Tuesday, 28 December 2021

मोदी के लिए कृषि कानूनों को फिर से लाना 2024 से पहले असंभव

मोदी है तो मुमकिन है का लोकप्रिय नारा विपक्ष का पीछा नहीं छोड़ रहा है और विपक्ष भी ऐसा कि इसी नारे की कालिख सत्ता के मुंह पर पोतकर चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश में जुटी है. आमतौर पर ऐसा होता नहीं है, लेकिन उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की गरमागरमी के बीच एक बार फिर से यह चर्चा तेज हो गई है कि जिन तीन कृषि कानूनों को हाल ही में रद्द किया गया है सरकार उसे फिर से ला सकती है. दरअसल, देश के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर अपने हालिया भाषण में कुछ ऐसा बोल गए जिसे देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने एक बड़े मुद्दे के तौर पर उछाल दिया है. अब कृषि मंत्री तोमर घूम-घूम कर सफाई देते फिर रहे हैं कि हमने ऐसा नहीं कहा है. यह विपक्ष की घिनौनी राजनीति है.

दरअसल, केंद्रीय कृषि मंत्री पिछले दिनों महाराष्ट्र के उस शहर में थे जो भाजपा की मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय भी है. इस शहर से सत्ता का कोई भी बयान जारी होता है तो उसके मायने निकाले जाते हैं. ऐसा ही हुआ कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के साथ. महाराष्ट्र के नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कृषि मंत्री ने जो बात कही उसे ध्यान से पढ़िए और शब्दों पर गौर कीजिए– ”हम कृषि सुधार कानून लेकर आए थे. कुछ लोगों को रास नहीं आया. लेकिन वो 70 वर्षों की आजादी के बाद एक बड़ा रिफॉर्म था जो नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में आगे बढ़ रहा था. लेकिन सरकार निराश नहीं है. हम एक कदम पीछे हटे हैं. आगे फिर बढ़ेंगे क्योंकि हिन्दुस्तान का किसान हिन्दुस्तान की बैक बोन है.”

क्या फिर से कृषि कानून ला सकती है सरकार?

असल में जब आप मंत्री जी के भाषण का वीडियो देखेंगे तो ज्यादा समझ में आएगा. ‘हम एक कदम पीछे हटे हैं. आगे फिर बढ़े हैं’ इस वाक्य को बोलने के दौरान मंत्री जी के चेहरे पर जो भाव था और जिस तरह की उत्तेजना झलकी वह इस बात को इंगित करने के लिए काफी है कि कोई इस भ्रम में न रहे कि सरकार ने तीन कृषि कानूनों को सदा के लिए रद्द किया है. उसे सत्ता अपने फायदे के लिए स्थगित किया है. वक्त निकल जाने के बाद उसे फिर से लाया जा सकता है. मतलब साफ है- मोदी है तो मुमकिन है. बस इसी मुद्दे को चुनावी हथियार बनाकर कांग्रेस पार्टी देश को यह बताने और समझाने में जुट गई है कि सरकार किसानों को चुनौती के अंदाज में कह रही है कि ”आंदोलन को खत्म करना था लिहाजा हम थोड़ा पीछे हटे हैं. इस भ्रम में मत रहना कि हम तुम्हारे साथ खड़े हो गए हैं.” कांग्रेस ने सरकार पर पूंजीपतियों के दबाव में दोबारा काले कानूनों को वापस लाने की साजिश रचने का आरोप लगाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से स्पष्टीकरण मांगा है. पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तोमर के इस बयान को पीएम मोदी की माफी का अपमान करार देते हुए कहा कि सरकार ने इन विवादास्पद कानूनों पर यदि फिर से अपने कदम आगे बढ़ाए तो देश का किसान फिर सत्याग्रह करेगा. पहले भी अहंकार को हराया था, फिर हराएंगे!

राकेश टिकैत की प्रतिक्रिया के मायने भी समझिए

अगर आपको याद हो तो गाजीपुर बॉर्डर छोड़ने से पहले भारतीय किसान आंदोलन के प्रवक्ता और किसान आंदोलन के प्रमुख चेहरा राकेश टिकैत ने कहा था कि किसान आंदोलन अभी खत्म नहीं हुआ है. आंदोलन अभी स्थगित हुआ है. हम फिर वापस आएंगे क्योंकि अभी तो सिर्फ तीन कृषि कानूनों की ही वापसी हुई है. फसलों की एमएसपी का असली मुद्दा तो अभी बचा ही हुआ है जिसपर सरकार को फैसला करना है. कृषि मंत्री के खलबली मचाने वाले बयान के तुरंत बाद राकेश टिकैत ने भी चेतावनी दे दी कि किसान आंदोलन फिर से शुरू हो सकता है. टिकैत की यह चेतावनी भी कोई ऐसी-वैसी जगह नहीं, किसानों के गढ़ और राजेश पायलट की कर्मभूमि राजस्थान के दौसा में मीडिया के बीच जारी की. टिकैत ने कहा कि केंद्र सरकार ने सिर्फ तीन कृषि कानून ही रद्द किए हैं, किसान संगठनों की अन्य मांगें अभी नहीं मानी गई हैं. सत्ता पक्ष टिकैत के बयान को भले ही ‘थोथा चना बाजे घना’ के अंदाज में ले रही हो, लेकिन किसान आंदोलन को करीब से समझने वाले विश्लेषक इस बात की तरफ इंगित कर रहे हैं कि टिकैत की प्रतिक्रिया को देखते हुए कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के बयान को हल्के में नहीं लिया जा सकता है. ऐसे भी तोमर का व्यक्तित्व गंभीर किस्म का है. लिहाजा उनके बयान को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और उसकी गंभीर व्याख्या होनी चाहिए ताकि इस बात का पता चल सके कि अगर फिर से कृषि कानून लेकर सरकार आती है तो उसका स्वरूप क्या होगा?

2024 से पहले कानून को फिर से लाना असंभव

हालांकि कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर कोई इकलौते नेता नहीं हैं जिन्होंने कृषि कानूनों को फिर से लाने की तरफ इशारा किया हो. उन्नाव से भाजपा सांसद साक्षी महाराज भी कह चुके हैं कि राष्ट्र विरोधी ताकतों की वजह से कृषि कानूनों को वापस लिया गया है. बिल का क्या है? बनता है, बिगड़ता है. फिर वापस आ जाएगा. राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र ने भी कुछ इसी तरह के संकेत देते हुए कह चुके हैं कि जरूरत पड़ी तो किसान बिल को फिर से ड्राफ्ट करके लाया जाएगा. लेकिन भाजपा नीत मोदी सत्ता 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले इस तरह का कोई रिस्क लेना नहीं चाहेगी. क्योंकि सरकार को भी अच्छे से पता है कि कानून कोई जादुई छड़ी नहीं कि घुमा दी और सुधार हो गया. भारत में हजारों कानून हैं, लेकिन कितने कारगर हैं ये कानून समस्याओं का समाधान कराने में? असल में सुधार, बदलाव या परिवर्तन एक प्रक्रियागत चीजें हैं जिसका सरकार द्वारा समग्र प्रबंधन किया जाना बेहद जरूरी होता है. 

कृषि कानूनों के संदर्भ में बात करें तो यहां सुधार या परिवर्तन के प्रबंधन पर जोर नहीं दिया गया, सिर्फ कायदे-कानून पर जोर दिया गया. इसी मूल वजह से सरकार को कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा. और उससे भी बड़ा सच यह कि प्रचार-प्रसार के बल पर सरकार बिग रिफॉर्म का एक परसेप्शन गढ़कर इन तीन कृषि कानूनों को लागू करना चाहती थी. चूंकि किसान देश की नब्ज जानते हैं, पहचानते हैं लिहाजा वो सत्ता की नीयत को आसानी से भांप गए. उन्हें सरकार की नीयत पर शक हुआ कि आखिर सत्ता चाहती क्या है? कृषि सुधारों का क्रियान्वयन कैसे होगा? कृषि सुधार के लिए जरूरी था कि तमाम स्टेकहोल्डर्स से, किसान संगठनों से संवाद किया जाता, इसके तहत सरकार और किसान अपना-अपना पक्ष रखते. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया. जिससे जैसे-तैसे सरकार ने पीछा छुड़ाया. अब आगामी चुनावों में किसानों द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एसएसपी) गारंटी कानून की मांग ही सरकार के लिए मुसीबत का सबब बना रहेगा. लिहाजा तीनों कृषि कानूनों को फिर से लाने का रिस्क कम से कम 2024 के लोकसभा चुनाव तक सरकार लेने की स्थिति में बिल्कुल नहीं है.

बहरहाल, आने वाले वक्त में मोदी सत्ता के समक्ष कई चुनौतियां हैं. बंगाल चुनाव में पराजय के बाद यूपी का चुनाव दोबारा से जीतना सबसे बड़ी चुनौती सामने खड़ी है. आरएसएस की भी अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं और उसकी चाहत है कि 2025 में संघ के शताब्दी समारोह का जश्न मोदी सत्ता की चकाचौंध में मने. लिहाजा संघ और भाजपा दोनों के लिए जरूरी है कि तमाम विवादित मसलों को किनारे रखकर येन-केन-प्रकारेण 2022 में यूपी फतह और फिर 2024 में देश का जनादेश भाजपा के पक्ष में खड़ा हो. ऐसे में इस बात के आसार कम ही हैं कि सरकार कृषि कानूनों को दोबारा से लाकर फिर से एक और किसान आंदोलन की मुसीबत मोल ले.

(27 दिसंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/farmers-protest-re-introducing-agricultural-laws-impossible-before-2024-977991.html 

Sunday, 26 December 2021

हां हैं भारत में ‘काम के घंटे’ सबसे ज्यादा, क्या कर लोगे?


देश में नए श्रम कानूनों (Labor Laws) को लागू करने की आहट फिर से सुनाई देने लगी है. कहा जा रहा है कि अगर ऐसा हुआ तो कर्मचारियों को हफ्ते में चार दिन ही काम करना पड़ेगा. बाकी के तीन दिन वो छुट्टियां मना सकेंगे. लेकिन क्या इससे भारत ऐसा देश भी बन सकेगा जहां दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले काम के घंटे कम हो जाएंगे? तो इसका जवाब है- बिल्कुल नहीं. काम के घंटे पहले की तरह ही सप्ताह में 48 घंटे की बनी रहेगी. इसमें कोई दो राय नहीं कि दुनिया के तमाम देशों में श्रम कानूनों के तहत काम के जो घंटे निर्धारित हैं उसमें भारत में काम के घंटे और काम का सप्ताह दुनिया में सबसे ज्यादा लंबा है. यह एक कठोर सत्य है. लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होने वाली. मुश्किलें और भी बढ़ने वाली हैं. हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ भारत में ही 48 घंटे का साप्ताहिक कार्य दिवस है. बांग्लादेश, वियतनाम, ब्रिटेन आदि में भी 48 घंटे का ही साप्ताहिक कार्य दिवस है, लेकिन ये भी सत्य है कि कानूनी तौर पर 48 घंटे से ज्यादा काम के घंटे दुनिया के किसी भी देश में नहीं है.

भारत में वाकई काम के घंटे सबसे ज्यादा हैं?

दुनिया के कई देशों में काम के घंटे की कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह से पालन नहीं किया जाता है. भारत भी इससे अछूता नहीं है. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) की पहली आवर्ती श्रम बल सर्वे (PLFS) के डेटा का तो यही कहना है कि दुनिया के अन्य देशों के कर्मचारियों की तुलना में भारत के लोग सबसे ज्यादा घंटे काम करते हैं. भारत की सांख्यिकी एजेंसी की ओर से काम के घंटे पर किया गया यह पहला आधिकारिक सर्वे है, जिसमें यह बात सामने आई कि यहां के शहरों में औसतन एक कर्मचारी हर हफ्ते 53 से 54 घंटे काम करता है और गांव में 46 से 47 घंटे. काम के ये घंटे अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की ओर से तय किए गए काम के घंटों की सीमा से ज्यादा है. हालांकि सरकार ने इस सर्वे को जारी नहीं किया. अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स और एजेंसियों के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया के कुछ प्रमुख देशों मसलन ऑस्ट्रेलिया में सप्ताह में 38 घंटा, दक्षिण कोरिया में 40 घंटा, फ्रांस में 35 घंटा, अमेरिका में 40 घंटा, रूस में 40 घंटे का ही कार्य दिवस तय है. आर्थिक इतिहासकार माइकल ह्यूबरमैन और क्रिस मिंस का अध्ययन इस बात की तस्दीक करता है कि दुनिया के ज्यादातर देशों खासतौर से अधिक आय वाले देशों में पिछले 150 सालों में काम के औसत घंटे में काफी कमी आई है. 1870 की औद्योगिक क्रांति के बाद काम के घंटे कम हुए. खासकर उन देशों में, जहां औद्योगीकरण पहले हुआ. लेकिन भारत जैसे देश में आर्थिक उदारीकरण की बयार के साथ गैरकानूनी तरीके से काम के घंटे को बढ़ा दिया गया. देश में बहुत सारे संस्थान इस रूप में काम करने लगे जो कागजी तौर पर तो श्रम कानूनों का अक्षरश: पालन करते हैं, लेकिन व्यवहार में इसकी घनघोर अनदेखी करते हैं.

क्यों होती है ‘काम के तय घंटे’ की अनदेखी?

मशहूर ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स ने 1930 में भविष्यवाणी की थी कि तकनीकी परिवर्तन और उत्पादकता में सुधार के साथ एक ऐसा वक्त आएगा जब हम सप्ताह में सिर्फ 15 घंटे काम कर रहे होंगे, मतलब हर रोज तीन घंटे काम. आज जब हम काम के घंटों के आंकड़ों में झांकते हैं तो हम में से अधिकांश अभी भी सप्ताह में औसतन 42 घंटे से अधिक काम कर रहे हैं. और भारत की तो बात ही जुदा है जहां कानूनी तौर पर दुनिया में सबसे ज्यादा, सप्ताह में 48 घंटे की कार्य अवधि तय है. आखिर कीन्स से गलती कहां हुई? हमें ऐसा लगता है कि कीन्स ने जिन चीजों को कम करके आंका, उनमें से एक है हमारे साथियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की मानवीय इच्छा. एक ऐसी इच्छा जो हममें से अधिकांश को जरूरत से ज्यादा काम करने के लिए मजबूर करता है. उन देशों में तो और भी ज्यादा जहां बड़ी आबादी के बीच भीषण बेरोजगारी और इस वर्क फोर्स का शोषण करने के लिए बड़े-बड़े महाजन यानि कॉरपोरेट हैं. दरअसल कीन्स एक कट्टर अर्थशास्त्री थे और इस बात की सूक्ष्मता को आंकने में चूक गए कि मानव जाति की सामाजिक व आर्थिक इच्छा से जुड़ी स्पर्धा भी एक फैक्टर हो सकता है जो अर्थशास्त्र के बने-बनाए सिद्धांत को झकझोर कर रख देता है. इससे इतर, श्रम कानून से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की आबादी का एक बड़ा श्रम बल असंगठित क्षेत्र से जुड़ा है. इन असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों का वेतन बहुत कम होता है, जिसकी वजह से उन्हें ज्यादा घंटे तक काम करने को मजबूर होना पड़ता है. हालांकि फैक्टरी अधिनियम 1948 में कहा गया है कि मजदूरों से सप्ताह में 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं कराया जा सकता और अगर इससे ज्यादा काम कराया जाता है तो ओवरटाइम देना होगा. लेकिन इसका पालन कितना हो पाता है वह किसी से छिपा नहीं है.

