ये पहली बार नहीं जब चीन ने भारत को उकसाया हो। चीन में कम्युनिस्ट सरकार आने के 10 साल बाद से ही भारत-चीन के बीच सीमा विवाद शुरू हो गया था और खास बात यह भी कि इसकी शुरुआत भी चीन ने ही की थी। नतीजा ये हुआ कि भारत हिंदी-चीनी भाई-भाई करता रहा और चीन हमारी पीठ में छुरा भोंकता रहा। बात प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के पंचशील से 1962 की लड़ाई तक हो, या फिर पीएम नरेंद्र दामोदार दास मोदी के झूले से गलवान-2020 की विकट परिस्थिति हो, चीन से भारत के रिश्तों का रंग तो खून के लाल रंग के मानिंद ही रहा। हां, इसमें यह भी जानना जरूरी है कि इंदिरा गांधी एकमात्र ऐसी प्रधानमंत्री रहीं जिन्होंने कभी चीन की तरफ झांकने की कोशिश नहीं की। वह चीन की मुखर विरोधी थीं और जब तक प्रधानमंत्री रहीं, चीन राष्ट्राध्यक्ष की भारत की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं हुई। इंदिरा हमेशा अपने पिता की मौत का जिम्मेदार चीन को मानती थीं। फिलहाल इस पूरी कहानी को हम इन प्रमुख तथ्यों से समझ सकते हैं...
1. भारत और चीन के बीच 1 अप्रैल 1950 से डिप्लोमैटिक रिलेशन हैं। 1949 से लेकर 1958 तक चीन ने कभी सीमाओं को लेकर आपत्ति नहीं जताई। हालांकि, 1954 में चीन की एक किताब 'अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न चाइना' में छपे नक्शे में चीन ने लद्दाख को अपना हिस्सा बताया। बाद में जुलाई 1958 में भी चीन से निकलने वालीं दो मैगजीन 'चाइना पिक्टोरियल' और 'सोवियत वीकली' में भी चीन ने अपना जो नक्शा छापा, उसमें भारतीय इलाकों को भी शामिल किया गया। भारत ने दोनों ही बार इस पर आपत्ति जताई। लेकिन, चीन ने ये कह दिया कि ये नक्शे पुराने हैं और उनकी सरकार के पास नक्शे को ठीक करने का समय नहीं है। 1954 में चीन ने उत्तर प्रदेश के बाराहोती इलाके में भारतीय सैनिकों की तैनाती पर आपत्ति जताई थी। उस वक्त उत्तराखंड नहीं था और ये इलाका उत्तर प्रदेश में था। चीन का कहना था कि बाराहोती उसका हिस्सा है, जिसे वो वू-जी के नाम से पुकारता था। इसके बाद चीन ने भारतीय इलाकों में घुसपैठ शुरू कर दी। सितंबर 1956 में चीनी सैनिकों ने अरुणाचल के शिपकी-ला इलाके में घुसपैठ की। जुलाई 1958 में चीनी सैनिकों ने लद्दाख के पास खुरनाक किले पर कब्जा कर लिया। सितंबर-अक्टूबर 1958 में चीन अरुणाचल प्रदेश के लोहित फ्रंटियर डिविजन के अंदर तक आ गया।
2. भारत को अखबार के माध्यम से पता चला कि चीन ने शिंजियांग से लेकर तिब्बत के बीच एक हाईवे बनाया। इसकी सड़क अक्साई चिन से भी गुजरी है, जो भारतीय हिस्से में है। इसकी पुष्टि करने के लिए 1958 की गर्मियों में भारत ने दो टीम अक्साई चिन भेजी। चीन ने पहली टीम को गिरफ्तार ही कर लिया। दूसरी टीम जब लौटकर आई तो उसने बताया कि शिंजियांग-तिब्बत हाईवे बनकर तैयार है और उसकी सड़क अक्साई चिन से भी गुजर रही है। इस पर भारत ने 18 अक्टूबर 1958 को चीन को लेटर भी लिखा। चीन का जवाब आया कि जो हाईवे बना है, वो पूरी तरह से चीन के हिस्से में है। पूरी स्थिति पर उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन के राष्ट्रपति झोऊ इन-लाई को पत्र लिखा। इस पर लाई ने 23 जनवरी 1959 को जवाब