Friday, 29 November 2019

शिवसेना की 'धर्मनिरपेक्षता' पर हंगामा क्यों?

महाराष्ट्र में 'महा विकास अघाड़ी' की सरकार बन चुकी है। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं वो भी घोर सेक्यूलर यानी धर्मनिरपेक्ष दलों कांग्रेस और एनसीपी के साथ। सूबे के राजनीतिक इतिहास को पलटकर देखें तो पहली बार शिवसेना हिन्दुत्व की डोर तोड़कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी संग सेक्यूलर यानी धर्मनिरपेक्षता की डोर से बंध गई है। शपथ ग्रहण समारोह से पहले जैसे ही महा विकास अघाड़ी का चार पन्नों का न्यूनतम साझा कार्यक्रम (कॉमन मिनिमम प्रोग्राम) सामने आया और उसकी प्रस्तावना में जब इस बात का उल्लेख पाया गया कि गठबंधन 'संविधान में वर्णित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को लेकर प्रतिबद्ध है' तो सियासी गलियारों में खलबली मच गई। देखते ही देखते खबरिया चैनलों में इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि आखिर शिवसेना की ऐसी क्या मजबूरी रही कि उसे हिन्दुत्व से किनारा करना पड़ा? बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना जिसकी पहचान भगवा और हिन्दुत्व से थी, ऐसा क्या हो गया कि उसे सेक्यूलरिज्म यानी धर्मनिरपेक्षता की राह पकड़नी पड़ी। हम इसे समझने की कोशिश करेंगे, लेकिन अगर आप मशहूर शायर बशीर बद्र के इस शेर की कुछ पंक्तियों पर गौर फरमाएं तो शायद बहुत कुछ समझ में आ जाएगा...  

मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे,
मुक़द्दर में चलना था चलते रहे।
वो क्या था जिसे हमने ठुकरा दिया,
मगर उम्र भर हाथ मलते रहे।
मुहब्बत अदावत वफ़ा बेरुख़ी,
किराये के घर थे बदलते रहे।

बात हिन्दुत्व की हो या सेक्यूलरिज्म की, जब ये सब किराये के घर हैं तो क्या भाजपा, क्या कांग्रेस और क्या एनसीपी, जब जहां से सत्ता मिल जाए वहीं अपना घर बना लो। कोई मतलब नहीं इस हंगामे का। राजनीति में सब कुछ जायज होता है। कुछ भी निश्चित नहीं होता। शिवसेना इसका अपवाद नहीं। शिवसेना के राजनीतिक सफर पर गौर करें तो कई ऐसे वाक्ये सामने आए जब पार्टी ने अपनी सियासी जमीन को मजबूत आधार प्रदान करने के लिए विचारधारा को ताख पर रखा। दरअसल, बाला साहेब ठाकरे ने महाराष्ट्र के स्थानीय लोगों यानी मराठी मानुष या कहिए मराठी अस्मिता की रक्षा के लिए 19 जून 1966 को शिवसेना की नींव रखी थी। ठाकरे मूल रूप से कार्टूनिस्ट थे और राजनीतिक विषयों पर तीखे कटाक्ष करते थे। अगर आपको याद हो तो शिवसेना के गठन के समय बाला साहेब ठाकरे ने नारा दिया था, 'अंशी टके समाजकरण, वीस टके राजकरण' (80 प्रतिशत समाज और 20 फीसदी राजनीति)। लेकिन भूमिपुत्र, मराठी मानुष या मराठी अस्मिता का मुद्दा लंबे समय तक चल नहीं सका। फिर शिवसेना ने हिन्दुत्व के मुद्दे को अपना लिया जिसके सहारे वह आगे बढ़ती रही। सिर्फ महाराष्ट्र की बात करें तो शिवसेना ने पहली बार महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 1990 में लड़ा जिसमें उसके 52 विधायकों ने जीत हासिल की। भाजपा के साथ 1989 में गठबंधन किया जो 2014 तक चला। 2014 का विधानसभा चुनाव दोनों दलों ने एक दूसरे से अलग होकर लड़ा। उसके बाद दोनों पार्टियों ने मिलकर प्रदेश में सरकार जरूर बनाई, लेकिन मुद्दों पर टकराव की बुनियाद भी इसी दौर में फली-फुली। 2018 के अंत में उद्धव ठाकरे ने अयोध्या में रामलला के दर्शन कर राम जन्मभूमि मुद्दे को हवा दी थी। 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ मिलकर शिवसेना ने चुनाव जरूर लड़ा और इन्हीं दोनों दलों को जनादेश भी मिला लेकिन 'मुख्यमंत्री हमारा होगा' को लेकर दोनों दलों ने हिन्दुत्व की डोर तोड़ दी। शिवसेना ने मराठा राजनीति के भीष्म पितामह शरद पवार की उस एनसीपी से हाथ मिला लिया जिसने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। और अंतत: महा अघाड़ी विकास (शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस) की सरकार बन गई। जिद्द पूरी करते हुए शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बन गए। अब जो लोग हिन्दूवादी शिवसेना की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठा रहे हैं उन्हें अपना राजनीतिक ज्ञान बढ़ाना चाहए और जानना चाहिए कि शिवसेना ने इस तरह के कदम कोई पहली बार नहीं उठाए हैं।

53 साल के राजनीतिक सफर में कई ऐसे मौक आए जब शिवसेना और कांग्रेस ने एक-दूसरे को सहयोग किया। साल 1967 को याद करें जब पार्टी की स्थापना के एक साल ही हुए थे, शिवसेना की पहली चुनावी रैली में कांग्रेस नेता रामाराव अदित पहुंचे थे। 'बाल ठाकरे एंड द राइज ऑफ शिवसेना' में भी इस बात का उल्लेख है। रामाराव अदिक और बाला साहेब ठाकरे पुराने दोस्त थे। किताब के मुताबिक, ठाकरे ने उस वक्त कांग्रेस-शिवसेना गठबंधन पर कहा भी था कि हम कम्युनिस्टों को हराने के लिए साथ आ रहे हैं। इतना ही नहीं, 1966 में बाल ठाकरे ने जब शिवसेना नाम की पार्टी बनाई थी तो ऐसा कहा जाता है कि उनको महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक का समर्थन हासिल था, जिस वजह से शिवसेना को वसंत सेना भी कहा जाता था। 1971 में शिवसेना ने अपना पहला चुनाव के. कामराज की कांग्रेस सिंडिकेट के साथ मिलकर लड़ा था। ये अलग बात थी कि बाद में इंदिरा वाली कांग्रेस का गुट ही असली कांग्रेस के रूप में अस्तित्व में आया। जब आपातकाल का दौर आया तो बाल ठाकरे ही इकलौते विरोधी नेता थे जिन्होंने इंदिरा द्वारा लगाए गए आपातकाल का खुलकर समर्थन किया था। ठाकरे तो यहां तक कहते सुने गए थे कि मैं लोकशाही नहीं, बल्कि ठोकशाही पर विश्वास करता हूं। थॉमस हेनसेन की लिखी किताब 'वेजेस ऑफ वायलेंस : नेमिंग एंड आइडेंटिटी इन पोस्टकोलोनियल बॉम्बे' के मुताबिक, ठाकरे ने आपातकाल का समर्थन करते हुए कहा था कि इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल इसलिए लगाया, क्योंकि देश में फैली अस्थिरता से निपटने का यही एकमात्र उपाय है। 1977 में बाला साहेब ने बीएमसी चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मुरली देवड़ा का समर्थन किया था। उसी साल हुए आम चुनाव में शिवसैनिकों ने कांग्रेस का प्रचार भी किया था। 1980 में इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनते ही महाराष्ट्र की सरकार को बर्खास्त कर दिया और यहां दोबारा चुनाव कराए। इन चुनावों में कांग्रेस ने अब्दुल रहमान अंतुले को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया था। अंतुले और ठाकरे अच्छे दोस्त थे। इसलिए ठाकरे ने चुनाव में अपने उम्मीदवार नहीं उतारे और कांग्रेस का समर्थन किया। शिवसेना और कांग्रेस की दोस्ती राष्ट्रपति चुनाव में भी साथ दिख चुकी है। 2007 में शिवसेना ने एनडीए समर्थित भैरो सिंह शेखावत की जगह यूपीए की उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया था। इसी तरह से 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में शिवसेना ने यूपीए के प्रणब मुखर्जी का समर्थन किया था। राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद प्रणब मुखर्जी बाल ठाकरे से मिलने उनके घर मातोश्री भी गए थे।

इतना ही नहीं, वो शिवसेना जो अपनी कट्टर विचारधारा और मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ बयान देने के लिए जानी जाती है, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन कर एक जमाने में राजनीति के बड़े सूरमाओं को हैरत में डाल दिया था। पत्रकार प्रकाश अकोलकर ने शिवसेना पर लिखी अपनी किताब 'जय महाराष्ट्र' में लिखा है कि 1970 के दशक में मुंबई मेयर का चुनाव जीतने के लिए शिवसेना ने मुस्लिम लीग के साथ भी तालमेल किया था। हिंदू हृदय सम्राट के रूप में प्रसिद्धि पा चुके बाला साहेब ठाकरे ने मुस्लिम नेता गुलाम मोहम्मद बनातवाला के साथ स्टेज भी साझा किया था। उस वक्त की राजनीतिक कहानी पर भरोसा करें तो मुस्लिम लीग नेता गुलाम मोहम्मद बनातवाला को शिवसेना खासकर बाल ठाकरे का प्रबल आलोचक माना जाता था। लेकिन शिवसेना ने अपना मेयर बनाने के लिए मुस्लिम लीग से गठबंधन कर मदद ली थी। तब शिवसेना और मुसलमानों के साथ आने को एक बड़े मास्टर स्ट्रोक की तरह देखा गया था। कहने का तात्पर्य यह कि सत्ता के लिए जो पार्टी मुस्लिम लीग को अपना सकती है तो फिर कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिलाने पर सवाल उठाने का कोई मतलब नहीं रह जाता है।

बहरहाल, शिवसेना ने धर्मनिरपेक्ष दलों से गठबंधन कर सरकार जरूर बनाई है, लेकिन इस बात का उल्लेख पार्टी ने कहीं नहीं किया है कि हम हिन्दुवादी नहीं हैं। हर हिन्दू जन्म से हिन्दूवादी होता है। भाजपा की थिंकटैंक आरएसएस भी कहती है कि हिन्दुस्तान में रहने वाला हर इंसान हिन्दू है। ऐसे में यह मानना कि भाजपा से अलग होने पर पार्टी के अंदर जो हिन्दुत्व की अवधारणा है वह खत्म हो जाती है, ठीक तो नहीं ठहराया जा सकता है। शिवसेना ही क्यों, कांग्रेस, समेत कोई भी गैर भाजपाई दल यह नहीं कह सकता कि वह हिन्दुत्व में भरोसा नहीं रखती। हिन्दुत्व कोई राजनीतिक विचारधारा तो है नहीं। जब हिन्दुत्व एक दर्शन है, जीवन जीने का तरीका है तो फिर इसपर बहस की कोई गुंजाइश बचती नहीं है। रही बात धर्म निरपेक्ष या पंथ निरपेक्ष होने की तो इसका जिक्र भारतीय संविधान की प्रस्तावना में है और पूरा देश धर्मनिरपेक्षता की डोर से बंधा है। क्या भाजपा यह दावा कर सकती है कि वह धर्मनिरपेक्ष पार्टी नहीं है। तो फिर शिवसेना की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल कैसे खड़ा किया जा सकता है।

Wednesday, 6 November 2019

आरसीईपी पर भारत का फैसला राष्ट्रीय हित में

रीजनल कॉम्प्रहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) के प्रस्तावित समझौते से भारत को बाहर रखने का मोदी सरकार का फैसला राष्ट्र के हित में है वो भी तब जब सरकार ने 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य तय कर रखा हो। और ये सब तभी संभव है जब बागवानी, डेयरी फार्मिंग, दुग्ध प्रसंस्करण, कृषि वानिकी, मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन से किसानों की आय में वृद्धि करने की तरकीब पर अमल किया जाएगा। इस सबके बीच अगर हम 'आरसीईपी समझौता' के चक्र में फंस जाते तो देश के ऊपर मुश्किलों का पहाड़ टूट जाता। इस लिहाज से भारत सरकार का यह फैसला काफी अहम है। एशिया के 16 प्रमुख देशों के साथ दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक समझौते के बारे में पीएम मोदी ने कहा भी कि आरसीईपी करार का मौजूदा स्वरूप पूरी तरह इसकी मूल भावना और इसके मार्गदर्शी सिद्धान्तों को परिलक्षित नहीं करता है। इसमें भारत द्वारा उठाए गए मुद्दों और चिंताओं का संतोषजनक समाधान नहीं किया गया है। ऐसे में भारत के लिए आरसीईपी समझौते में शामिल होना संभव नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इसको लेकर मोदी सरकार पर काफी आक्रामक रूख पहले ही दिखा चुकी थी। उन्होंने कहा था कि सरकार इसके जरिए पहले ही बुरी स्थिति का सामना कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान पहुंचाने की तैयारी में है। अगर सरकार इस समझौते पर दस्तखत करती है तो इसका हमारे किसानों, दुकानदारों, छोटे और मझोले इकाइयों पर गंभीर दुष्परिणाम होंगे।

दरअसल, भारत ने इस समझौते से पहले कई मुद्दे और चिंताएं सामने रखी थीं पर उसका ठोस समाधान नहीं निकला। भारत की पहली और सबसे बड़ी चिंता तो यही थी कि चीन समेत इन देशों के साथ पहले से ही बड़ा व्यापार घाटा है। इस समझौते के बाद आयात और ज्यादा बढ़ने की स्थिति में भारतीय उद्योगों और किसानों के हित प्रभावित हो सकते थे। मालूम हो कि आरसीईपी में आसियान के 10 सदस्य देशों के अलावा चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, भारत और न्यू जीलैंड शामिल हैं। इन देशों में दुनिया की आधी आबादी रहती है और ग्लोबल जीडीपी की बात करें तो इसमें इनका 30 प्रतिशत का योगदान है। आरसीईपी (रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकनॉमिक पार्टनरशिप) की बात करें तो यह दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार ब्लॉक स्थापित करने की एक कोशिश है जिसमें 16 देश शामिल हैं। भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और आसियान देशों के अलावा ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड 2012 से इस मसले पर लगातार बातचीत करते आ रहे हैं। इसके तहत मुख्य बिंदुओं में 90 प्रतिशत सामानों पर आयात शुल्क घटाया जाना या खत्म किया जाना है। चीन के मामले में भारत 80 प्रतिशत सामान पर आयात शुल्क शून्य करने के पक्ष में था। इसके अलावा सर्विस, ट्रेड, निवेश बढ़ाना और वीजा नियमों को आसान बनाने के संबंध में भी भारत ने अपने विचार रखे थे। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि भारत को इस समझौते से पीछे हटना पड़ा?