कहीं जापान जैसा हाल न हो जाए भारत का भी

अगर आप काम के घंटे को लेकर जापान के हालात का अध्ययन करें तो तथ्य काफी डराते भी हैं और चौंकाते भी हैं कि कहीं भारत का वर्क फोर्स जापान की तर्ज पर तो आगे नहीं बढ़ रहा. जापान जैसे देश में लोग रोजाना 16-16 घंटे काम कर रहे हैं. लोगों के काम करने के एडिक्शन से यहां की सरकार भी परेशान है. चेक गणराज्य की राजधानी प्रॉग में जन्मे डेविड टेसिन्स्की की जापानी श्रमिकों की दिनचर्या को दिखाने वाली उन तस्वीरों को कौन भूल सकता है. ‘The Man-Machine’ नाम की फोटो सीरिज वाली रिपोर्ट में डेविड कहते हैं कि उन्हें जापानी कर्मचारी रोबोट की तरह लगे. सालों-साल उनका एक ही रुटीन रहता है. सुबह काम पर निकलना, दिनभर काम, फिर ओवरटाइम, उसके बाद सहकर्मियों के साथ बातचीत, ड्रिंक्स और फिर देर रात घर वापसी. इतना ही नहीं, ज्यादातर लोग बस, ट्रेन जैसी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का इस्तेमाल करते हैं. टैक्सी लेना या खुद की कार रखना उनके जेब से बाहर की बात होती है. देर रात जब बस और ट्रेन बंद हो चुकी होती है तो कई वर्कर सड़क किनारे ही सो जाते हैं. डेविड कहते हैं कि लोग सड़कों पर भूत की तरह चलते हैं, खुद में खोए-खोए, नींद भरी आंखों के साथ. कई लोग तो खड़े-खड़े सोते मिले. इनमें से हर कोई यही कहता है कि बस पांच साल इस तरह काम कर लूं, फिर फलां पोजीशन पर पहुंच जाऊंगा. भारत में काम के घंटे की परिस्थिति की गंभीरता को समझने की अगर कोशिश की जाए तो संकेत अच्छे नहीं हैं. कोविड काल में हमने बहुत कुछ नंगी आंखों से देखा भी.

काम के घंटों में हो सकता है और इजाफा

साल 1870 की बात करें तो ज्यादातर देशों में लोग साल में 3,000 घंटे से अधिक काम करते थे, मतलब हर हफ्ते 60-70 घंटे. लेकिन आज के वक्त में काम के घंटे तब के मुकाबले आधे हो गए हैं, उदाहरण के लिए, जर्मनी में जहां काम के घंटे 60 प्रतिशत कम हुए हैं वहीं ब्रिटेन में काम के घंटों में 40 प्रतिशत की कमी आई है. लेकिन भारत और चीन की बात करें तो यहां काम के घंटे पहले से बढ़े हैं. भारत में 1970 में जहां लोग औसतन साल में 2,077 घंटे काम करते थे, साल 2020 में बढ़कर 2,117 घंटे हो गए यानि इसमें 2 फीसदी का इजाफा हुआ है. चीन का आंकड़ा भारत से भी दो कदम आगे है. यहां 1970 में लोग 1976 घंटे सालाना काम करते थे, 2020 में बढ़कर 2,174 घंटे हो गए यानि 10 फीसदी का इजाफा. पिछले पांच दशक का इतिहास इस बात की ताकीद करता है कि आने वाले दिनों में भारत में काम के घंटों में और इजाफा हो सकता है. अगर ऐसा हुआ तो ‘आठ घंटे का आंदोलन’ का वजूद ही मिट जाएगा जिसने लंबे संघर्ष के दौरान हजारों कुर्बानियां दीं. 1886 में एक नारा गढ़ा गया था- ‘आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे मनोरंजन!’ और इसी नारे के साथ अमेरिका के 13 हजार से अधिक व्यापारिक प्रतिष्ठानों में काम करने वाले करीब तीन लाख मजदूर अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए सड़कों पर उतर आए थे. कहते हैं कि ‘आठ घंटे का आंदोलन’ इन मजदूरों के पांच दशक के संघर्षों की गाथा का चरम था.

बहरहाल, हालात एक बार फिर से 1886 के पहले जैसी होती दिख रही है जब लोग हर दिन 15 घंटे से ज्यादा काम करते थे. कोविड महामारी के संकट से जूझ रही पूरी दुनिया और खासतौर से भारत में मजदूरों की जिंदगी तो खतरे में पड़ी ही, उसके 8 घंटे के कार्यदिवस पर भी सरकार और कॉरपोरेट का हथौड़ा चलने लगा है. फैक्ट्रियों से लेकर बड़े-बड़े कॉरपोरेट दफ्तरों तक में 8 घंटे के कार्यदिवस को आईना दिखाया जा रहा है और कहा जाने लगा है कि दफ्तर में आने का समय होता है, जाने का नहीं. आने वाले वक्त में 12 घंटे या उससे अधिक वक्त तक काम करने की परिस्थिति तमाम मजदूरों-कर्मचारियों, चाहे वह शारीरिक श्रम से जुड़ा हो या फिर मानसिक श्रम से, उसे शारीरिक, आर्थिक, पारिवारिक और सामाजिक तौर पर तोड़कर रख देगा, उसके अस्तित्व को नष्ट कर देगा. चूंकि श्रमिकों के हितों की रक्षा करने वाली तमाम संगठन और यूनियन्स पहले ही अपनी मौत मर चुकी हैं लिहाजा आने वाली मुश्किलों से लड़ने के लिए ‘दुनिया के मजदूरों एक हों’ का नारा फिर से बुलंद करने के अलावा और कोई मार्ग नहीं होगा.

(25 दिसंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/amidst-the-new-labor-laws-understand-why-india-has-the-highest-working-hours-in-the-whole-world-975387.html 

Friday, 24 December 2021

चुनाव सुधार (संशोधन) कानून 2021 : हड़बड़ी में गड़बड़ी की कहानी


देश ने एक बार फिर देखा कि विपक्ष के भारी विरोध और उसकी तमाम आशंकाओं के बीच केंद्र सरकार ने किस तरह से हड़बड़ी में चुनाव कानून (संशोधन) विधेयक, 2021 को बिना चर्चा के संसद के दोनों सदनों में ध्वनिमत पारित करा दिया. याद हो तो इससे पहले तीन कृषि विधेयकों को भी पारित कराने में सरकार ने इसी तरह की हड़बड़ी मचाई थी. अंजाम ये हुआ कि किसानों के एक साल से अधिक वक्त तक चले आंदोलनों के बाद सरकार को कानून रद्द करने का फैसला करना पड़ा. तो चुनाव सुधार बिल को भी संसद से पारित कराने में सरकार ने जो हड़बड़ी दिखाई यह विपक्ष के विरोध को जायज ठहराने का सबसे बड़ा आधार बन रहा है.

जब इस प्रस्तावित बिल को लोकसभा में पेश किया गया था तो कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा था कि विधेयक सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ है और हमारी निजता का उल्लंघन करता है. यह लोगों से उनके वोट देने के हक को छीन सकता है. लिहाजा इसे स्टैंडिंग कमेटी को भेजा जाए. एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि वोटर आईडी कार्ड और आधार को जोड़ना निजता के खिलाफ है और ऐसा करके सरकार चुनाव आयोग की स्वायत्ता पर सवाल उठा रही है. यह पूरी तरह लोकतंत्र के खिलाफ है. तो क्या वास्तव में विपक्ष जो कुछ कह रहा है वह जायज है और अगर ऐसा है तो क्या किसान आंदोलन की तर्ज पर देश में ‘लोकतंत्र बचाओ आंदोलन’ खड़ा किया जाएगा?

बिल पास कराने को लेकर हड़बड़ी से पैदा हुआ संदेह

सत्ता पक्ष जब भी किसी विधेयक को संसद से पारित कराकर उसे कानून बनाने में हड़बड़ी दिखाए, जोर-जबरदस्ती करे, विपक्ष की आवाज को दबाने की पुरजोर कोशिश करे तो इस बात को बल मिलता है कि विधेयक में गड़बड़ी को छिपाने के लिए सरकार चर्चा और बहस से बचती है. हड़बड़ी में उसे पारित कराने की पहल करती है. हालांकि मौजूदा विधेयक में आधार नंबर को वोटर आईडी कार्ड से जोड़ने की व्यवस्था को ऐच्छिक रखा गया है और इसी आधार पर सरकार विपक्ष के विरोध को गैरजरूरी बता रही है, लेकिन फिर ऐसी हड़बड़ी क्यों जो बिल को पारित करने में सदन में दिखाई गई? राज्यसभा में तो इसे विपक्ष के वॉकआउट के बाद पारित किया गया. लोकसभा में भी इसपर ठीक से बहस करने का मौका नहीं दिया गया. बात तो यहां तक की जाने लगी है कि विपक्ष के 12 सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित करने के पीछे भी सत्ता पक्ष का यही मकसद था कि राज्यसभा से यह बिल विपक्ष के विरोध के बावजूद आसानी से पारित करा लिया जाए. चुनाव सुधार संबंधी बेहद अहम संशोधन विधेयक को लेकर विपक्ष में इस तरह का अविश्वास अगर पैदा हुआ है तो यह संसदीय लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है. एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी भी मीडिया में लगातार इस बात को कह रहे हैं कि उन्होंने लिखित रूप में वोटों के विभाजन की मांग की थी ताकि इस असंवैधानिक कानून के खिलाफ विरोध दर्ज करा सकें लेकिन इसकी भी अनुमति सरकार ने नहीं दी. अगर उन्हें बोलने की अनुमति दी जाती तो सरकार की नीयत का पर्दाफाश हो जाता.

चुनाव प्रक्रिया यूआईडीएआई के अधीन क्यों?

भारतीय निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है जिसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए स्थापित किया गया था. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संसदीय लोकतंत्र का एक हिस्सा है जो संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा है. लेकिन इस प्रस्ताव को लाकर सरकार चुनावी प्रक्रिया को यूआईडीएआई के अधीन करना चाहती है जो एक स्वायत्त संस्था नहीं है. तो इस बात का समझना बेहद जरूरी है कि चुनाव आयोग तो स्वायत्त संस्था है, लेकिन यूआईडीएआई स्वायत्त संस्था नहीं है. आधार की निगरानी करने वाली यह संस्था सरकार के अधीन है. लिहाजा इसके बिना यह काम हो नहीं सकता है. अगर आयोग अपने काम में इस संस्था को पार्टनर बनाएगा तो सरकार की नीयत पर संदेह होना स्वाभाविक सी बात है. याद हो तो सुप्रीम कोर्ट ने केवल कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार के अनिवार्य उपयोग की अनुमति दी थी. लेकिन वहां भी आधार ने लोगों को बड़े पैमाने पर आधारहीन कर दिया है. बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, तकनीकी विफलताओं से लाखों लोगों को सरकार की कल्याण योजनाओं से वंचित किया गया. सबसे बड़ी बात यह है कि आधार को वोटर आईडी कार्ड से लिंक करने से मतदाता आसानी से पहचाने जा सकेंगे.

विरोधियों और समर्थकों की पहचान आसान हो जाएगी

सत्ताधारी दल पहचान और अनुकूल मतदान की संभावना के आधार पर मतदाताओं की प्रोफाइल बना सकेंगे. वे अपने विरोधियों और समर्थकों में फर्क कर सकेंगे ताकि सरकार की लोक कल्याणकारी योजनाओं में भेदभाव किया जा सके. विपक्ष को इस बात का अंदेशा है और यह अंदेशा गलत नहीं है. क्योंकि फरवरी 2015 में जब एक प्रयोग के तौर पर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में मतदाता सूची को आधार नंबर से लिंक करने की योजना शुरू हुई थी तो इसके तहत लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे. तब इसको लेकर खूब हंगामा मचा था कि बिना किसी जानकारी के कैसे मतदाताओं के नाम काट दिए गए और मतदाता की अनुमति के बिना कैसे आधार नंबर दे दिया गया. अगस्त 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस योजना पर रोक लगा दी. उसके बाद जब तेलंगाना में चुनाव हुआ तो 20 लाख लोग वोट नहीं दे सके. ट्विटर पर हजारों लोग ट्रेंड कराने लगे कि मेरा वोट कहां है. जब चुनाव आयोग ने राज्य निर्वाचन अधिकारी से इसकी जांच के लिए कहा तो आंध्र प्रदेश के निवार्चन अधिकारी ने कहा कि डेटा उनसे लीक नहीं हुआ है. तेलंगाना सरकार ने एसआईटी का गठन किया लेकिन जांच नतीजे की बाट जोह रहा है.

सरकार पर यूं ही संदेह नहीं कर रहा विपक्ष

ऐसा माना जा रहा है कि आधार नंबर की पूरी जानकारी अगर राजनीतिक दलों के हाथ लग जाए तो वे इसका कई तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं. विपक्ष भी कह रहा है कि यह कानून सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है. एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने बिल का विरोध करते हुए कहा भी है “विधेयक सदन की विधायी क्षमता से बाहर है, क्योंकि ये केंद्र सरकार द्वारा अपने ही फैसले (पुट्टास्वामी बनाम केंद्र सरकार) में निर्धारित कानून की सीमाओं का उल्लंघन करता है. वोटर आईडी और आधार को जोड़ने से निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में परिभाषित किया है. सदन ऐसे कानून को बनाने के लिए सक्षम नहीं है जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो.” यहां तक कहा जा रहा है कि अगर आधार को वोटर कार्ड से जोड़ा गया तो इससे गैर-नागरिकों को भी मतदान का अधिकार मिल जाएगा. पुड्डुचेरी के चुनाव को याद करें तो तब भाजपा ने लोगों को एसएमएस संदेश भेजे थे जिसमें स्थानीय व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ने का लिंक दिया गया था. आरोप लगा था कि जिन मोबाइल नंबरों पर मैसेज भेजे गए हैं वो आधार से लिंक हैं और आशंका है कि ये डेटा आधार पर नजर रखने वाली संस्था यूआईडीएआई से ली गई हो. केस मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा थी और कोर्ट की तब की टिप्पणी ने एक तरह से यूआईडीएआई की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए थे. कर्नाटक हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज के.एस. पुट्टास्वामी ने भी सुप्रीम कोर्ट में आधार की वैधानिकता को लेकर एक याचिका दायर की थी क्योंकि इसके चार ही मकसद बताए गए हैं जिसमें वोटर आईडी नहीं है. उल्लेखनीय है कि इसी केस की सुनवाई के दौरान अगस्त 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की योजना पर अंतरिम रोक लगाते हुए आधार नंबर को मतदाता सूची से जोड़ने का काम रोक दिया था.

