Friday, 12 June 2020

चीन की इस खतरनाक डिप्लोमेसी से बच पाएगा भारत?

कोरोना वायरस संक्रमितों और उससे बढ़ती मौतों के बीच पड़ोसी देशों मसलन चीन, नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान आदि की हरकतों से मुश्किल दौर में फंसता जा रहा है। और इस सबके पीछे चीन की 'डेब्ट ट्रैप डिप्लोमेसी' को असली वजह बताया जा रहा है। अब सवाल यह उठता है कि 'डेब्ट-ट्रैप डिप्लोमेसी' है क्या? जब कोई देश इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के नाम पर किसी अन्य देश को पहले कर्ज देता है और फिर उस देश को एक तरह से कब्जा लेता है तो इसे 'डेब्ट-ट्रैप डिप्लोमेसी' कहते हैं। ये शब्द खासतौर पर चीन के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है। इस संबंध में चीन का तर्क यह है कि इससे छोटे और विकासशील देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत होगा, लेकिन उसके विरोधी मानते हैं कि चीन ऐसा करके छोटे देशों को अपने कब्जे में करता है। इसे श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है... 

साल 2005 से 2015 तक महिंदा राजपक्षे श्रीलंका के राष्ट्रपति रहे और अब प्रधानमंत्री हैं। राजपक्षे को देश में तीन दशकों से जारी गृहयुद्ध को खत्म करने का श्रेय दिया जाता है लेकिन, राजपक्षे के ही दौर में श्रीलंका सबसे ज्यादा कर्ज के बोझ में दब गया। कहा जाता है कि राजपक्षे के कार्यकाल में श्रीलंका की भारत से दूरी और चीन से नजदीकियां बढ़ीं। ये अलग बात है कि इन नजदीकियों का फायदा श्रीलंका ने कम और चीन ने ज्यादा उठाया। राजपक्षे के राष्ट्रपति रहते ही श्रीलंका में हम्बनटोटा बंदरगाह प्रोजेक्ट पर काम शुरू हुआ था। इस प्रोजेक्ट के लिए 2007 से 2014 के बीच श्रीलंका की सरकार ने चीन से 1.26 अरब डॉलर का कर्ज लिया। ये कर्ज एक बार में नहीं बल्कि पांच किस्तों में लिया गया। हम्बनटोटा बंदरगाह पहले से ही चीन-श्रीलंका मिलकर बना रहे थे। इसे चीन की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी हार्बर इंजीनियरिंग ने बनाया है और इसमें 85 प्रतिशत धन चीन के एक्जिम बैंक ने लगाया था। लगातार कर्ज लेने का नतीजा ये हुआ कि श्रीलंका पर विदेशी कर्ज बढ़ता गया। ऐसा माना जाता है कि कर्ज बढ़ने की वजह से श्रीलंका को दिसंबर 2017 में हम्बनटोटा बंदरगाह चीन की मर्चेंट पोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड कंपनी को 99 साल के लिए लीज पर देना पड़ा। बंदरगाह के साथ ही श्रीलंका को 15 हजार एकड़ जमीन भी देनी पड़ी। ध्यान देने की बात ये है कि ये जमीन भारत की सीमा से सिर्फ 150 किमी की दूरी पर है। इस पूरे घटनाक्रम को एक मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है कि कैसे चीन पहले छोटे देश को इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर कर्ज देता है। उसे अपना कर्जदार बनाता है। और फिर उसकी संपत्ति को कब्जा लेता है।

ध्यान हो तो चीन 2013 से बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। इस प्रोजेक्ट का मकसद एशिया, यूरोप और अफ्रीका को सड़क, रेल और समुद्री मार्गों से जोड़ना है। इस पूरे प्रोजेक्ट पर एक ट्रिलियन डॉलर यानी 75 लाख करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। चीन के इस प्रोजेक्ट को जो देश समर्थन दे रहा है, उनमें से ज्यादातर अब चीन के कर्जदार बन चुके हैं। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर या सीपीईसी भी इसी परियोजना का हिस्सा है। इस पर चीन और पाकिस्तान दोनों मिलकर काम कर रहे हैं। ये कॉरिडोर चीन के काश्गर प्रांत को पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से जोड़ता है। इसकी लागत 46 अरब डॉलर (करीब 3.50 लाख करोड़ रुपए) है। इसमें भी करीब 80 प्रतिशत खर्च अकेले चीन कर रहा है। नतीजा-पाकिस्तान धीरे-धीरे चीन का कर्जदार देश बनता जा रहा है। आईएमएफ के मुताबिक, 2022 तक पाकिस्तान को चीन को 6.7 अरब डॉलर चुकाने हैं। पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका की तरह बांग्लादेश भी चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव प्रोजेक्ट का हिस्सा है। जनवरी 2019 तक चीन और बांग्लादेश के बीच 10 अरब डॉलर का कारोबार हो रहा था। ऐसा अनुमान है कि 2021 तक दोनों देशों के बीच 18 अरब डॉलर का कारोबार होने लगेगा। बांग्लादेश का चीन के प्रोजेक्ट का हिस्सा बनना इसलिए भी चिंता पैदा करता है क्योंकि ये कोलकाता के बेहद करीब से गुजरेगा।