असल में भारत का चीन समेत इन तमाम देशों से आयात पहले ही काफी ज्यादा है और निर्यात काफी कम है। इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद इस बात की आशंका प्रबल हो जाती कि चीन से आयात काफी बढ़ जाएगा और इससे भारत के हितों की रक्षा करना संभव नहीं रह जाएगा। अगर आप आंकड़ों पर गौर करें तो सिर्फ 2019 में भारत का आरसीईपी देशों के साथ व्यापार घाटा 105 अरब डॉलर का है। इसमें 54 अरब डॉलर का घाटा सिर्फ चीन के साथ है। दूसरी तरफ इस समझौते का भारत में राजनीतिक विरोध भी काफी हो रहा था। डेयरी उद्योग से जुड़े किसान इस व्यापार समझौते का अत्यधिक विरोध कर रहे थे। भाजपा और आरएसएस से जुड़ी संस्था स्वदेशी जागरण मंच भी इसके खिलाफ लगातार आवाजें उठा रही थी। निश्चित रूप से समझौते में भारत के शामिल होने से चीन से मैन्युफैक्चर्ड गुड्स और न्यूजीलैंड से डेयरी प्रॉडक्ट्स की भारत में डंपिंग होगी, जिससे घरेलू उत्पाद व उत्पादकों को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचेगा। अगर यह समझौता होता तो मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को भी गहरा धक्का लगता।

इसके अलावा नॉन-टैरिफ बैरियर्स की बात करें तो इसको लेकर भी समझौते में कोई विश्वसनीय प्रतिबद्धता नहीं है। भारत ने आयात शुल्क बढ़ने की स्थिति में सुरक्षा की गारंटी मांगी थी जिसपर ध्यान नहीं दिया गया। बाजार की पहुंच को लेकर कोई मजबूत भरोसा नहीं मिलना भी भारत के इस समझौते में शामिल नहीं होना बड़ी वजह है। इस समझौते में सेवाओं को लेकर भी पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया जबकि भारत ने इसपर काफी जोर दिया था। इन तमाम तथ्यों पर गौर करने के बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैंकॉक में आरसीईपी सम्मेलन में अपने वक्तव्य में साफ तौर पर कह दिया, ‘चूंकि इस समझौते में भारत की चिंताओं और उसकी तरफ से उठाए गए मुद्दों का संतोषजनक समाधान पेश नहीं किया गया है। लिहाजा भारत का आरसीईपी में शामिल होना संभव नहीं है।’

क्या है आरसीईपी और भारत इसमें शामिल होता तो क्या होता?
आरसीईपी एक व्यापारिक समझौता (ट्रेड एग्रीमेंट) है जो सदस्य देशों को एक दूसरे के साथ व्यापार में सहूलियत प्रदान करता है। समझौते के तहत सदस्य देशों को आयात और निर्यात पर लगने वाला टैक्स नहीं भरना पड़ता है या बहुत कम भरना पड़ता है। इस एग्रीमेंट पर आसियान के 10 देशों के साथ-साथ छह अन्य देश, जिसमें भारत भी शामिल है, दस्तखत करेंगे। यह एग्रीमेंट अगर अमल में आया तो यह दुनिया के 3.4 अरब लोगों के बीच एक व्यापारिक समझौता होगा जो विश्व का सबसे बड़ा फ्री ट्रेड पैक्ट होगा। भारत का व्यापार घाटा आरसीईपी के ज्यादातर सदस्य देशों के साथ है और समझौते के बाद भारत पर बहुत ज्यादा बोझ बढ़ जाएगा। किसी देश के साथ व्यापार घाटे का मतलब यह है कि हम उस देश से आयात ज्यादा करते हैं और निर्यात कम। ऐसे में यदि आयात टैक्स घटता है तो यह व्यापार घाटा और बढ़ सकता है।

भारतीय उद्योग जगत ने भी आरसीईपी समूह में चीन की मौजूदगी को लेकर चिंता जताई थी। डेयरी, धातु, इलेक्ट्रॉनिक्स और रसायन समेत विभिन्न सेक्टर्स ने सरकार से इन क्षेत्रों में शुल्क कटौती नहीं करने का आग्रह किया था। उद्योग जगत को इस बात की आशंका है कि आयात शुल्क कम या खत्म होने की स्थिति में विदेशों से अधिक मात्रा में माल भारत आएगा और स्थानीय उद्योगों पर इसका बुरा असर होगा। अमूल ने भी डेयरी उद्योग को लेकर चिंता जाहिर की थी। योजना के मुताबिक, भारत प्रस्तावित समझौते के तहत चीन से आने वाले करीब 80 प्रतिशत उत्पादों पर शुल्क घटा या पूरी तरह से हटा सकता है। भारत इसी प्रकार ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से आयातित 86 प्रतिशत उत्पादों और आसियान, जापान और दक्षिण कोरिया से आयात होने वाले 90 प्रतिशत उत्पादों पर सीमा शुल्क में कटौती कर सकता है। आयात होने वाले सामानों पर शुल्क कटौती को 5, 10, 15, 20 और 25 साल की अवधि में अमल में लाया जाना है। भारत का 2018-19 में आरसीईपी के सदस्य देशों में से चीन, दक्षिण कोरिया और आस्ट्रेलिया सहित 11 देशों के साथ व्यापार में घाटा रहा है।

Wednesday, 30 October 2019

मौत के साथ दफन हो गया खलीफा का सपना

दुनिया का सबसे खूंखार आतंकवादी और आईएसआईएस चीफ अबु बकर अल-बगदादी की मौत के साथ ही उसका दुनिया का खलीफा बनने का सपना दफन हो गया। अपने संदेशों के जरिये बगदादी युवाओं को एक ही सपना दिखाता था कि एक ही खलीफा दुनिया पर राज करेगा और उसका इलाका ही दुनिया का केंद्र बनेगा। दुनियाभर के लोग इसीलिए उसकी देहरी पर पहुंचे क्योंकि उन्हें ये सपना दिखाया गया कि इराक या सीरिया अब पूरी तरह से इस्लामिक स्टेट बनेगा जो पूरी दुनिया में फैल जाएगा। मसलन, इराक और सीरिया के लिए आईएसआईएस, भारत के लिए आईएसजेके या फिर दुनिया के अन्य हिस्सों में भी इसी तरह की दस्तक देने की कोशिश की गई।

दरअसल, बगदादी ने 2013 में इस्लामिक स्टेट नाम का संगठन जब बनाया था तो वह सिर्फ अलकायदा से ताजा-ताजा अलग हुआ था और कोई उसके नाम को जानता नहीं था, लेकिन बगदादी ने सद्दाम के बाद खाली हुए इराक को भुनाने की एक कोशिश की। सद्दाम समर्थकों को बगदादी अपने खेमे में लाया और नए तरीकों से दुनिया के सामने अपने संगठन को पेश किया। ये एक ऐसा समय काल था जब दुनिया में सोशल मीडिया की तूती बोलती थी। जिसके हाथ सोशल मीडिया की चाबी लगी वह सत्ता की बुलंदियों पर पहुंच गया। चाहे वह राजनीतिक सत्ता हो, आतंकवादियों की सत्ता हो, व्यापारिक सत्ता हो, धर्म की सत्ता हो या कुछ और। बगदादी ने भी मौका हाथ से जाने नहीं दिया। अलकायदा या लश्कर-ए-तैयबा के तरीकों से हटकर इस्लामिक स्टेट ने नए तरह की आतंकियों की फौज खड़ी की। उसने दुनियाभर में लोगों की फेसबुक पोस्ट, ट्विटर अकाउंट, गूगल सर्च आदि के जरिए उनकी सोच को प्रभावित करना शुरू किया, इस्लामिक स्टेट के बारे में जानकारी देनी शुरू की और अगर उसे यह दिख जाता कि युवक में बगावती तेवर है तो इस्लामिक स्टेट के प्रति संवेदना को जगाया जाता। यही बड़ी वजह रही कि दुनिया के कई हिस्सों से युवा, खासकर पढ़ी-लिखी पीढ़ी इस्लामिक स्टेट के चंगुल में फंसने लगी, फिर चाहे वह भारत से भागे कई युवक हों, ब्रिटेन के कई मुस्लिम स्कॉलर या फिर ऑस्ट्रेलिया, मिस्र से भागे इंजीनियर। इन सभी ने बगदादी के इस्लामिक स्टेट की सोच को बेहिसाब घृणित तरीके से फैलाया और नए तरीके से अंजाम दिया।

अगर आप याद करें तो साल 2001 में जब अलकायदा ने न्यूयॉर्क में हमला कर तहलका मचाया था तो दुनिया ने पहली बार आतंक का खौफनाक चेहरा देखा था। उसके बाद दुनिया के कई हिस्सों में आतंकी घटनाएं हुईं, कभी चर्च को उड़ाया गया, कभी मेट्रो स्टेशन को निशाना बनाया गया, कभी बंदूकधारियों ने गोलियां बरसाईं, लेकिन इन सबसे इतर जब इस्लामिक स्टेट आया तो वह लोगों को अगवा करता था, उनका वीडियो बनाता था और दुनिया के सामने या तो उसे गोलियों से भून देता था या फिर सीधा गला काट देता था जिसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालकर वायरल कर देता था ताकि दुनियाभर में इस्लामिक स्टेट की दहशतगर्दी का प्रचार हो। खौफ फैलाने वाला इस्लामिक स्टेट सरगना बगदादा का ये तरीका नया था जो दूसरे आतंकी संगठनों से उसे अलग बनाता था।

अमेरिकी पत्रकार को मारते हुए जारी किए गए वीडियो के अलावा आईएस ने कई ऐसे वीडियो बनाए जिसमें तुर्किश पत्रकार, इराकी सेना के जवान, स्थानीय लोगों को मारना, महिलाओं को उठाना, उसका रेप करना जैसे वीडियो शामिल रहे। मकसद सिर्फ एक ही था कि पूरी दुनिया में आईएस के नाम का हौव्वा खड़ा किया जाए। और शायद इसी करतूत की वजह से उसका सपना दफन हो गया। अगर हम अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कही बातों पर भरोसा करें तो दुनिया में खौफ पैदा करने वाला और दुनिया का नंबर वन आतंकी बगदादी आखिरी वक्त में कुत्तों की मौत मारा गया। ट्रंप ने कहा कि अपने कत्लेआम के लिए दुनिया भर में खौफ पैदा करने वाला बगदादी आखिरी पलों में रो रहा था, गिड़गिड़ा रहा था। वह बेहद खौफ में था, उसे अपनी मौत साफ नजर आ रही थी। बगदादी आगे-आगे भाग रहा था और अमेरिकी सेना के कुत्ते उसके पीछे-पीछे छलांग भर रहे थे।

अबू बकर अल-बगदादी के बारे में कहा जाता है कि उसका परिवार धर्म के प्रति काफी निष्ठावान था। बगदादी का परिवार तो यह भी दावा करता रहा है कि जिस कबीले से पैगंबर मोहम्मद थे, उसी कबीले से वह भी है और बगदादी का परिवार पैगंबर मुहम्मद का वंशज है। पैगंबर मुहम्मद इस्लाम के संस्थापक थे यह सर्वविदित है। इस्लामिक मान्यता के अनुसार, उन्हें इस्लाम का पैगंबर भी कहा जाता है जिन्हें पहले आदम, इब्राहिम, मूसा ईसा और अन्य भविष्यवक्ताओं द्वारा प्रचारित एकेश्वरवादी शिक्षाओं को प्रस्तुत करने और पुष्टि करने के लिए भेजा गया था। अगर सच में बगदादी पैगंबर मुहम्मद का वंशज था और वह आतंक का सरगना बन जाए, लोगों की हत्या करे, महिलाओं का रेप करे तो उसकी ऐसी दुर्गति होनी ही थी। वह दुनिया का खलीफा कैसे बन सकता था। दफन होना ही था उसके दुनिया का खलीफा बनने का सपना। इस्लामिक स्टेट बनाने का सपना।

Friday, 25 October 2019

राज्यों के चुनाव परिणाम भाजपा के लिए खतरे की घंटी

महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव समेत 17 राज्यों की 51 सीटों पर उपचुनाव के जो परिणाम सामने आए हैं वह केंद्र समेत अधिकांश राज्यों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए सबक भी है और आने वाले वक्त में खतरे की घंटी भी।  

सबसे पहले एक नजर चुनाव के परिणामों पर डालते हैं। 17 राज्यों की 51 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव परिणामों की बात करें तो भाजपा को इन राज्यों में नुकसान झेलना पड़ा है। इन राज्यों में भाजपा के पास 17 सीटें थी लेकिन उपचुनाव में पार्टी को दो सीटों का नुकसान झेलकर 15 सीटें ही हाथ आईं। जबकि कांग्रेस का आंकड़ा 11 से 12 हो गया। सपा की सीटें एक से बढ़कर तीन हो गईं। महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव की बात करें तो दोनों ही राज्यों में भाजपा का ग्राफ इतना नीचे गिरा है जिसकी पार्टी को उम्मीद नहीं थी। हरियाणा में भाजपा ने मिशन-75 का लक्ष्य रखा था वहीं महाराष्ट्र में 250 सीटें जीतने का दावा किया था। लेकिन जब परिणाम सामने आया तो हरियाणा में बहुमत से 6 सीटें कम 40 और महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना (105+56) गठबंधन को 161 सीटों से संतोष करना पड़ा। 2014 के आंकड़ों की बात करें तो तब महाराष्ट्र में भाजपा को 122 और शिवसेना को 63 सीटें मिली थीं। इसी प्रकार से हरियाणा में भाजपा को 47 सीटें मिली थी। मतलब इस चुनाव में भाजपा को महाराष्ट्र में 17 और हरियाणा में सात सीटों का सीधे-सीधे नुकसान हुआ है। शिवसेना को भी सात सीटों का नुकसान झेलना पड़ा है। अब सवाल यह उठता है कि लोकसभा चुनाव 2019 में प्रचंड बहुमत से जीतने वाली भाजपा छह महीने में इतना कमजोर कैसे हो गई? इस अहम बदलाव को भाजपा किस रूप से देखती है यह तो हम नहीं बता सकते, लेकिन चुनावी परिणाम के आंकड़ों और राजनीतिक हालातों से कुछ ऐसी बातें उभरकर सामने आईं हैं जो निश्चित रूप से चौंकाने वाली हैं।