‘स्वैच्छिक है अनिवार्य नहीं’ एक बड़ा धोखा

याद हो तो आधार की व्यवस्था अब तक की सबसे विवादित व्यवस्था रही है. हर बार इसे स्वेच्छा की आड़ लेकर लागू किया जाता है और धीरे-धीरे इसे अनिवार्य कर दिया जाता है. मतलब व्यवहार में आधार को लेकर स्वेच्छा और अनिवार्य का अंतर अब मिट चुका है. लिहाजा केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू की इस बात पर भरोसा करना मुश्किल हो रहा है कि सुप्रीम कोर्ट की सलाह के बाद सरकार ने इसे स्वैच्छिक कर दिया. मतलब वोटर आईडी कार्ड को आधार से लिंक करना अनिवार्य नहीं है. यह आपकी इच्छा पर निर्भर होगा. लेकिन कानून की समझ रखने वालों का कहना है कि सरकार का यह दावा कि स्वेच्छा पर निर्भर करेगा इसे साफ-साफ बिल में नहीं लिखा गया है. बिल में यह स्पष्ट नहीं है कि मतदाता आधार नंबर देने से मना कर सकता है. अगर यह नहीं लिखा है तो तय मानिए कि आधार नंबर देना अनिवार्य होगा. बिल की भाषा में यहां तक लिखा हुआ है कि आधार नंबर न देने के पर्याप्त आधार मतदाता के पास होने चाहिए. जाहिर सी बात है, पर्याप्त आधार के नाम पर आने वाले वक्त में ऐसे नियम बनने लगेंगे जिससे आधार नंबर देना अनिवार्य हो जाएगा. आम मतदाता के लिए यह समझना तक मुश्किल हो जाएगा कि अगर मतदाता सूची को आधार नंबर से लिंक कर दिया गया तो उसके वोट देने के अधिकार पर कैसे असर पड़ेगा? कैसे किसी को मतदाता सूची से अलग कर दिया जाएगा या किसी समूह का मतदान केंद्र उसके घर से इतना दूर कर दिया जाएगा कि वोट देने जाने के लिए सोचना पड़ेगा? विपक्ष सत्ता पक्ष के इन तमाम दांवपेच को समझ रहा है और आने वाले राजनीतिक व लोकतांत्रिक खतरे को भांपते हुए विरोध की आवाज तेज कर रहा है.

ये बड़ी हास्यास्पद बात है कि कानून मंत्री किरण रिजिजू ने विधेयक का समर्थन करते हुए विपक्षी सदस्यों की यह कहकर आलोचना की कि वे इस विधेयक को समझ ही नहीं पाए हैं. अगर मंत्री की इस आलोचना को ही सच मान लिया जाए, तब भी क्या सरकार के लिए यह जरूरी नहीं था कि ऐसे तमाम सदस्यों को विधेयक समझने का मौका दिया जाता, सदन में बहस की जाती, विपक्ष की आशंकाएं दूर करती? लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया. आखिर सरकार इतनी जल्दी में क्यों थी? कहीं इसका संबंध आने वाले पांच राज्यों के विधानसभा से तो नहीं जुड़ा हुआ है? बहरहाल, सरकार को इस बात की समझ तो होनी ही चाहिए कि संसदीय लोकतंत्र में असहमति के लिए हमेशा गुंजाइश रहती है, जिसे हर कीमत पर बनाए रखना चाहिए. दुर्भाग्य से सरकार असहमति की इस गुंजाइश को मिटा देना चाहती है. ऐसे में विपक्ष सत्ता की नीयत पर संदेह भी करेगा और उसके फैसले का विरोध भी.

(23 दिसंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/electoral-reforms-2021-preparation-for-linking-aadhaar-and-voter-id-the-governments-flurry-tells-the-story-of-the-mess-972545.html 

Thursday, 23 December 2021

यूपी चुनाव 2022 : असल में बाहुबलियों की बैक-डोर एंट्री कराना है

याद करके देखिए, 90 के दशक की राजनीति का वो दौर जब समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव की जीत सुनिश्चित करने के लिए लखनऊ से अरुण शंकर शुक्ला अन्ना और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से धर्मपाल सिंह उर्फ डीपी यादव जैसे बाहुबली इटावा पहुंचते थे. वक्त बदला, राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और इन बाहुबलियों को ये लगने लगा कि जब हम अपने बाहुबल से मुलायम और मायावती जैसे नेताओं को चुनाव जितवा सकते हैं तो खुद चुनाव लड़कर क्यों नहीं जीत सकते. तो इन बाहुबलियों ने पार्टी में उम्मीदवारी जता दी और विधानसभा से लेकर संसद तक खड़ी हो गई इन बाहुबली नेताओं की फौज. इस दौर को अगर 'अपराध का राजनीतिकरण' कहें तो शायद गलत नहीं होगा और इसमें क्या भाजपा, क्या कांग्रेस, क्या सपा और क्या बसपा सबने डुबकी लगाई. एक लम्बे कालखंड के बाद जब लोगों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ी, राजनीतिक शुचिता की बात की जाने लगी और चुनाव आयोग का शिकंजा कसा तो इन बड़े दलों को इस बात का अहसास हुआ कि इससे पार्टी की साख खराब हो रही है तो इन बाहुबली नेताओं से किनारा करना शुरू कर दिया. ऐसे में अब इन बाहुबली नेताओं को सूबे की जाति आधारित छोटी-छोटी पार्टियां खूब भा रही हैं. यूपी चुनाव के संदर्भ में बात करें तो खास बात ये भी है कि ये छोटी-छोटी पार्टियां भी मुख्य रूप से दो गठबंधनों का हिस्सा बन गई हैं जिसमें एक की कमान सपा के पास तो दूसरे की कमान भाजपा के पास है. 

भाजपा के बाहुबलियों का किधर होगा ठिकाना? 

भाजपा और निषाद पार्टी के कुछ नेताओं की कोशिश है कि निषाद पार्टी को गठबंधन में वही सीटें दी जाएं जिनपर भाजपा से जुड़े बाहुबली नेता अपना दांव लगाने जा रहे हैं. कई गंभीर मामलों के आरोपी और पूर्व सांसद धनंजय सिंह 2002 और 2007 में रारी विधानसभा सीट से विधायक रहे हैं. 2009 में बसपा के टिकट पर वह लोकसभा भी पहुंचे लेकिन 2011 में बसपा से निकाले जाने के बाद आजकल उनका भाजपा प्रेम किसी से छिपा नहीं है. माना जा रहा है कि आगामी चुनाव में धनंजय सिंह को मल्हनी सीट से भाजपा की सहयोगी पार्टी अपना दल (एस) या फिर निषाद पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ाया जा सकता है. इसके अलावा धनंजय सिंह के करीबी कटेहरी के पूर्व ब्लॉक प्रमुख अजय सिंह सिपाही और अतरौलिया के पूर्व ब्लॉक प्रमुख अखंड सिंह भी निषाद पार्टी के संपर्क में हैं. बीकापुर से पूर्व विधायक जितेंद्र सिंह बबलू की भी भाजपा में सीधे एंट्री तो नहीं हो पाई है, लेकिन कहा जा रहा है कि वह भी निषाद पार्टी से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. मिर्जापुर के पूर्व एमएलसी बाहुबली विनीत सिंह की बात करें तो भाजपा भले ही सीधे तौर पर उन्हें स्वीकार न करे, लेकिन अपनी सहयोगी पार्टी अपना दल (एस) की बदौलत जरूर अपने करीब बनाए रखने की जुगत भिड़ा रही है. बाहुबली ब्रजेश सिंह फिलहाल वाराणसी से विधान परिषद के निर्दलीय सदस्य के तौर पर एमएलसी हैं. माना जा रहा है कि बृजेश सिंह भी इस बार के चुनाव में अपना भाग्य जरूर आजमाएंगे, लेकिन भाजपा समर्थित किस पार्टी के टिकट पर यह अभी तय नहीं है. 

भाजपा विरोधी बाहुबलियों का ठिकाना

जब से योगी सरकार ने बाहुबली नेताओं और हिस्ट्रीशोटरों पर शिकंजा कसा है तब से खुद को बाहुबली कहने वाले नेता सीधे तौर पर दो धड़ों में बंट गए हैं- एक खेमा भाजपा समर्थक तो दूसरा भाजपा विरोधी खेमा बन गया. ऐसे में भाजपा विरोध का झंडा उठाकर घूम रहे कद्दावर बाहुबली नेताओं ने भी अपना राजनीतिक ठिकाना ढूंढना शुरू कर दिया है. माफिया से नेता बने मुख्तार अंसारी ने भी 2022 की तैयारी कर ली है. इसका संकेत सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने दे दिया है. भाजपा के खिलाफ बड़ा मोर्चा खोल चुके राजभर सपा के साथ गठबंधन की घोषणा करने के बाद यह तय कर चुके हैं कि बाहुबली मुख्तार को वह अपनी पार्टी से विधानसभा का चुनाव लड़वाएंगे. अतीक अहमद की बात करें तो अभी तय नहीं है कि वो चुनाव लड़ते हैं या नही, लेकिन उनकी पत्नी शाइस्ता परवीन जरूर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी अखिल भारतीय मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन में शामिल हो गई हैं. ऐसा माना जा रहा है कि वह ओवैसी की पार्टी से प्रयागराज शहर दक्षिण से चुनाव मैदान में उतर सकती हैं जहां से अतीक अहमद पांच बार विधायक रहे हैं. इसके अलावा अयोध्या की गोसाइगंज विधानसभा से विधायक रहे बाहुबली अभय सिंह, सुल्तानपुर जिले के बाहुबली भाई चन्द्रभद्र सिंह उर्फ सोनू और यशभद्र सिंह उर्फ मोनू, आजमगढ़ के यादव बंधु यानी रमाकांत यादव और उमाकांत यादव समेत करीब दो दर्जन से अधिक बाहुबली नेता जाति आधारित पार्टियों के बैनर तले 2022 के चुनावी समर में कूदने को तैयार हैं.

हरिशंकर तिवारी बनाम विजय मिश्रा 

पूर्वांचल के सबसे बड़े बाहुबली नेता हरिशंकर तिवारी अपने दोनों बेटे भीष्म शंकर तिवारी उर्फ कुशल तिवारी और विनय शंकर तिवारी के साथ खुले तौर पर सपा का दामन थाम चुके हैं. मुख्यमंत्री के गृह जनपद गोरखपुर में 9 विधानसभा सीटें हैं जिसमें चिल्लापुर विधानसभा सीट पर तो हरिशंकर तिवारी की तूती बोलती ही है, बाकी की 8 सीटें भी हरिशंकर तिवारी अपनी पुरानी बाहुबली तरकीब से भाजपा से छीनकर सपा की झोली में डालने का जतन जरूर करेंगे. कहते हैं कि यूपी में सरकार चाहे जिसकी रही हो, पंडित हरिशंकर तिवारी के भौकाल में कभी कोई कमी नहीं आई. अब देखना होगा कि हरिशंकर तिवारी योगी के किले को ढहाकर अपने भौकाल को बनाए रखने में कितने सफल होते हैं. दूसरी तरफ विजय मिश्रा एक ऐसे बाहुबली नेता हैं जो डंके की चोट पर कहते हैं 'बाहुबली' नहीं, जनबली कहिए. अखिलेश यादव ने 'बाहुबली विरोधी' छवि को धार देने के लिए 2017 के चुनाव से पहले जब विजय मिश्रा का टिकट काट दिया था तो वह निषाद पार्टी के टिकट पर लड़े और जीते भी. विजय मिश्रा ने एक रणनीति के तहत खुद को पूर्वांचल के एकलौते ब्राह्मण बाहुबली नेता के तौर पर स्थापित किया. चुनाव जीतने के लिए बड़े-बड़े यज्ञ करवाना और हिन्दुत्व की बात करना उनकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है. ऐसे में बड़ा सवाल यह कि क्या भाजपा इस ब्राह्मणवादी और हिन्दुत्व का झंडाबरदार बाहुबली नेता को सीधे तौर पर टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारने की हिम्मत जुटा पाएगा या फिर निषाद पार्टी के रास्ते ही विजय मिश्रा की भाजपा में एंट्री होगी? 

अपनी पार्टी के खुद मालिक हैं ये बाहुबली नेता

पूर्वांचल में सबसे असरदार व समझदार दबंग बाहुबली नेता के तौर पर कुंडा विधायक रघुराजप्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने हाल ही में अपनी अलग पार्टी जनसत्ता दल का गठन किया है. उसी के झंडे पर वे इस बार कुंडा से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. हालांकि राजा भैया को किसी भी पार्टी की सरकार हो, कभी कोई परेशानी नहीं हुई. दूसरी तरफ पश्चिमांचल की बात करें तो दादरी विधानसभा से भाजपा के विधायक रहे महेंद्र भाटी हत्याकांड में बरी होने के बाद राष्ट्रीय परिवर्तन दल के अध्यक्ष धर्मपाल सिंह उर्फ डीपी यादव की भी एक बार फिर से यूपी की सियासत में एंट्री हो गई है. कहा जा रहा है कि डीपी यादव सम्भल की असमोली विधानसभा से चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं. चूंकि भाजपा, सपा और बसपा तीनों ही दलों के साथ डीपी यादव ने सियासत की है, लिहाजा डीपी का झुकाव किस पार्टी की तरफ रहेगा इसका फैसला चुनाव बाद ही तय होगा. 

आखिर कब जागेगी विधायिका की अंतरात्मा?

बहरहाल, देखना बड़ा रोचक होगा कि यूपी चुनाव में तमाम बाहुबली नेताओं से जाति आधारित पार्टियां कितना फायदा उठा पाती हैं और चुनाव बाद सपा, भाजपा, बसपा या फिर कांग्रेस जो सीधे तौर पर टिकट देने से बच रही हैं, जीतने के बाद इन बाहुबली नेताओं से खुद को कितना दूर रख पाती है? ये दोनों सवाल इसलिए बहुत अहम हैं क्योंकि कहीं न कहीं विधायिका के साथ-साथ चुनाव आयोग पर भी 'अपराध के राजनीतिकरण' को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. याद हो तो देश की शीर्ष अदालत ने कुछ महीने पहले ही तो कहा था- ''राजनीतिक व्यवस्था के अपराधीकरण का खतरा बढ़ता जा रहा है. इसकी शुद्धता के लिए आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को कानून निर्माता बनने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. मगर हमारे हाथ बंधे हैं. हम सरकार के आरक्षित क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं कर सकते. हम केवल कानून बनाने वालों की अंतरात्मा से अपील कर सकते हैं.'' लेकिन शीर्ष अदालत की इस अपील से विधायिका की अंतरात्मा क्यों जागे जब राजनीति का मतलब ही चुनाव जीतना और उसके जरिये सत्ता पर काबिज होना रह गया हो. 

हालांकि इस बात से इंकार नहीं कि चुनाव आयोग की सख्ती की वजह से ही तमाम बड़ी पार्टियों ने आपराधिक छवि वाले बाहुबली नेताओं से थोड़ा-थोड़ा किनारा किया है, लेकिन इससे ऐसे नेताओं के चुनाव लड़ने पर रोक तो लग नहीं गई. मान लीजिए कल को यूपी विधानसभा में समाजवादी पार्टी या फिर भाजपा को बहुमत हासिल करने के लिए तीन सीटें कम पड़ जाएं और इसकी भरपाई बाहुबली विधायक करने की स्थिति में हों तो क्या सपा के अखिलेश यादव या भाजपा के योगी आदित्यनाथ इस आधार पर सरकार बनाने से इंकार कर सकते हैं कि समर्थन देने वाला विधायक बाहुबली. अगर यह संभव नहीं तो फिर यही कहा जाएगा कि जाति आधारित पार्टियां तो बहाना है, असल में बाहुबलियों की बैक-डोर एंट्री कराना है. लिहाजा चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और केंद्र में बैठी सत्ता को मिलकर राजनीति की ऐसी साफ-सुथरी तस्वीर बनानी होगी जिसमें आपराधिक छवि वाले बाहुबली नेताओं की कहीं से कोई एंट्री न होने पाए.

