Saturday, 20 June 2020

चीन के खिलाफ ये कर पाए तो पलट सकती है बाजी

भारत-चीन के बीच हिंसक झड़प और उससे उपजे तनाव के बाद देश में चीनी उत्पादों के बहिष्कार करने का जो सैलाब उमड़ा हुआ है उसकी पृष्टिभूमि में 18 जून को एक खबर आई कि अमेजन इंडिया पर वनप्लस प्रो-8 की सेल चंद मिनटों में ही खत्म हो गईं। अमेजन ने इस बात की जानकारी तो नहीं दी कि सेल कितने मिनट में खत्म हुई, लेकिन इस दौरान इस चाइनीज हैंडसेट की सभी यूनिट्स बिक गईं। वाकई हम भारत के लोग इमोशन में अजब-गजब तरीके से सोच लेते हैं और मशाल लेकर निकल पड़ते हैं कि आज तो सारे चीनी प्रोडक्ट्स को आग के हवाले करके रहेंगे। लेकिन जब उस आग में मेड इन चाइना मोबाइल, लैपटॉप, टैबलेट और घर के दीवारों की शोभा बढ़ा रहे एचडी एलईडी स्मार्ट टीवी को डालने की बारी आती है तो होश फाख्ता हो जाते हैं कि अरे, इसके बिना तो जिंदगी ही बेनूर हो जाएगी। तो फिर हारकर चीनी तानाशाह शी जिनपिंग के पुतले को आग के हवाले कर हम अपना गुबार निकाल लेते हैं और यह मान लेते हैं कि हमने चीन को युद्ध में परास्त कर दिया। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है जिसे देश की जनता समझ नहीं पाती है। वह ये भी नहीं समझ पाती कि चीन बार-बार हमारी पीठ में छूरा घोंपता है तो हमारी सरकार चीनी सामान का आयात बंद क्यों नहीं कर देती। और अगर आयात बैन नहीं कर सकती तो फिर सरकार हमें आत्मनिर्भर भारत का पाठ क्यों पढ़ा रही है?

दरअसल, भारत और चीन के बीच गलवान घाटी में पिछले दिनों हुए खूनी टकराव ने एक बार फिर से भारत में चीनी कंपनियों के बिजनेस और दबदबे को लेकर विमर्श को उभार दिया है। लोग सीधे तौर पर सोच लेते हैं कि भारत चीन के लिए एक बहुत बड़े बाजार के रूप में है और अगर भारत सरकार उसके सामान को आयात करना बंद कर दे तो चीन की आर्थिक कमर टूट जाएगी। लेकिन हम उन तथ्यों से अनजान हैं कि चीन की कंपनियों के सस्ते उत्पादों ने भारत में अपनी जड़ें इस कदर जमा ली हैं कि उनको उखाड़ पाना बेहद मुश्किल है। सच बात तो यह है कि भारत किसी भी देश का इंपोर्ट या एक्सपोर्ट को बंद नहीं कर सकता। इसकी वजह विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) है। डब्ल्यूटीओ के नियमों के मुताबिक, किसी देश की सरकार आयात या निर्यात को एकदम से बंद नहीं कर सकती। अगर ऐसा होने लग जाए तो ग्लोबलाइजेशन ही खत्म हो जाएगा। दिक्कत की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो कुछ कहते हैं लगो उसे समझ नहीं पाते हैं। उनका कहना है कि देश आत्मनिर्भर बने। इसका मतलब किसी का बहिष्कार करना नहीं होता है। ग्राहक और कंपनी अपने स्तर से चाहें तो कर सकते हैं, लेकिन डब्ल्यूटीओ से बंधी सरकार ऐसा नहीं कर सकती। दूसरी बात यह है कि चीनी कंपनियों के प्रोडक्ट्स की घुसपैठ भारत के बाजार में इस कदर हो चुकी है उससे निकलना कठिन ही नहीं असंभव जैसा है। इस समझने के लिए इन आंकड़ों पर गौर फरमाना जरूरी है कि ताकि हम जान सकें कि चीन की किन कंपनियों की भारत में किस सेक्टर में कितनी हिस्सेदारी है और अगर उनको हटा दिया जाए तो भारत के पास उसका क्या विकल्प हो सकता है...