मंदी और बेरोजगारी, किसानों की आत्महत्या, पीएमसी घोटाला और आरे विवाद, अति राष्ट्रवाद को चुनाव में मुद्दा बनाना, स्थानीय मुद्दों की अनदेखी, दलबदलुओं को टिकट और भाजपा के चाणक्य अमित शाह की दोहरी भूमिका ऐस मुद्दे रहे जिसकी वजह से भाजपा को इस चुनाव में झटका लगा है। हरियाणा में भाजपा ने मिशन-75 का लक्ष्य रखा था वहीं महाराष्ट्र में 250 सीटें जीतने का दावा किया था। लेकिन इसी अति आत्मविश्वास में पार्टी ने तमाम मुद्दों को इग्नोर कर दिया। मंदी, बेरोजगारी और किसानों की समस्या को कमतर आंककर आम चुनाव के पैटर्न पर उम्मीद जताई गई कि अंत में लोग इन मुद्दों को भुलाकर राष्ट्रवाद के नाम पर भारी जीत दिलाएंगे। लेकिन जमीन पर ऐसा हुआ नहीं। महाराष्ट्र में वह क्षेत्र जहां ऑटो सेक्टर में आई मंदी का सबसे अधिक प्रभाव दिखा वहां भाजपा को बड़ी हार मिली। हरियाणा में ऐसे क्षेत्रों में जहां पार्टी ने आम चुनाव में 65 फीसदी तक वोट पाए वहां 30 फीसदी तक वोट महज छह महीनों में ही गिर गया। इन दोनों ही राज्यों के चुनावों में अनुच्छेद 370 को भाजपा ने सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था। महाराष्ट्र में तो सावरकर को भारत रत्न देने का मुद्दा भी उछाला था और स्थानीय नेता तक इस मुद्दे पर वोट मांगते दिखे। लेकिन इन मुद्दों को मतदाताओं ने खारिज कर दिया।

दलबदलुओं को भी दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव और कई राज्यों के उपचुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा। हरियाणा में इंनेलो से कई ऐसे नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होकर चुनाव लड़े और हार गए। महाराष्ट्र में लोकसभा उपचुनाव में उदयनराजे भोसले और गुजरात विधानसभा उपचुनाव में अल्पेश ठाकोर का हारना इस तथ्य की ओर इंगित करता है। मराठा राजा शिवाजी के वंशज उदयनराजे भोसले ने पिछले महीने एनसीपी का दामन छोड़ दिया था और भाजपा में शामिल होने के लिए उन्हें अपनी लोकसभा सीट खाली करनी पड़ी थी। और जब सतारा में उपचुनाव हुआ तो मतदाताओं ने एनसीपी के श्रीनिवास पाटिल को जिताकर भोसले को बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसी प्रकार से भाजपा के ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर को राधनपुर सीट से हार का मुंह देखना पड़ा। 2017 में अल्पेश ने कांग्रेस के टिकट पर यह सीट जीती थी। हाल में वह भाजपा में शामिल हो गए थे। अल्पेश के करीबी धवलसिंह झाला को भी बायड़ विधानसभा सीट से हाथ धोना पड़ा।  

आपको याद हो तो आम चुनाव से ठीक पहले पुलवामा हमले के बाद भारत की ओर से किए गए एयर स्ट्राइक से पूरा चुनावी माहौल बदल गया था। मोदी की अगुवाई में भाजपा की बड़ी जीत के पीछे इसे बड़ा कारण बताया गया था। जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को हटाने के फैसले के बाद ऐसी ही जीत की उम्मीद इन दो राज्यों में थी। क्योंकि धारा 370, तीन तलाक जैसे भावनात्मक मुद्दों पर ऐतिहासिक फैसले के बाद यह पहला चुनाव था। इससे पहले चूंकि भाजपा का स्थानीय चुनावों में राष्ट्रीय और भावनात्मक मुद्दों पर जीतने का रिकॉर्ड था। उसके ऊपर से जब विपक्ष पहले से ही पस्त और बिखरी नजर आ रही थी, भाजपा के लिए बड़ी जीत की बात लोग परिणाम आने से पहले ही करने लगे थे। एग्जिट पोल में भी दोनों राज्यों में भाजपा की बड़ी जीत का दावा किया गया था। राष्ट्रीय और राष्ट्रवाद के मुद्दों को लेकर भाजपा अति आत्मविश्वास में डूब गई और इस चक्कर में पार्टी ने दूसरे अहम व स्थानीय मुद्दों को इग्नोर कर दिया। परिणाम सबके सामने है।

भाजपा को लेकर एक और जो अहम वजह इस चुनावी नतीजे के बताए जा रहे हैं वह है, क्या भाजपा के चाणक्य अमित शाह के सरकार में चले जाने की वजह से पार्टी को नुकसान तो नहीं झेलना पड़ा है। बतौर गृह मंत्री अमित शाह पहले दिन से ही काफी सक्रिया हो गए थे जैसे पहले वह पार्टी हुआ करते थे। एक के बाद एक वो कई फैसले ले रहे थे। कम समय में  केंद्र की मोदी सरकार ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए जम्मू-कश्मीर को विशेषाधिकार देने वाले अनुच्छेद 370 को खत्म कर दिया। यह एक ऐसा फैसला था जिसको लेकर भाजपा लंबे समय से अपने चुनावी घोषणा पत्र में वादा तो करती आ रही थी लेकिन पूरा नहीं कर पाई थी। अनुच्छेद 370 को समाप्त करना ही नहीं बल्कि उसके बाद हालात को संभालना भी एक बड़ी चुनौती थी। इसके अलावा ट्रिपल तलाक और एनआरसी पर भी सरकार की ओर से अहम फैसला लिया गया। यह भी अमित शाह की सक्रियता का ही नतीजा था। इन तमाम ऐतिहासिक फैसलों को अमलीजामा पहनाने की वजह से शाह इन दोनों राज्यों के चुनाव में समय नहीं दे पाए। हालांकि यह चुनाव परिणाम को लेकर एक तरह का अनुमान है, एक विश्लेषण है।

बहरहाल, चुनाव परिणाम आ चुके हैं। हरियाणा में भाजपा ने उस जननायक जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई है जो उसके खिलाफ चुनाव मैदान में थी। कहने का मतलब यह कि सिद्धांतों और विचारधारा की राजनीति करने वाली भाजपा ने यहां सत्ता के लिए समझौता किया है। दूसरी तरफ महाराष्ट्र में कुर्सी की जंग अभी जारी है। यहां भी सत्ता के लिए शिवसेना और भाजपा में जिस तरह की जंग छिड़ी हुई है, जाहिर करता है कि राजनीति अब जनता के लिए नहीं बल्कि सत्ता के लिए है। हालांकि यह चुनाव क्या भाजपा, क्या कांग्रेस, देश के तमाम राजनीतिक दलों के लिए संकेत है, एक सबक है कि जनता अब अपनी लड़ाई लड़ने खुद मैदान में उतर चुकी है। उसे समझ में आ गया है कि सत्ता में बैठी पार्टी भावनात्मक मुद्दों में उलझाकर उसके असली मुद्दों से ध्यान भटका रही है और उसके असली मुद्दों के लिए विपक्ष में बैठी पार्टियां जब उसकी लड़ाई नहीं लड़ पा रही है तो फिर रास्ता क्या बचता है। यही कि वो अपनी लड़ाई खुद लड़े और इसका आगाज हरियाणा, महाराष्ट्र चुनाव और 17 राज्यों के उपचुनावों के परिणामों से हो चुका है। आगामी चुनावों में यह लड़ाई और तेज होगी।

Friday, 11 October 2019

कांग्रेस का ये वादा भी कहीं वादाखिलाफी न बन जाए

हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के गिनती के दिन शेष रह गए हैं और ऐसे में कांग्रेस पार्टी के घोषणा पत्र में किए गए वादे और वादाखिलाफी को लेकर जिस तरह की बयानबाजी पार्टी के अपने ही कद्दावर नेता करने लग जाएं तो इसे क्या कहेंगे? हम बात कर रहे हैं मध्यप्रदेश के कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की जिन्होंने यह कहकर खलबली मचा दी है कि प्रदेश सरकार ने कर्जमाफी का जो वादा किया था उसे पूरी तरह से निभाया नहीं गया है। सिंधिया का यह बयान कमलनाथ सरकार के खिलाफ है, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के भी खिलाफ है जिन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान इस बात का ऐलान किया था और सरकार बनने के बाद भी कहा था कि कांग्रेस पार्टी की सरकार ने कर्जमाफी का वादा पूरा किया है। सिंधिया का यह बयान इसलिए भी नुकसानदेह है कि आज ही हरियाणा में गुलाम नबी आजाद, भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी शैलजा ने चुनाव घोषणा पत्र जारी किया है जिसमें कर्जमाफी के साथ-साथ ढेर सारे लोक-लुभावन वादे किए गए हैं। कहीं कांग्रेस का ये वादा भी कहीं वादाखिलाफी न बन जाए।   

हम इस ताजा घोषणा पत्र में किए वादों की बात करेंगे लेकिन उससे पहले भिंड में एक सभा को संबोधित करने वाले कांग्रेस के दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया क्या बोले यह जानना जरूरी है। सिंधिया का कहना है कि प्रदेश के किसानों का कर्ज पूरी तरह से माफ नहीं किया गया है। केवल 50 हजार रुपये तक का कर्ज माफ किया गया है जबकि हमने कहा था कि 2 लाख रुपये तक का कर्ज माफ किया जाएगा। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस के अंदर ही कर्जमाफी को लेकर सवाल उठे हों। इससे पहले राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह ने भी कमलनाथ सरकार की इस योजना पर सवाल उठाया था। उन्होंने किसानों की पूरी तरह से कर्जमाफी न होने पर राहुल गांधी को जनता से माफी मांगने तक की बात कही थी। लेकिन चूंकि यह वक्त चुनाव का है, 21 अक्टूबर को हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव होने हैं जहां पहले से ही कांग्रेस के खराब प्रदर्शन की आशंका जताई जा रही है और ऐसे में कांग्रेस की वादाखिलाफी से संबंधित बयान वह भी अपने नेताओं द्वारा, पार्टी को कितना नीचे गिराकर छोड़ेगी अंदाजा नहीं लगा सकते। 

हरियाणा की बात करें तो पार्टी ने घोषणा पत्र जारी कर दिया है और बहुत सारे ऐसे वादे किए गए हैं जो वाकई मैच का रूख बदल सकते हैं, लेकिन बात वहीं आकर अटक जाती है कि अपने ही नेता जब पार्टी पर वादाखिलाफी का आरोप लगा रहे हों तो घोषणा पत्र में किए वादे पर मतदाता भरोसा कैसे करे। घोषणा पत्र में कांग्रेस ने हर बार की तरह इस बार भी सरकार बनने पर 24 घंटे में कर्जमाफी का वादा किया है। भूमिहीन किसानों को भी कर्जमाफी का लाभ मिलेगा। दो एकड़ तक जमीन रखने वाले किसानों को बिजली मुफ्त देने का वादा किया गया है। प्राकृतिक आपदा से फसल खराब होने पर 12 हजार रुपये प्रति एकड़ मुआवजा देने का वादा किया गया है।

घोषणा पत्र में महिलाओं को सरकारी नौकरियों में 33 फीसदी आरक्षण का वादा किया गया है। निजी संस्थानों में भी कांग्रेस आरक्षण देगी। पंचायती राज संस्थाओं में 50 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा किया गया है। रोडवेज में महिलाओं को मुफ्त यात्रा कराई जाएगी। इसके लिए अलग बसें होंगी, जिनमें महिला चालक और परिचालक होंगी। शहरी निकायों में भी 50 फीसदी आरक्षण देने का वादा किया गया है। गर्भवती महिलाओं को बच्चे के जन्म तक 3500 रुपये हर माह दिए जाएंगे। उसके बाद पांच साल तक 5 हजार दिए जाएंगे। बीपीएल महिलाओं को हर महीने 2 हजार रुपये चूल्हा खर्च दिया जाएगा। 

घोषणा पत्र में एससी छात्रों को वजीफा देने का वादा किया गया है। मेधावी छात्रों को दसवीं तक 12 हजार सालाना मिलेंगे। 11-12वीं के मेधावी एससी छात्रों को 15 हजार देंगे। क्रीमिलेयर सीमा 6 लाख से बढ़ाकर 8 लाख सालाना किया जाएगा। पुरानी पेंशन योजना लागू करने का वादा किया गया है। एससी कमीशन दोबारा बनाया जाएगा। बेरोजगार स्नातक को 7 हजार, एमए पास को 10 हजार भत्ता देंगे। प्रदेश के युवाओं को निजी उद्योगों में 75 प्रतिशत आरक्षण देंगे। घोषणा पत्र में वादा किया गया है कि कांग्रेस की सरकार लोगों को 300 यूनिट तक प्रतिमाह बिजली मुफ्त देगी। 300 यूनिट से अधिक पर रेट आधा होगा। 5100 रुपये वृद्धावस्था पेंशन देंगे। नए मोटरवाहन कानून के तहत भारी भरकम जुर्माना वसूली के कानून में संशोधन करके उसे खत्म करेंगे। जूनियर व सीनियर खिलाड़ियों के लिए खास नीति बनाएंगे। रोडवेज किलोमीटर स्कीम खत्म करेंगे और 2000 नई बसें रोडवेज के बेड़े में शामिल करेंगे। 

बहरहाल, भिंड से निकली ज्योतिरादित्य सिंधिया की पार्टी विरोधी आवाज हरियाणा और महाराष्ट्र में क्या गुल खिलाती है यह तो चुनाव परिणाम ही बताएगा, लेकिन पार्टी आलाकमान को ऐसे नेताओं के बोलने पर शिकंजा कसना चाहिए। कांग्रेस का हर नेता खुद को बचाने के चक्कर में पार्टी के लिए इतना पड़ा गड्ढा खोद दे रहा है कि आने वाले वक्त में अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा। संजय निरूपम, अशोक तंवर, सलमान खुर्शीद और अब ज्योतिरादित्य सिंधिया ये ऐसे नाम हैं जिनके हालिया बयान से पार्टी को काफी नुकसान हुआ है। राहुल के युवा ब्रिगेड का सोनिया के नेतृत्व के खिलाफ मुखर होना पार्टी की सेहत के लिए ठीक नहीं है। लेकिन अगर यह सिलसिला जारी रहता है तो पार्टी को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही चुनावी वादे को लेकर जो वादाखिलाफी की बातें कही जा रही है उसको लेकर पार्टी के बड़े नेता जनता के सामने आएं और पारदर्शी तरीके से बात को रखें। लोगों को बताएं कि सच क्या है और झूठ क्या है। अगर पार्टी ने जनता से वादा किया है तो वह कितना पूरा हुआ है यह जानने का जनता को हक है।