(22 दिसंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/up-assembly-election-2022-bahubali-leaders-are-ready-to-re-enter-in-up-politics-with-the-help-of-caste-based-parties-970006.html 

Sunday, 19 December 2021

आर्थिक विकास की उम्मीदों पर पानी फेरता महंगाई का नया रिकॉर्ड


महंगाई दर ने एक बार फिर झटका दिया है. नवंबर में थोक महंगाई दर (WPI) 14.23 प्रतिशत पर पहुंच गई थी. इससे पहले अक्टूबर महीने में यह 12.54 प्रतिशत पर थी, जबकि सितंबर में 10.6 प्रतिशत थी. आंकड़े बताते हैं कि थोक महंगाई दर का ये आंकड़ा 12 साल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. इतना ही नहीं, कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) आधारित खुदरा महंगाई दर भी नवंबर में बढ़कर 4.91 प्रतिशत हो गई जो अक्टूबर महीने में 4.48 प्रतिशत दर्ज की गई थी. आरबीआई (RBI) भी इस बात को मान रही है कि CPI आधारित मुद्रास्फीति के चालू वित्त वर्ष यानि 2021-22 में 5.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है. तो बात थोक महंगाई दर की हो या फिर खुदरा महंगाई दर की, चिंता दोनों की ही सेहत को लेकर है. आर्थिक गलियारों में इस बात को लेकर कानाफूसी शुरू हो गई है कि महंगाई दर का नया रिकॉर्ड देश की आर्थिक विकास दर की उम्मीदों पर पानी तो नहीं फेर देगा?

आर्थिक विकास दर को लेकर क्या हैं उम्मीदें?

वैश्विक अर्थव्यवस्था में होने वाले विकास को लेकर विश्व बैंक की ग्लोबल इकोनॉमिक प्रॉस्पेक्ट्स की रिपोर्ट पर भरोसा करें तो 2021-22 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानि जीडीपी में होने वाले विकास की दर करीब 8.3 फीसदी रहने का अनुमान है. 2020-21 में यह दर -7.3 फीसदी थी. मतलब यह कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक बार फिर से पटरी पर लौट रही है, हालांकि यह जीडीपी विकास दर उतनी नहीं है जितना पहले अनुमान लगाया गया था. इससे पहले अप्रैल 2021 में विश्व बैंक ने भारत की जीडीपी में 10.1 फीसदी की वृद्धि का अनुमान लगाया था, लेकिन कोरोना की दूसरी लहर से मची तबाही में यह अनुमान धुल गया. विश्व बैंक के अनुसार, भारत ने इंफ्रास्ट्रक्चर, ग्रामीण विकास और स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च किया है. साथ ही सर्विस सेक्टर और मैन्युफैक्चरिंग में उम्मीद से ज्यादा तेज गति से रिकवरी होने का फायदा भी भारत को मिल सकता है. भारत के वित्त मंत्रालय की आर्थिक समीक्षा 2020-21 में भी इस बात का दावा किया गया है कि वित्त वर्ष 2021-22 में भारत की वास्तविक जीडीपी की विकास दर 11.0 प्रतिशत रहेगी तथा सांकेतिक जीडीपी की विकास दर 15.4 प्रतिशत रहेगी, जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सर्वाधिक होगी. अब जबकि महंगाई दर का आंकड़ा 12 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचकर 14.23 प्रतिशत पर पहुंच गया है, तो जीडीपी विकास दर की उम्मीद को झटका लगना स्वाभाविक सी बात है.

विकास दर को कैसे चपत लगाती है बढ़ती महंगाई?

बढ़ती महंगाई जीडीपी विकास दर को किस तरह से चपत लगाती है उसे समझने से पहले महंगाई दर और जीडीपी विकास दर को समझना जरूरी है. महंगाई दर वो दर है जिसमें एक तय समय के दौरान चीजों के दाम बढ़ने या घटने का पता चलता है. जैसे भारत में महंगाई की गणना सालाना आधार पर होती है. यानि, अगर किसी महीने महंगाई दर 10 प्रतिशत रहती है तो इसका मतलब ये हुआ कि पिछले साल उसी महीने के मुकाबले इस साल चीजों के दाम 10 प्रतिशत बढ़ गए हैं. इसे और सरल व आसान भाषा में समझें तो अगर किसी चीज का दाम पिछले साल 100 रुपए था तो 10 प्रतिशत महंगाई दर का मतलब उसका दाम इस साल 110 रुपए हो गया.

जब हम ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GDP) यानि सकल घरेलू उत्पाद की बात करते हैं तो इससे एक तय समयावधि में देश के आर्थिक विकास और ग्रोथ का पता चलता है. जीडीपी किसी एक साल में देश में पैदा होने वाले सभी सामानों और सेवाओं के कुल मूल्य को कहते हैं. इससे पता चलता है कि सालभर में अर्थव्यवस्था ने कितना अच्छा या कितना खराब प्रदर्शन किया है. जीडीपी के आंकड़े को आठ सेक्टरों से इकट्ठा किया जाता है. इसमें कृषि, मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रिसिटी, गैस सप्लाई, माइनिंग, वानिकी और मत्स्य, होटल, कंस्ट्रक्शन, ट्रेड और कम्युनिकेशन, फ़ाइनेंस सेक्टर, रियल एस्टेट, इंश्योरेंस, बिजनेस सर्विसेज, सोशल और सार्वजनिक सेवाएं शामिल हैं. जो अर्थशास्त्र को समझते हैं वो ये भी जानते हैं कि महंगाई दर बढ़ने पर लोगों की क्रय शक्ति घट जाती है. क्रय शक्ति घटने से जरूरत की तमाम चीजों की मांग गिरती है. इसका असर सप्लाई चेन पर पड़ता है जो विनिर्माण उद्योग के ग्रोथ पर ब्रेक लगा देता है. इससे तमाम सेक्टरों में छंटनी शुरू हो जाती है जो बेरोजगारी दर को बढ़ाती है. इन स्थितियों का सामना हम 2016 में नोटबंदी और 2020 में कोविड महामारी के दौरान लॉकडाउन की परिस्थितियों में कर चुके हैं.

महंगाई दर से ज्यादा खतरनाक है बेरोजगारी दर

माना जाता है कि भारत जैसे कम और मध्यम आमदनी वाले देश के लिए साल दर साल अधिक जीडीपी ग्रोथ हासिल करना जरूरी है ताकि देश की बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा किया जा सके. लेकिन अगर इस बढ़ती आबादी की क्रयशक्ति पर महंगाई दर और बेरोजगारी दर अपने-अपने तरीके से ब्रेक लगाएगी तो जीडीपी ग्रोथ की बात हम किस आधार पर करेंगे. Nasscom की एक रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू सॉफ्टवेयर कंपनियों में फिलहाल 1.6 करोड़ कर्मचारी काम करते हैं और साल 2022 तक देश की घरेलू आईटी कंपनियां 30 लाख से ज्यादा कर्मचारियों की छंटनी करने की तैयारी कर रही है. दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इनमें करीब 90 लाख कर्मचारी लो-स्किल्ड और बीपीओ में नौकरी कर रहे हैं. इन 90 लाख में से 30 लाख लोग अपनी नौकरी गंवाएंगे क्योंकि ऑटोमेशन का सबसे ज्यादा असर लो स्किल्ड लेबर पर ही पड़ने वाला है. कहा जा रहा है कि ऐसा करके घरेलू आईटी कंपनियां सालाना 100 बिलियन डॉलर की बचत करना चाहती हैं. अगर इस तरह से देश की अलग-अलग कंपनियां आईटी सेक्टर की तर्ज पर अपनी बचत को बढ़ाने में लग गईं तो देश में बेरोजगारों की एक ऐसी बड़ी फौज खड़ी हो जाएगी जो बाजार में मांग और आपूर्ति के संतुलन को तहस-नहस कर देगा. जब ऐसे लोगों की क्रयशक्ति खत्म हो जाएगी, मांग कम हो जाएगी तो सोचिए देश की जीडीपी ग्रोथ का क्या होगा? तो बात सिर्फ महंगाई दर को लेकर ही नहीं है, बेरोजगारी दर के बारे में भी सरकार को सोचना पड़ेगा क्योंकि बेरोजगारी दर में इजाफा मंहगाई दर से कहीं ज्यादा खतरनाक स्थिति में है.

ओमीक्रॉन वायरस से बाजार डरा हुआ है

बहरहाल, इस वक्त केंद्र सरकार के सामने दो मुख्य चुनौतियां हैं- पहला, बढ़ती महंगाई को काबू करना और दूसरा आर्थिक विकास दर में तेजी लाना. सरकार के लिए इन दोनों बड़ी चुनौतियों से निपटना आसान नहीं होगा. क्योंकि महंगाई को काबू करने के लिए लोगों की क्रय शक्ति बढ़ानी होगी. लेकिन इसमें लंबा वक्त लग सकता है. क्योंकि कोविड महामारी और लॉकडाउन की परिस्थिति से निकलने के बावजूद कोविड का खतरा अभी टला नहीं है. ओमीक्रॉन से बाजार डरा हुआ है. जिन मुट्ठीभर लोगों के पास पैसा है या रोजगार है वो अभी खर्च नहीं कर रहे हैं और और जिनके पास कमाई का कोई जरिया नहीं है वो खर्च करे तो कहां से करें. सरकार खुद मान रही है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में सुस्ती है. पैसा अटका पड़ा है, बाजार में मांग बढ़ नहीं रही है और नए निवेश आ नहीं रहे हैं. ऐसे में सरकार के लिए वही अंतिम रास्ता बच जाता है जिसमें वह जरूरतमंदों के हाथों में सीधा पैसा थमाए ताकि उसकी क्रयशक्ति में वृद्धि हो. यह सर्वविदित तथ्य है कि बाजार अपने निश्चित नियम से ही चलता है. उसे कोई सरकार अपने तरीके से खड़ा करने या चलाना चाहे तो वह देश के लिए घाटे का सौदा साबित होता है.

(18 दिसंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/new-record-of-inflation-rate-spoiling-the-expectations-of-indian-economic-growth-963754.html

Tuesday, 14 December 2021

संघ और भाजपा के जाल में फिर से खुद को फंसा तो नहीं गए राहुल?


मैं हिन्दू हूं, मगर हिन्दुत्ववादी नहीं हूं. ये सब (आम जनता) हिन्दू हैं मगर हिन्दुत्ववादी नहीं हैं. महात्मा गांधी हिन्दू थे और गोडसे हिन्दुत्ववादी. ये शब्द हैं कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के जो पीएम मोदी द्वारा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण से ठीक एक दिन पहले राजस्थान की राजधानी जयपुर में आयोजित 'महंगाई हटाओ महारैली' में हिन्दू और हिन्दुत्ववादी के बीच का फर्क समझा रहे थे. लेकिन क्या राहुल गांधी ने इन दोनों शब्दों के मायने और दोनों शब्दों के बीच के अंतर की व्याख्या करने से पहले इस बात का अंदाजा लगाया था कि देश इस बात को समझना चाहता है भी या नहीं? दरअसल, ये पूरा भाषण राहुल गांधी के मन की एक भड़ास थी जिसे उन्होंने उगल दिया. महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, किसानी और कोरोना की त्रासदी के बीच जनता क्या चाहती है, नेता और जनता के बीच का कैसा संवाद हो कि वह एक-दूसरे को कनेक्ट कर पाए, इसको समझने में राहुल गांधी बार-बार चूक जाते हैं और यही वो बात है जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राहुल गांधी को पीछे छोड़ देते हैं. 

मिटाना होगा 'मुसलमान विरोधी हिन्दू' का भाव 

इसमें कोई शक नहीं कि हिन्दू और हिन्दुत्ववादी के गूढ़ अर्थ को समझाने के लिए राहुल गांधी ने जो बात की वह सौ प्रतिशत सत्य है. सरसंघचालक मोहन भागवत भी कई मौकों पर 'वाद' शब्द से परहेज करने की नसीहत देते रहे हैं. आप इसको इस तरीके से भी समझ सकते हैं कि चाहे वह हिन्दुत्ववाद हो, राष्ट्रवाद हो या फिर मार्क्सवाद ही क्यों न हो, इसमें 'वाद' सामूहिक जीवन का नमक है. यह नमक अगर ना हो तो बेस्वाद और ज्यादा हो जाए तो जहर बन जाता है. किसी भी चीज में 'अति' यानी जरूरत से बहुत ज्यादा खतरनाक होता है. लिहाजा हमें इस बात को समझना होगा कि हिन्दुत्ववाद में 'वाद' रूपी नमक वाकई इतना ज्यादा हो गया है कि वह जहर बन गया है. देश को समझना यही बात है और राहुल गांधी भी यही बात समझाने की कोशिश भी कर रहे हैं लेकिन राहुल इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि उनकी इस बात को देश कितना समझना चाहता है. दरअसल, इस देश में बड़े ही करीने से इस बात को स्थापित कर दिया गया है कि दक्षिणपंथी दल भाजपा का मतलब है हिन्दुओं की पार्टी, मुसलमान विरोधी हिन्दू पार्टी. कांग्रेस पार्टी समेत तमाम भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों को हिन्दू विरोधी पार्टी के तौर पर देखा जाता है. हिन्दुओं में जो मुसलमान विरोधी भाव बीते कुछ वर्षों में इस तरह से भर दिए गए हैं कि भारत में अगर मुसलमानों को कोई सबक सिखा सकता है तो वह भाजपा ही है, इस भाव को मिटाना बेहद जरूरी है. लेकिन ये काम इतना आसान है नहीं. लोग हिन्दू और हिन्दुत्ववादी के गूढ़ दर्शन को नहीं समझना चाहते हैं. हिन्दुत्व के व्हाट्सप ज्ञान का असर ज्यादा है क्योंकि वो ज्यादा सहज तरीके से लोगों से संवाद कर रहा है, लोगों को हिन्दुत्ववाद से कनेक्ट कर पा रहा है. लिहाजा राहुल गांधी को इस तरह के टूलकिट ईजाद करने होंगे जो लोगों में 'मुसलमान विरोधी हिन्दू' का जो भाव अंदर तक समाया हुआ है उसे सहज संवाद के जरिये मिटा पाए.

संघ और भाजपा के बुने जाल में फंसे राहुल

कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा और उसकी मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जिस हिन्दु, हिन्दुत्व और हिन्दुत्ववाद का ताना-बाना पूरे देश में तैयार किया है, राहुल गांधी बार-बार उसमें आकर फंस जाते हैं. जब भी कोई बड़ा चुनाव देश में होता है, कभी राहुल के गोत्र को उछाला जाता है, कभी जनेऊ की बात होती है, कभी उनके धर्म को लेकर सवाल खड़े किए जाते हैं. ऐसे में कांग्रेस नेता को लगता है कि अगर आरएसएस और भाजपा के इन सवालों का जवाब नहीं दिया गया तो जनता इस बात को मान लेगी कि भाजपा और आरएसएस के लोग जो आरोप लगा रहे हैं उसमें सच्चाई है. और फिर योगी आदित्यनाथ जैसे नेता भी कहने से नहीं चूकते कि राहुल का जनेऊ दिखाकर खुद को सनातनी हिन्दू दिखाने का प्रयास हमारी यानी संघ परिवार की वैचारिक विजय है. फर्क इससे नहीं पड़ता कि मुसलमान उन्हें क्या मानते हैं? फर्क इससे जरूर पड़ता है कि हिन्दू उन्हें क्या मानते हैं. फर्क इससे पड़ता है कि राहुल गांधी के परनाना जवाहरलाल नेहरू को किसी गयासुद्दीन का वंशज बताने वाली व्हाट्सऐप कंटेंट की जो धार है उसे मोड़ा जा सकता है या नहीं. अगर आप देखें तो विगत पांच-सात वर्षों से इस तरह की बातें लगातार सोशल मीडिया और गोदी मीडिया प्रचारित व प्रसारित करती रही है बिना रुके और बिना थके. कांग्रेस कभी इन हमलों का कोई करारा जवाब नहीं दे पाती है. और ये बात सिर्फ राहुल गांधी की नहीं है. याद करें तो यह कांग्रेस में पनपी शॉर्टकट संस्कृति का ही नतीजा था कि हिन्दू वोट पाने की हड़बड़ी में राजीव गांधी ने खुद 1989 में राम मंदिर का शिलान्यास करा दिया था. मतलब एजेंडा संघ का और काम किया कांग्रेस पार्टी ने. इससे कांग्रेस को हिन्दू वोटों का कोई लाभ नहीं हुआ. लाभ अगर किसी को हुआ तो वह संघ के हिन्दुत्व एजेंडे को हुआ. अब राहुल गांधी भी वही कर रहे हैं. एजेंडा संघ परिवार या भाजपा तय कर रहा है कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी और कांग्रेस हिन्दू विरोधी हैं, मुस्लिम समर्थक हैं. लेकिन दूसरी तरफ सोनिया गांधी तिलक लगा कर, राहुल गांधी भगवा पहन कर, जनेऊ दिखा कर, खुद को शिवभक्त बोल कर, अपना गोत्र बता कर और धर्मनिरपेक्षता की चादर फेंककर खुद को हिन्दू साबित करने में लगे हैं. कहने का मतलब यह कि संघ और भाजपा ने कांग्रेस को धकेल-धकेल कर उस कोने तक पहुंचा ही दिया है, जहां वह खुद को हिन्दू कहने से बच नहीं पा रही है. 