दिया और सीमा विवाद का मुद्दा उठाते हुए दावा किया कि उसका 5 हजार स्क्वायर मील (करीब 13 हजार स्क्वायर किमी) का इलाका भारतीय सीमा में है। ये पहला ऐसा मौका था जब चीन ने आधिकारिक रूप से सीमा विवाद का मुद्दा उठाया। लाई ने ये भी कहा था कि उनकी सरकार 1914 में तय हुई मैकमोहन लाइन को नहीं मानती है। मैकमोहन लाइन 1914 में तय हुई थी। इसमें तीन पार्टियां थीं- ब्रिटेन, चीन और तिब्बत। उस समय ब्रिटिश इंडिया के विदेश सचिव सर हेनरी मैकमोहन थे। उन्होंने ब्रिटिश इंडिया और तिब्बत के बीच 890 किमी लंबी सीमा खींची। इसे ही मैकमोहन लाइन कहा गया। इस लाइन में अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा बताया गया था, लेकिन आजादी के बाद चीन ने दावा किया कि अरुणाचल तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा है और चूंकि तिब्बत पर अब उसका कब्जा है, इसलिए अरुणाचल भी उसी का हुआ। जबकि, भारत का कहना था कि जो भी ब्रिटिशों ने तय किया था, भारत उसी को मानेगा।
3. 3 दिसंबर 1961 को चीन ने भारत के सामने एक नया व्यापारिक समझौता पेश किया था। इस पर भारत ने साफ कर दिया कि जब तक चीन 1954 से पहले की स्थिति पर नहीं आता और अपने सैनिकों को वापस नहीं बुलाता, तब तक भारत हस्ताक्षर नहीं करेगा। इसका नतीजा ये हुआ कि भारत-चीन के बीच जो पहले व्यापारिक समझौता हुआ था, वो 23 मई 1962 को खत्म हो गया। 1959 के बाद पहली बार 8 सितंबर 1962 को चीन ने मैकमोहन लाइन को पार किया। 13 सितंबर 1962 को चीन ने फिर प्रस्ताव दिया कि अगर भारत समझौते पर हस्ताक्षर करने को तैयार होता है तो उसकी सेना 20 किमी पीछे जा सकती है। भारत इस पर बात करने को तैयार हो गया। लेकिन, 20 सितंबर को चीन के सैनिक और भारतीय सैनिकों के बीच झड़प हो गई। उसके बाद एक महीने तक बॉर्डर पर तनातनी रही और आखिरकार 20 अक्टूबर 1962 को दोनों देशों के बीच युद्ध शुरू हो गया। 22 नवंबर 1962 को युद्धविराम की घोषणा की गई।
4. 13 जून 1967 को चीन ने भारतीय दूतावास के दो अधिकारियों पर जासूसी का आरोप लगाते हुए उन्हें निष्कासित कर दिया और भारतीय दूतावास को सीज कर दिया। भारत ने भी यही किया और नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास को सीज कर दिया। हालांकि बाद में चीन ने भारतीय दूतावास के अधिकारियों को छोड़ दिया था। 11 सितंबर 1967 को चीन ने तिब्बत-सिक्किम सीमा के पास नाथू-ला में मोर्टार दागे। 1962 के युद्ध के बाद ये पहला मौका था, जब चीन ने गोलाबारी और फायरिंग की थी। इतना ही नहीं, चीन ने भारतीय सैनिकों के शव को अपने पास ही रख लिया और पांचवें दिन 15 सितंबर को वापस किया। न सिर्फ नाथू-ला बल्कि छोला के पास भी भारत-चीन के सैनिकों के बीच लड़ाई हुई। हालांकि, दोनों जगह चीनी सेना को ज्यादा नुकसान पहुंचा। नाथू-ला में भारत के 88 जवान शहीद हुए थे, जबकि चीन के 300 जवान मारे गए थे। वहीं, छोला में चीन के 40 जवानों की जान गई थी।