Thursday, 10 October 2019

डेंजर जोन में राज-नीतीश

महाराष्ट्र के बाद अब बिहार की राजनीति में भी बड़ा भाई और छोटा भाई का खेल शुरू हो गया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता व राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सलाह दी है कि अब वह भाजपा को बड़ा भाई मान लें वरना 2020 का विधानसभा चुनाव भी हार जाएंगे। हालांकि इस तरह की बातें 2019 के लोकसभा चुनाव से ही शुरू हो गई थी लेकिन बिहार की राजनीति में स्वामी का इस तरह से कूदना थोड़ा अचंभित करने वाला जरूर है। स्वामी का यह ताजा बयान पटना में विजयादशवीं के दिन रावण वध कार्यक्रम से भाजपा नेताओं व मंत्रियों द्वारा बनाई गई दूरियों के बाद जेडीयू नेताओं की टिप्पणियों पर पलटवार के रूप में देखा जा रहा है। आपको याद होगा 2014 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और शिवसेना के बीच बड़ा भाई और छोटा भाई बनने को लेकर तकरार इस हद तक हो गई थी कि दोनों ने अलग-अलग चुनाव लड़ने का फैसला किया था और फिर जब जनादेश आया तो शिवसेना ने सिर झुकाकर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई। ये अलग बात थी कि दोनों दल बहुमत हासिल नहीं कर पाए थे लेकिन सीटों और वोट प्रतिशत के मामले में भाजपा शिवसेना से काफी आगे निकल गई। वोट प्रतिशत की बात करें तो भाजपा को 2014 के चुनाव में 27.81 प्रतिशत और शिवसेना को 19.35 प्रतिशत वोट मिले। भाजपा ने 260 सीटों पर चुनाव लड़कर 122 सीटें जीती जबकि 282 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने वाली शिवसेना के सिर्फ 63 विधायक ही जीत सके। यह काफी अहम है कि इस स्थिति में आने में भाजपा को तीन दशक का सफर तय करना पड़ा। इस चुनाव में मिली सफलता के बाद भाजपा का आत्मविश्वास और प्रबल हो गया। फिर तय किया गया कि ऐसे तमाम राज्य जहां स्थानीय क्षत्रपों से गठबंधन कर भाजपा चुनाव लड़ती है वहां उन्हें कमजोर करने की रणनीति बनाई जाए। यही रणनीति जम्मू कश्मीर में पीडीपी को लेकर अपनाई गई। आंध्र प्रदेश में हालांकि टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू पहले ही इस तिकड़म को समझ गए थे लेकिन, अलगाव के बाद भी उन्हें लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भारी नुकसान भुगतना पड़ा। सत्ता तक गंवानी पड़ी। अब निशाने पर बिहार में नीतीश की जेडीयू है।   

दरअसल, बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी समेत भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में होने वाले दशहरा समारोह (रावण वध कार्यक्रम) में हिस्सा नहीं लिया। इस कार्यक्रम में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मुख्य अतिथि थे। खास बात यह रही कि पूरे कार्यक्रम के दौरान उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के लिए जो कुर्सी लगाई गई थी वह खाली रही। इसके बाद इस तरह के कयास लगने शुरू हो गए कि बिहार की राजनीति पर संकट के बादल घुमरने लगे हैं। राज-नीतीश डेंजर जोन में आ गई है। इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर जेडीयू के बागी नेता अजय आलोक ने ट्वीट किया और पूछा, क्या हो गया बिहार बीजेपी? कोई गांधी मैदान में रावण वध में नहीं आया? रावण वध नहीं करना था क्या? इससे पहले पूरा बिहार जब बाढ़ और जल प्रलय के चपेट में था तब बेगूसराय से भाजपा सांसद और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने राज-नीतीश पर करारा प्रहार किया था और आपदा राहत को लेकर सरकारी मशीनरी को कठघरे में खड़ा किया था। इसपर प्रदेश के मंत्री अशोक चौधरी समेत कई जेडीयू नेताओं ने गिरिराज पर पलटवार किया था। कहने का मतलब यह कि भाजपा-जेडीयू की गठबंधन सरकार में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है।

स्वामी के ताजा बयान पर गौर करें तो पक्के तौर पर यह बात निकलकर आती है कि राज-नीतीश को लेकर भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व कुछ अलग तरीके से सोच रहा है। स्वामी ने कहा कि अगर जेडीयू को बिहार में अपनी राजनीति बचानी है तो उसे छोटे भाई की भूमिका में रहना होगा। देशभर में लोग भाजपा को पसंद कर रहे हैं और इस लहर के बीच बिहार में भी अब भाजपा बड़े भाई की भूमिका में है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार को अगर 2020 का चुनाव जीतना है तो उन्हें भाजपा के साथ छोटे भाई की भूमिका में रहना होगा। स्वामी ने यह भी कहा कि नीतीश कुमार को पता करना चाहिए कि भाजपा के नेता किन कारणों से नाराज हैं। गिरिराज सिंह के बयान का भी समर्थन करते हुए स्वामी ने कहा कि वह स्पष्टवादी नेता हैं। उन्होंने कहा कि बिहार में बाढ़ के दौरान नीतीश कुमार की खासी आलोचना हुई है। प्रतिकूल हालातों को देखते हुए दोनों दलों में दूरियां जरूर बढ़ी है। शायद इसी को देखते हुए दशहरा के दौरान पार्टी के नेता शामिल नहीं हुए होंगे। इस तरह से स्वामी ने बिहार में भाजपा और जेडीयू के बीच बढ़ते मतभेद को लेकर जो बुनियादी बातें की हैं वह निश्चित रूप से आने वाले वक्त में अलगाव का रास्ता अख्तियार करेगी। भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह जब इस तरह की कोई चाल चलते हैं तो तय मानिए कि उन्होंने अगले चुनाव के लिए पूरा रोडमैप तैयार कर लिया होगा। नीतीश कुमार की घेरेबंदी का पूरा इंतजाम कर लिया होगा। इसके बाद सही वक्त पर जेडीयू को शर्तों के घेरे में लाने की कोशिश की जाएगी। मान गए तो ठीक वरना गठबंधन खत्म। तब तक नीतीश इस हाल में नहीं होंगे कि लालू की आरजेडी या कांग्रेस से कोई तालमेल कर सकें। ऐसे भी लालू जब से जेल गए हैं आरजेडी की हालत लगातार पतली ही होती गई है। और नीतीश के बारे में यह सर्वविदित है कि वह बिहार की राजनीति में अकेले दम पर कुछ भी नहीं कर पाएंगे। बस, नीतीश की इसी राजनीतिक कमजोरी का भरपूर फायदा उठाने की कोशिश में भाजपा जुगत भिड़ा रही है।

Wednesday, 9 October 2019

रिपब्लिकन के हत्थे चढ़े डोनाल्ड ट्रम्प

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर शिकंजा लगातार कसता जा रहा है और इस बात की आशंका प्रबल होती दिख रही है कि रिपब्लिकन पार्टी 2020 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए उन्हें उम्मीदवार बनाने से परहेज करे। यह आशंका इसलिए प्रबल होती दिख रही है क्योंकि 2016 के चुनाव में ट्रम्प पर रूसी मदद के जो आरोप लगते आ रहे हैं उसपर अब रिपब्लिकन पार्टी ने भी मुहर लगा दी है। आप सब जानते हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प रिपब्लिकन पार्टी से ही 2016 में राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बने थे और डेमोक्रेट प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन को हराकर राष्ट्रपति बने थे। तभी से ट्रम्प पर रूसी मदद के आरोप लगने शुरू हो गए थे। एक दिन पहले अमेरिकी सीनेट में जब रिपब्लिकन सीनेटर की अगुआई में बनी कमेटी की रिपोर्ट पेश की गई तो खलबली मच गई क्योंकि इस रिपोर्ट ने भी ट्रम्प पर लग रहे आरोप को सच करार दिया है।

दरअसल, अमेरिका दुनिया का सबसे जागरूक लोकतांत्रिक देश माना जाता है। डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दो दल ही यहां की राजनीतिक व्यवस्था में सक्रिय हैं जिनमें एक के पास सत्ता होती है तो दूसरा विपक्ष की भूमिका में होता है। खास बात यह है कि अमेरिकी सांसद चाहे वो रिपब्लिकन हों या डेमोक्रेट, वैचारिक और लोकतांत्रिक नजरिये से इतने सशक्त होते हैं कि अगर उनका नेता भी कहीं से गड़बड़ लगता है तो उसके खिलाफ आवाज उठाने में देरी नहीं करते हैं। ट्रम्प के मामले में भी जो चीजें सामने आ रही हैं वह इस बात को साबित करता है। हालांकि ट्रम्प-रूस कनेक्शन का अंदाजा तो बहुत पहले से लगाया जा रहा था और रिपब्लिकन की हालिया रिपोर्ट से पहले भी एक रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हो चुकी है। बावजूद इसके ट्रम्प लगातार इस बात की वकालत करते आ रहे थे कि राष्ट्रपति चुनाव में रूस ने किसी भी तरह की दखलअंदाजी की है। इस तरह की खबरों को वे अक्सर फेक न्यूज करार देते रहे। फाइनली रिपब्लिकन पार्टी ने सीनेटर रिचर्ड बर की अगुआई में मामले की सच्चाई जानने के लिए कमेटी गठित की। और अब जब इस कमेटी की रिपोर्ट सामने आ गई है तो ट्रम्प पर संकट के बादल गहराने लगे हैं।

सीनेट इंटेलिजेंस कमेटी की इस जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि रूस के सेंट पीटर्सबर्ग स्थित इंटरनेट रिसर्च एजेंसी (आईआरए) ने डोनाल्ड ट्रम्प के लिए सोशल मीडिया पर समर्थन जुटाया था। रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि आईआरए ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रूस के पसंदीदा उम्मीदवार के लिए समर्थन जुटाया था। इसके जरिए राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को नुकसान पहुंचाया गया क्योंकि उनके जीतने की संभावना ज्यादा थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये सब क्रेमलिन (रूस के राष्ट्रपति का आवास और कार्यालय) के आदेश पर किया गया। रिपोर्ट में चेतावनी भी दी गई है कि 2020 के चुनाव में भी रूस की दखलअंदाजी हो सकती है। लिहाजा एजेंसियों को सावधान रहने की जरूरत है।

रिपब्लिकन की इस ताजा जांच रिपोर्ट से पहले ट्रम्प के खिलाफ इसी साल इस आशय की एक और रिपोर्ट आई थी। करीब 448 पेज की उस रिपोर्ट में भी स्पेशल काउंसल रॉबर्ट मुलर ने इस बात की पुष्टि की थी कि रूसी सेना के अधिकारियों द्वारा डेमोक्रेट उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश की थी। 18 अप्रैल 2019 को यह रिपोर्ट कानून मंत्रालय को सौंपी गई थी। हालांकि रिपोर्ट के आखिर में उन्होंने यह भी लिखा था कि रूसी दखल के मामले में पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिल सके हैं। लेकिन इस बात का खुलासा जरूर हुआ था कि ट्रम्प ने रूसी दखल की जांच को नियंत्रित करने की कोशिश की। तब ट्रम्प ने मुलर को जांच से हटवाने की भी कोशिश की थी।

बहरहाल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लगातार मुश्किलों में फंसते जा रहे हैं। आपको पता होगा कि तीन अमेरिकी कांग्रेस समितियों के प्रमुख पहले ही महाभियोग चलाने से जुड़ी जांच का कानूनी आदेश व्हाइट हाउस में पेश कर चुके हैं। इस बीच अमेरिकी संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने इससे जुड़े एक मामले में यूक्रेन पर दबाव बनाने के लिए उपराष्ट्रपति माइक पेंस से उनकी संभावित भूमिका को लेकर दस्तावेज भी मांगे गए हैं। मालूम हो कि ट्रंप पर उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी जो.बिडेन को नुकसान पहुंचाने के मकसद से यूक्रेन से जानकारियां साझा करने के आरोप हैं। हालांकि ट्रंप इससे भी इनकार करते रहे हैं। अब जबकि ट्रम्प की पार्टी रिपब्लिकन की जांच कमेटी में भी इस बात का खुलासा हो गया है कि 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में रूसी दखलंदाजी हुई है तो ट्रम्प पर मुसीबत का शिकंजा कसना लाजिमी है। वो भी ऐसे वक्त में जब अगले ही साल अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव होना है और ट्रम्प की यह ख्वाहिश कि अमेरिका के हित में उन्हें एक और मौका दिया जाए।

Monday, 7 October 2019

राष्ट्रवादी मोदीनॉमिक्स पर भारी बाजार की ताकत

देश में राष्ट्रवादी बयार के बीच जो जनभावनाएं मौजूद हैं उनमें से ही लोग दबी जुबान में यह बात अब करने लगे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अप्रतिम लोकप्रियता और सरकार की ताकत को कोई टक्कर दे सकता है तो वह है भारतीय बाजार, भारतीय अर्थव्यवस्था। मीडिया, चुनाव आयोग, केंद्रीय जांच एजेंसियां समेत तमाम संवैधानिक व अन्य संस्थाएं, यहां तक कि पड़ोसी या कहें तो दुश्मन देश पाकिस्तान से भी यह सरकार निपटने में पूरी तरह सक्षम है लेकिन बाजार की जो राजनीतिक ताकत है उसे राष्ट्रवादी औजार से काबू नहीं किया जा सकता। उसका एक बना-बनाया सिद्धांत है जिससे छेड़छाड़ करने का मतलब है वह बेपटरी हो जाता है। सरकार अर्थव्यवस्था के ऐसे दोराहे पर आकर फंस गई है कि उसे यह समझ में नहीं आ रहा कि आगे बढ़ा जाए या पीछे। हालत यह हो गई है कि आगे कुआं दिख रहा और पीछे खाई। जो फैसले बीते पांच सालों में लिए गए खासकर अर्थव्यवस्था को लेकर मसलन नोटबंदी, जीएसटी, बैंको का विलय, कॉरपोरेट को रियायतों के साथ टैक्स छूट आदि वह सब लगातार पीछे की तरफ ही ले जा रहा है। डिमांड और सप्लाई के जिस पेंच में मोदीनॉमिक्स फंस गई है वह देश में बेरोजगारों की बड़ी फौज खड़ी कर गया है। रोजगार संकट दूसरी तरह से संकट की परिस्थितियों को जन्म दे रहा है।