तो अब क्या करना चाहिए राहुल गांधी को?

इसमें कोई शक नहीं कि गांधी और गांधी के दर्शन इस देश और दुनिया में हमेशा प्रासंगिक रहेंगे. लेकिन देश राजनीति के उस दौर को जी रहा है जिसमें गांधी और पटेल तक को कांग्रेस से छीनकर भाजपा ने हाईजैक कर लिया है. अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण किया जा रहा है. काशी विश्नाथ मंदिर कॉरिडोर का लोकार्पण कर ऐसे जताया जा रहा है कि इसी से हर साल 2 करोड़ युवाओं को नौकरी मिल जाएगी. ऐसे में राहुल और उनकी कांग्रेस पार्टी के पास एक ही विकल्प बचता है कि वह 'पंथनिरपेक्ष भारत' जो भारतीय संविधान की आत्मा है को ही आधार बनाकर विकास की बात करें. गांधी, नेहरू, पटेल और इंदिरा की विरासत वाली कांग्रेस को लेकर आगे बढ़ना होगा. देखना और समझना होगा इन नेताओं के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक दर्शन को. कांग्रेस पार्टी राजनीति के एक ऐसे मुहाने पर खड़ी है जहां उसे अपने वोट बैंक को नए रूप में खड़े करने होंगे. क्योंकि कांग्रेस जिस वोट बैंक पर खड़ी थी उसमें भाजपा और आप जैसी तमाम क्षेत्रीय पार्टियां जबरदस्त सेंध लगा चुकी है. ऐसे में बात हिन्दू और मुसलमान वाली राजनीति से नहीं बनेगी. बात किसानों की करनी होगी, बात महिलाओं की करनी होगी, बात युवाओं और बच्चों के भविष्य की करनी होगी, बात बेरोजगारी, महंगाई और गरीबी को मिटाने की करनी होगी. बात संविधान को बचाने की करनी होगी, बात लोकतंत्र को बचाने की करनी होगी. और सिर्फ बात ही नहीं करनी होगी बल्कि उसे जमीन पर उतारना भी पड़ेगा. अगर इतना कर पाए तो हिन्दू-मुसलमान की बुनियाद पर खड़ी हिन्दुत्व की राजनीतिक इमारत को गिरने से कोई नहीं बचा सकता. 

(13 दिसंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/jaipur-congress-rally-and-hinduism-did-rahul-gandhi-fall-into-the-trap-of-rss-and-bjp-957307.html

Friday, 10 December 2021

राष्ट्रीय राजनीति को झकझोर देने वाला है प्रियंका का शक्ति विधान


उत्तर प्रदेश में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बिसरती सियासी जमीन को फिर से जीवंत करने के लिए पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने महिला घोषणा पत्र (भारतीय राजनीतिक इतिहास में पहली बार किसी राजनीतिक दल द्वारा पेश किया गया घोषणा पत्र) को जिस अंदाज में पेश किया और जिन बातों को मजबूती के साथ रखा उसका मूल भाव तो यही निकलता है कि यूपी तो बहाना है, पूरे देश को बताना है. मतलब आने वाले वक्त में कुछ इसी तरह की रणनीति के साथ कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय राजनीति में नया अवतार होगा और उसकी ध्वजवाहक होंगी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पोती प्रियंका गांधी वाड्रा. दरअसल, उत्तर प्रदेश में महिलाओं को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर सशक्त बनाने के इस नायाब फॉर्मूले के तहत कांग्रेस ने प्रियंका गांधी का ट्रेडमार्क बनाने की कोशिश की है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रियंका को कांग्रेस के चेहरे के तौर पर देखा जा रहा है और चुनाव का पूरा दारोमदार उन्ही के कंधों पर है, लिहाजा पूरे देश की राजनीतिक दशा और दिशा तय करने वाले इस सूबे में कुछ ऐसा अलग सा दिखाना था जिसकी गूंज से राष्ट्रीय राजनीति अछूता न रहे.   

देश की राजनीति बदलने की बड़ी कोशिश
प्रियंका ने 'शक्ति विधान' नाम से इस महिला घोषणा पत्र में जिन छह प्रमुख बिन्दुओं (स्वाभिमान, स्वावलंबन, शिक्षा, सम्मान, सुरक्षा और सेहत) को शामिल किया है और उसके पीछे की सोच को जिस रूप में बयां किया है उसका लब्बोलुआब यही है कि सिर्फ चुनाव जीतना कांग्रेस का मकसद नहीं. पार्टी की कोशिश है कि राजनीति की सूरत बदलनी चाहिए. पार्टी की कोशिश है कि आने वाले वक्त में महिलाएं देश की राजनीति करें. आखिर ऐसी राजनीति को देश कब तक ढोता रहे और क्यों न ऐसी राजनीति को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए जिसने धर्म, जाति और संपत्ति की रक्षा के नाम पर परिवार, समाज और देश को सिर्फ बांटने का काम किया है. जवाब तलाशना आसान नहीं होगा कि आजादी के बाद जिस कांग्रेस पार्टी ने सबसे लंबे समय तक देश में राज किया, वही पार्टी अब किस आधार पर राजनीति की सूरत को बदलने की बात कर रही है. महिलाओं के हाथों में राजनीति की कमान सौंपने की बात कर रही है. महिला सशक्तिकरण की बात कर रही है. लेकिन प्रियंका गांधी इन सवालों से बेफिक्र और बेखौफ होकर एक भरोसे के साथ अपने कदम आगे बढ़ा रही है. ऐसे भी इस तरह के अहम फैसले हवा में नहीं लिए जाते हैं. इसके पीछे बहुत बड़ी थिंकटैंक काम करती है. लाखों लोगों की फीडबैंक के आधार पर इन बिन्दुओं को तैयार किया गया होगा. सबसे बड़ी बात यह कि कोई भी राजनीतिक दल इस घोषणा पत्र का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है. आने वाले वक्त में कांग्रेस ने अपने 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' अभियान के तहत अगले दो महीनों में उत्तर प्रदेश की पांच करोड़ महिला मतदाताओं तक पहुंचने की योजना बनाई है. अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस दिन इस अभियान को देश के स्तर पर चलाने का फैसला लिया जाएगा तो राजनीति की सूरत क्या होगी? निश्चित रूप से आने वाले वक्त में प्रियंका का यह मॉडल देश की राजनीति में बदलाव का वाहक बनेगी बशर्ते इसे ईमानदारी से लागू किया जाए.  

प्रियंका गांधी के दावे में कितना है दम?
प्रियंका का दावा है कि शक्ति विधान यानी महिला घोषणा पत्र महिला सशक्तिकरण और राजनीति में महिलाओं की भूमिका के लिए मील का पत्थर बनेगा. प्रियंका के इस दावे से कोई इनकार भी नहीं है. चूंकि राजनीति हमारे जीवन के सभी पहलुओं पर फैसले लेती है- मसलन समाज, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, आंतरिक और बाहरी सुरक्षा आदि. इसीलिए घोषणा पत्र में विधानसभा चुनाव में 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को देने का ऐलान किया गया है. याद हो तो सबसे पहले कांग्रेस ने ही पंचायतों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की व्य्वस्थास की थी. ये अलग बात है कि देश की संसद में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का बिल आज तक अटका हुआ है. इसमें कोई दो राय नहीं कि देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी भी कांग्रेस पार्टी से ही थीं. चुनाव आयोग के आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो उत्तर प्रदेश में साल 2007 के विधानसभा चुनाव में जहां महज 41.92 प्रतिशत महिलाओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था, वहीं साल 2012 के विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा बढ़कर 60.28 प्रतिशत और 2017 में 63.31 प्रतिशत तक पहुंच गया. आंकड़ों से साफ है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में महिला मतदाता किसी भी दल की दशा और दिशा बदलने में सक्षम हैं. पिछले पांच सालों में देश में जितने भी चुनाव हुए हैं, उसमें महिलाओं का वोट प्रतिशत पहले की अपेक्षा काफी तेजी से बढ़ा हैं. हालांकि महिला मतदाताओं का बढ़-चढ़कर चुनाव में भाग लेना और उनकी स्थिति में सुधार होना, दोनों अलग-अलग मामले हैं. वोट देने में इनकी संख्या बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि महिलाओं की स्थिति में सुधार आ रहा हैं. ये स्थिति तब बनेंगी जब महिलाएं निर्णय लेने की स्थिति में पहुंचेंगी और इसी को ध्यान में रखते हुए प्रियंका गांधी ने महिला घोषणा पत्र में उन बातों को प्रमुखता से जगह दी है जिससे वो निर्णय लेने की स्थिति में होंगी.

जातिवादी राजनीति से कैसे पार पाएगा यह मॉडल?
प्रियंका गांधी ने कांग्रेस पार्टी की अतीत की तमाम उपलब्धियों को सामने रखकर यूपी के लिए महिला मतदाताओं पर खासा असर डालने वाला जो राजनीतिक मॉडल तैयार किया है उसमें हिन्दू-मुस्लिम, सवर्ण-दलित, अगड़ों-पिछड़ों की बात करने की जगह प्रियंका सिर्फ महिलाओं की बात कर रही हैं. ऐसे में एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि भारतीय राजनीति में जातिवाद की गहरी पैठ को कांग्रेस का यह मॉडल किस तरह से मिटा पाएगा. इसको इस रूप में समझा जा सकता है कि भारतीय समाज के सभी वर्गों में महिलाओं के संघर्ष, उनकी तकलीफें लगभग एक जैसी ही हैं. इन महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए कदम-कदम पर जूझना पड़ता है. लिहाजा जब आधी आबादी को कांग्रेस के इस मॉडल में एड्रेस किया जा रहा है तो जातिवादी राजनीति का अवरोध तो खुद-ब-खुद टूट जाएगा. आखिर सबकुछ तो इस घोषणा पत्र में शामिल है मसलन, सरकारी पदों पर 40 प्रतिशत महिलाओं की नियुक्ति, महिलाओं के लिए मुफ्त बस सेवा, सस्ता ऋण, कामकाजी महिलाओं के लिए 25 शहरों में छात्रावास, आंगनबाड़ी महिलाओं के लिए 10 हजार मानदेय, महिलाओं की स्वयं सहायता समूह को 4 फीसदी पर ऋण, राशन दुकानों में 50 प्रतिशत का संचालन महिलाओं के हाथों में, हर साल तीन गैस सिलेंडर मुफ़्त, स्नातक में नामांकित लड़कियों को स्कूटी, 12वीं की छात्राओं को स्मार्ट फोन, पुलिस बल में 25 प्रतिशत महिलाओं को नौकरी जैसे महत्वपूर्ण वादे किए गए हैं.

बहरहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में महिला विमर्श को लेकर जिस तौर-तरीके के साथ प्रियंका आगे बढ़ रही हैं, जब देश गुलाम था तब गांधीजी ने भी ऐसी कोशिश की थी और बहुत हद तक कामयाबी भी हासिल की थी. गांधी जानते थे कि महिलाओं को साथ लेकर ही समाज को सुधारा जा सकता है और देश को आजाद भी कराया जा सकता है. आज प्रियंका गांधी भी गांधी के उसी रास्ते पर चलकर रचनात्मक राजनीति उत्तर प्रदेश में कर रही हैं. गांधी कांग्रेस की विरासत हैं और अगर यूपी चुनाव में इस विरासत के साथ प्रियंका गांधी को आगे कर कांग्रेस ने राजनीति की मौजूदा तस्वीर को बदलने का संकल्प लिया है तो निश्चित तौर पर इसका बड़ा असर आने वाले वक्त में राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा. 

(9 दिसंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/how-much-will-priyanka-gandhi-women-manifesto-change-the-politics-of-uttar-pradesh-951709.html

Thursday, 9 December 2021

तो क्या पीएम मोदी ने सेट कर दिया है यूपी चुनाव का एजेंडा?


भारतीय सिनेमा के ग्रेटेस्ट शोमैन राजकपूर की साल 1955 में एक फिल्म आई थी- श्री 420. फिल्म में मुख्य किरदार के रूप में राजकपूर के ऊपर फिल्माये गए गाने की वो चार पंक्तियां एक बार फिर से तब तरोताजा हो गई जब पीएम मोदी ने 'लाल टोपी' पर गंभीर लांछन लगाकर उत्तर प्रदेश की चुनावी बिसात में गरमाहट ला दी...

'मेरा जूता है जापानी
ये पतलून इंगलिश्तानी
सर पे लाल टोपी रूसी
फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी...'

हम बात कर रहे हैं राजनीतिक रूप से देश के सबसे अहम राज्य उत्तर प्रदेश की जहां चुनावी बिसात बिछ चुकी है. शह और मात के इस सियासी खेल में पीएम मोदी से लेकर अखिलेश यादव तक, सीएम योगी से लेकर जयंत चौधरी तक और प्रियंका गांधी से लेकर बहन मायावती तक सब सत्ता की सीढ़ी तक पहुंचने के लिए अपनी-अपनी चालें चलने शुरू कर दिए हैं. इसी कड़ी में पीएम मोदी ने भी फ़िराक़ गोरखपुरी की धरती गोरखपुर से अपनी चाल यह कहकर चल दी है कि 'लाल टोपी' उत्तर प्रदेश के लिए खतरे की घंटी है. सियासी पंडितों ने पीएम मोदी के इस सियासी तीर को आंकने में बिना देरी किए सवाल उछालने शुरू कर दिए कि क्या प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सत्ताधारी पार्टी भाजपा यह मान चुकी है कि आने वाले चुनाव में उनका मुकाबला अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी से ही होना है जिनकी पहचान 'साइकिल' से कम और 'लाल टोपी' से ज्यादा है?    