1. स्मार्टफोन की बात करें तो भारत में इसका बाजार 2 लाख करोड़ रुपए का है और इसमें 72 प्रतिशत हिस्सा चीनी कंपनियों के प्रोडक्ट का है। अगर आप विकल्प की बात करेंगे तो इस मामले में भारत के पास कोई ऑप्सन नहीं है। क्योंकि चीन के ब्रांड हर प्राइस सेगमेंट में और आरएंडडी में काफी आगे हैं।

2. भारत में टेलीविजन का बाजार करीब 25,000 करोड़ रुपए का है। इसमें चीनी कंपनियों की स्मार्ट टीवी की हिस्सेदारी 42 से 45 प्रतिशत है। नॉन स्मार्ट टीवी की हिस्सेदारी 7-9 प्रतिशत है। भारत इस बाजार को तोड़ तो सकता है, लेकिन यह काफी महंगा पड़ेगा। क्योंकि भारत की तुलना में चीन की स्मार्ट टीवी 20-45 प्रतिशत तक सस्ती है और भारतीय खरीददार की जेब इसके लिए तैयार नहीं है।

3. भारत में टेलीकॉम इक्विपमेंट का बाजार 12,000 करोड़ रुपए का है। इसमें चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत के आसपास है। इस बाजार को भी भारत तोड़ सकता है, लेकिन यह भी काफी महंगा पड़ेगा। इसी तरह से होम अप्लायंसेस की बात करें तो इस सेगमेंट का मार्केट साइज 50 हजार करोड़ रुपए का है। इसमें चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 10-12 प्रतिशत है। भारत के लिए इस बाजार को भी अपने कब्जे में किया जा सकता है, लेकिन चीन के बड़े ब्रांड काफी सस्ते में भारत में उपलब्ध हैं।

4. ऑटो कंपोनेंट सेगमेंट का मार्केट भारत में 57 अरब डॉलर का है। इसमें चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 26 प्रतिशत है। भारत के लिए इस बाजार को तोड़ना बहुत ही मुश्किल है। क्योंकि आरएंडी पर काफी पैसा खर्च करना होगा जिसके लिए भारत की कंपनियां तैयार नहीं है। यही हालत सोलर पावर मार्केट का है। इस मार्केट का साइज 37 हजार 916 मेगावाट का है। इसमें चीन की कंपनियों का हिस्सा 90 प्रतिशत है। भारत के लिए यह इसलिए मुश्किल है क्योंकि घरेलू स्तर पर उत्पादन काफी कमजोर है और विकल्प बना भी लिया तो चीन की तुलना में काफी महंगा होगा।

5. अब बात करते हैं दवा कारोबार की। भारत में फार्मा एपीआई का मार्केट साइज 2 अरब डॉलर का है। इसमें चीन की कंपनियों की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत है। फार्मा सेक्टर के जानकारों का कहना है कि इस मार्केट में चीन को पछाड़ना नामुमकिन है। क्योंकि अन्य सोर्स काफी महंगे हैं और साथ ही रेगुलेटरी मुश्किलें भी गंभीर हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अभी भी कोरोना महामारी से निपटने के लिए कई अहम उपकरणों जैसे कि इंफ़्रा रेड थर्मामीटर, पल्स ऑक्सीमीटर आदि चीन से ही मंगाए जा रहे हैं।

उपरोक्त तमाम तथ्यों का निष्कर्ष यही है कि हमें जो प्रोडक्ट बाजार में 10 रुपए में मिल रहा है, वही प्रोडक्ट अगर चीन 5 से 6 रुपए में देने के लिए बैठा है और ऊपर से हमारे देश की 85 प्रतिशत आबादी की प्रति व्यक्ति आय इतनी कम है कि वह चाहकर भी चाइनीज प्रोडक्ट को अपनी जिंदगी से बाहर नहीं कर सकता। कहने का मतलब यह कि अगर हम बेहतरीन फीचर्स वाले स्मार्टफोन और स्मार्ट टीवी के स्क्रीन पर खेलना बंद करने की ठान लें तो चीन से हारी बाजी को पलटा जा सकता है। क्योंकि स्मार्टफोन और स्मार्ट टीवी ने जिंदगी को गुलाम बना लिया है। हर शख्स घर में आटा से पहले मोबाइल में डाटा है कि नहीं इसकी चिंता पहले करता है और यहीं से शुरू होती है हमारी हार का सिलसिला। और इस वक्त कोरोना काल में जिस तरह से हर कोई लॉकडाउन की मार झेल रहा है, वर्क फ्रॉम होम में जिस तरह से मोबाइल और कंप्यूटर उसकी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन गया है, चीनी उत्पाद को भारतीय बाजार से बेदखल करने की सोच को जमीन पर उतारना चांद को छूने जैसा ही है। 