बीते कई सप्ताहों से वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लगातार कारोबारी समुदाय में अपनी पैठ बनाने के लिए एक के बाद एक प्रेस कांफ्रेंस कर देश के बजट की कई व्यवस्थाओं में सुधार किया। आप गौर करेंगे तो जुलाई में पेश किए गए बजट के बाद से आरबीआई ने दरों में दो बार कटौती की लेकिन क्या हुआ? कारोबारी जगत में कोई खास सुधार तो आया नहीं। आरबीआई ने पिछले हफ्ते रेपो रेट में लगातार पांचवीं बार कटौती करते हुए उसे 5.15 फीसदी पर लाने का जो फैसला किया वह पिछले 9 वर्षों में सबसे कम है। रेपो रेट को आप इस तरह से समझ सकते हैं कि यह वह ब्याज दर है जिसपर रिजर्व बैंक देश के सभी व्यापारिक बैंकों को कर्ज देता है। इस लिहाज से बाजार में सस्ता कर्ज पहुंचने की जो गुंजाइश आरबीआई ने बनाने की कोशिश की उससे शेयर बाजार में उछाल आना चाहिए था लेकिन हुआ इसका उलटा। रिजर्व बैंक की घोषणा के बाद शेयर बाजार में अच्छी-खासी गिरावट देखी गई।

भारतीय अर्थव्यवस्था की जो जमीनी हकीकत है उसको देखकर तो यही लगता है कि सरकार की तरफ से अगर कोई बड़ा कदम नहीं उठाया गया तो हालात सुधरने को नहीं। दरअसल कारोबार जगत में सरकार से उम्मीदें खत्म सी हो गई हैं। कोई भी कारोबार आम लोगों और परिवार की आर्थिक परिस्थितियों से अलग नहीं होता। जब आम लोगों की तरफ से मांग खत्म सी हो गई है, उनकी क्रय शक्ति लगातार कमजोर हो रही है तो फिर कारोबारी कब तक उत्पादन का बोझ सहते रहेंगे। सीएमआईई का कंपनियों के पूंजीगत व्यय के आंकड़ों पर गौर करें तो यह खुद-ब-खुद बदहाली की कहानी बयां कर देती है। दिसंबर 2018 में समाप्त तिमाही में यह 3.03 लाख करोड़ रुपये था जो इस वर्ष मार्च तिमाही तक घटकर 2.66 लाख करोड़ रुपये रह गया। आगे की दो तिमाहियों में तो यह 84,000 करोड़ रुपये और 99,000 करोड़ रुपये रह गया। इससे पहले ऐसा 2008 की एक तिमाही में हुआ था। तमाम आर्थिक संकेतक नकारात्मक हैं और ऐसा काफी समय से है। ध्यान दें तो देश के सबसे बड़े कारोबारी समूह के स्वामी मुकेश अंबानी समेत तमाम बड़े कारोबारी नकदी संभाले हुए हैं या अपना जोखिम कम कर रहे हैं, अपने कर्ज चुकता कर रहे हैं तो इस हालात में यह कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि बाकी लोग निवेश करेंगे।

असल में सवाल यह है कि जीडीपी अनुमान का दावा कर, कॉरपोरेट टैक्स में छूट से कारोबारी जगत को 1.45 लाख करोड़ रुपये की सीधी राहत देने भर से बात नहीं बनने वाली है। यह सब ऐसे औजार हैं जो बाजार में कुछ दिन तक तेजी देती है लेकिन उसके बाद फिर वही ढाक के तीन पात वाली बात हो जाती है। अगर आप याद करें तो टैक्स रियायत के बाद पिछले महीने 24 सितंबर को शेयर बाजार उच्चतम स्तर पर पहुंचा था। लेकिन तब से अब तक बीएसई सेंसेक्स को 2.53 लाख करोड़ रुपये का नुकसान भी तो हो चुका है। ब्याज दर में कटौती समेत अन्य ऐसे फैसले जो बदले गए हैं तथा सुधार भी उसी निराशा की स्थिति पर कुर्बान हो गए। हालांकि दुनिया भर के बाजारों की हालत खराब है। अमेरिका के बारे में भी एक हालिया रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया गया है कि 50 साल के इतिहास में अमेरिका बेरोजगारी के सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। लेकिन भारत की आर्थिक बदहाली के बारे में तमाम विश्लेषक लगातार यह कहने से नहीं हिचक रहे हैं कि भारत की दिक्कतें इसकी अपनी वजहों से है ना कि वैश्विक सुस्ती से। भारतीय बाजार इस बात को कहने से न तो चूक रही है और न ही डर रही है। लेकिन सरकार समझे तो सही। अगर सरकार के वित्तीय मामलों के जानकार मोदीनॉमिक्स की हकीकत को समझ नहीं पा रहे या समझना नहीं चाहते तो फिर भगवान ही मालिक।

Sunday, 6 October 2019

भारत का रहने वाला हूं भारत की ही बातें रखूंगा

भारत के विदेश मंत्री सुब्रमण्यम जयशंकर अभी हाल में वाशिंगटन में जमे थे, इस अंदाज में कि भारत का रहने वाला हूं भारत की ही बातें रखूंगा। वह वहां क्या कर रहे थे और भारत के किस मिशन को अंजाम तक पहुंचाने में जुटे थे इसकी थोड़ी सी झलक उनके प्रेस कांफ्रेंस से मिलती है। यह वाक्या तब का है जब उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पिओ से मुलाकात की थी और रूस से एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम के करार को लेकर अमेरिकी दखलंदाजी पर आपत्ति जताई थी। इस दौरान जयशंकर ने सख्त लहजे में इस बात को कहा कि हम नहीं चाहते कि कोई देश हमें बताए कि रूस से क्या खरीदना है और क्या नहीं। निश्चित रूप से लंबे अरसे बाद अमेरिकी प्रतिबंध की धमकी को नजरंदाज करते हुए भारत ने मजबूती से अपना पक्ष रखा है। जब यह खबर आई तो पता चला कि एस.जयशंकर संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के दौरान से ही अमेरिका में डटे हैं और पूरी दुनिया के नेताओं से मुलाकात कर भारत के पक्ष को मजबूती से रख रहे हैं। भारत जब भी कोई बड़ा निर्णय लेता है जिसकी गूंज पूरी दुनिया को सुनाई पड़ती है और ऐसा महसूस होता है कि दुनिया के ताकतवर देशों की टेढ़ी निगाहें भारत की तरफ हैं तो कूटनीतिक संवाद के जरिये अपने पक्ष को मजबूती से पेश करना होता है। जयशंकर इसी मिशन के तहत अमेरिका में हैं। याद करें तो इससे पहले अटल सरकार में जब भारत ने परमाणु परीक्षण किया था तब तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने भी इसी तरह के कूटनीतिक संवाद के जरिये दुनिया को समझाया था। इस बार मसला जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 को खत्म करने के बाद वैश्विक पटल पर उपजी परिस्थिति को लेकर है।

एस.जयशंकर बेशक आज विदेश मंत्री की हैसियत से अमेरिका की यात्रा पर हैं लेकिन यह मत भूलिए कि वह इससे पहले मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में विदेश सचिव की भूमिका में थे और उससे पहले वह अमेरिका में भारत के राजदूत भी रह चुके हैं। नरेंद्र मोदी को इस बात का अंदाजा था कि भारत के पक्ष को किस मंच पर किस तरह से रखना है यह जयशंकर से बेहतर कोई और नहीं जान सकता है। लिहाजा उन्होंने विदेश मंत्री के रूप में जयशंकर का चुनाव किया। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से जो रिपोर्ट निकलकर आ रही है उसके मुताबिक, पिछले दो-तीन दिनों में जयशंकर वॉशिंगटन में पांच और न्यूयॉर्क में दो थिंकटैंकों से मिले हैं। वॉशिंगटन डीसी के जिन पांच प्रमुख थिंकटैंकों से जयशंकर की मुलाकात हुई है उनमें कार्निज इन्डोमेंट फॉर इंटरनैशनल पीस, अटलांटिक काउंसिल, सेंटर फॉर स्ट्रैटिजिक एंड इंटरनैशनल स्टडीज, द ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यून और द हेरिटेज फाउंडेशन शामिल हैं। इससे पहले वह न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र से इतर सेंटर फॉर फॉरेन रिलेशंस और एशिया सोसाइटी से मुखातिब हुए थे। इससे पहले वह 42 देशों के विदेश मंत्रियों और 36 देशों के साथ द्विपक्षीय बातचीत को भी अंजाम दे चुके हैं। यह सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अपने कूटनीतिक प्रयासों से अलग है। 

इतना सब कुछ करने के बाद जब वह पत्रकारों से मुखातिब हुए तो कश्मीर को लेकर दनादन सवाल पूछे जाने लगे। जयशंकर ने सबको सुना और फिर भारत और पाकिस्तान को एक साथ रखने पर ऐतराज जताया। उन्होंने कहा, आप भारत और पाकिस्तान को एक साथ कैसे रख सकते हैं? आप एक ऐसे देश को हमारे साथ कैसे रख सकते हैं जो हमारी अर्थव्यवस्था का आठवां हिस्सा है। जो छवि के लिहाज से बिल्कुल उलट वजह से चर्चा में रहता है। जहां तक जम्मू कश्मीर में तमाम अस्थायी पाबंदियों की बात है तो धारा 370 को खत्म किए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में किसी की जान न जाए इसलिए अस्थायी पाबंदियां लगाई गई हैं। मुख्य मकसद संभावित हिंसा को रोकना है। कहने का मतलब यह कि अमेरिकन इंस्टीट्यूशन के जरिये जो बात कही और रखी जाती है उसकी धमक पूरी दुनिया में होती है। इसीलिए जयशंकर ने इस रास्ते को चुना है। अमेरिकन थिंकटैंक की बात करें तो यह बहुत हद तक दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को तय करते हैं। इनका असर सिर्फ अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया पर पड़ता है। अमेरिकन थिंकटैंक हो, अमेरिकन मीडिया हो या फिर ट्रम्प प्रशासन के तमाम दिग्गज, सबके बीच भारत अपना पक्ष मजबूती से रख रहा है कि जम्मू-कश्मीर का भारत में वैध तरीके से विलय हुआ है और पाकिस्तान ने उसके एक हिस्से पर अवैध कब्जा कर रखा है जिसे 'पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला कश्मीर' (पीओके) कहा जाता है।

Saturday, 5 October 2019

ये कांग्रेस और कितना बिखरेगी?

महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा की गहमागहमी के बीच देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और कितना बिखरेगी, और कितना नीचे की तरफ जाएगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता जा रहा है। टिकट बंटवारे को लेकर एक तरफ जहां हरियाणा और महाराष्ट्र के पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं में भारी असंतोष देखा जा रहा है वहीं उत्तर प्रदेश में बिना चुनाव के ही उठापटक दिखने लगी है। ऐसे तो 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार के बाद से ही कांग्रेस छोड़कर भाजपा या अन्य सत्ताधारी दलों में जाने की होड़ लगी थी, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद से तो ऐसा लगने लगा है कि पार्टी की आंतरिक सत्ता में जो जहां काबिज हैं उन्हें छोड़कर हर कोई पार्टी छोड़ने को तैयार बैठा है बशर्ते उसे कोई अपना ले। अभी सबसे अधिक चर्चा जिस नेता को लेकर हो रही है वह हैं अदिति सिंह और संजय निरूपम। तो पहले बात करते हैं अदिति सिंह की।

महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर उत्तर प्रदेश विधानसभा के विशेष सत्र में कांग्रेस पार्टी के बहिष्कार के बावजूद विधायक अदिति सिंह ने इसमें शामिल होकर सबको हैरान कर दिया। इतना ही नहीं, जिस दिन यूपी विधानसभा का विशेष सत्र आयोजित किया जा रहा था उसी दिन लखनऊ में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी योगी सरकार के खिलाफ पैदल मार्च कर रही थीं और अदिति सिंह पैदल मार्च से नदारद थीं। वह विधानसभा सत्र में शामिल होकर विकास के मुद्दे पर बात कर रहीं थीं। ठीक एक दिन बाद उन्हें वाई प्लस श्रेणी की सुरक्षा मिल गई और इसके साथ ही उनके पार्टी छोड़ने की चर्चा तेज हो गई है। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अदिति सिंह पर जिस तरह की मेहरबानी दिखाई है, स्पष्ट है कि वह भाजपा में शामिल होने जा रही हैं। हालांक यह पहला मौका नहीं है जब अदिति ने पार्टी लाइन से अलग हटकर कदम उठाया हो। इससे पहले भी उन्होंने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को हटाने पर केंद्र सरकार के फैसले का समर्थन किया था।

अदिति सिंह को राजनीति में लाने का सबसे बड़ा हाथ प्रियंका गांधी का माना जाता है, लेकिन राजनीति के खेल भी बड़े निराले होते हैं। उसी प्रियंका गांधी की गांधी जयंती पर लखनऊ में पदयात्रा का खुला विरोध कर अदिति सिंह ने कांग्रेस को संदेश दे दिया कि अब वो क्या करने जा रही हैं। दिल्ली, मसूरी और फिर अमेरिका में पढ़ाई करने के बाद कॉरपोरेट करियर छोड़ कर राजनीति में कदम रखने वाली अदिति सिंह रायबरेली से पांच बार विधायक रहे बाहुबली अखिलेश की बेटी हैं। जानकार लोगों का कहना है कि पिता के न रहने के बाद राजनीतिक विरोधी अदिति सिंह को कमजोर करने में लग गए। अदिति के पास मजबूती का कोई आधार नहीं था। उनके घर उनके पिता की दबंगई का जो तंत्र था उसे आगे बढ़ाना वाला कोई बचा नहीं था। ऊपर से राहुल, प्रियंका और सोनिया का करीबी होना भी उनकी राजनीति को नुकसान पहुंचा रहा था। इस सबके बीच अपने राजनीतिक करियर में नफा-नुकसान का अंदाजा लगाकर अदिति ने एक नया दांव खेलने की कोशिश की है। देखना है अब इसमें वह कितना आगे जा पाती हैं।  

