देश की राजनीति बदलने की बड़ी कोशिश
प्रियंका ने 'शक्ति विधान' नाम से इस महिला घोषणा पत्र में जिन छह प्रमुख बिन्दुओं (स्वाभिमान, स्वावलंबन, शिक्षा, सम्मान, सुरक्षा और सेहत) को शामिल किया है और उसके पीछे की सोच को जिस रूप में बयां किया है उसका लब्बोलुआब यही है कि सिर्फ चुनाव जीतना कांग्रेस का मकसद नहीं. पार्टी की कोशिश है कि राजनीति की सूरत बदलनी चाहिए. पार्टी की कोशिश है कि आने वाले वक्त में महिलाएं देश की राजनीति करें. आखिर ऐसी राजनीति को देश कब तक ढोता रहे और क्यों न ऐसी राजनीति को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए जिसने धर्म, जाति और संपत्ति की रक्षा के नाम पर परिवार, समाज और देश को सिर्फ बांटने का काम किया है. जवाब तलाशना आसान नहीं होगा कि आजादी के बाद जिस कांग्रेस पार्टी ने सबसे लंबे समय तक देश में राज किया, वही पार्टी अब किस आधार पर राजनीति की सूरत को बदलने की बात कर रही है. महिलाओं के हाथों में राजनीति की कमान सौंपने की बात कर रही है. महिला सशक्तिकरण की बात कर रही है. लेकिन प्रियंका गांधी इन सवालों से बेफिक्र और बेखौफ होकर एक भरोसे के साथ अपने कदम आगे बढ़ा रही है. ऐसे भी इस तरह के अहम फैसले हवा में नहीं लिए जाते हैं. इसके पीछे बहुत बड़ी थिंकटैंक काम करती है. लाखों लोगों की फीडबैंक के आधार पर इन बिन्दुओं को तैयार किया गया होगा. सबसे बड़ी बात यह कि कोई भी राजनीतिक दल इस घोषणा पत्र का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है. आने वाले वक्त में कांग्रेस ने अपने 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' अभियान के तहत अगले दो महीनों में उत्तर प्रदेश की पांच करोड़ महिला मतदाताओं तक पहुंचने की योजना बनाई है. अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस दिन इस अभियान को देश के स्तर पर चलाने का फैसला लिया जाएगा तो राजनीति की सूरत क्या होगी? निश्चित रूप से आने वाले वक्त में प्रियंका का यह मॉडल देश की राजनीति में बदलाव का वाहक बनेगी बशर्ते इसे ईमानदारी से लागू किया जाए.
प्रियंका गांधी के दावे में कितना है दम?
प्रियंका का दावा है कि शक्ति विधान यानी महिला घोषणा पत्र महिला सशक्तिकरण और राजनीति में महिलाओं की भूमिका के लिए मील का पत्थर बनेगा. प्रियंका के इस दावे से कोई इनकार भी नहीं है. चूंकि राजनीति हमारे जीवन के सभी पहलुओं पर फैसले लेती है- मसलन समाज, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, आंतरिक और बाहरी सुरक्षा आदि. इसीलिए घोषणा पत्र में विधानसभा चुनाव में 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को देने का ऐलान किया गया है. याद हो तो सबसे पहले कांग्रेस ने ही पंचायतों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की व्य्वस्थास की थी. ये अलग बात है कि देश की संसद में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का बिल आज तक अटका हुआ है. इसमें कोई दो राय नहीं कि देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी भी कांग्रेस पार्टी से ही थीं. चुनाव आयोग के आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो उत्तर प्रदेश में साल 2007 के विधानसभा चुनाव में जहां महज 41.92 प्रतिशत महिलाओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था, वहीं साल 2012 के विधानसभा चुनाव में यह आंकड़ा बढ़कर 60.28 प्रतिशत और 2017 में 63.31 प्रतिशत तक पहुंच गया. आंकड़ों से साफ है कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में महिला मतदाता किसी भी दल की दशा और दिशा बदलने में सक्षम हैं. पिछले पांच सालों में देश में जितने भी चुनाव हुए हैं, उसमें महिलाओं का वोट प्रतिशत पहले की अपेक्षा काफी तेजी से बढ़ा हैं. हालांकि महिला मतदाताओं का बढ़-चढ़कर चुनाव में भाग लेना और उनकी स्थिति में सुधार होना, दोनों अलग-अलग मामले हैं. वोट देने में इनकी संख्या बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि महिलाओं की स्थिति में सुधार आ रहा हैं. ये स्थिति तब बनेंगी जब महिलाएं निर्णय लेने की स्थिति में पहुंचेंगी और इसी को ध्यान में रखते हुए प्रियंका गांधी ने महिला घोषणा पत्र में उन बातों को प्रमुखता से जगह दी है जिससे वो निर्णय लेने की स्थिति में होंगी.