चीन-भारत व्यापार के जानकारों की बात करें तो इस बात को वो भी मानते हैं कि चीन से व्यापारिक प्रतिबंध तोड़ने और उनके सामानों के आयात को लेकर उपजा विरोध सही है, लेकिन वो इस बात से भी इत्तफाक रखते हैं कि हमें इससे पहले अपने देश के व्यावहारिक अड़चनों को दूर करना होगा। उसे कई स्पेशल इकोनॉमिक जोन तैयार करने होंगे ताकि हम पहले आत्मनिर्भर बनें। ऐसे जोन में सस्ती जमीन उपलब्ध कराकर सरकार उद्यमियों को जीएसटी में डिस्काउंट देकर, टैक्स हॉलिडे प्रदान करे, श्रम कानूनों को आसान बनाए तो इस तरह से धीरे-धीरे हम आत्मनिर्भर हो सकते हैं और चीन के ऊपर हमारी निर्भरता समाप्त हो सकती है। लेकिन इस काम में लंबा वक्त लगेगा। 1962 के बाद से हमारी सरकारों ने इस दिशा में काफी काम किया भी, लेकिन जबसे हमने नेहरू की मिक्स्ड इकनॉमी को छोड़कर पूंजीवादी आर्थिक उदारीकरण के दौर में प्रवेश किया और पिछले एक दशक में जिस तरह से डिजिटलाइजेशन के मकड़जाल में खुद को फंसाया, हमारी निर्भरता चीन पर लगातार बढ़ती गई। आर्थिक उदारीकरण और डिजिटलाइजेशन के दौर में जब शॉर्टकट तरीके से हम भारत के लोग चांद को छूने की कोशिश करने लगे तो इसी दौर में हमने अपनी आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को भी भुला दिया। उसका नतीजा ये हुआ कि आज तमाम अंग्रेजी दवाओं के लिए चीनी कच्चा माल और वैक्सीनेशन के लिए बिल गेट्स की हैल्थ केयर कंपनियों पर हमारी निर्भरता उस स्तर पर पहुंच गई जहां से आत्मनिर्भर भारत की बात बेमानी सी लगती है। क्योंकि उसके पीछे की नीति और नीयत दोनों संदेह से परे नहीं है।

Thursday, 18 June 2020

खत्म होना चाहिए अब 'हिन्दी-चीनी भाई-भाई' का खेल

ये पहली बार नहीं जब चीन ने भारत को उकसाया हो। चीन में कम्युनिस्ट सरकार आने के 10 साल बाद से ही भारत-चीन के बीच सीमा विवाद शुरू हो गया था और खास बात यह भी कि इसकी शुरुआत भी चीन ने ही की थी। नतीजा ये हुआ कि भारत हिंदी-चीनी भाई-भाई करता रहा और चीन हमारी पीठ में छुरा भोंकता रहा। बात प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के पंचशील से 1962 की लड़ाई तक हो, या फिर पीएम नरेंद्र दामोदार दास मोदी के झूले से गलवान-2020 की विकट परिस्थिति हो, चीन से भारत के रिश्तों का रंग तो खून के लाल रंग के मानिंद ही रहा। हां, इसमें यह भी जानना जरूरी है कि इंदिरा गांधी एकमात्र ऐसी प्रधानमंत्री रहीं जिन्होंने कभी चीन की तरफ झांकने की कोशिश नहीं की। वह चीन की मुखर विरोधी थीं और जब तक प्रधानमंत्री रहीं, चीन राष्ट्राध्यक्ष की भारत की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं हुई। इंदिरा हमेशा अपने पिता की मौत का जिम्मेदार चीन को मानती थीं। फिलहाल इस पूरी कहानी को हम इन प्रमुख तथ्यों से समझ सकते हैं...

1. भारत और चीन के बीच 1 अप्रैल 1950 से डिप्लोमैटिक रिलेशन हैं। 1949 से लेकर 1958 तक चीन ने कभी सीमाओं को लेकर आपत्ति नहीं जताई। हालांकि, 1954 में चीन की एक किताब 'अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न चाइना' में छपे नक्शे में चीन ने लद्दाख को अपना हिस्सा बताया। बाद में जुलाई 1958 में भी चीन से निकलने वालीं दो मैगजीन 'चाइना पिक्टोरियल' और 'सोवियत वीकली' में भी चीन ने अपना जो नक्शा छापा, उसमें भारतीय इलाकों को भी शामिल किया गया। भारत ने दोनों ही बार इस पर आपत्ति जताई। लेकिन, चीन ने ये कह दिया कि ये नक्शे पुराने हैं और उनकी सरकार के पास नक्शे को ठीक करने का समय नहीं है। 1954 में चीन ने उत्तर प्रदेश के बाराहोती इलाके में भारतीय सैनिकों की तैनाती पर आपत्ति जताई थी। उस वक्त उत्तराखंड नहीं था और ये इलाका उत्तर प्रदेश में था। चीन का कहना था कि बाराहोती उसका हिस्सा है, जिसे वो वू-जी के नाम से पुकारता था। इसके बाद चीन ने भारतीय इलाकों में घुसपैठ शुरू कर दी। सितंबर 1956 में चीनी सैनिकों ने अरुणाचल के शिपकी-ला इलाके में घुसपैठ की। जुलाई 1958 में चीनी सैनिकों ने लद्दाख के पास खुरनाक किले पर कब्जा कर लिया। सितंबर-अक्टूबर 1958 में चीन अरुणाचल प्रदेश के लोहित फ्रंटियर डिविजन के अंदर तक आ गया।