इससे इतर महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव की गहमागहमी के बीच कांग्रेस को नेताओं के बगावती तेवरों से जूझना पड़ रहा है। पहले हरियाणा में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर ने टिकटों में खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया और कहा कि हरियाणा कांग्रेस अब हुड्डा कांग्रेस हो गई है। दूसरी तरफ महाराष्ट्र में संजय निरुपम ने बागी तेवर अख्तियार कर प्रचार न करने का ऐलान कर दिया है। महाराष्ट्र में कांग्रेस उम्मीदवारों की सूची जारी होने के बाद निरुपम ने ट्वीट कर कहा कि शायद पार्टी को अब उनकी सेवाओं की जरूरत नहीं रह गई है। संजय निरुपम ने मीडिया के सामने आकर भी मल्लिकार्जुन खड़गे समेत पार्टी के बड़े नेताओं पर हमला बोला और आरोप लगाया कि राहुल गांधी व उनके करीबियों के खिलाफ साजिश रची जा रही है। निरुपम ने कहा कि कांग्रेस के अंदर सिस्टमैटिक फॉल्ट हो गया है। अगर इससे नहीं निकले तो पार्टी और तबाह हो जाएगी और बर्बाद होगी।

हरियाणा, महाराष्ट्र और अब उत्तर प्रदेश के ताजा घटनाक्रम को देखें तो यह कहने में कोई हिचक नहीं कि कांग्रेस में विखराव का सिलसिला अभी थमा नहीं है। यह कहां जाकर रूकेगा अभी कहना मुश्किल होगा। दरअसल, राहुल गांधी ने जब कांग्रेस की कमान संभाली थी तो चुनावी सफलता और विफलता मिली वो एक अलग मसला है, लेकिन पार्टी में संगठन स्तर पर कई बड़े बदलाव किए थे और आने वाले वक्त में बहुत सारे बदलाव होने थे। उन तमाम नेताओं की वीआरएस का ऑफर दे दिया गया था जो ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स कर रहे थे। संगठन में दशकों से जो नेता कुर्सी पर जमे थे उन्हें यह महसूस होने लगा था कि राहुल की कांग्रेस में उनका गुजरा मुश्किल है। राहुल गांधी की चुनावी विफलता के पीछे पार्टी के अंदर गुटबाजी बड़ी वजह रही। पार्टी की आर्थिक ताकत तो पहले से कमजोर हो ही रखी है। संजय निरूपम का ताजा बयान पार्टी की इसी कमजोरी की तरफ संकेत कर रहा है। अब कांग्रेस इससे कैसे पार पाएगी यह पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है। मुझे लगता है कि पार्टी में बिखराव का दौर अभी कुछ वक्त और चलेगा। यह तब तक चलेगा जब तक कोई नया अध्यक्ष पार्टी की कमान नहीं संभाल लेता है।

Friday, 4 October 2019

पाकिस्तान में एक और 'तख्ता पलट' की आहट

पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने देश के कुछ बड़े कारोबारियों के साथ जिस तरह से बैठकें की हैं और कारोबारियों ने जिस अंदाज में वजीरे आलम इमरान खान की आर्थिक नीतियों को लेकर उनके नजरिये पर बात रखी है उससे तख्ता पलट के लिए मशहूर पाकिस्तान में एक और तख्ता पलट की चर्चा जंगल में आग की तरह फैल गई है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान की वित्तीय राजधानी कराची और रावलपिंडी स्थित सैन्य दफ्तरों में बड़े कारोबारियों के साथ जनरल बाजवा ने तीन हाई सिक्यॉरिटी मीटिंग्स की हैं। असल में पाकिस्तान इस वक्त भीषण आर्थिक बदहाली के दौर से गुजर रहा है और इसका असर वहां की मिलिट्री पर भी साफ-साफ दिख रहा है। कहा जा रहा है कि पिछले एक दशक में ऐसा पहली बार हुआ है जब 2020 का रक्षा बजट फ्रीज कर दिया गया है। इस तरह के हालात तब हैं जब पाकिस्तानी सैनिक अफगानिस्तान के आतंकियों और भारत के साथ तनाव की वजहों से हाई अलर्ट पर है।

जनरल बाजवा की इस भूमिका को लेकर पाकिस्तान के कारोबारी जगत की बात करें तो कई बिजनस लीडर और आर्थिक विश्लेषक इसका स्वागत कर रहे हैं और कई इस बात को लेकर चिंतित भी हैं कि यह पाकिस्तान की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर चोट करने जैसा है। सिटीग्रुप इंक के पूर्व बैंकर यूसुफ नजर जो पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था पर एक किताब भी लिख चुके हैं का कहना है कि इसके दूरगामी असर होंगे। हालांकि इसको लेकर पाकिस्तानी वित्त मंत्रालय में प्रवक्ता ओमर हामिद की भी प्रतिक्रिया आई है जिसमें उन्होंने कहा कि हम सेना की ओर से इकनॉमी को लेकर कोई प्रक्रियात्मक हस्तक्षेप नहीं देख रहे हैं। सेना अपना काम कर रही है और हम अपना काम कर रहे हैं। लेकिन बात इतनी ही नहीं है। दरअसल, जम्मू और कश्मीर से आर्टिकल 370 को खत्म कर भारत सरकार ने जो इतिहास रचा है और उसके बाद पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर भी जिस तरह से भारत बार-बार अपना दावा जता रहा है उससे वजीरे आलम इमरान खान की स्थिति लगातार कमजोर होती दिख रही है। 

पाक सेना और आईएसआई को इस बात का अहसास हो गया है कि इमरान खान न तो देश के अंदर ठीक से काम कर पा रहे हैं और ना ही अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मंच पर भी पाकिस्तान की बात को ठीक से रख पा रहे हैं। कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान की वैश्विक मंच पर जिस तरह से बेइज्जती हुई है, यहां तक कि इस्लामिक देशों ने भी जिस तरह से पाकिस्तान से मुंह फेर लिया है यह पाक सेना को विचलित कर रहा है। यह तो रही सेना की बात। इससे इतर यहां सत्ता के समानांतर आतंकवादी संगठनों की सत्ता चलती है वह भी इमरान खान से नाखुश दिख रही है। जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर, लश्कर-ए-तैयबा चीफ हाफिज सईद समेत तमाम आतंकी संगठनों पर संयुक्त राष्ट्र ने जिस तरह से चाबुक चलाया है उससे इन संगठनों को लगने लगा है कि इमरान के रहते इनका अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। इसका अहसास पाक सेना और आईएसआई को भी है जो इसे प्रश्रय देता है। जाहिर सी बात है इमरान खान के खिलाफ अगर इतना सब कुछ चल रहा है तो तख्ता पलट की आहट सुनाई पड़ रही है तो इसमें किसी को अचरच नहीं होना चाहिए। यह जरूर होगा क्योंकि पाकिस्तान में इसका इतिहास पुराना है और इतिहास हमेशा खुद को दोहराता है, वक्त जो भी लगे।

Thursday, 3 October 2019

जैश-ए-मोहम्मद के निशाने पर कौन?

ट्रंप प्रशासन में भारत-प्रशांत सुरक्षा मामलों के सहायक रक्षा मंत्री रेंडेल श्राइवर का यह आगाह करना कि पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन भारत पर आतंकी हमलों की योजना बना रहे हैं, जैश-ए-मोहम्मद द्वारा पीएम मोदी और एनएसए अजीत डोभाल को टारगेट करने के लिए स्पेशल स्क्वॉड बनाने की योजना, जम्मू में एक बस से 15 किलो विस्फोटक की बरामदगी व उसके आरडीएक्स होने का शक और फिर राजधानी दिल्ली में जैश के आतंकियों के घुसने की पुख्ता सूचना महज इत्तेफाक नहीं है और ना ही अफवाहें। निश्चित रूप से पाक प्रायोजित आतंकवादी संगठनों द्वारा इस तरह की विध्वंसकारी योजनाओं को अंजाम तक पहुंचाने की हरसंभव कोशिश की जा रही है जिसका अलर्ट भारत की खुफिया एजेंसियों को भी लगातार मिल रही है। यहां एक बात और गौर करने की है कि हाल के दिनों में हमले के जो भी अलर्ट मिले हैं उसमें जैश-ए-मोहम्मद का नाम जरूर आ रहा है। यहां यह जानना जरूरी है कि आखिर क्या है जैश-ए-मोहम्मद और इसे भारत से इतनी नफरत क्यों है? भारत में कौन है जैश के निशाने पर? 

जैश-ए-मोहम्मद एक जिहादी इस्लामी उग्रवादी संगठन है जिसका मुख्य मकसद भारत से कश्मीर को अलग कराना है। इस रास्ते में जो भी आता है वह इसका दुश्मन बन जाता है। यह संगठन पाकिस्तान से ही अपनी आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देता है और इसमें पाकिस्तानी सेना, आईएसआई और पाक सरकार भी इसे सहयोग करती है। इस संगठन की स्थापना मसूद अज़हर नामक पाकिस्तानी पंजाबी नेता ने मार्च 2000 में की थी और इसे भारत में हुए कई आतंकी हमलों के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। कंधार विमान अपहरण से पहले मसूद अज़हर जब भारत की जेल में बंद था तो उसे छुड़ाने के लिए ही आतंकियों ने 31 दिसंबर 1999 को भारत के एक विमान को अगवा कर लिया था। इस विमान में कुल 814 यात्री सवार थे। अपहृत विमान में सवार यात्रियों को बचाने के लिए भारत सरकार को मसूद अजहर समेत तीन आतंकवादियों को कंधार ले जाकर छोड़ने का फैसला लेना पड़ा था और तभी वही मसूद अजहर भारत में बड़ी-बड़ी आतंकी घटनाओं को अंजाम दे रहा है। इन घटनाओं में दिसम्बर 2001 में लश्कर-ए-तैयबा के साथ मिलकर भारतीय संसद पर आत्मघाती हमला भी शामिल है। इसके अलावा 24 सितंबर 2002 को लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के दो आतंकवादियों ने मिलकर गुजरात के गांधीनगर में अक्षरधाम मंदिर में हमला किया था। 29 अक्टूबर 2005 को जैश और लश्कर के आतंकियों ने मिलकर दिल्ली में सीरियल ब्लास्ट को अंजाम दिया। 2 जनवरी 2016 को पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले में भी जैश-ए-मोहम्मद का हाथ था। 18 सितंबर 2016 को जम्मू-कश्मीर के उरी सेक्टर में स्थित भारतीय सेना के स्थानीय मुख्यालय पर फिदायीन हमला किया था जिसमें 18 जवान शहीद हो गए थे। 14 फरवरी 2019 को कश्मीर के पुलवामा में आत्मघाती हमले में 40 से अधिक जवानों की मौत में भी जैश का हाथ था।

राजधानी दिल्ली में जिन आतंकियों के घुसने की बात की जा रही है उसके पीछे भी जैश का हाथ बताया जा रहा है। कैटिगरी-ए के इंटेलिजेंस इनपुट के बाद दिल्ली पुलिस की स्पेशल टीम छापेमारी कर रही है। कैटिगरी-ए के इनपुट को एक्सट्रीमली क्रेडिबल यानी अति विश्वसनीय माना जाता है। कुछ दिन पहले एक अंग्रेजी दैनिक ने भी एक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया था कि जैश-ए-मोहम्मद ने पीएम मोदी और एनएसए अजीत डोभाल को टारगेट करने के लिए स्पेशल स्क्वॉड बनाया है। बहुत संभव है दिल्ली में घुसे जैश के आत्मघाती आतंकी उसी स्पेशल स्क्वॉड के सदस्य हों। जैसा कि हमने शुरू में ही इस बात का उल्लेख किया है कि जैश-ए-मोहम्मद का मुख्य उद्देश्य कश्मीर को भारत के कब्जे से मुक्त कराना है और इस रास्ते में जो भी आएगा वह उसके टारगेट में आ जाता है। जाहिर सी बात है, नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में गृह मंत्री अमित शाह और एनएसए अजीत डोभाल ने जम्मू और कश्मीर से आर्टिकल 370 को जिस तरह से खत्म कर दिया और जैश के लिए यह कश्मीर अब सपने जैसा हो गया तो इससे जैश आपे से बाहर हो गया है। इससे पहले मोदी सरकार की वजह से चीन के बार-बार वीटो के बावजूद संयुक्त राष्ट्र को मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने का फैसला सुनाना पड़ा। इन तमाम वजहों से पीएम मोदी और अजीत डोभाल जैश के निशाने पर आ गए हैं।

Wednesday, 2 October 2019

भारत को फिर चाहिए ऐसा ही 'गांधी'

पूरा राष्ट्र मोहनदास करमचंद गांधी जिन्हें हम सब प्यार से बापू कहते हैं की 150वीं जयंती मना रहा है। इस बात में कोई दो राय नहीं कि सत्य और अहिंसा के जो महान आदर्श बापू ने स्थापित किए थे और जिन आदर्शों के बूते भारत को गोरों से आजादी दिलाई थी उसकी वजह से दुनिया के अधिकांश देशों में उन्हें पूजा जाता है। लेकिन भारत में गांधी को लेकर जिस तरह की बहस छिड़ी हुई है उससे यह महसूस होता है कि भारत को बापू जैसा ही एक और गांधी की जरूरत है जो आज की पीढ़ी को बता सकें कि भारत जैसे देश में गांधी होने का मतलब क्या होता है। गांधी को लेकर देश के अंदर जिस तरह की गलतफहमियां हाल के कुछ वर्षों में पैदा की गईं हैं वह हमें देश के अंदर और देश के बाहर शर्मसार करती है। गांधी पर आरोपों की फेहरिस्त तो काफी लंबी है लेकिन दो-तीन बातें जो मन को विचलित करती है उसपर विचार करना जरूरी है। मेरा मानना है कि जो लोग इस तरह की बात कर रहे हैं वो या तो गांधी को जानते नहीं हैं, गांधी को समझते नहीं हैं या फिर गांधी के खिलाफ जो एक खास वर्ग के लोग भ्रम फैला रहे हैं उसके शिकार हो रहे हैं। बड़ी सरल और सहज भाषा में बात की जाए तो मैं जिस गांधी को जानता हूं वो 'सादा जीवन उच्च विचार, संयम बरतें रहें उदार' है। गांधी एक विचार हैं। गांधी एक दर्शन हैं जीवन जीने का दर्शन। सत्य और अहिंसा के प्रतीक हैं गांधी।  

