सकते हैं। अगर सरकार ऐसा कर सकी तो बाकी की समस्याएं मसलन महंगाई, गरीबी, भ्रष्टाचार, बिचौलिया संस्कृति आदि खुद-ब-खुद सुसाइड कर लेंगे।

लेकिन, राजनीतिक दलों पर पैनी नजर रखने वाली संस्था एडीआर ने कॉरपोरेट फंडिग के जो तथ्य देश के सामने रखे हैं वह इन्हीं राजनीतिक दलों में से बनी सरकार पर सवालिया निशान लगाती है कि क्या ये 'नया भारत' बनाएंगे? रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 के आम चुनाव में राजनीतिक दलों को जितना पैसा कॉरपोरेट फंडिंग से मिला उतना पैसा उससे पहले के 10 साल में नहीं मिला। एडीआर के मुताबिक, 2004 से 2013 के बीच कॉरपोरेट ने 460 करोड़ 83 लाख रुपये राजनीतिक दलों को फंडिंग किया। वहीं 2013 से 2015 के बीच कॉरपोरेट ने 797 करोड़ 79 लाख रुपये राजनीतिक दलों को फंडिंग किया। ध्यान रखिएगा कि ये आंकडे सिर्फ राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के हैं। यानी भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस पार्टी, एनसीपी और वामपंथी दलो को दिये गये फंड। एडीआर की इस रिपोर्ट से ही ये सच भी निकला है कि 80 फीसदी से ज्यादा कॉरपोरेट फंडिंग भाजपा को मिल रही है। अप्रैल 2012 से अप्रैल 2016 के बीच 956 करोड़ 77 लाख रुपये की कॉरपोरेट फंडिग हुई। इसमें से 705 करोड़ 81 लाख रुपये भाजपा के पास गये। 198 करोड़ 16 लाख रुपये कांग्रेस के पास गये।

यहां जिस पार्टी की सरकार 'न्यू इंडिया' की बात कर रही है उसी पार्टी को सबसे ज्यादा कॉरपोरेट चंदा मिल रहा है तो मेरा सवाल यह कि अगर कॉरपोरेट से इतना चंदा लेकर धन और बल की ताकत पर चुनाव जीतने का खेल जो राजनीतिक दल कर रही है उसकी कीमत भी तो सरकार को इन कॉरपोरेट घरानों को चुकानी होगी। क्योंकि ये कॉरपोरेट घराने चंदा समाजसेवा और जनकल्याण की नीतियों के लिए तो नहीं देते हैं। वो चंदा सिर्फ इसलिए देते हैं क्योंकि जब उस पार्टी की सरकार बनती है तो उससे अपने माफिक नीतियां बनवाकर अत्यधिक मुनाफा कमा सकें। लोकतंत्र में जब चुनाव होते हैं तो मतदाता यह देखता है कि कौन सा राजनीतिक दल और उसका नेता जनहित और देशहित में बेहतर साबित हो सकता है। कहने का मतलब यह कि चुनाव में हार और जीत का आधार उसका काम होता है। लेकिन बदलते भारत में जब चुनाव धनबल की ताकत से लड़ा जाने लगे तो तय मानिए कि देश उल्टी दिशा में चलने लगा है। चुनाव में जीत या हार अगर कॉरपोरेट तय करने लगे तो समझिए देश का विनाश तय है, वक्त जो भी लगे। फिर ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि इस हालात में 'न्यू इंडिया' का सपना तो कभी पूरा नहीं होने वाला।

Sunday, 1 October 2017

इन नीतियों से PM मोदी का कोई वास्ता नहीं

इसी साल जून महीने में एक खबर निकलकर आई थी कि मनमोहन सरकार के कार्यकाल में मंत्रियों और सांसदों ने पंचसितारा होटलों के बिल पर 10 साल में 19.77 करोड़ रुपए खर्च किए वहीं वर्तमान मोदी सरकार के मंत्रियों और सांसदों ने पिछले एक साल में ही इन पर 25 करोड़ रुपये खर्च कर दिए। नियमों के मुताबिक, सांसदों को शपथ लेने के दिन से रहने के लिए आवास उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी होती है। अगर आवास न भी उपलब्ध हो तो उन्हें स्टेट गेस्ट हाउस या फिर अशोका, जनपथ या सम्राट जैसे सरकारी होटलों में ठहराया जाता है। ऐसे में मोदी सरकार के मंत्री और हाउस कमेटी के चेयरमैन अर्जुन राम मेघवाल का यह जवाब कि वर्तमान लोकसभा में पहली बार 330 सांसद ऐसे हैं जिनका दिल्ली में कोई आवास नहीं है, ऐसे में होटल्स का बिल बढ़ना स्वभाविक है, बचकाना सा लगता है।

