भारत के एक सैन्य अधिकारी और दो जवानों की जान लेने वाले चीनी ड्रैगन ने एक बार फिर उसी गलवान घाटी को चुना है जहां 1962 में भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ था और तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था- चीन ने भारत के पीठ में छूरा घोंपा है। इस बार भी लद्दाख में सीमा विवाद को शांति से सुलझाने की भारत की कोशिशों के बीच चीन ने भारत को बड़ा धोखा दिया। दरअसल, 6 जून को लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की बातचीत में दोनों पक्षों में बातचीत से विवाद सुलझाने पर सहमति बनी थी। इसी के चलते 16 बिहार रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल संतोष बाबू सोमवार रात चीनी पक्ष से बातचीत करने के लिए गए थे। पर चीन को तो गलवान में एक बार फिर भारत की पीठ में छूरा भोंकना था। गलवान घाटी के पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 के करीब यह बातचीत चल रही थी, जब भारतीय सैन्य दलों पर हमला किया गया। भारत ने इसका जवाब तो दिया, लेकिन चीनी ड्रैगन संख्या में ज्यादा थे। इस टकराव में कर्नल संतोष बाबू, हवलदार पालानी और सिपाही कुंदन झा समेत 20 सैनिक शहीद हो गए। चीन के भी 43 सैनिकों के हताहत होने की खबर है लेकिन, चीन की ओर से इस संबंध में आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। यह टकराव करीब 3 घंटे तक चला।
गलवान घाटी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर स्थित है। बगल में गलवान नदी बहती है। यह वही अक्साई चिन का इलाका है जिसे चीन ने अपने कब्जे में ले रखा है और इसी अक्साई चीन को लेकर भारतीय गृह मंत्री अमित शाह ने चीन को ललकारते हुए आर्टिकल 370 को खत्म करने के बहस के दौरान संसद में कहा था कि अक्साई चीन और पाक अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और हम इसे लेकर रहेंगे। भारत के प्रति चीन की नजरें तभी से वक्री हो गई हैं और कोरोना काल में ताइवान को लेकर भारत ने जिस तरह की कूटनीति रास्ते को अख्तियार किया वह आग में घी का काम किया। फिर से आते हैं गलवान पर। गलवान नदी काराकोरम रेंज की पूर्वी छोर समांगलिंग से निकलती है। फिर पश्चिम में बहते हुए श्योक नदी में मिल जाती है। गलवान घाटी का पूरा इलाका रणनीतिक रूप से भारत के लिए काफी अहम है। क्योंकि भारतीय सैनिक गलवान नदी में भी नाव के जरिए नियमित गश्त करते हैं, ताकि चीन के अतिक्रमण को रोका जा सके। इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो आप यह जान सकेंगे कि गलवान नदी का नाम गुलाम रसूल गलवान के नाम पर रखा गया है। रसूल गलवान लेह के रहने वाले थे। माना जाता है कि उन्होंने ही इस नदी को खोजा था और उन्हीं के नाम पर इस घाटी का नाम भी पड़ा। 1899 में इस नदी का पता लगाया गय था। गलवान घाटी भी अक्साई चिन क्षेत्र में है। इसके पश्चिमी इलाके पर 1956 से ही चीन अपने कब्जे का दावा करता आ रहा है। 1960 में अचानक गलवान नदी के पश्चिमी इलाके, आसपास की पहाड़ियों और श्योक नदी घाटी पर चीन अपना दावा करने लगा था। लेकिन भारत लगातार कहता रहा है कि अक्साई चिन उसका इलाका है। इसके बाद 1962 में भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ था।
1962 में चीन के भारतीय इलाकों पर कब्जों के दावों के बाद दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के सामने आ गई थीं। दरअसल, भारतीय गोरखा सैनिकों ने 4 जुलाई 1962 को घाटी में पहुंचने के लिए एक पोस्ट बनाई थी। इस पोस्ट ने समांगलिंग के एक चीनी पोस्ट के कम्युनिकेशन नेटवर्क को काट दिया जिसे चीन ने अपने ऊपर हमला बताया था। इसके बाद चीनी सैनिकों ने गोरखा पोस्ट को 100 गज की दूरी पर घेर लिया था। भारत ने चीन को धमकी दी थी कि वह इसे किसी भी कीमत पर खाली कराकर रहेगा। इसके बाद भारत ने चार महीने तक इस पोस्ट पर हेलिकॉप्टर के जरिए खाद्य और सैन्य सप्लाई जारी रखी थी। 20 अक्टूबर 1962 को भारत-चीन युद्ध शुरू हुआ। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने इसी गालवन पोस्ट पर भारी गोलीबारी और बमबारी के लिए एक बटालियन भेजा था। इस दौरान यहां 33 भारतीय मारे गए थे, कई कंपनी कमांडर और अन्य लोगों को चीनी सेना ने बंदी बना लिया था। इसके बाद से चीन ने अक्साई-चिन पर अपने दावों वाले पूरे क्षेत्र पर कब्जा कर लिया।