2. भारत को अखबार के माध्यम से पता चला कि चीन ने शिंजियांग से लेकर तिब्बत के बीच एक हाईवे बनाया। इसकी सड़क अक्साई चिन से भी गुजरी है, जो भारतीय हिस्से में है। इसकी पुष्टि करने के लिए 1958 की गर्मियों में भारत ने दो टीम अक्साई चिन भेजी। चीन ने पहली टीम को गिरफ्तार ही कर लिया। दूसरी टीम जब लौटकर आई तो उसने बताया कि शिंजियांग-तिब्बत हाईवे बनकर तैयार है और उसकी सड़क अक्साई चिन से भी गुजर रही है। इस पर भारत ने 18 अक्टूबर 1958 को चीन को लेटर भी लिखा। चीन का जवाब आया कि जो हाईवे बना है, वो पूरी तरह से चीन के हिस्से में है। पूरी स्थिति पर उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन के राष्ट्रपति झोऊ इन-लाई को पत्र लिखा। इस पर लाई ने 23 जनवरी 1959 को जवाब दिया और सीमा विवाद का मुद्दा उठाते हुए दावा किया कि उसका 5 हजार स्क्वायर मील (करीब 13 हजार स्क्वायर किमी) का इलाका भारतीय सीमा में है। ये पहला ऐसा मौका था जब चीन ने आधिकारिक रूप से सीमा विवाद का मुद्दा उठाया। लाई ने ये भी कहा था कि उनकी सरकार 1914 में तय हुई मैकमोहन लाइन को नहीं मानती है। मैकमोहन लाइन 1914 में तय हुई थी। इसमें तीन पार्टियां थीं- ब्रिटेन, चीन और तिब्बत। उस समय ब्रिटिश इंडिया के विदेश सचिव सर हेनरी मैकमोहन थे। उन्होंने ब्रिटिश इंडिया और तिब्बत के बीच 890 किमी लंबी सीमा खींची। इसे ही मैकमोहन लाइन कहा गया। इस लाइन में अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा बताया गया था, लेकिन आजादी के बाद चीन ने दावा किया कि अरुणाचल तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा है और चूंकि तिब्बत पर अब उसका कब्जा है, इसलिए अरुणाचल भी उसी का हुआ। जबकि, भारत का कहना था कि जो भी ब्रिटिशों ने तय किया था, भारत उसी को मानेगा।


3. 3 दिसंबर 1961 को चीन ने भारत के सामने एक नया व्यापारिक समझौता पेश किया था। इस पर भारत ने साफ कर दिया कि जब तक चीन 1954 से पहले की स्थिति पर नहीं आता और अपने सैनिकों को वापस नहीं बुलाता, तब तक भारत हस्ताक्षर नहीं करेगा। इसका नतीजा ये हुआ कि भारत-चीन के बीच जो पहले व्यापारिक समझौता हुआ था, वो 23 मई 1962 को खत्म हो गया। 1959 के बाद पहली बार 8 सितंबर 1962 को चीन ने मैकमोहन लाइन को पार किया। 13 सितंबर 1962 को चीन ने फिर प्रस्ताव दिया कि अगर भारत समझौते पर हस्ताक्षर करने को तैयार होता है तो उसकी सेना 20 किमी पीछे जा सकती है। भारत इस पर बात करने को तैयार हो गया। लेकिन, 20 सितंबर को चीन के सैनिक और भारतीय सैनिकों के बीच झड़प हो गई। उसके बाद एक महीने तक बॉर्डर पर तनातनी रही और आखिरकार 20 अक्टूबर 1962 को दोनों देशों के बीच युद्ध शुरू हो गया। 22 नवंबर 1962 को युद्धविराम की घोषणा की गई।