कल्याणकारी राज्य में भरोसा नहीं
दरअसल, मोदी सरकार ऐसी कोई नीति बनाने में भरोसा नहीं रखती जिसके तहत मंत्रियों और सांसदों की सुख-सुविधाओं में कटौती की बात हो। मोदी सरकार अपनी हर नीति में गरीबों के कल्याण की बात करती है, लेकिन यहां भी थोड़ी गहराई में जाकर इसकी छानबीन करें तो पाएंगे कि मोदी सरकार की कोई भी नीति गरीबों के कल्याण के लिए नहीं होती। दरअसल नरेंद्र मोदी कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में विश्वास ही नहीं रखते। इस बात का संकेत उन्होंने शुरू में ही मनरेगा का मजाक उड़ाकर दे दिया था। देश के सवा सौ करोड़ भाईयों-बहनों को सरकार ने बीच बाजार में लाकर खड़ा कर दिया जिसकी समझ में ये नहीं आ रहा कि आगे बढूं या पीछे की तरफ लौट जाऊं। क्योंकि आगे कुआं दिख रहा है तो पीछे खाई। विचलित मन:स्थिति के बीच खड़ा जनमानस अपना सब कुछ सरकार को समर्पित कर जिंदगी को दांव पर लगा चुका है।

गरीबों के पैसे से गरीबों की योजनाएं

जनधन योजना इस सरकार के व्यापार का पहला चरण था जब गरीबों की जेब से पैसा निकालकर बैंकों के हवाले किया गया। बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भी गरीबों के कल्याण की योजना बताई और लोगों ने इसे मान भी लिया। इसके बाद नोटबंदी दूसरा चरण था ताकि ज्यादा से ज्यादा डिजिटल मनी को बढ़ावा मिले और कॉरपोरेट घरानों को अतिरिक्त व्यापार। उनके बाजार का तीसरा चरण जीएसटी के रूप सामने आया और चौथा चरण पेट्रोल और डीजल पर बेहिसाब टैक्स। ऐसी और भी कई स्कीमें हैं जिसे पीएम मोदी ने सफलतापूर्वक लागू किया और इसे गरीबों के कल्याण से जोड़ दिया। जबकि हकीकत में यह बाजार का कंसालिडेशन था।

डिजिटल मनी से पूंजीपतियों की चांदी
अर्थशास्त्र का सिद्धांत कहता है कि एक खुदरा बाजार संगठित व्यापार के लिए हमेशा नुकसानदेह होता है इसलिए बाजार जितना संगठित हो वह व्यापारियों के लिए बहुत मुनाफे का सौदा होता है। जब इस दुनिया में नोट के रूप में करेंसी आयी थी तब उसका भी यही मकसद था कि लोग जिस तरह से आपस में लेनदेन करते हैं उससे बाजार कभी पूंजीपतियों के हवाले नहीं हो पायेगा। डिजिटल मनी उससे भी आगे का कदम है जो बाजार को पूंजीपतियों के हवाले करने में मदद पहुंचाएगा। पहले नोट के कारण बाजार में जो छुटभैये पैदा हो गये थे डिजिटल मनी और जीएसटी उनको साफ कर देंगें।

विपन्न लोगों का संपन्न देश होगा भारत
प्रधानमंत्री मोदी देश में ऐसी आर्थिक नीति लागू कर रहे हैं जिससे देश तो मजबूत होता दिख रहा है लेकिन लोग लगातार कमजोर होते जा रहे हैं। देश की समृद्धि का ग्राफ ऊपर उठेगा लेकिन लोगों की समृद्धि का ग्राफ लगातार नीचे चला जाएगा। देश में एक लाख लखपति पैदा होने की बजाय सौ करोड़पति पैदा हो जाएंगे जिससे ऊपर से देखने पर देश आंकड़ों में बहुत समृद्ध नजर आयेगा, आधारभूत ढांचा भी विकसित होता चला जाएगा लेकिन आम आदमी की मुश्किलें बढ़ती जाएंगी। पहले भारत संपन्न लोगों का विपन्न देश था लेकिन मोदी का कार्यकाल खत्म होते-होते भारत विपन्न लोगों का संपन्न देश बन जाएगा।

बहरहाल, शुरू में जो बातें की गईं कि मोदी राज में मंत्रियों और सांसदों की सुख-सुविधाओं में किसी तरह की कटौती की बात करना सरकार की नीति का हिस्सा नहीं है वह तभी सफल हो पाएगा जब कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को कुंद कर देंगे। मोदी सरकार ने बड़े ही होशियारी से गरीबों को नाम पर जनकल्याण योजनाएं बनाकर गरीबों से ही पैसे वसूलकर बैंकों और सरकार के खजाने भर लीं और उसे खुद की सुख सुविधाओं पर खर्च करने में उड़ा रही है या फिर कॉरपोरेट घरानों के कर्जों का सेटलमेंट करने में लगा रही है।