कुछ दिनों पहले नेपाल ने एक नया नक्शा जारी किया, जिसमें उसने लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को अपना हिस्सा बताया। फिर 13 जून को इससे संबंधित विधेयक नेपाली संसद में पेश कर पारित किया गया। पूरी दुनिया को मालूम है कि ये तीनों ही भूभाग भारत का हिस्सा रहा है। जानकारों का मानना है कि इसके पीछे भी चीन का ही हाथ है। क्योंकि, चीन नेपाल को आर्थिक मदद कर रहा है। आपको याद हो तो पिछले साल अक्टूबर में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग दो दिन के दौरे पर नेपाल गए थे। ये 23 साल बाद पहला मौका था, जब चीन के किसी राष्ट्रपति ने नेपाल का दौरा किया था। इस दौरे में जिनपिंग ने नेपाल को इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए 56 अरब नेपाली रुपए (35 अरब रुपए) की मदद देने का ऐलान किया था। 

अमेरिकी वेबसाइट हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू की रिपोर्ट बताती है कि, चीन शुरू से ही छोटे देशों को कर्ज देता रहा है। 1950 और 1960 के दशक में चीन ने बहुत से छोटे-छोटे देशों को कर्ज दिया। ये ऐसे देश थे, जहां कम्युनिस्ट सरकारें थीं। जर्मनी की कील यूनिवर्सिटी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर जून 2019 में एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट को आधार मानें तो साल 2000 से लेकर 2018 के बीच दुनिया के कई छोटे देशों पर चीन की उधारी 500 अरब डॉलर से बढ़कर 5 ट्रिलियन डॉलर हो गई है। आज के हिसाब से 5 ट्रिलियन डॉलर की गणना करें तो यह 375 लाख करोड़ रुपए होते हैं। जानकार बताते हैं कि इस समय चीन दुनिया का सबसे बड़ा लेंडर यानी लोन देने वाला देश बन गया है। इतना लोन तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक ने भी नहीं दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो दुनियाभर की जीडीपी का 6 प्रतिशत के बराबर की राशि कर्ज के रूप में चीन ने दूसरे देशों को दिया है। 

दक्षिण एशियाई देशों से इतर बात करें तो कर्ज देने के लिए चीन की पहली पसंद अफ्रीकी देश हैं। इसका कारण है कि ज्यादातर अफ्रीकी देश गरीब और छोटे हैं और विकासशील भी। अक्टूबर 2018 में आई एक स्टडी बताती है कि हाल के कुछ सालों में अफ्रीकी देशों ने चीन से ज्यादा कर्ज लिया है। 2010 में अफ्रीकी देशों पर चीन का 10 अरब डॉलर (आज के हिसाब से 75 हजार करोड़ रुपए) का कर्ज था जो 2016 में बढ़कर 30 अरब डॉलर (2.25 लाख करोड़ रुपए) हो गया। अफ्रीकी देश जिबुती, दुनिया का इकलौता कम आय वाला ऐसा देश है जिस पर चीन का सबसे ज्यादा कर्ज है। जिबुती पर अपनी जीडीपी का 80 प्रतिशत से ज्यादा विदेशी कर्ज है। इसमें भी जितना कर्ज जिबुती पर है, उसमें से 77 प्रतिशत से ज्यादा कर्ज अकेला चीन का है। 

बहरहाल, चीन की 'डेब्ट-ट्रैप डिप्लोमेसी' को भारत के संदर्भ में देखें तो यह हमारे देश की राष्ट्रीय संप्रभुता, एकता व अखंडता के लिए  बेहद खतरनाक है। कोरोना महामारी के दौर में जब पूरी दुनिया भीषण आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही है, चीन एक ऐसा अकेला देश है जिसकी जीडीपी अभी भी प्लस में है और नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों को आर्थिक सहयोग देकर भारत को घेरने की रणनीति को सफल तरीके से अंजाम दे रहा है। तो ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या भारत चीन की 'डेब्ट-ट्रैप डिप्लोमेसी' से मुकाबला करने में सक्षम है? क्या अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया समेत दुनियाभर के 62 देशों के साथ मिलकर हम चीन की भारत के प्रति वक्र दृष्टि से बच सकते हैं?

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