5. 1980 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास भारतीय सेना की तैनाती बढ़ा दी थी। साथ ही विवादित जगहों पर इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट का काम भी शुरू करवा दिया। 1984 में भारतीय सेना ने अरुणाचल प्रदेश के पास समदोरांग चू घाटी के पास पैट्रोलिंग बढ़ा दी। उसके दो साल बाद 1986 की सर्दियों में चीनी सेना भी समदोरांग चू घाटी में तैनात हो गई और वांडुंग में हेलीपैड बना दिया। चीन की इस हरकत पर उस वक्त के भारतीय आर्मी चीफ जनरल के. सुंदरजी ने इलाके में सेना तैनात कर दी। इससे चीनी सेना को पीछे जाना पड़ा था। 1987 तक चीन का रुख 1962 की तरह ही रहा और उसकी सेना बार-बार उकसा रही थी। हालांकि, उस समय विदेश मंत्री एनडी तिवारी और प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बातचीत से मसला सुलझा लिया।
6. जून 2017 में भी भारत-चीन की सेनाएं डोकलाम में 73 दिनों तक आमने-सामने थीं। दरअसल, भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों को सड़क बनाने से रोक दिया था। दोनों सेनाओं के बीच डोकलाम इलाके में तनातनी हुई थी। ये इलाका उस जगह है, जहां भारत, चीन और भूटान की सीमा मिलती है। इसे भूटान में डोकलाम और भारत में डोका-ला कहते हैं। हालांकि ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कालखंड था और है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति सी जिनपिंग कई बार मिले और झूला भी झूले लेकिन चीन कहां मानने वाला। जून 2017 के डोकलाम से जून 2020 में गलवान घाटी तक पहुंचने में चीन को सिर्फ तीन साल का वक्त लगा और अब वह एक बार फिर से 1962 जैसा युद्ध करने के लिए भारत को उकसा रहा है।
इन तमाम तथ्यों का लब्बोलुआब यह है कि पहले वह इधर-उधर की बातें करता है, तथ्यों में उलझाता है, उकसाता है, व्यापारिक समझौते का ताना-बाना बुनता है, भारत के सभी पड़ोसियों को पहले अपने आर्थिक जाल में फंसाता है, फिर उसे भारत के प्रति भड़काता है और फिर मौका पाकर पीठ पीछे हमला कर देता है। मतलब, चीनी ड्रैगन पहले शांति और दोस्ती के ठंडे पानी का दिखावा करता है, फिर आखिर में उगलता आग ही है। लिहाजा अब भारत के लिए यह जरूरी हो गया है कि हम अपनी विदेश नीति और आर्थिक नीति को रीसेट करें ताकि कम्युनिस्ट चीन जिसकी कथनी और करनी में बहुत फर्क है उसे समझने में कोई भूल न कर पाएं।
1. भारत और चीन के बीच 1 अप्रैल 1950 से डिप्लोमैटिक रिलेशन हैं। 1949 से लेकर 1958 तक चीन ने कभी सीमाओं को लेकर आपत्ति नहीं जताई। हालांकि, 1954 में चीन की एक किताब 'अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न चाइना' में छपे नक्शे में चीन ने लद्दाख को अपना हिस्सा बताया। बाद में जुलाई 1958 में भी चीन से निकलने वालीं दो मैगजीन 'चाइना पिक्टोरियल' और 'सोवियत वीकली' में भी चीन ने अपना जो नक्शा छापा, उसमें भारतीय इलाकों को भी शामिल किया गया। भारत ने दोनों ही बार इस पर आपत्ति जताई। लेकिन, चीन ने ये कह दिया कि ये नक्शे पुराने हैं और उनकी सरकार के पास नक्शे को ठीक करने का समय नहीं है। 1954 में चीन ने उत्तर प्रदेश के बाराहोती इलाके में भारतीय सैनिकों की तैनाती पर आपत्ति जताई थी। उस वक्त उत्तराखंड नहीं था और ये इलाका उत्तर प्रदेश में था। चीन का कहना था कि बाराहोती उसका हिस्सा है, जिसे वो वू-जी के नाम से पुकारता था। इसके बाद चीन ने भारतीय इलाकों में घुसपैठ शुरू कर दी। सितंबर 1956 में चीनी सैनिकों ने अरुणाचल के शिपकी-ला इलाके में घुसपैठ की। जुलाई 1958 में चीनी सैनिकों ने लद्दाख के पास खुरनाक किले पर कब्जा कर लिया। सितंबर-अक्टूबर 1958 में चीन अरुणाचल प्रदेश के लोहित फ्रंटियर डिविजन के अंदर तक आ गया।