जातिवादी राजनीति से कैसे पार पाएगा यह मॉडल?
प्रियंका गांधी ने कांग्रेस पार्टी की अतीत की तमाम उपलब्धियों को सामने रखकर यूपी के लिए महिला मतदाताओं पर खासा असर डालने वाला जो राजनीतिक मॉडल तैयार किया है उसमें हिन्दू-मुस्लिम, सवर्ण-दलित, अगड़ों-पिछड़ों की बात करने की जगह प्रियंका सिर्फ महिलाओं की बात कर रही हैं. ऐसे में एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि भारतीय राजनीति में जातिवाद की गहरी पैठ को कांग्रेस का यह मॉडल किस तरह से मिटा पाएगा. इसको इस रूप में समझा जा सकता है कि भारतीय समाज के सभी वर्गों में महिलाओं के संघर्ष, उनकी तकलीफें लगभग एक जैसी ही हैं. इन महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए कदम-कदम पर जूझना पड़ता है. लिहाजा जब आधी आबादी को कांग्रेस के इस मॉडल में एड्रेस किया जा रहा है तो जातिवादी राजनीति का अवरोध तो खुद-ब-खुद टूट जाएगा. आखिर सबकुछ तो इस घोषणा पत्र में शामिल है मसलन, सरकारी पदों पर 40 प्रतिशत महिलाओं की नियुक्ति, महिलाओं के लिए मुफ्त बस सेवा, सस्ता ऋण, कामकाजी महिलाओं के लिए 25 शहरों में छात्रावास, आंगनबाड़ी महिलाओं के लिए 10 हजार मानदेय, महिलाओं की स्वयं सहायता समूह को 4 फीसदी पर ऋण, राशन दुकानों में 50 प्रतिशत का संचालन महिलाओं के हाथों में, हर साल तीन गैस सिलेंडर मुफ़्त, स्नातक में नामांकित लड़कियों को स्कूटी, 12वीं की छात्राओं को स्मार्ट फोन, पुलिस बल में 25 प्रतिशत महिलाओं को नौकरी जैसे महत्वपूर्ण वादे किए गए हैं.
बहरहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में महिला विमर्श को लेकर जिस तौर-तरीके के साथ प्रियंका आगे बढ़ रही हैं, जब देश गुलाम था तब गांधीजी ने भी ऐसी कोशिश की थी और बहुत हद तक कामयाबी भी हासिल की थी. गांधी जानते थे कि महिलाओं को साथ लेकर ही समाज को सुधारा जा सकता है और देश को आजाद भी कराया जा सकता है. आज प्रियंका गांधी भी गांधी के उसी रास्ते पर चलकर रचनात्मक राजनीति उत्तर प्रदेश में कर रही हैं. गांधी कांग्रेस की विरासत हैं और अगर यूपी चुनाव में इस विरासत के साथ प्रियंका गांधी को आगे कर कांग्रेस ने राजनीति की मौजूदा तस्वीर को बदलने का संकल्प लिया है तो निश्चित तौर पर इसका बड़ा असर आने वाले वक्त में राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा.
(9 दिसंबर 2021 को https://www.tv9hindi.com में प्रकाशित)
https://www.tv9hindi.com/opinion/how-much-will-priyanka-gandhi-women-manifesto-change-the-politics-of-uttar-pradesh-951709.html
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