एक बात जो बार-बार की जाती है कि देश के विभाजन के लिए गांधी ही जिम्मेदार थे सही नहीं है। इस बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है। इतिहास इस बात का गवाह है कि वर्ष 1946 में जिस वक्त गांधी नोआखली में सांप्रदायिक सद्भाव बनाने की कोशिश कर रहे थे, उस समय उनके आसपास रहने वाले तमाम बड़े राजनीतिक चेहरे दिल्ली में लॉर्ड माउंटबेटन के साथ बैठकर भारत की आजादी को अंजाम देने में लगे थे। गांधी जब तक दिल्ली लौटते, माउंटबेटन भारती की आजादी के साथ-साथ देश के बंटवारे की बुनियाद भी रख चुके थे। गांधीवादी लेखक कुमार प्रशांत के एक लेख के मुताबिक, गांधी को इस बात का आभास हो गया था कि उनकी पीठ पीछे कुछ बड़ा खेल हुआ है क्योंकि सरदार पटेल, जवाहर लाल नेहरू और मौलाना आजाद तीनों का व्यवहार बदल सा गया था। कोई उनसे खुलकर इस बारे में बात करने से कतरा रहा था। दरअसल उस वक्त तक कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बंटवारे पर सहमति बन चुकी थी। दस्तावेज पर कांग्रेस की ओर से मौलाना आजाद, लीग की ओर से मोहम्मद अली जिन्ना और अंग्रेजों की ओर से लॉर्ड माउंटबेटेन साइन कर चुके थे। इसके बावजूद गांधी ने विभाजन को रोकने की हर कोशिश की। गांधी माउंटबेटन से मिले और जब कहा कि आप लोगों ने जो भी तय किया है वह ठीक है, लेकिन मेरा सिर्फ इतना निवेदन है कि आप इस काम में जल्दबाजी न करें तो माउंटबेटन ने गांधी को जवाब दिया कि मैं किसी जल्दबाजी में नहीं हूं। मुझे एक कैलेंडर दिया गया है जिसके भीतर मुझे काम करना है। इसके बाद गांधी जिन्ना से मिले और कहा कि तुम किस बात के लिए परेशान हो रहे हो। तुम पाकिस्तान चाहते हो, वह तुम्हें मिल जाएगा। लेकिन पहले इन अंग्रेजों को बाहर जाने दो। इन्हें बीच में मत डालो। जिन्ना ने बापू को यह जवाब देकर चौंका दिया कि अंग्रेज हैं तभी तो मेरे पाकिस्तान की गारंटी है। वे चले गए तो पता नहीं आप लोग क्या करेंगे। गांधी इतने पर भी हार नहीं माने और पटेल व नेहरू से मिले। अपने विचारों से अवगत कराया और कहा कि तुम लोग जाकर माउंटबेटेन से कहो कि आप भारत की आजादी का ऐलान कीजिए और देश की बागडोर जिन्ना को दे दीजिए। तुम दोनों जिन्ना से कहो कि आप पीएम बन जाइए, हम आपका समर्थन करेंगे। इस पर सरदार पटेल ने गांधी से कहा- बापू आप कह रहे हैं तो हम आपकी बात नहीं काटेंगे। लेकिन यह बात देश को आपको बतानी होगी। उसके बाद देश में जो विद्रोह होगा उसका मुकाबला हम नहीं कर पाएंगे। यह काम आपको खुद करना होगा। अंत में गांधी अफने समाजवादी शिष्यों राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी की ओर देखते हैं जो कांग्रेसी विचारधारा के विरोधी होने के बावजूद आजादी की इस लड़ाई के चलते उनके करीब आए थे। गांधी ने उनसे कहा कि अगर आप लोग मेरा साथ दें तो मैं जान की बाजी लगा सकता हूं, लेकिन वहां से भी गांधी को खाली हाथ लौटना पड़ा। अब गांधी के सामने विभाजन को रोकने का कोई विकल्प नहीं था। बंटवारे के बाद भी गांधी ने दोनों देशों के बीच इस बंटवारे को रोकने की कोशिश की। गांधी का कहना था कि वह बिना वीजा और पासपोर्ट के पाकिस्तान जाएंगे जिससे वह भारत-पाक विभाजन की वैधानिकता और राजनीतिक सीमा को तोड़ सकें। उनकी सोच थी कि दोनों देश अपनी-अपनी जगह रहें, लेकिन दोनों देशों के लोग बिना किसी रोक-टोक के एक दूसरे के यहां आ जा सकें। उन्होंने अपने दो विश्वसनीय सहयोगियों को जिन्ना से मिलने पाकिस्तान भेजा लेकिन इससे पहले कि वे दोनों लोग जिन्ना का संदेश लेकर लौट पाते गांधी की हत्या कर दी गई और विभाजन के इस दर्द को दिल में समेट इस दुनिया से विदा हो गए। 

गांधी हमेशा कहते थे कि अगर मैंने जुर्म किया है तो मैं उसकी सजा भुगतने के लिए तैयार हूं। चौरी-चोरा कांड की भी पूरी जिम्मेदारी खुद लेते हुए उन्होंने कहा था कि मुझे सजा दे दो। अब आज अगर कुछ लोग यह सवाल उठाते हैं कि गांधी ने भगत सिंह को बचाने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किया तो इसके जवाब में यही कहा जा सकता है कि जो शख्स खुद को कभी बचाने का प्रयास नहीं किया वो किसी और को कैसे बचा सकता है। गांधी जब जेल में थे तभी भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी थी। 26 जनवरी 1931 को गांधी जब रिहा हुए तो उसके बाद मार्च में गांधी-इरविन समझौता हुआ। इसके बारे में कहा यह जाता है कि गांधी को यह समझौता तोड़ देना चाहिए था। भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी की सजा को रुकवाने को पूर्व शर्त बना देनी चाहिए थी लेकिन यह स्पष्ट रूप से गांधी-इरविन समझौते में था कि हिंसक क्रांतिकारी गतिविधियों में जो लोग शामिल हैं उन्हें नहीं छोड़ा जाएगा। जबकि जो अहिंसक सत्याग्रही थे गांधी-इरविन समझौते के तहत ऐसे करीब 90 हजार राजनीतिक कैदियों की रिहाई हुई। सुभाष चंद्र बोस ने 'इंडियन स्ट्रगल' में लिखा है कि गांधीजी अपनी ओर से जितना प्रयास भगत सिंह को बचाने के लिए कर सकते थे किया था। जब तक इरविन ने फांसी के ऑर्डर पर दस्तख्त नहीं किए थे उससे पहले गांधीजी ने तीन चिट्ठियां लिखी थीं। उसमें उन्होंने इरविन को कहा कि फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दीजिए। 18 फरवरी, 19 मार्च और 23 मार्च 1931 को ये चिट्ठियां लिखी गई थी। इरविन ने यह नहीं माना।

एक अंतिम बात, क्या गांधी तकनीक के विरोधी थे? नहीं, गांधी ने बार-बार इस बात का जिक्र किया कि हम तकनीक के खिलाफ नहीं हैं। हमारी चिंता इस बात को लेकर है कि यह तकनीक कहीं इंसान पर हावी न हो जाए। पश्चिमी तकनीक और पश्चिमी बाजार को गांधी हमेशा  संदेह की दृष्टि से देखते थे। इस विरोध के पीछे गांधी की अपनी सोच और दूरगामी योजना थी। गांधी के लिए स्वराज और आजादी का मतलब सिर्फ मानचित्र पर एक अलग मुल्क का होना भर नहीं था। वह चाहते थे देश भी आजाद हो और देश के लोगों की सोच भी आजाद हो। इसी संकल्प को बल प्रदान के लिए वह ग्रामोद्योग को बढ़ावा देने, देश के अंदर बने उत्पाद को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा देने की बात करते थे। इस नजरिये से पश्चिम चीजों का विरोध जरूरी था। 1909 में गांधी की लिखी किताब को पढ़े तो आप पाएंगे कि उनका पश्चिमी तकनीक के खिलाफ सत्याग्रह था। उनकी सोच थी कि अगर हम पश्चिम तकनीक और बाजार से जुड़े रहेंगे तो फिर लोगों को अपनी अहमियत और मौलिकता का आभास नहीं होगा, जो किसी भी स्वतंत्र समाज की पहली जरूरत होती है। अंग्रेजों की साजिश भी थी कि वह हमें मशीनों पर इस तरह निर्भर करें जिससे हम कभी उबर नहीं पाएं। एक तरह से हमारे हुनर और कारोबार को समाप्त कर दिया गया था। गांधी ने इस चुनौती को पहले ही भांप लिया था। उन्होंने लोगों के बीच पश्चिमी तकनीक के विरोध को अस्मिता से जोड़ा। लोगों में राष्ट्रीय भावना को जगाया। गांधी का यह स्पष्ट मानना था कि मशीन इंसानी सोच को नियंत्रित करती है। एक सीमा में बांधती है। वह मशीन पर निर्भरता को खुली सोच में सबसे बड़ी बाधा मानते थे। ऐसी सोच के पीछे गांधी का अपना आधार था। गांधी की इस सोच को नजरंदाज करने का ही दुष्परिणाम है कि देश में बेरोजगारी चरम पर है। हर काम मशीन कर दे रहा है। इंसान मशीन का पुतला भर रह गया है।

बहरहाल, बहुत से लोग यह सवाल पूछते हैं कि आज अगर गांधी होते तो क्या करते? निश्चित रूप से इस सवाल का जवाब देना कठिन है लेकिन इस बात पर गौर करिए कि गांधी की हत्या के सात दशक से अधिक वक्त बीत जाने के बाद भी आज अगर वो इतने प्रासंगिक हैं तो तय मानिए कि आज अगर गांधी होते तो इस देश की दशा और दिशा कुछ और होती। अगर आप गांधी को पढ़ेंगे तो आप पाएंगे कि वह हमेशा कहते थे, 'पाप से घृणा करो पापी से नहीं क्योंकि पापी को खत्म कर दोगे तो भी पाप बचा रह जाएगा लेकिन पाप खत्म कर दोगे तो पापी पैदा ही नहीं होंगे।' निश्चित रूप से इस कथन में गांधी बदलाव की बात कर रहे हैं। गांधी मन को बदलने की बात कर रहे हैं। गांधी आज होते तो शायद आतंकवाद को नए नजरिए से देखने की बात करते। जब डाकू बदल सकता है तो आतंकी क्यों नहीं बदल सकता। गांधी इस बात को हमेशा मानते थे कि हर व्यक्ति को अपने सत्य की पहचान खुद करनी होती है। गांधी आतंक की राह पर चलने वाले से कहते कि अपने सत्य को पहचानो, अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनो, किसी और के सच पर मत चलो। कहने का मतलब यह कि आज हम जिस गांधी की 150वीं जयंती मना रहे हैं वो गांधी आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 75 साल पहले। आज भी देश का ऐसा गांधी चाहिए और कल भी। 

Tuesday, 1 October 2019

अपने ही 'स्वामी लोग' बिगाड़ रहे हैं भाजपा की सेहत

सुब्रमण्यम स्वामी और स्वामी चिन्मयानंद
भारतीय जनता पार्टी और केंद्र की मोदी सरकार इस वक्त अपने ही 'स्वामी जनों' की हरकतों से मुसीबत में है। एक हैं स्वामी चिन्मयानंद जो अपने निकृष्ट चरित्र से भाजपा की सेहत बिगाड़ रहे हैं और दूसरे हैं सुब्रमण्यम स्वामी जो आर्थिक मंदी की आड़ में मोदी सरकार की मोदीनॉमिक्स और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की आर्थिक समझ पर लगातार सवाल खड़े कर रहे हैं।

पहले बात करते हैं सुब्रमण्यम स्वामी की जो वर्तमान में भाजपा से राज्यसभा सांसद हैं और ऐसा लगता है कि भाजपा ने उन्हें मोदीनॉमिक्स और भारतीय अर्थव्यवस्था की खामियां उजागर करने की खुली छूट दे रखी है। आर्थिक मंदी को लेकर अपने ताजा बयान में स्वामी ने पीएम मोदी को एक प्रकार से सलाह के अंदाज में अप्रिय सच सुनने का मिजाज पैदा करने की नसीहत दी है। साथ में ये भी जोड़ा कि अगर आप अर्थव्यवस्था को संकट से बाहर निकालना चाहते हैं तो सरकार के अर्थशास्त्रियों को भयभीत करना बंद करें। बीते दिनों एक किताब की लांन्चिंग समारोह में जब स्वामी के बोलने की बारी आई तो वो लगे बोलने- 'मोदी जिस तरह से सरकार चलाते हैं, उसमें बहुत कम लोग रेखा से बाहर कदम रख सकते हैं। उन्हें लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए कि वह मुंह पर कह सकें कि यह नहीं होना चाहिए। मुझे लगता है कि उन्होंने अभी ऐसा मिजाज पैदा नहीं किया है।' 

दरअसल स्वामी की टिप्पणी ऐसे वक्त में आई है, जब देश की विकास दर बीते छह साल में सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है। इतना ही नहीं, अर्थव्यवस्था के संकट के लिए स्वामी ने नोटबंदी और जल्दबाजी में लागू किए गए जीएसटी को भी जिम्मेदार बताया। सरकार उच्चतर वृद्धि के लिए जरूरी नीतियों को ही नहीं समझ पाई। हमें एक ऐसे तरीके की जरूरत है, जिसमें हमारी अर्थव्यवस्था में लघु अवधि, मध्यम अवधि और दीर्घावधि के लिए योजनाएं हों लेकिन, आज ऐसा कुछ नहीं है। मुझे डर है कि सरकार द्वारा नियुक्त अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को सच बताने में डरते हैं। स्वामी का ये पूरा का पूरा प्रवचन मोदी सरकार और मोदीनॉमिक्स पर सीधा हमला है। अक्सर अपनी इस तरह की टिप्पणी से स्वामी सरकार को नीचा दिखाने को कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। जब वह बोलते हैं या ट्वीटर पर लिखते हैं उस वक्त यह भूल जाते हैं कि वह एक पार्टी के सांसद हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि स्वामी जो कुछ लिख और बोल रहे हैं वह सच के काफी करीब होता है, हार्वर्ड विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पीएचडी कर रखी है लेकिन, इस बात का ख्याल तो रखना ही चाहिए कि वह पार्टी के अनुशासन से बंधे हैं और ऐसी कोई बात नहीं करें जिससे पार्टी या सरकार का हाजमा बिगड़ जाए।