2. भारत को अखबार के माध्यम से पता चला कि चीन ने शिंजियांग से लेकर तिब्बत के बीच एक हाईवे बनाया। इसकी सड़क अक्साई चिन से भी गुजरी है, जो भारतीय हिस्से में है। इसकी पुष्टि करने के लिए 1958 की गर्मियों में भारत ने दो टीम अक्साई चिन भेजी। चीन ने पहली टीम को गिरफ्तार ही कर लिया। दूसरी टीम जब लौटकर आई तो उसने बताया कि शिंजियांग-तिब्बत हाईवे बनकर तैयार है और उसकी सड़क अक्साई चिन से भी गुजर रही है। इस पर भारत ने 18 अक्टूबर 1958 को चीन को लेटर भी लिखा। चीन का जवाब आया कि जो हाईवे बना है, वो पूरी तरह से चीन के हिस्से में है। पूरी स्थिति पर उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन के राष्ट्रपति झोऊ इन-लाई को पत्र लिखा। इस पर लाई ने 23 जनवरी 1959 को जवाब दिया और सीमा विवाद का मुद्दा उठाते हुए दावा किया कि उसका 5 हजार स्क्वायर मील (करीब 13 हजार स्क्वायर किमी) का इलाका भारतीय सीमा में है। ये पहला ऐसा मौका था जब चीन ने आधिकारिक रूप से सीमा विवाद का मुद्दा उठाया। लाई ने ये भी कहा था कि उनकी सरकार 1914 में तय हुई मैकमोहन लाइन को नहीं मानती है। मैकमोहन लाइन 1914 में तय हुई थी। इसमें तीन पार्टियां थीं- ब्रिटेन, चीन और तिब्बत। उस समय ब्रिटिश इंडिया के विदेश सचिव सर हेनरी मैकमोहन थे। उन्होंने ब्रिटिश इंडिया और तिब्बत के बीच 890 किमी लंबी सीमा खींची। इसे ही मैकमोहन लाइन कहा गया। इस लाइन में अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा बताया गया था, लेकिन आजादी के बाद चीन ने दावा किया कि अरुणाचल तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा है और चूंकि तिब्बत पर अब उसका कब्जा है, इसलिए अरुणाचल भी उसी का हुआ। जबकि, भारत का कहना था कि जो भी ब्रिटिशों ने तय किया था, भारत उसी को मानेगा।
3. 3 दिसंबर 1961 को चीन ने भारत के सामने एक नया व्यापारिक समझौता पेश किया था। इस पर भारत ने साफ कर दिया कि जब तक चीन 1954 से पहले की स्थिति पर नहीं आता और अपने सैनिकों को वापस नहीं बुलाता, तब तक भारत हस्ताक्षर नहीं करेगा। इसका नतीजा ये हुआ कि भारत-चीन के बीच जो पहले व्यापारिक समझौता हुआ था, वो 23 मई 1962 को खत्म हो गया। 1959 के बाद पहली बार 8 सितंबर 1962 को चीन ने मैकमोहन लाइन को पार किया। 13 सितंबर 1962 को चीन ने फिर प्रस्ताव दिया कि अगर भारत समझौते पर हस्ताक्षर करने को तैयार होता है तो उसकी सेना 20 किमी पीछे जा सकती है। भारत इस पर बात करने को तैयार हो गया। लेकिन, 20 सितंबर को चीन के सैनिक और भारतीय सैनिकों के बीच झड़प हो गई। उसके बाद एक महीने तक बॉर्डर पर तनातनी रही और आखिरकार 20 अक्टूबर 1962 को दोनों देशों के बीच युद्ध शुरू हो गया। 22 नवंबर 1962 को युद्धविराम की घोषणा की गई।