4. 13 जून 1967 को चीन ने भारतीय दूतावास के दो अधिकारियों पर जासूसी का आरोप लगाते हुए उन्हें निष्कासित कर दिया और भारतीय दूतावास को सीज कर दिया। भारत ने भी यही किया और नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास को सीज कर दिया। हालांकि बाद में चीन ने भारतीय दूतावास के अधिकारियों को छोड़ दिया था। 11 सितंबर 1967 को चीन ने तिब्बत-सिक्किम सीमा के पास नाथू-ला में मोर्टार दागे। 1962 के युद्ध के बाद ये पहला मौका था, जब चीन ने गोलाबारी और फायरिंग की थी। इतना ही नहीं, चीन ने भारतीय सैनिकों के शव को अपने पास ही रख लिया और पांचवें दिन 15 सितंबर को वापस किया। न सिर्फ नाथू-ला बल्कि छोला के पास भी भारत-चीन के सैनिकों के बीच लड़ाई हुई। हालांकि, दोनों जगह चीनी सेना को ज्यादा नुकसान पहुंचा। नाथू-ला में भारत के 88 जवान शहीद हुए थे, जबकि चीन के 300 जवान मारे गए थे। वहीं, छोला में चीन के 40 जवानों की जान गई थी।

5. 1980 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास भारतीय सेना की तैनाती बढ़ा दी थी। साथ ही विवादित जगहों पर इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट का काम भी शुरू करवा दिया। 1984 में भारतीय सेना ने अरुणाचल प्रदेश के पास समदोरांग चू घाटी के पास पैट्रोलिंग बढ़ा दी। उसके दो साल बाद 1986 की सर्दियों में चीनी सेना भी समदोरांग चू घाटी में तैनात हो गई और वांडुंग में हेलीपैड बना दिया। चीन की इस हरकत पर उस वक्त के भारतीय आर्मी चीफ जनरल के. सुंदरजी ने इलाके में सेना तैनात कर दी। इससे चीनी सेना को पीछे जाना पड़ा था। 1987 तक चीन का रुख 1962 की तरह ही रहा और उसकी सेना बार-बार उकसा रही थी। हालांकि, उस समय विदेश मंत्री एनडी तिवारी और प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बातचीत से मसला सुलझा लिया।

6. जून 2017 में भी भारत-चीन की सेनाएं डोकलाम में 73 दिनों तक आमने-सामने थीं। दरअसल, भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों को सड़क बनाने से रोक दिया था। दोनों सेनाओं के बीच डोकलाम इलाके में तनातनी हुई थी। ये इलाका उस जगह है, जहां भारत, चीन और भूटान की सीमा मिलती है। इसे भूटान में डोकलाम और भारत में डोका-ला कहते हैं। हालांकि ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कालखंड था और है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति सी जिनपिंग कई बार मिले और झूला भी झूले लेकिन चीन कहां मानने वाला। जून 2017 के डोकलाम से जून 2020 में गलवान घाटी तक पहुंचने में चीन को सिर्फ तीन साल का वक्त लगा और अब वह एक बार फिर से 1962 जैसा युद्ध करने के लिए भारत को उकसा रहा है।

इन तमाम तथ्यों का लब्बोलुआब यह है कि पहले वह इधर-उधर की बातें करता है, तथ्यों में उलझाता है, उकसाता है, व्यापारिक समझौते का ताना-बाना बुनता है, भारत के सभी पड़ोसियों को पहले अपने आर्थिक जाल में फंसाता है, फिर उसे भारत के प्रति भड़काता है और फिर मौका पाकर पीठ पीछे हमला कर देता है। मतलब, चीनी ड्रैगन पहले शांति और दोस्ती के ठंडे पानी का दिखावा करता है, फिर आखिर में उगलता आग ही है। लिहाजा अब भारत के लिए यह जरूरी हो गया है कि हम अपनी विदेश नीति और आर्थिक नीति को रीसेट करें ताकि कम्युनिस्ट चीन जिसकी कथनी और करनी में बहुत फर्क है उसे समझने में कोई भूल न कर पाएं।

Tuesday, 16 June 2020

फिर से वही गलवान घाटी और हठ अक्साई चीन का

भारत के एक सैन्य अधिकारी और दो जवानों की जान लेने वाले चीनी ड्रैगन ने एक बार फिर उसी गलवान घाटी को चुना है जहां 1962 में भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ था और तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था- चीन ने भारत के पीठ में छूरा घोंपा है। इस बार भी लद्दाख में सीमा विवाद को शांति से सुलझाने की भारत की कोशिशों के बीच चीन ने भारत को बड़ा धोखा दिया। दरअसल, 6 जून को लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की बातचीत में दोनों पक्षों में बातचीत से विवाद सुलझाने पर सहमति बनी थी। इसी के चलते 16 बिहार रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल संतोष बाबू सोमवार रात चीनी पक्ष से बातचीत करने के लिए गए थे। पर चीन को तो गलवान में एक बार फिर भारत की पीठ में छूरा भोंकना था। गलवान घाटी के पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 के करीब यह बातचीत चल रही थी, जब भारतीय सैन्य दलों पर हमला किया गया। भारत ने इसका जवाब तो दिया, लेकिन चीनी ड्रैगन संख्या में ज्यादा थे। इस टकराव में कर्नल संतोष बाबू, हवलदार पालानी और सिपाही कुंदन झा समेत 20 सैनिक शहीद हो गए। चीन के भी 43 सैनिकों के हताहत होने की खबर है लेकिन, चीन की ओर से इस संबंध में आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। यह टकराव करीब 3 घंटे तक चला।