पीएम मोदी के निशाने पर 'लाल टोपी' क्यों?
मंगलवार को मेरठ के दबथुवा में जिस वक्त सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी जयंत सिंह परिवर्तन रैली के मंच से भाजपा के सूर्यास्त की बात कर रहे थे, ठीक उसी वक्त गोरखपुर में एक विशाल कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी का नाम लिए बगैर 'लाल टोपी' को निशाने पर लेते हुए पीएम मोदी कह रहे थे- 'लाल टोपी वालों को यूपी की सत्ता चाहिए घोटालों के लिए, अपनी तिजोरी भरने के लिए, अवैध कब्जों के लिए, माफिया को खुली छूट देने के लिए. 'लाल टोपी' वालों को सरकार बनानी है आतंकवादियों पर मेहरबानी दिखाने के लिए, आतंकियों को जेल से छुड़ाने के लिए. याद रखिए, लाल टोपी वाले यूपी के लिए रेड अलर्ट हैं यानी खतरे की घंटी.' सीधे तौर पर पीएम मोदी ने सपा की पूर्ववर्ती सरकार पर तीखा तंज किया है. लोगों को आगाह किया है कि अगर आपने फिर से ऐसे लोगों के हाथों में सत्ता सौंपी तो पूरा प्रदेश फिर से 'गुंडा राज' की गिरफ्त में होगा. जानबूझकर पीएम मोदी ने सपा के चुनाव चिह्न 'साइकिल' को टारगेट नहीं कर 'लाल टोपी' को किया है क्योंकि साइकिल आमजन की सवारी है. लिहाजा आमजन की भावनाओं को ठेस न पहुंचे सो सपा की जान से प्यारी 'लाल टोपी' पर निशाना साधा है. कहें तो 'लाल टोपी' को उछालकर पीएम मोदी ने यूपी चुनाव का एजेंडा सेट कर दिया है.

'लाल टोपी' के एक तीर से साधे कई निशाने
बड़ा सवाल यह कि 'लाल टोपी' की आड़ लेकर पीएम मोदी इतनी तीखी बातें क्यों कर गए? दरअसल, मार्च 2018 में जब सपा के सांसद लाल टोपी पहन कर संसद भवन के अंदर दाखिल हुए तो पत्रकारों ने चुटकी लेते हुए पूछ दिया- ये क्या? तो उन्होंने अपनी टोपी को लहराते हुए कहा था- यह भाजपा के लिए रेड सिग्नल है, अलार्म बेल यानी खतरे की घंटी. कहा जा रहा है कि मंगलवार को गोरखपुर में पीएम मोदी ने उसी अलार्म बेल से यह कहकर चुनावी पटलवार किया है कि 'लाल टोपी' वालों को सिर्फ लाल बत्ती चाहिए, ये यूपी के लिए रेड अलर्ट है. आप पूछ सकते हैं कि पीएम मोदी ने इस पलटवार के लिए तीन साल से अधिक समय का इंतजार क्यों किया? पीएम मोदी अक्सर ऐसा करते हैं, लेकिन अब देखना यह है कि शब्दों की बाजीगरी में जिस तीर से पीएम मोदी ने सपा को निशाने पर लिया है वह लक्ष्य को कितना बेध पाता है. पीएम मोदी को यह भी लगता है कि जिस तरह से बिहार चुनाव में उन्होंने बार-बार लालू यादव के 'जंगल राज' का जिक्र अपने भाषणों में कर तेजस्वी यादव की आरजेडी को सत्ता की सीढ़ी पर चढ़ने नहीं दिया, ठीक उसी तरह से यूपी में भी अखिलेश यादव की 'लाल टोपी' से जनभावना को इतना आतंकित कर दिया जाए कि सपा सत्ता की रेस से बाहर हो जाए. एक और अहम बात यह भी कि दक्षिणपंथी दल भाजपा वाम दलों को दुश्मन नंबर-एक मानती रही है और चूंकि वाम दलों के झंडे का रंग भी गहरा लाल है जो सपा की 'लाल टोपी' से काफी मेल खाता है. कहने का तात्पर्य यह कि पीएम मोदी ने 'लाल टोपी' के एक तीर से कई निशाने साधे हैं.

भाजपा को भारी न पड़ जाए 'लाल टोपी' का तंज  
यूपी चुनाव में अभी तीन महीने से अधिक का वक्त बाकी है. कहते हैं कि राजनीति में हालात बदलने के लिए कई बार इतना वक्त काफी होता है, लेकिन पीएम मोदी और सीएम योगी के हालिया रूख से इतना तो साफ हो ही गया है कि इस बार की चुनावी बिसात पर भाजपा सपा को अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मान चुकी है. ये अपने-आप में अखिलेश यादव की महत्ता को भी रेखांकित करता है. केंद्र और राज्य की सत्ता में काबिज भाजपा के सबसे लोकप्रिय नेता और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'लाल टोपी' पर तंज कसकर इस बात को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार कर लिया है कि उनकी लड़ाई अखिलेश यादव से ही है. निश्चित तौर पर मोदी के इस तंज ने अखिलेश यादव को बैठे-बिठाए चुनावी समर में कूदने का एक नायाब चुनावी मुद्दा दे दिया है. कहते हैं कि संपूर्ण क्रांति के अग्रदूत लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने सबसे पहले 'लाल टोपी' पहनी थी. तभी से यूपी में लाल और भगवा रंग के बीच एक प्रतीकात्मक संघर्ष जारी है. 1992 में जब समाजवादी पार्टी की स्थापना हुई तो राममनोहर लोहिया के अनुयायी रहे जनेश्वर मिश्रा, बृजभूषण तिवारी, मोहन सिंह आदि ने इसमें अहम भूमिका निभाई थी और उन्होंने 'लाल टोपी' को अपनाया था. श्री 420 के उस गाने को ही लें जिसमें राजकपूर कह रहे हैं पैर में जापानी जूता, बदन पे इंगलिश्तानी पतलून और सिर पे रूसी लाल टोपी होते हुए भी दिल तो हिन्दुस्तानी ही है. ऐसे में पीएम मोदी ने 'लाल टोपी' को जिस तरीके से कठघरे में खड़ा किया है, आने वाले वक्त में अखिलेश यादव निश्चित रूप से मुद्दा बनाकर 'लाल टोपी' के ऐतिहासिक प्रसंगों के साथ पलटवार जरूर करेंगे.  

बहरहाल, भगवा टोपी बनाम लाल टोपी की जंग में फंसा उत्तर प्रदेश का जनादेश किस टोपी के रंग को चोखा करता है ये तो विधानसभा चुनाव के नतीजे ही तय करेंगे, लेकिन जब बात गोरखपुर की धरती से निकली है तो लाल टोपी बनाम भगवा टोपी की सियासत में फंसे सियासतदानों चाहे वो पीएम नरेंद्र मोदी हों या फिर सीएम योगी आदित्यनाथ, अखिलेश यादव हों या फिर बहन मायावती, प्रियंका गांधी हों या फिर चौधरी जयंत सिंह सबको मशहूर शायर फ़िराक़ गोरखपुरी के इस शेर को जरूर पढ़ना चाहिए, उसके गूढ़ अर्थ को जरूर समझना चाहिए और हो सके तो अपनी गंदी सियासत को गुडबॉय कर इसे आत्मसात करना चाहिए...

'मज़हब कोई लौटा ले, और उसकी जगह दे दे
तहज़ीब सलीके की, इंसान करीने के।' 

 

(8 दिसंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/prime-minister-narendra-modi-has-set-the-agenda-of-uttar-pradesh-assembly-elections-2022-by-targeting-the-red-cap-of-akhilesh-yadav-949019.html

 

Tuesday, 7 December 2021

नगालैंड में शांति बहाली की नौटंकी का हश्र


नगालैंड के मोन जिला स्थित गांव तिरु में सुरक्षा बलों की फायरिंग में 21 पैरा स्पेशल फोर्सेज के एक जवान और एक दर्जन से अधिक ग्रामीणों की मौत के बाद सड़क से लेकर संसद तक हंगामा खड़ा हो गया है. सुनने में घटना बहुत छोटी सी लगती है कि सेना के 21 पैरा स्पेशल फोर्सेज किसी बड़े ऑपरेशन की ताक में थे. खुफिया विंग की गलत इनपुट की वजह से सुरक्षा बलों ने उग्रवादी समझ ग्रामीणों के उस वाहन पर फायरिंग झोंक दी जिसमें गांव के निर्दोष दिहाड़ी मजदूर थे. माना कि जो कुछ हुआ उसमें सुरक्षा बलों से बड़ी चूक हुई है, लेकिन इस हकीकत से सरकार पल्ला कैसे झाड़ सकती है कि नगालैंड के हालात ठीक नहीं हैं और यह ताजा मामला इतना हल्का नहीं जितना सुनने में लग रहा है. निश्चित रूप से फायरिंग की इस वीभत्स घटना ने केंद्र सरकार, सेना की खुफिया विंग, नगालैंड सरकार और स्थानीय पुलिस सबको कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में बयान देकर भले ही एसआईटी गठन की बात की हो और सेना ने कोर्ट ऑफ इंक्वायरी की, लेकिन इस सवाल का जवाब तो केंद्र सरकार को देना ही पड़ेगा कि सुरक्षाबलों ने किन उग्रवादियों पर कार्रवाई के लिए इतनी बड़ी घेरेबंदी की थी? उन उग्रवादियों की तो नहीं जिनके साथ 2015 में केंद्र ने फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर किया था. समझौते के 6 साल बीतने के बावजूद केंद्र सरकार विवादों को खत्म करने में आखिर क्यों विफल रही है? अभी भी अफस्पा कानून से जकड़ा नगालैंड खुद को ठगा सा क्यों महसूस कर रहा है?  

शांति बहाल नहीं होने के पीछे हैं कई वजहें

दरअसल, म्यांमार की सीमा से सटे नगालैंड में स्थायी शांति लाने के प्रयास तभी से ठप्प पड़े हैं जब से केंद्र सरकार ने एनएससीएन की ओर से अवैध तरीके से टैक्स की जो वसूली कर रहे थे उसपर रोक लगा दी. संगठन की दलील है कि केंद्र सरकार का यह फैसला ठीक नहीं है. उल्लेखनीय है कि जिस उग्रवादी संगठन से केंद्र सरकार ने 2015 में फ्रेमवर्क समझौता किया था वह अपनी स्थापना के वक्त से ही राज्य के तमाम लोगों, व्यापारियों और सरकारी कर्मचारियों तक से टैक्स वसूलता रहा है. जब सरकार ने इसपर शिकंजा कसा तो समझौते का असर बेअसर होने लगा. दूसरी अहम बात यह है कि नागा समुदाय को डेवलपमेंट यानी विकास से बहुत चिढ़ है. केंद्र सरकार को लगता है डेवलपमेंट के जरिये ही वह सरकार से दूर हो रहे लोगों को अपनी तरफ ला पाएंगी, लेकिन हकीकत में ऐसा है नहीं. नागाओं के बीच अमीर और गरीब की खाई एक बड़ी समस्या है जो निरंतर बढ़ती ही जा रही है. इनकी इस समस्या को कोई एड्रेस नहीं करता है. पलायन की वजह से गांव के गांव खाली हो रहे हैं. इन खाली होते नागा गांवों की बात कोई सरकार या राजनीतिक दल नहीं करता. पहाड़ी गांवों में पानी की किल्लत है. जलवायु परिवर्तन की वजह से फसलें चौपट हो रही हैं. लिहाजा यहां की बड़ी आबादी मजदूरी के लिए गांव छोड़ने को मजबूर हैं. तीसरी अहम बात यह कि केंद्र सरकार ने 3 अगस्त, 2015 को एनएससीएन के इसाक मुइवा गुट के साथ जिस फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर किए थे उसके प्रावधानों को गोपनीय रखा गया था. बाद में साल 2017 में नागा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप जैसे सात विद्रोही गुटों को जब शांति समझौते में शामिल किया गया तो कुछ नागा संगठनों ने इसको लेकर निराशा जताई थी और इसे शांति प्रक्रिया को लंबा खींचने का जरिया बताया था. बाद में एनएससीएन ने जब फ्रेमवर्क समझौते के प्रावधानों को सार्वजनिक किया तो शांति प्रक्रिया में मध्यस्थ रहे आर.एन. रवि जो इस वक्त प्रदेश के राज्यपाल भी हैं, पर साझा संप्रभुता का हवाला देते हुए मूल समझौते में कुछ लाइनें बदलने का आरोप लगाया था. 

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एनएससीएन अलग संविधान और अलग झंडे की मांग पर आज भी अड़ा है जबकि केंद्र सरकार इसके लिए तैयार नहीं है. यही शांति प्रक्रिया की राह में सबसे बड़ी बाधा है. समझौता होना जरूरी है और समय-समय पर समझौते होते भी रहे हैं, लेकिन समझौते करने वाले पक्षों ने कभी आम नागाओं की जिंदगी के बारे में न तो सोचा और न ही समझा? तो फिर कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि नागा लोगों की जिंदगी पटरी पर आ जाएगी और ऐसे में यह उम्मीद करनी तो और भी बेमानी है कि नगालैंड में शांति बहाल हो जाए. सारे विवाद खत्म हो जाएं. एक और जो सबसे अहम बात है वह यह कि उत्तर-पूर्वी भारत के बहुत सारे हिस्से आज भी खुद को भारत से अलग-थलग महसूस करते हैं. नगालैंड भी उनमें से एक है. राजनीतिक अलगाव की वजह से हर बार नागा शांति समझौता अपने मुकाम तक नहीं पहुंच पाता है. थोड़ी देर के लिए खुद ही सोचकर देखिए- भारतीय संविधान में कश्मीर को दिए गए विशेष दर्जे को लेकर हम सब जितनी बहसें करते हैं उतनी कभी नागालैंड को दिए गए विशेष दर्जे के बारे में करते हैं? बिल्कुल नहीं. जबकि हकीकत यह है कि नगालैंड का इतिहास काफी पुराना और काफी विवादित रहा है जिसकी शुरुआत आजादी से पहले से होती है. 

बहुत पेचीदा है नगालैंड का इतिहास

नागा किसी एक अकेली जनजाति का नाम नहीं, बल्कि यह जनजतियों के समूह का नाम है. अंग्रेजों ने इनके इलाके में एक छावनी बनाई थी. यही छावनी मौजूदा वक्त में नगालैंड की राजधानी है जिसे कोहिमा कहा जाता है. नागा पहाड़ों पर रहते थे जिन्हें नागा हिल्स कहा जाता था. ये पहाड़ तमाम संसाधनों से अटे पड़े थे जिनपर अंग्रेजों की नजरें गड़ी थीं. आधिकारिक तौर पर साल 1881 में नागा हिल्स ब्रिटिश भारत का हिस्सा बन गया. लेकिन ऐसा कहा जाता है कि नागा जनजाति के लोग ब्रिटिश भारत का हिस्सा अपनी मर्जी से नहीं बने थे. इनके साथ तब भी जबरदस्ती की गई थी जैसा कि साम्राज्यवादी ताकतें अपने उपनिवेशों के साथ किया करती थी. गुलामी के खिलाफ नागा लोगों ने भी विरोध की आवाज बुलंद की थी और साल 1918 में नागा क्लब का गठन किया. साइमन कमीशन जब भारत आया तो नागाओं ने कहा कि हमें हमारे हाल पर छोड़ दीजिए. 1946 में अंगामी जापू फिजो की अगुआई में नागा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) बना. शुरुआती वक्त में इनका कहना था कि नागा हिल्स के तौर पर यह भारत का हिस्सा होगा, लेकिन अपने शासन चलाने के तरीकों को वह खुद तय करेंगे. इसको लेकर भारत सरकार और नागाओं के बीच अकबर हैदरी समझौता भी हुआ था. लेकिन आजादी के ठीक पहले यह समझौता टूट गया. 