एक बार फिर चीन ने जिस तरीके से गलवान नदी के किनारे स्थित गलवान घाटी से युद्ध की भूमिका बांधी है, भारत को इसे हल्के में लेना बड़ी भूल होगी। एक ऐसा वक्त जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस के महासंकट से जूझ रहा है, बावजूद इसके चीन अगर भारत को ललकार रहा है तो भारत को यह बात समझनी होगी कि कहीं न कहीं उसकी कूटनीति में दिक्कत है। लिहाजा मोदी सरकार को अपनी विदेश नीति को नए सिरे से सजाना और संवारना होगा। कोरोना के बाद की दुनिया और चीन की दादागिरी से कुछ इसी तरह के संदेश मिल रहे हैं।
गलवान घाटी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर स्थित है। बगल में गलवान नदी बहती है। यह वही अक्साई चिन का इलाका है जिसे चीन ने अपने कब्जे में ले रखा है और इसी अक्साई चीन को लेकर भारतीय गृह मंत्री अमित शाह ने चीन को ललकारते हुए आर्टिकल 370 को खत्म करने के बहस के दौरान संसद में कहा था कि अक्साई चीन और पाक अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और हम इसे लेकर रहेंगे। भारत के प्रति चीन की नजरें तभी से वक्री हो गई हैं और कोरोना काल में ताइवान को लेकर भारत ने जिस तरह की कूटनीति रास्ते को अख्तियार किया वह आग में घी का काम किया। फिर से आते हैं गलवान पर। गलवान नदी काराकोरम रेंज की पूर्वी छोर समांगलिंग से निकलती है। फिर पश्चिम में बहते हुए श्योक नदी में मिल जाती है। गलवान घाटी का पूरा इलाका रणनीतिक रूप से भारत के लिए काफी अहम है। क्योंकि भारतीय सैनिक गलवान नदी में भी नाव के जरिए नियमित गश्त करते हैं, ताकि चीन के अतिक्रमण को रोका जा सके। इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो आप यह जान सकेंगे कि गलवान नदी का नाम गुलाम रसूल गलवान के नाम पर रखा गया है। रसूल गलवान लेह के रहने वाले थे। माना जाता है कि उन्होंने ही इस नदी को खोजा था और उन्हीं के नाम पर इस घाटी का नाम भी पड़ा। 1899 में इस नदी का पता लगाया गय था। गलवान घाटी भी अक्साई चिन क्षेत्र में है। इसके पश्चिमी इलाके पर 1956 से ही चीन अपने कब्जे का दावा करता आ रहा है। 1960 में अचानक गलवान नदी के पश्चिमी इलाके, आसपास की पहाड़ियों और श्योक नदी घाटी पर चीन अपना दावा करने लगा था। लेकिन भारत लगातार कहता रहा है कि अक्साई चिन उसका इलाका है। इसके बाद 1962 में भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ था।
1962 में चीन के भारतीय इलाकों पर कब्जों के दावों के बाद दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के सामने आ गई थीं। दरअसल, भारतीय गोरखा सैनिकों ने 4 जुलाई 1962 को घाटी में पहुंचने के लिए एक पोस्ट बनाई थी। इस पोस्ट ने समांगलिंग के एक चीनी पोस्ट के कम्युनिकेशन नेटवर्क को काट दिया जिसे चीन ने अपने ऊपर हमला बताया था। इसके बाद चीनी सैनिकों ने गोरखा पोस्ट को 100 गज की दूरी पर घेर लिया था। भारत ने चीन को धमकी दी थी कि वह इसे किसी भी कीमत पर खाली कराकर रहेगा। इसके बाद भारत ने चार महीने तक इस पोस्ट पर हेलिकॉप्टर के जरिए खाद्य और सैन्य सप्लाई जारी रखी थी। 20 अक्टूबर 1962 को भारत-चीन युद्ध शुरू हुआ। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने इसी गालवन पोस्ट पर भारी गोलीबारी और बमबारी के लिए एक बटालियन भेजा था। इस दौरान यहां 33 भारतीय मारे गए थे, कई कंपनी कमांडर और अन्य लोगों को चीनी सेना ने बंदी बना लिया था। इसके बाद से चीन ने अक्साई-चिन पर अपने दावों वाले पूरे क्षेत्र पर कब्जा कर लिया।
एक बार फिर चीन ने जिस तरीके से गलवान नदी के किनारे स्थित गलवान घाटी से युद्ध की भूमिका बांधी है, भारत को इसे हल्के में लेना बड़ी भूल होगी। एक ऐसा वक्त जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस के महासंकट से जूझ रहा है, बावजूद इसके चीन अगर भारत को ललकार रहा है तो भारत को यह बात समझनी होगी कि कहीं न कहीं उसकी कूटनीति में दिक्कत है। लिहाजा मोदी सरकार को अपनी विदेश नीति को नए सिरे से सजाना और संवारना होगा। कोरोना के बाद की दुनिया और चीन की दादागिरी से कुछ इसी तरह के संदेश मिल रहे हैं।

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