गलवान घाटी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर स्थित है। बगल में गलवान नदी बहती है। यह वही अक्साई चिन का इलाका है जिसे चीन ने अपने कब्जे में ले रखा है और इसी अक्साई चीन को लेकर भारतीय गृह मंत्री अमित शाह ने चीन को ललकारते हुए आर्टिकल 370 को खत्म करने के बहस के दौरान संसद में कहा था कि अक्साई चीन और पाक अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और हम इसे लेकर रहेंगे। भारत के प्रति चीन की नजरें तभी से वक्री हो गई हैं और कोरोना काल में ताइवान को लेकर भारत ने जिस तरह की कूटनीति रास्ते को अख्तियार किया वह आग में घी का काम किया। फिर से आते हैं गलवान पर। गलवान नदी काराकोरम रेंज की पूर्वी छोर समांगलिंग से निकलती है। फिर पश्चिम में बहते हुए श्योक नदी में मिल जाती है। गलवान घाटी का पूरा इलाका रणनीतिक रूप से भारत के लिए काफी अहम है। क्योंकि भारतीय सैनिक गलवान नदी में भी नाव के जरिए नियमित गश्त करते हैं, ताकि चीन के अतिक्रमण को रोका जा सके। इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो आप यह जान सकेंगे कि गलवान नदी का नाम गुलाम रसूल गलवान के नाम पर रखा गया है। रसूल गलवान लेह के रहने वाले थे। माना जाता है कि उन्होंने ही इस नदी को खोजा था और उन्हीं के नाम पर इस घाटी का नाम भी पड़ा। 1899 में इस नदी का पता लगाया गय था। गलवान घाटी भी अक्साई चिन क्षेत्र में है। इसके पश्चिमी इलाके पर 1956 से ही चीन अपने कब्जे का दावा करता आ रहा है। 1960 में अचानक गलवान नदी के पश्चिमी इलाके, आसपास की पहाड़ियों और श्योक नदी घाटी पर चीन अपना दावा करने लगा था। लेकिन भारत लगातार कहता रहा है कि अक्साई चिन उसका इलाका है। इसके बाद 1962 में भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ था।

1962 में चीन के भारतीय इलाकों पर कब्जों के दावों के बाद दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के सामने आ गई थीं। दरअसल, भारतीय गोरखा सैनिकों ने 4 जुलाई 1962 को घाटी में पहुंचने के लिए एक पोस्ट बनाई थी। इस पोस्ट ने समांगलिंग के एक चीनी पोस्ट के कम्युनिकेशन नेटवर्क को काट दिया जिसे चीन ने अपने ऊपर हमला बताया था। इसके बाद चीनी सैनिकों ने गोरखा पोस्ट को 100 गज की दूरी पर घेर लिया था। भारत ने चीन को धमकी दी थी कि वह इसे किसी भी कीमत पर खाली कराकर रहेगा। इसके बाद भारत ने चार महीने तक इस पोस्ट पर हेलिकॉप्टर के जरिए खाद्य और सैन्य सप्लाई जारी रखी थी। 20 अक्टूबर 1962 को भारत-चीन युद्ध शुरू हुआ। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने इसी गालवन पोस्ट पर भारी गोलीबारी और बमबारी के लिए एक बटालियन भेजा था। इस दौरान यहां 33 भारतीय मारे गए थे, कई कंपनी कमांडर और अन्य लोगों को चीनी सेना ने बंदी बना लिया था। इसके बाद से चीन ने अक्साई-चिन पर अपने दावों वाले पूरे क्षेत्र पर कब्जा कर लिया।

एक बार फिर चीन ने जिस तरीके से गलवान नदी के किनारे स्थित गलवान घाटी से युद्ध की भूमिका बांधी है, भारत को इसे हल्के में लेना बड़ी भूल होगी। एक ऐसा वक्त जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस के महासंकट से जूझ रहा है, बावजूद इसके चीन अगर भारत को ललकार रहा है तो भारत को यह बात समझनी होगी कि कहीं न कहीं उसकी कूटनीति में दिक्कत है। लिहाजा मोदी सरकार को अपनी विदेश नीति को नए सिरे से सजाना और संवारना होगा। कोरोना के बाद की दुनिया और चीन की दादागिरी से कुछ इसी तरह के संदेश मिल रहे हैं।

Friday, 12 June 2020

चीन की इस खतरनाक डिप्लोमेसी से बच पाएगा भारत?