14 अगस्त, 1947 को नागाओं ने भी खुद को आजाद घोषित कर दिया. उसी दिन पाकिस्तान भी बना. वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि पाकिस्तान को तो देश के तौर पर मान्यता मिली लेकिन नागाओं को नहीं मिली. भारत के संविधान बनने के एक साल बाद नागा नेशनल काउंसिल की अगुआई में नागा गुटों ने रेफरेंडम करवाया जिसमें पता चला कि 99 फीसदी से अधिक नागा आजाद नागालैंड चाहते हैं. भारत सरकार ने इस रेफरेंडम को मानने से इंकार कर दिया. लेकिन अपनी आजादी के लिए नागाओं ने अपनी लड़ाई जारी रखी. 22 मार्च, 1952 को फिजो ने भूमिगत नागा फेडरल गवर्नमेंट (एनएफजी) और नागा फेडरल आर्मी (एनएफए) का गठन किया. मतलब देश के अंदर देश और उसकी अपनी फैज भी. इनसे निपटने के लिए भारत सरकार ने सैनिकों को बहुत अधिकार दिए. साल 1958 में नागा फेडरल आर्मी से निपटने के लिए भारत सरकार ने 1958 में सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (अफस्पा) बनाया. यहीं से अफस्पा कानून की शुरुआत हुई जिसे बाद में कश्मीर में भी लागू किया गया. लेकिन कहते हैं न कि फौजी बंदूकों से कभी कोई समाधान का रास्ता नहीं निकलता है. और आखिरकार पक्षकारों को शांति वार्ता की मेज पर बैठना ही पड़ा और साल 1963 में असम से नागा हिल्स जिले को अलग कर नगालैंड को राज्य का दर्जा दे दिया गया. 1964 में पहली बार नगालैंड विधानसभा का गठन हुआ. 

नागा गुटों में तालमेल न होने से भी बिगड़ी बात

नगालैंड राज्य के गठन के बाद भारतीय संविधान में संशोधन किया गया जिसमें अनुच्छेद 371-ए जोड़ा गया. इसके मुताबिक केंद्र का बनाया कोई भी कानून अगर नागा परंपराओं (मतलब नागाओं के धार्मिक-सामाजिक नियम, उनके रहन-सहन और पारंपरिक कानून) से जुड़ा हुआ होगा तो वो राज्य में तभी लागू होगा जब नागालैंड की विधानसभा बहुमत से उसे पास करेगी. यानी नागा लोगों की संस्कृति को सुरक्षित रखे जाने का पूरा भरोसा संविधान के तहत दिया गया. लेकिन बात तब भी नहीं बनी. नागा गुटों और भारत सरकार के बीच करीब एक दशक से अधिक समय तक संघर्ष जारी रहा. फिर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पहल की थीं. 11 नवंबर, 1975 को शिलांग समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिये NNC नेताओं का एक गुट सरकार से मिला जिसमें हथियार छोड़ने पर सहमति जताई गई. यह भी कहा कि वह अलग राज्य की मांग नहीं करेंगे और भारतीय संविधान के अंदर ही रहेंगे. लेकिन सरकार के लिए मुश्किल यह थी कि नागा समुदाय के अंदर भी कई गुट थे जिनसे संतुलन बिठाना आसान नहीं था. इसका नतीजा यह हुआ कि NNC और NFG का एक समूह इस समझौते से खुद को अलग कर लिया था. 

चीन भी पीछे नहीं रहा नागाओं को भड़काने में 

नगालैंड की सीमा चीन से लगी है. समय-समय पर मौका पाकर चीन ने नागाओं के विरोध की जमीन में खूब खाद-पानी दिया. कहा जाता है कि एनएनसी के तत्कालीन सदस्य थुइनगालेंग मुइवा समझौते के वक्त चीन में ही थे. इन्होंने एनएनसी और एनएफजी के तकरीबन 140 सदस्यों के साथ शिलांग शांति समझौते को ही नकार दिया था. बाद में इसी गुट ने 1980 में नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन) का गठन किया. साल 1988 में एनएससीएन में भी दो फाड़ हो गया. खापलांग ने एनएससीएन से अलग होकर एनएससीएन (के) बना लिया. उसके बाद जो एनएससीएन बचा, वह कहलाया एनएससीएन (आईएम). आई यानी इसाक और एम यानी मुइवा. एनएससीएन (आईएम) ने ‘ग्रेटर नागालिम’ की मांग उठानी शुरू कर दी.  ग्रेटर नागालिम में आज के नागालैंड सहित अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, असम और म्यांमार के इलाके आते हैं. एनएससीएन (आईएम) ने भारत सरकार के साथ पहला शांति समझौता 1997 में किया. 1997 के बाद से एनएससीएन (आईएम) ने सरकार से कई दौर की बातचीत की. शांति समझौते के बाद भी छिटपुट हिंसा होती रही. और फिर 3 अगस्त 2015 को नागा शांति समझौता का फ्रेमवर्क ऑफ एग्रीमेंट बना. यानी समझौता किन शर्तों पर होगा, उसका खाका बना.  एनएससीएन (आईएम) के अलावा नागालैंड में कम से कम छह और हथियारबंद संगठन नागा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप्स (एनएनपीजी) थे जिन्हें सरकार ने 2017 में शांति बहाली का हिस्सा बनाया. 

बहरहाल, एनएससीएन (आईएम) ने 6 साल पहले हुए फ्रेमवर्क समझौते लेकर हाल ही में एक बयान जारी किया है जिसमें कहा गया कि छह साल बीत जाने के बाद भी भारत सरकार की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है. नागाओं के साथ ऐसा सलूक नहीं किया जा सकता. संगठन के इस बयान के बाद अचानक से नगालैंड में हलचल तेज हो गई है. सेना की खुफिया विंग समेत सरकारी एजेंसियां भी उग्रवादी संगठनों की गतिविधियों को लेकर सरकार और सेना को फिर से चौकस रहने की इनपुट दे रहे हैं. तभी तो सेना ने अपने बयान में इस बात की पुष्टि की है कि नगालैंड में मोन जिले के तिरु में उग्रवादियों की संभावित गतिविधियों की विश्वसनीय खुफिया जानकारी के आधार पर इलाके में एक विशेष अभियान चलाए जाने की योजना बनाई गई थी. मतलब नगालैंड में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. सरकार की मुश्किलें इस रूप में भी बड़ी हो गई हैं कि भाजपा की नगालैंड इकाई के अध्यक्ष तेमजेन इम्ला एलोंग ने कहा है कि फायरिंग की घटना, शांतिकाल में युद्ध अपराध के बराबर है. यह नरसंहार और मृत्युदंड देने जैसा है. इसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. सिर्फ इसे खुफिया विफलता बताकर पल्ला झाड़ लेना सबसे लाचारी भरा बयान है. एलोंग ने कहा कि ऐसे वक्त में तो और अधिक संयम बरतना चाहिए था, जब भारत सरकार और नगा राजनीतिक समूहों के बीच शांति वार्ता चल रही हो. उनकी इस मांग पर कि घटना के जिम्मेदार असम रायफल्स के जवानों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाए और पीड़ितों को इंसाफ दिया जाए, आने वाले वक्त में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व और भाजपा नीत केंद्र सरकार के लिए मुश्किल पैदा करेगा. तेमजेन इम्ला एलोंग नगालैंड सरकार में मंत्री भी हैं.

(6 दिसंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/nagaland-killings-why-is-the-situation-in-state-so-bad-was-the-deal-with-the-extremist-groups-ineffective-946764.html

Thursday, 2 December 2021

मुनव्वर फारूकी को टारगेट करने के पीछे ये है असली गेम

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो कॉमेडियंस की कॉमेडी पर खिलखिला उठते हैं, लेकिन हाल के वर्षों में कुछ ऐसे लोगों की भी जमात खड़ी हुई है जिनकी इन कॉमेडी से भावनाएं आहत होती हैं. उन्हें यह कॉमेडी देश की सभ्यता और संस्कृति पर हमला लगता है और बात पुलिस-प्रशासन में शिकायत तक पहुंच जाती है. कई बार तो बात उस कॉमेडियन के शो रद्द कराने या उसे ऑनलाइन-ऑफलाइन धमकी देने तक पहुंच जाती है. इसी फेहरिस्त में एक बार फिर से चर्चा में हैं कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी. रविवार 28 नवंबर की शाम को फारूकी का लेटेस्ट शो 'डोंगरी टू नोवेयर' बेंगलुरू के गुड शेफर्ड ऑडिटोरियम में होने वाला था. भारी विरोध के बाद पुलिस-प्रशासन ने शो को इजाजत नहीं दी. मुनव्वर फारूकी ने ट्वीट किया, “नफरत जीत गई, आर्टिस्ट हार गया. मैं अब कुछ नहीं कर रहा! अलविदा! अन्याय.” हंगामा मचना था सो मचा. कई तरह के सवाल उठ खड़े हुए जिसमें एक सवाल यह भी खड़ा हुआ कि क्या मुनव्वर फारूकी को वेवजह टारगेट किया जा रहा है?

फारूकी को टारगेट करने के पीछे क्या है असल कहानी

गुजरात के जूनागढ़ निवासी स्टैंडअप कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी को इसलिए टारगेट नहीं किया जा रहा है कि वह हिन्दू नहीं हैं. बात सिर्फ हिन्दू न होने की नहीं है. बहुत सारे हिन्दू कॉमेडियन भी हिन्दूवादी संगठनों और मौजूदा केंद्रीय सत्ता के निशाने पर हैं जो सत्ता के मनमाफिक बात नहीं करते हैं. मसलन कुणाल कामरा, राजीव निगम, वीर दास, तन्मय भट्ट, कीकू शारदा आदि लंबी फेहरिस्त है. असल बात तो ये है कि मुनव्वर फारुकी मुस्लिम होने के साथ-साथ मोदी सत्ता, भाजपा, आरएसएस समेत तमाम दक्षिणपंथी संगठनों पर अपनी कॉमेडी में अपने कंटेंट से तीखा कटाक्ष भी करते हैं. मशहूर चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन को कौन भूल सकता है. एक बार जब बीबीसी ने हुसैन से सवाल किया था, "क्या सोचकर आपने हिन्दू देवियों को न्यूड पेंट किया?" तो हुसैन का जवाब था, "इसका जवाब अजंता और महाबलीपुरम के मंदिरों में है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने जो अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, उसे भी पढ़ लीजिए. मैं सिर्फ कला के लिए जवाबदेह हूं और कला सार्वभौमिक है. नटराज की जो छवि है, वो सिर्फ भारत के लिए नहीं है, सारी दुनिया के लिए है. महाभारत को सिर्फ साधु-संतों के लिए नहीं लिखा गया है. उस पर पूरी दुनिया का हक है." लेकिन एक बात मुनव्वर फारूकी जैसे कलाकार को समझनी होगी कि मकबूल ने जब यह विवादित पेंटिंग बनाई थी तब देश की सत्ता बड़ी उदार हुआ करती थी. साल 1970 में बनाई गई इन पेंटिंग पर विवाद तब खड़ा हुआ जब 'विचार मीमांसा' नाम की एक पत्रिका ने साल 1996 में 'मकबूल फिदा हुसैनः पेंटर या कसाई' शीर्षक से उसे प्रकाशित कर दिया. फिर क्या था. तब भाजपा, आरएसएस और हिन्दूवादी संगठन ध्रुवीकरण की राजनीति का कोई मौका छोड़ते नहीं थे. ऐसा विरोध शुरू हुआ कि मकबूल फिदा हुसैन को देश छोड़ना पड़ा. कहने का मतलब यह कि समय, काल और परिस्थिति के हिसाब से इस देश में कलाकार टारगेट होते रहे हैं. मुनव्वर फारूकी अपवाद नहीं हैं. आज देश में माहौल ही ऐसा हो गया है जहां उदारता और असहिष्णुता में टकराव आम हो गई है और इस टकराव की आग में घी डालकर उसे बड़ा बनाने में मीडिया बड़ी भूमिका निभा रही है. गुजरात बजरंग दल के एक नेता ने तो यहां तक कह दिया था कि मुनव्वर फारूकी ने अपनी कॉमेडी से हिन्दू धर्म को नीचा दिखाया है, हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत किया है. बजरंग दल इन चीजों को लेकर सहिष्णु नहीं है. और फिर गुजरात में होने वाले फारूकी के तमाम शो को रद्द कर दिया गया.  

क्या है फारूकी के विवाद की पूरी कहानी?

मध्यप्रदेश के इंदौर से शुरू हुई विवादों की यह कहानी अब कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु पहुंच काफी हॉट हो गई है. साल 2021 पहली जनवरी की बात है. मुनरो कैफे में कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी का स्टैंडअप कॉमेडी शो था. हालांकि कुछ अन्य विवादित कॉमेडी वीडियो को लेकर फारुकी पहले से ही हिन्दू संगठनों के निशाने पर थे. लेकिन यहां तो लाइव शो के दौरान ही कुछ हिन्दू संगठनों के कार्यकर्ता आ धमके थे. तब फारूकी 37 दिन तक जेल में रहे थे. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत दी थी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तब तुकोगंज पुलिस स्टेशन में मुनव्वर फारूकी पर हिन्दू देवी-देवताओं सीता मैया, भगवान राम और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करने का आरोप लगा था. जहां तक बेंगलुरू शो की बात है तो द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, हिन्दू जागृति समिति ने बीते 27 नवंबर को बेंगलुरू के पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखकर फारूकी के शो को रद्द करने के लिए कहा था. रणनीति के तहत इसी पत्र को ट्विटर पर भी पोस्ट किया गया जिसमें कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई, भाजपा सांसद सांसद तेजस्वी सूर्या और अनंत कुमार हेगड़े को टैग किया गया था. राजनीतिक दबाव में बेंगलुरू पुलिस ने शो की इजाजत नहीं दी. मामला तब और तूल पकड़ गया जब कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा सांसद राहुल गांधी ने मुनव्वर का नाम लिए बिना ट्वीट किया, “नफरत नहीं जीतेगी. विश्वास रखिए. हार नहीं माननी है. रुकना नहीं है.” सोशल मीडिया पर मुनव्वर के समर्थन और विरोध में खूब बहस चल रही हैं. हालांकि मुनव्वर ने खुद अपने ट्वीट में इस बात का दावा किया है, "हमारे पास शो का सेंसर सर्टिफिकेट भी है. इसमें कोई भी आपत्तिजनक बात नहीं है. हमने पिछले दो महीने में 12 शो रद्द किए हैं. सिर्फ धमकियों की वजह से." लेकिन कहते हैं न कि 'होइहि सोइ जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावै साखा'.  सो फारूकी को रामायण की इन पंक्तियों की गहराई को आत्मसात करना चाहिए.

मुनव्वर फारूकी बनाम जाकिर खान क्यों? 