4. 13 जून 1967 को चीन ने भारतीय दूतावास के दो अधिकारियों पर जासूसी का आरोप लगाते हुए उन्हें निष्कासित कर दिया और भारतीय दूतावास को सीज कर दिया। भारत ने भी यही किया और नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास को सीज कर दिया। हालांकि बाद में चीन ने भारतीय दूतावास के अधिकारियों को छोड़ दिया था। 11 सितंबर 1967 को चीन ने तिब्बत-सिक्किम सीमा के पास नाथू-ला में मोर्टार दागे। 1962 के युद्ध के बाद ये पहला मौका था, जब चीन ने गोलाबारी और फायरिंग की थी। इतना ही नहीं, चीन ने भारतीय सैनिकों के शव को अपने पास ही रख लिया और पांचवें दिन 15 सितंबर को वापस किया। न सिर्फ नाथू-ला बल्कि छोला के पास भी भारत-चीन के सैनिकों के बीच लड़ाई हुई। हालांकि, दोनों जगह चीनी सेना को ज्यादा नुकसान पहुंचा। नाथू-ला में भारत के 88 जवान शहीद हुए थे, जबकि चीन के 300 जवान मारे गए थे। वहीं, छोला में चीन के 40 जवानों की जान गई थी।
5. 1980 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास भारतीय सेना की तैनाती बढ़ा दी थी। साथ ही विवादित जगहों पर इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट का काम भी शुरू करवा दिया। 1984 में भारतीय सेना ने अरुणाचल प्रदेश के पास समदोरांग चू घाटी के पास पैट्रोलिंग बढ़ा दी। उसके दो साल बाद 1986 की सर्दियों में चीनी सेना भी समदोरांग चू घाटी में तैनात हो गई और वांडुंग में हेलीपैड बना दिया। चीन की इस हरकत पर उस वक्त के भारतीय आर्मी चीफ जनरल के. सुंदरजी ने इलाके में सेना तैनात कर दी। इससे चीनी सेना को पीछे जाना पड़ा था। 1987 तक चीन का रुख 1962 की तरह ही रहा और उसकी सेना बार-बार उकसा रही थी। हालांकि, उस समय विदेश मंत्री एनडी तिवारी और प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बातचीत से मसला सुलझा लिया।
6. जून 2017 में भी भारत-चीन की सेनाएं डोकलाम में 73 दिनों तक आमने-सामने थीं। दरअसल, भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों को सड़क बनाने से रोक दिया था। दोनों सेनाओं के बीच डोकलाम इलाके में तनातनी हुई थी। ये इलाका उस जगह है, जहां भारत, चीन और भूटान की सीमा मिलती है। इसे भूटान में डोकलाम और भारत में डोका-ला कहते हैं। हालांकि ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कालखंड था और है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति सी जिनपिंग कई बार मिले और झूला भी झूले लेकिन चीन कहां मानने वाला। जून 2017 के डोकलाम से जून 2020 में गलवान घाटी तक पहुंचने में चीन को सिर्फ तीन साल का वक्त लगा और अब वह एक बार फिर से 1962 जैसा युद्ध करने के लिए भारत को उकसा रहा है।
इन तमाम तथ्यों का लब्बोलुआब यह है कि पहले वह इधर-उधर की बातें करता है, तथ्यों में उलझाता है, उकसाता है, व्यापारिक समझौते का ताना-बाना बुनता है, भारत के सभी पड़ोसियों को पहले अपने आर्थिक जाल में फंसाता है, फिर उसे भारत के प्रति भड़काता है और फिर मौका पाकर पीठ पीछे हमला कर देता है। मतलब, चीनी ड्रैगन पहले शांति और दोस्ती के ठंडे पानी का दिखावा करता है, फिर आखिर में उगलता आग ही है। लिहाजा अब भारत के लिए यह जरूरी हो गया है कि हम अपनी विदेश नीति और आर्थिक नीति को रीसेट करें ताकि कम्युनिस्ट चीन जिसकी कथनी और करनी में बहुत फर्क है उसे समझने में कोई भूल न कर पाएं।

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