कोरोना वायरस संक्रमितों और उससे बढ़ती मौतों के बीच पड़ोसी देशों मसलन चीन, नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान आदि की हरकतों से मुश्किल दौर में फंसता जा रहा है। और इस सबके पीछे चीन की 'डेब्ट ट्रैप डिप्लोमेसी' को असली वजह बताया जा रहा है। अब सवाल यह उठता है कि 'डेब्ट-ट्रैप डिप्लोमेसी' है क्या? जब कोई देश इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के नाम पर किसी अन्य देश को पहले कर्ज देता है और फिर उस देश को एक तरह से कब्जा लेता है तो इसे 'डेब्ट-ट्रैप डिप्लोमेसी' कहते हैं। ये शब्द खासतौर पर चीन के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है। इस संबंध में चीन का तर्क यह है कि इससे छोटे और विकासशील देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत होगा, लेकिन उसके विरोधी मानते हैं कि चीन ऐसा करके छोटे देशों को अपने कब्जे में करता है। इसे श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है... 

साल 2005 से 2015 तक महिंदा राजपक्षे श्रीलंका के राष्ट्रपति रहे और अब प्रधानमंत्री हैं। राजपक्षे को देश में तीन दशकों से जारी गृहयुद्ध को खत्म करने का श्रेय दिया जाता है लेकिन, राजपक्षे के ही दौर में श्रीलंका सबसे ज्यादा कर्ज के बोझ में दब गया। कहा जाता है कि राजपक्षे के कार्यकाल में श्रीलंका की भारत से दूरी और चीन से नजदीकियां बढ़ीं। ये अलग बात है कि इन नजदीकियों का फायदा श्रीलंका ने कम और चीन ने ज्यादा उठाया। राजपक्षे के राष्ट्रपति रहते ही श्रीलंका में हम्बनटोटा बंदरगाह प्रोजेक्ट पर काम शुरू हुआ था। इस प्रोजेक्ट के लिए 2007 से 2014 के बीच श्रीलंका की सरकार ने चीन से 1.26 अरब डॉलर का कर्ज लिया। ये कर्ज एक बार में नहीं बल्कि पांच किस्तों में लिया गया। हम्बनटोटा बंदरगाह पहले से ही चीन-श्रीलंका मिलकर बना रहे थे। इसे चीन की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी हार्बर इंजीनियरिंग ने बनाया है और इसमें 85 प्रतिशत धन चीन के एक्जिम बैंक ने लगाया था। लगातार कर्ज लेने का नतीजा ये हुआ कि श्रीलंका पर विदेशी कर्ज बढ़ता गया। ऐसा माना जाता है कि कर्ज बढ़ने की वजह से श्रीलंका को दिसंबर 2017 में हम्बनटोटा बंदरगाह चीन की मर्चेंट पोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड कंपनी को 99 साल के लिए लीज पर देना पड़ा। बंदरगाह के साथ ही श्रीलंका को 15 हजार एकड़ जमीन भी देनी पड़ी। ध्यान देने की बात ये है कि ये जमीन भारत की सीमा से सिर्फ 150 किमी की दूरी पर है। इस पूरे घटनाक्रम को एक मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है कि कैसे चीन पहले छोटे देश को इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर कर्ज देता है। उसे अपना कर्जदार बनाता है। और फिर उसकी संपत्ति को कब्जा लेता है।

ध्यान हो तो चीन 2013 से बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। इस प्रोजेक्ट का मकसद एशिया, यूरोप और अफ्रीका को सड़क, रेल और समुद्री मार्गों से जोड़ना है। इस पूरे प्रोजेक्ट पर एक ट्रिलियन डॉलर यानी 75 लाख करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। चीन के इस प्रोजेक्ट को जो देश समर्थन दे रहा है, उनमें से ज्यादातर अब चीन के कर्जदार बन चुके हैं। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर या सीपीईसी भी इसी परियोजना का हिस्सा है। इस पर चीन और पाकिस्तान दोनों मिलकर काम कर रहे हैं। ये कॉरिडोर चीन के काश्गर प्रांत को पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से जोड़ता है। इसकी लागत 46 अरब डॉलर (करीब 3.50 लाख करोड़ रुपए) है। इसमें भी करीब 80 प्रतिशत खर्च अकेले चीन कर रहा है। नतीजा-पाकिस्तान धीरे-धीरे चीन का कर्जदार देश बनता जा रहा है। आईएमएफ के मुताबिक, 2022 तक पाकिस्तान को चीन को 6.7 अरब डॉलर चुकाने हैं। पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका की तरह बांग्लादेश भी चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव प्रोजेक्ट का हिस्सा है। जनवरी 2019 तक चीन और बांग्लादेश के बीच 10 अरब डॉलर का कारोबार हो रहा था। ऐसा अनुमान है कि 2021 तक दोनों देशों के बीच 18 अरब डॉलर का कारोबार होने लगेगा। बांग्लादेश का चीन के प्रोजेक्ट का हिस्सा बनना इसलिए भी चिंता पैदा करता है क्योंकि ये कोलकाता के बेहद करीब से गुजरेगा।