भाजपा की सेहत से खिलवाड़ करने वाले दूसरे स्वामी हैं चिन्मयानंद जिन्हें स्वामी चिन्मयानंद के नाम से लोग जानते हैं और इनका असली नाम कृष्णपाल सिंह है। पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे स्वामी चिन्मयानंद भाजपा के कद्दावर नेता रहे हैं और इस वक्त कानून की एक छात्रा से रेप के आरोप में जेल में बंद हैं। जिस छात्रा ने चिन्मयानंद पर आरोपों की झड़ी लगाई है उसके मुताबिक स्वामी लड़कियों से न्यूड मसाज कराते थे, लड़कियां जब सेक्स करने से मना करती थी तो वह गुस्से में उसके कपड़े तक फाड़ देते थे। ऐसे-ऐसे आरोप जिस स्वामी पर लगे और वह भाजपा का कद्दावर नेता रहा हो, निश्चित रूप से भाजपा जैसी दक्षिणपंथी विचारधारा वाली पार्टी के दामन को दागदार तो कर ही रहा है। भाजपा भले ही अब स्वामी से पल्ला झाड़ रही हो लेकिन इस बात से कोई कैसे इनकार कर सकता है कि स्वामी चिन्मयानंद अटल सरकार में गृह राज्य मंत्री रहे हैं। इस बात से कोई कैसे इनकार कर सकता है कि वह 1991 में भाजपा के टिकट पर बदायूं से, 1998 में मछलीशहर से और 1999 में जौनपुर से सांसद रहे हैं। राम मंदिर आंदोलन में भी स्वामी चिन्मयानंद ने गोरखपुर की गोरक्षा पीठ के महंत और पूर्व सांसद अवैद्यनाथ के साथ मिलकर बड़ी भूमिका निभाई थी। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी समेत तमाम विपक्षी दलों के नेता भाजपा के चाल, चरित्र और चेहरे पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। जाहिर है भाजपा आलाकमान, संगठन, नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए स्वामी चिन्मयानंद परेशानी का सबब तो बन ही गए हैं।

बहरहाल, भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को इस बात को समझने की जरूरत है कि चाहे वो सुब्रमण्यम स्वामी के वाजिब तार्किक बातें हों या स्वामी चिन्मयानंद के घिनौने कृत्य, यह पार्टी की सेहत के लिए फलदायी नहीं हो सकती है। देर-सवेर इसका खामियाजा पार्टी और सरकार को भुगतना ही पड़ता है। ऐसा भी नहीं है कि इन स्वामी जनों के आचार, विचार और व्यवहार से पार्टी या पार्टी के नेता अनभिज्ञ रहे हों। सुब्रमण्यम स्वामी को मोदीनॉमिक्स पर कोई बात अगर ठीक नहीं लगती है तो तो उन्हें पार्टी फोरम में बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए। लेकिन अगर आप दूरियां बनाएंगे तो फिर वो परेशानी तो खड़ी करेंगे ही। लेकिन स्वामी चिन्मयानंद जैसे लोगों से निपटने का एक ही तरीका है कि ऐसे मामलों में पार्टी और सरकार को स्वत: संज्ञान लेकर जरूरी कार्रवाई करनी चाहिए और तत्काल प्रभाव से इस बात का ऐलान करना चाहिए कि ऐसे शख्स का पार्टी से कोई लेना देना नहीं है। खुले तौर पर ऐसे घृणित व्यक्ति को पार्टी में जगह देने के लिए समाज और देश से माफी मांग लेनी चाहिए।

Monday, 30 September 2019

लालू यादव के कुनबे में ये कैसी जंग?

एक तरफ जहां बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के संस्थापक लालू प्रसाद यादव इन दिनों जेल में जीवन से संघर्ष कर रहे हैं, वही दूसरी तरफ उनके घर में सास, बहू और ननद यानी राबड़ी देवी, ऐश्वर्या राय और मीसा भारती के बीच घमासान मचा हुआ है। हालांकि घटनाक्रम के तहत यह जानकारी निकलकर आई है कि सुलह हो गई है और बहू ऐश्वर्या को राबड़ी ने घर में एंट्री दे दी है लेकिन ऐसा पहले भी हो चुका है और इस बात की कोई गारंटी नहीं कि आगे इस तरह का कोई विवाद नहीं होगा।

दरअसल, पिछले साल मई में लालू के बड़े लाल तेजप्रताप और चंद्रिका राय की बेटी व दरोगा राय की पोती ऐश्वर्या की शादी पटना में हुई थी। शादी के महज पांच महीने बाद ही तेजप्रताप ने कोर्ट में तलाक की अर्जी दे दी। इसके बाद दोनों परिवारों के बीच सुलह कराने की कोशिशें की गईं। दोनों ही पक्षों की तरफ से कहा गया कि घर में सबकुछ ठीक है और परिवार के लोग इस मामले को बैठकर सुलझा लेंगे। लेकिन तेजप्रताप से जब भी इस बारे में मीडिया ने सवाल पूछा तो उन्होंने साफ कहा कि वे तलाक लेकर रहेंगे। इस मामले में वे अपने परिवार की बात भी नहीं सुनेंगे। यहीं आकर मामला बिगड़ गया है और अब तो राबड़ी और मीसा भी खुलकर तेजप्रताप के समर्थन में आ गईं हैं। ऐश्वर्या का कहना है कि वह अपने ससुराल में रहना चाहतीं हैं और अपने रिश्ते को बचाना चाहती हैं लेकिन मीसा भारती के बहकावे में आकर पति तेजप्रताप ने बातचीत करना बंद कर दिया। मुझे इस घर में जून से खाना तक नहीं मिल रहा है। मेरी मां अपने घर से खाना भेजती हैं।

एक सशक्त राजनीतिक परिवार के घर से इस तरह की कहानी का सार्वजनिक होना मुझे लगता है इकलौता मामला है और तय मानिए यह कहानी राष्ट्रीय जनता दल को ठीक उसी तरह से डुबो देगी जिस तरह से आज की तारीख में कुदरत के कहर ने नीतीश के सुशासन को डुबो दिया है। याद कीजिए, लालू प्रसाद यादव ने किस तरीके पार्टी को खड़ा किया था और किस तरह से वो अपनी सियासी चतुराई से पटना से लेकर दिल्ली तक की सत्ता को अपनी अंगुली पर नचाते थे। आज जब वह चारा घोटाला केस में अपने कर्मों का फल जेल की सजा के रूप में भुगत रहे हैं, पार्टी के अस्तित्व पर तो सवालिया निशान लग ही रहे हैं, परिवार भी बिखराव से बचता नजर नहीं आ रहा है। परिवार से लेकर पार्टी तक बिन लालू सब खत्म दिख रहा है।

दरअसल, लालू के बड़े लाल तेजप्रताप और दरोगा राय की बेटी ऐश्वर्या की शादी को शुरू से एक बेमेल रिश्ता बताया जा रहा था। लेकिन दोनों परिवारों ने किसी की एक नहीं सुनी और शादी हो गई। जब शादी हो गई तो नतीजा सामने आना ही था। अब सवाल यह उठता है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी से काफी पढ़ी लिखी ऐश्वर्या ने यह जानते हुए कि 12वीं पास तेजप्रताप उसके मुकाबले काफी कम पढ़ा-लिखा है, शादी करने को क्यों तैयार हो गई? यह काफी अहम सवाल है और इस सवाल का जवाब ही इस पूरे फैमिली ड्रामे की जड़ में है। ऐश्वर्या उस दरोगा राय की पोती है जो 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970 तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे थे। ऐश्वर्या की अपनी महत्वाकांक्षा है और निश्चित रूप से लालू के बेटे से शादी करने के पीछे भी वही राजनीतिक महत्वाकांक्षा रही होगी। लेकिन शादी के बाद जब चीजें खुलीं तो सबके कान खड़े हो गए। जेल जाने से पहले लालू ने अपनी राजनीतिक विरासत अपने छोटे बेटे तेजस्वी को सौंप दी थी। ऊपर से मीसा भारती भी राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय हैं और वर्तमान में वह राज्यसभा सांसद हैं। 

कहने का मतलब यह कि जिस परिवार में लालू यादव के बाद तेजस्वी यादव, मीसा भारती, खुद राबड़ी देवी तीन-तीन लोग विरासत को संभालने में पसीना बहान रहे हैं वहां ऐश्वर्या की कितनी दाल गलेगी। बहुत संभव था, लालू प्रसाद यादव अगर जेल नहीं गए होते तो बहू ऐश्वर्या के राजनीतिक भविष्य को लेकर कोई तरकीब निकालते। लेकिन उनकी गैरमौजूदगी में हर किसी को यह भय सता रहा है कि ऐश्वर्या की इस घर में स्थापित कर कहीं राष्ट्रीय जनता दल को हथिया न ले। हालांकि अभी तक ऐश्वर्या की ऐसी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आई है लेकिन चूंकि जिस राजनीतिक परिवार से ऐश्वर्या आती हैं उसका असर तो मिटाए नहीं मिटेगा।

Sunday, 29 September 2019

पूरे देश की नब्ज टटोलेंगे ये चुनाव

आर्थिक मंदी, राष्ट्रवाद और भावनात्मक मुद्दों की पृष्टभूमि में आगामी 21 अक्टूबर को होने जा रहे महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव तथा देश के 18 राज्यों की 64 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव को कम आंकना राजनीतिक लिहाज से बड़ी गलती होगी। ये चुनाव काफी अहम हैं। अहम इसलिए क्योंकि दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार है और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में इन चुनावों के नतीजे निश्चित रूप से इस बात का अहसास कराएंगे कि राष्ट्रवाद की बयार में अर्थनीति का राजनीति पर कितना व कैसा असर होता है।

2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी और शाह की लीडरशिप में देश के मतदाताओं ने जिस तरह का जनादेश भारतीय जनता पार्टी को दिया, उसके बाद से तमाम सियासी पंडितों की जुबान पर जैसे ताला सा लग गया है। कुछ भी बोलने और बताने की जहमत नहीं उठा रहे। उस वक्त तो सिर्फ बालाकोट ही था। अब जब महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव होने जा रहे हैं तो यह कश्मीर में धारा 370 और मुस्लिम महिलाओं के लिए तीन तलाक जैसे राष्ट्रवाद और भावनात्मक मुद्दों की पृष्टभूमि में लड़ा जा रहा है। जाहिर है तमाम विश्लेषकों को यह मानने में हिचक नहीं हो रही कि कमल को खिलने से कोई नहीं रोक सकता है। 

दोनों राज्य में होने जा रहे चुनाव कई मायनों में बेहद खास हैं, लेकिन इस चुनाव का मतलब सिर्फ इन दो राज्यों की सरकार का भविष्य नहीं है। दिवाली के दो दिन पहले 24 अक्टूबर को जो नतीजे आएंगे वो ऐसे बहुत से सवालों का जवाब देगें जिनपर पूरे देश की निगाहें टिकी हैं। ये चुनाव इसलिए भी खास है क्योंकि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद ये पहला चुनाव है और वह भी ऐसे दौर में हो रहा है जब देश आर्थिक मंदी के दंश को भी झेल रहा है। निश्चित रूप से इन चुनावों में अर्थनीति को राजनीति कितना प्रभावित करती है इसकी झलक भी दिखेगी। यह चुनाव सियासी गठबंधनों पर भी अपनी छाप छोड़ेगी और नतीजे राजनीतिक प्राथमिकताओं की दशा और दिशा तो तय करेंगे ही साथ ही राष्ट्रीय राजनीति का मार्ग भी तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। ये चुनाव इसलिए भी अहम हैं क्योंकि इसके साथ 18 राज्यों की 64 सीटों पर विधानसभा उपचुनाव भी होने हैं। इनमें कर्नाटक की 15 सीटें, उत्तर प्रदेश की 11, बिहार की 5, केरल की 5, असम की 4, गुजरात की 4, पंजाब की 4, सिक्किम की 3, हिमाचल प्रदेश की 2, राजस्थान की 2, तमिलनाडु की 2, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, मध्यप्रदेश, मेघालय, ओडिशा, पुडुचेरी की एक-एक सीटें शामिल हैं। इतने राज्यों से जो जनादेश आएंगे वो पूरे देश की जमीनी हकीकत को दर्शाएंगे।

आर्थिक लिहाज से अगर आंकलन करें तो इसमें कोई दो राय नहीं कि मुंबई की पहचान देश के बिजनेस कैपिटल के रूप में है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी महाराष्ट्र काफी अहम है। देश की जीडीपी में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी जहां 14 प्रतिशत की है वहीं हरियाणा की हिस्सेदारी 3.7 प्रतिशत है। कंपनियों के निवेश की वजह से प्रति व्यक्ति आय में भी ये शीर्ष राज्यों में शामिल हैं। ऐसी परिस्थिति में 288 सीटों के लिए महाराष्ट्र के 8.96 करोड़ मतदाता और 90 सीटों के लिए हरियाणा के 1.83 करोड़ मतदाताओं का मूड मायने रखता है। देश की अर्थव्यवस्था में मंदी का दौर और बढ़ती बेरोजगारी इस चुनाव पर कितना असर डालेगा, यह काफी महत्वपूर्ण है। आर्थिक मंदी की बात करें तो यह सुस्ती जिस ऑटो सेक्टर में सबसे ज्यादा है उसका सबसे बड़ा केंद्र भी इन्हीं दोनों राज्यों में है। आंकड़ों पर गौर करें तो दो तिहाई कारें हरियाणा में बनती हैं। मारुति ने गुरुग्राम और मानेसर में जिन प्लांटों में उत्पादन बंदी दिवस मनाने की घोषणा की है वे भी यहीं हैं। महाराष्ट्र में भी कई ऑटोमोबाइल कंपनियों के प्लांट बेहाल हैं। व्यापक बेरोजगारी के लिहाज से हरियाणा की स्थिति अच्छी नहीं है। 

जहां तक सियासी दलों के बीच गठबंधनों और अपनी-अपनी हैसियत आंकने की बात है तो वह भी इस चुनाव के नतीजे तय करेंगे। शरद पवार और उनकी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ ही ओमप्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल की राजनीति के लिए भी यह चुनाव निर्णायक साबित होगा। भाजपा और शिवसेना को भी यह चुनाव बताएगा कि महाराष्ट की राजनीति में कौन बड़ा भाई है और कौन छोटा भाई। दोनों राज्यों में सक्रिय लगभग आधा दर्जन छोटी पार्टियां किसी समय किस दल के साथ चली जाएं यह कहना मुश्किल है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का भी दिल्ली से बाहर अपनी ताकत का अहसास हरियाणा चुनाव से हो जाएगा।

बहरहाल, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुआई में भाजपा ने जो नई राजनीति विकसित की है वह हर जगह पारंपरिक समीकरणों को तोड़कर खेल के नियम बदल देने में यकीन रखती है। चाहे वह मुख्यमंत्री की घोषणा का मसला हो, अधिकांश मौजूदा विधायकों के टिकट काटने का मसला हो, चुनावी मैदान में मुद्दों को डायवर्ट करने का मसला हो, राष्ट्रवाद को किस तरह से भुनाया जाए इसका मसला हो या कुछ और। अब इन तमाम रणनीतियों के बीच किस तरह का जनादेश निकलकर आता है ये तो आगामी 24 अक्टूबर को ही पता चलेगा लेकिन इतना तो तय है कि यह चुनाव काफी रोमांचक और राजनीति की दशा व दिशा को तय करने वाला होगा।