सोशल मीडिया पर मुनव्वर फारूकी को खूब नसीहत दी जा रही है, 'कॉमेडी करनी है तो जाकिर खान से सीखो, मुनव्वीर फारुकी की तरह किसी धर्म का मजाक उड़ाने की जरूरत नहीं है'. आखिर फारूकी का विरोध करने के लिए हिन्दूवादियों को जाकिर खान की जरूरत क्यों पड़ी? कौन हैं जाकिर खान जिसकी उपमा देकर फारूकी को नसीहत दी जा रही है? दरअसल जब मुनव्वर फारूकी के कॉमेडी कंटेंट पर सवाल उठा तो कुछ लोगों ने उनके समर्थन में कहा कि मुस्लिम होने की वजह से ही हमेशा उन्हें टारगेट किया जाता है. इसके जवाब में मुनव्वर फारूकी को ट्रोल करते हुए बड़ी संख्या लोग सोशल मीडिया पर लिखने लगे, दुनिया में और भी मुस्लिम कॉमेडियन्स हुए हैं जिन्हें भारत में खूब पसंद किया जाता है. जाकिर खान भी मुस्लिम है और सभी उसे बहुत पसंद करते हैं. निश्चित रूप से इस तरह की टिप्पणी इस बात को स्थापित करने के लिए लिखी गई कि मुस्लिम होने की वजह से मुनव्वर फारूकी को टारगेट नहीं किया जा रहा है. ऐसा कहा जाता है कि मध्यप्रदेश के इंदौर निवासी जाकिर खान के स्टैंडअप कॉमेडी की खास बात ये है कि इससे मिडिल क्लास फैमिली खुद को बेहद नजदीक पाती है. उनकी कॉमेडी का अंदाज बाकी स्टैंडअप कॉमेडियन से काफी अलग है जिसकी वजह से वह काफी मशहूर हैं. उनका सत्ता, सियासत और धर्म से कोई लेना-देना नहीं रहता. दरअसल, कॉमेडी भी कला की एक ऐसी विधा है जिसके कई रंग होते हैं. कोई जरूरी नहीं कि कॉमेडी के जिस रंग को जाकिर खान जीते हैं उसी रंग को मुनव्वर फारूकी भी जीयें. कोई अपनी कॉमेडी से समाज पर कटाक्ष करता है तो कोई सत्ता और सियासत पर. यही तो हमारे लोकतंत्र और भारतीय संविधान की खूबसूरती भी है कि हर कोई अपने तरीके से अपनी बात को अभिव्यक्त करने के लिए आजाद है. लेकिन यही आजादी जब सत्ता को बर्दाश्त नहीं होता तो आईटी सेल किसी मुनव्वर फारूकी के खिलाफ किसी जाकिर खान को खड़ा कर देता है.     

बहरहाल, कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी का बेंगलुरू में होने वाला शो पुलिस की सलाह पर रद्द किया जा चुका है. कानून-व्यवस्था की आड़ में आगे भी ऐसे शो रद्द होते रहेंगे इससे कोई इनकार नहीं. यही हमारे कानून की धाराओं की मुश्किल खूबसूरती है. लेकिन फारूकी इसी कानून को चुनौती देते हुए कहने से नहीं चूक रहे कि 'मुझे उस जोक के लिए जेल में डाला गया था, जो मैंने कभी कहा ही नहीं. मेरे शो में कुछ भी विवादास्पद नहीं है. लेकिन इसे भी रद्द कर दिया गया. यह अन्याय है.' फारूकी ने दावा किया है कि उनके पास शो का सेंसर सर्टिफिकेट भी है. इसमें कोई भी आपत्तिजनक बात नहीं है. लेकिन पुलिस प्रशासन ने फारूकी की बात नहीं सुनी. बात उनकी सुनी जिनके आका सत्ता के शीर्ष पर विराजमान हैं. भले ही फारूकी के इस लेटेस्ट शो में कोई आपत्तिजनक कंटेंट नहीं हो, लेकिन फारूकी का अतीत (धमकियों की वजह से पिछले दो महीने में 12 शो रद्द) उसका पीछा नहीं छोड़ रहा है. चूंकि उसके इसी अतीत से दक्षिणपंथी संगठनों की सत्ता की जमीन को खाद-पानी मिलता है, पांच राज्यों में चुनावी सरगर्मियां तेज हो चली हैं. लिहाजा वो तो शोर मचाएंगे ही. समझना मुनव्वर फारूकी जैसे कॉमेडी कलाकारों को ही होगा कि वो अपनी बात को इस तरह से कह जाएं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

(1 दिसंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/why-munawar-faruqui-comedy-hurts-people-sentiments-939086.html

Saturday, 27 November 2021

तो जनसंख्या नियंत्रण वाले कानूनों की जरूरत ही क्या है?


जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर एक बार फिर भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है. कानून को राष्ट्रीय स्तर पर लाया जाए या इसे टाल दिया जाए. संसद के शीतकालीन सत्र में तीन कृषि कानूनों को वापस लेने के मोदी सरकार के फैसले से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के नेताओं को भी लगने लगा है कि सरकार को जनसंख्या नियंत्रण बिल लाने से पहले सर्वसम्मति बनाने और व्यापक विचार-विमर्श का रास्ता अपनाना चाहिए. आखिर इस तरह की स्थिति क्यों पैदा हुई? दरअसल, राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण (National Family Health Survey) के ताजा सर्वे रिपोर्ट ने जिन तथ्यों का खुलासा किया है, उसने देश के नीति-निर्माताओं को एक बार फिर यह सोचने पर विवश किया है कि भारत जैसे देश में कानून बनाकर जनसंख्या के बोझ को कम नहीं किया जा सकता. ये अलग बात है कि यह एक सर्वे है और इसमें देश के 707 जिलों के सिर्फ 650,000 परिवारों को सैंपल के तौर पर शामिल किया गया है. 130 करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश में साढ़े छह लाख परिवारों का सैंपल बहुत मायने नहीं रखता, लेकिन इसे इंडिकेटर के तौर पर तो देखा ही जाएगा.

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे रिपोर्ट के क्या हैं मायने?

राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण (National Family Health Survey) में जो सबसे अहम बात निकलकर सामने आई है वो ये कि पहली बार देश में फर्टिलिटी रेट यानी प्रजनन दर 2 पर आ गई है. 2015-16 में यह 2.2 थी. मतलब पहले एक मां औसतन 2.2 बच्चे पैदा करती थी. अब वो औसतन 2 बच्चे पैदा कर रही है. इस गिरावट का सीधा मतलब ये है कि कम बच्चे पैदा हो रहे हैं. लिहाजा बिना जनसंख्या नियंत्रण कानून के ही देश जनसंख्या कम होने की दिशा में बढ़ रहा है. सर्वे के ताजा आंकड़ों में ये भी कहा गया है कि भारत में अब 1000 पुरुषों पर 1020 महिलाएं हैं. 1990 के दौर को याद करें तो हर 1000 पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या सिर्फ 927 थी. साल 2005-06 में हुए तीसरे एनएफएचएस सर्वे में ये 1000-1000 के साथ बराबर हो गया. इसके बाद 2015-16 में चौथे सर्वे के आंकड़ों को देखें तो इसमें फिर से गिरावट आ गई. तब 1000 पुरुषों के मुकाबले 991 महिलाएं थीं. आजादी के इतिहास में पहली बार महिलाओं के अनुपात ने पुरुषों को पछाड़ दिया है. मतलब ये कि महिला सशक्तिकरण अभियान के तहत जब महिलाएं इतनी सशक्त हो चुकी हैं तो महिलाओं को थोड़ा और जागरूक कर जनसंख्या नियंत्रण के गुर सिखाए जा सकते हैं. उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में भी जहां जनसंख्या नियंत्रण विधेयक को कानूनी जामा पहनाया गया है, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण रिपोर्ट-5 में प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या बढ़कर 1017 हो गई है. वर्ष 2015 की बात करें तो उस समय लिंगानुपात 995 था. चूंकि इस सर्वे को भारत का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय यानी Ministry of Health and Family Welfare कंडक्ट कराता है जिसकी शुरुआत 1992-93 में हुई थी. लिहाजा सरकार के लिए ये तय करना आसान होगा कि बेकाबू होती जनसंख्या वृद्धि के लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून कितना जरूरी है.

पीएम मोदी क्यों करते हैं जनसंख्या नियंत्रण की बात?

कहते हैं कि जिस प्रकार से बिना पानी के नदी की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी प्रकार जनसंख्या के बिना किसी राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन इसी का दूसरा पहलू यह भी है कि जब जनसंख्या बेकाबू हो जाए और वो भी युवा जनसंख्या जिसके लिए रोजगार के अवसर सीमित हों, तो भी राष्ट्र का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है. शायद इसी खतरे को भांपते हुए 15 अगस्त 2019 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेजी से बढ़ रही जनसंख्या पर चिंता जताई थी. दरअसल, किसी भी देश में युवा तथा कार्यशील जनसंख्या की अधिकता तथा उससे होने वाले आर्थिक लाभ को जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Divided) के तौर पर देखा जाता है. भारत में मौजूदा समय में सर्वाधिक जनसंख्या युवाओं की है. यदि इस आबादी का इस्तेमाल देश की अर्थव्यवस्था को गति देने में किया जाए तो यह जनसांख्यिकीय लाभांश प्रदान करेगा, लेकिन यह तब संभव होगा जब शिक्षा गुणवत्तापरक हो, रोजगार के अवसर असीमित हों, स्वास्थ्य एवं आर्थिक सुरक्षा के साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हों. वरना यह युवा व कार्यशील आबादी अभिशाप का रूप धारण कर सकती है. इसीलिए दुनिया के समझदार देश अपने संसाधनों के अनुपात में ही जनसंख्या वृद्धि पर बल देते हैं. भारत में मौजूदा वक्त में युवा एवं कार्यशील जनसंख्या सबसे ज्यादा है, लेकिन उसकी योग्यता के मुताबिक रोजगार के अवसर बेहद सीमित हैं. ऐसे में यदि जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित न किया गया तो स्थिति भयावह हो सकती है. इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनसंख्या नियंत्रण कानून लाकर जनसंख्या को नियंत्रित करने की बात लगातार कर रहे हैं.

क्यों जरूरी है जनसंख्या नियंत्रण कानून?

जो लोग तार्किक तरीके से जनसंख्या नियंत्रण कानून की बात कर रहे हैं उनकी बात को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है. दरअसल, किसी भी देश में जब जनसंख्या बेकाबू हो जाती है तो संसाधनों के साथ उसकी ग़ैर-अनुपातित वृद्धि होने लगती है, लिहाजा इसमें स्थिरता लाना जरूरी हो जाता है. भारत में विकास की गति की अपेक्षा जनसंख्या वृद्धि दर अधिक है. संसाधनों के साथ-साथ क्षेत्रीय असंतुलन भी तेजी से बढ़ रहा है. उसको इस तरह से समझ सकते हैं कि दक्षिण भारत में कुल फर्टिलिटी रेट यानी प्रजनन क्षमता दर 2.1 है जिसे स्थिरता दर माना जाता है, लेकिन इसके उलट उत्तर भारत और पूर्वी भारत जिसमें बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा जैसे राज्य हैं, इनमें कुल प्रजनन क्षमता दर 4 से ज़्यादा है तो यह भारत के भीतर एक क्षेत्रीय असंतुलन पैदा करता है. जब किसी भाग में विकास कम हो और जनसंख्या अधिक हो, तो ऐसे स्थान से लोग रोजगार की तलाश में अन्य स्थानों की तरफ पलायन करते हैं. लेकिन संसाधनों की कमी तथा जनसंख्या की अधिकता तनाव पैदा करती है, भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में उपजा क्षेत्रवाद कहीं न कहीं संसाधनों के लिए संघर्ष से ही जुड़ा हुआ है. लिहाजा सरकार के लिए यह जरूरी हो जाता है कि पूरे देश के लिए एक जनसंख्या नियंत्रण कानून बना दिया जाए.

जनसंख्या नियंत्रण कानून के राजनीतिक पहलू

मथुरा के युद्धोपरांत जब द्वारका पूरी तरह से नष्ट हो गई थी, तब पांडवों के महाप्रस्थान के बाद राजा परीक्षित स्वयं श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ को मथुरा का राज्य सौंपने आए थे. कहते हैं कि जब वज्रनाभ मथुरा के राजा बने उस वक्त समय पूरा वज्रमण्डल उजाड़ पड़ा था. चारों तरफ सिर्फ सूने भवन थे. तब वज्रनाभ ने राजा परीक्षित से कहा था- राज्य, धन या शत्रु की मुझे कोई चिंता नहीं, लेकिन मैं यहां राज्य किस पर करूं? यहां तो प्रजा ही नहीं है. मतलब ये कि राज्य यानी राष्ट्र की ताकत उसकी प्रजा यानी जनसंख्या होती है. पीएम मोदी देश और वैश्विक मंच पर बार-बार 130 करोड़ भारतवासी को अपनी ताकत बताते हैं. आर्थिक नजरिये से भी देखा जाए तो 130 करोड़ की बड़ी जनसंख्या ही भारत की ताकत है जो उसे दुनिया के नक्शे पर बड़ा बनाता है. बड़ी आबादी की वजह से ही यहां दुनिया भर की कंपनियों को बड़ा बाजार और सस्ता मैनपावर मिलता है. इसीलिए भारत इन कंपनियों को निवेश के लिए लुभाता भी है और भुनाता भी है. इस लिहाज से भारत के लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून अप्रासंगिक हो जाता है. सरसंघचालक मोहन भागवत भी लगातार इस बात की वकालत करते रहे हैं कि देश में एक ऐसी जनसंख्या नीति पर फिर से विचार किया जाना चाहिए जो सभी पर समान रूप से लागू हो. अभी हाल ही में नागपुर के रेशमबाग मैदान में दशहरा रैली को संबोधित करते हुए सरसंघचालक ने कहा था कि वर्ष 1951 से 2011 के बीच जनसंख्या वृद्धि दर में भारी अंतर के कारण देश की जनसंख्या में जहां भारत में उत्पन्न मत पंथों के अनुयायियों का अनुपात 88% से घटकर 83.8% रह गया है, वहीं मुस्लिम जनसंख्या का अनुपात 9.8% से बढ़कर 14.24% हो गया है. संघ समेत तमाम दक्षिणपंथी संगठन जनसंख्या नियंत्रण कानून को हिन्दू बनाम मुस्लिम के तौर पर आंकते हैं. लेकिन चुनाव और वोट बैंक की विवशता इन संगठनों के लिए भी मुश्किल खड़ी करता है, लिहाजा मीडिया के जरिये लोगों में इस तरह की खबर को प्रसारित करवा देते हैं कि इन्हें कानूनी जामा पहनाने से पहले व्यापक विमर्श जरूरी है, क्योंकि समाज के एक वर्ग में इसको लेकर शंका है. कहने का मतलब यह कि सरकार हो या फिर उससे जुड़ी सांगठनिक ताकतें सब जनसंख्या नियंत्रण को लेकर कानून बनाने पर कन्फ्यूज हैं. 

इसमें कोई दो राय नहीं कि जनसंख्या नियंत्रण एक दोधारी तलवार है. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की आबादी 121 करोड़ थी और मौजूदा वक्त में अनुमानित जनसंख्या 130 करोड़ को पार कर चुकी है. कोई अनहोनी न हुई तो 2030 तक भारत की आबादी चीन से भी ज्यादा होने का अनुमान लगाया जा रहा है. ऐसे में भारत के समक्ष तेजी से बढ़ती जनसंख्या एक बड़ी चुनौती है. लेकिन अतीत का अनुभव बताता है कि इसके नियंत्रण के लिए कानूनी तरीका बेहतर व उपयुक्त कदम नहीं माना जा सकता. आजाद भारत में दुनिया का सबसे पहला जनसंख्या नियंत्रण राजकीय अभियान साल 1951 में आरंभ किया गया था, लेकिन यह विफल रहा. साल 1975 में आपातकाल के दौरान बड़े स्तर पर जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास किए गए थे, लेकिन इस दौरान भी कई अमानवीय तरीकों का इस्तेमाल किये जाने की वजह से न सिर्फ यह कार्यक्रम फ्लॉप रहा बल्कि लोगों में भय का माहौल पैदा हो गया था. इसके बाद किसी सरकार ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की. चूंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां हर किसी को अपने व्यक्तिगत जीवन के विषय में फैसला लेने का अधिकार है. लिहाजा सरकार को कानून का सहारा लेने के बजाय जागरूकता अभियान, शिक्षा का दायरा और उसके स्तर को बढ़ाकर तथा गरीबी को समाप्त करने जैसे उपाय कर जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रयास करने होंगे. भारत के पास अपनी जनसंख्या के आकार में कटौती करने की पर्याप्त गुंजाइश है. राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 की रिपोर्ट को इस दिशा में एक शुभ संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए.

(26 नवंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
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