कुछ दिनों पहले नेपाल ने एक नया नक्शा जारी किया, जिसमें उसने लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को अपना हिस्सा बताया। फिर 13 जून को इससे संबंधित विधेयक नेपाली संसद में पेश कर पारित किया गया। पूरी दुनिया को मालूम है कि ये तीनों ही भूभाग भारत का हिस्सा रहा है। जानकारों का मानना है कि इसके पीछे भी चीन का ही हाथ है। क्योंकि, चीन नेपाल को आर्थिक मदद कर रहा है। आपको याद हो तो पिछले साल अक्टूबर में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग दो दिन के दौरे पर नेपाल गए थे। ये 23 साल बाद पहला मौका था, जब चीन के किसी राष्ट्रपति ने नेपाल का दौरा किया था। इस दौरे में जिनपिंग ने नेपाल को इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए 56 अरब नेपाली रुपए (35 अरब रुपए) की मदद देने का ऐलान किया था। 

अमेरिकी वेबसाइट हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू की रिपोर्ट बताती है कि, चीन शुरू से ही छोटे देशों को कर्ज देता रहा है। 1950 और 1960 के दशक में चीन ने बहुत से छोटे-छोटे देशों को कर्ज दिया। ये ऐसे देश थे, जहां कम्युनिस्ट सरकारें थीं। जर्मनी की कील यूनिवर्सिटी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर जून 2019 में एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट को आधार मानें तो साल 2000 से लेकर 2018 के बीच दुनिया के कई छोटे देशों पर चीन की उधारी 500 अरब डॉलर से बढ़कर 5 ट्रिलियन डॉलर हो गई है। आज के हिसाब से 5 ट्रिलियन डॉलर की गणना करें तो यह 375 लाख करोड़ रुपए होते हैं। जानकार बताते हैं कि इस समय चीन दुनिया का सबसे बड़ा लेंडर यानी लोन देने वाला देश बन गया है। इतना लोन तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक ने भी नहीं दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो दुनियाभर की जीडीपी का 6 प्रतिशत के बराबर की राशि कर्ज के रूप में चीन ने दूसरे देशों को दिया है। 

दक्षिण एशियाई देशों से इतर बात करें तो कर्ज देने के लिए चीन की पहली पसंद अफ्रीकी देश हैं। इसका कारण है कि ज्यादातर अफ्रीकी देश गरीब और छोटे हैं और विकासशील भी। अक्टूबर 2018 में आई एक स्टडी बताती है कि हाल के कुछ सालों में अफ्रीकी देशों ने चीन से ज्यादा कर्ज लिया है। 2010 में अफ्रीकी देशों पर चीन का 10 अरब डॉलर (आज के हिसाब से 75 हजार करोड़ रुपए) का कर्ज था जो 2016 में बढ़कर 30 अरब डॉलर (2.25 लाख करोड़ रुपए) हो गया। अफ्रीकी देश जिबुती, दुनिया का इकलौता कम आय वाला ऐसा देश है जिस पर चीन का सबसे ज्यादा कर्ज है। जिबुती पर अपनी जीडीपी का 80 प्रतिशत से ज्यादा विदेशी कर्ज है। इसमें भी जितना कर्ज जिबुती पर है, उसमें से 77 प्रतिशत से ज्यादा कर्ज अकेला चीन का है। 

बहरहाल, चीन की 'डेब्ट-ट्रैप डिप्लोमेसी' को भारत के संदर्भ में देखें तो यह हमारे देश की राष्ट्रीय संप्रभुता, एकता व अखंडता के लिए  बेहद खतरनाक है। कोरोना महामारी के दौर में जब पूरी दुनिया भीषण आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही है, चीन एक ऐसा अकेला देश है जिसकी जीडीपी अभी भी प्लस में है और नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों को आर्थिक सहयोग देकर भारत को घेरने की रणनीति को सफल तरीके से अंजाम दे रहा है। तो ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या भारत चीन की 'डेब्ट-ट्रैप डिप्लोमेसी' से मुकाबला करने में सक्षम है? क्या अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया समेत दुनियाभर के 62 देशों के साथ मिलकर हम चीन की भारत के प्रति वक्र दृष्टि से बच सकते हैं?