महाराष्ट्र में 'महा विकास अघाड़ी' की सरकार बन चुकी है। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं वो भी घोर सेक्यूलर यानी धर्मनिरपेक्ष दलों कांग्रेस और एनसीपी के साथ। सूबे के राजनीतिक इतिहास को पलटकर देखें तो पहली बार शिवसेना हिन्दुत्व की डोर तोड़कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी संग सेक्यूलर यानी धर्मनिरपेक्षता की डोर से बंध गई है। शपथ ग्रहण समारोह से पहले जैसे ही महा विकास अघाड़ी का चार पन्नों का न्यूनतम साझा कार्यक्रम (कॉमन मिनिमम प्रोग्राम) सामने आया और उसकी प्रस्तावना में जब इस बात का उल्लेख पाया गया कि गठबंधन 'संविधान में वर्णित धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को लेकर प्रतिबद्ध है' तो सियासी गलियारों में खलबली मच गई। देखते ही देखते खबरिया चैनलों में इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि आखिर शिवसेना की ऐसी क्या मजबूरी रही कि उसे हिन्दुत्व से किनारा करना पड़ा? बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना जिसकी पहचान भगवा और हिन्दुत्व से थी, ऐसा क्या हो गया कि उसे सेक्यूलरिज्म यानी धर्मनिरपेक्षता की राह पकड़नी पड़ी। हम इसे समझने की कोशिश करेंगे, लेकिन अगर आप मशहूर शायर बशीर बद्र के इस शेर की कुछ पंक्तियों पर गौर फरमाएं तो शायद बहुत कुछ समझ में आ जाएगा...
मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे,
मुक़द्दर में चलना था चलते रहे।
वो क्या था जिसे हमने ठुकरा दिया,
मगर उम्र भर हाथ मलते रहे।
मुहब्बत अदावत वफ़ा बेरुख़ी,
किराये के घर थे बदलते रहे।
बात हिन्दुत्व की हो या सेक्यूलरिज्म की, जब ये सब किराये के घर हैं तो क्या भाजपा, क्या कांग्रेस और क्या एनसीपी, जब जहां से सत्ता मिल जाए वहीं अपना घर बना लो। कोई मतलब नहीं इस हंगामे का। राजनीति में सब कुछ जायज होता है। कुछ भी निश्चित नहीं होता। शिवसेना इसका अपवाद नहीं। शिवसेना के राजनीतिक सफर पर गौर करें तो कई ऐसे वाक्ये सामने आए जब पार्टी ने अपनी सियासी जमीन को मजबूत आधार प्रदान करने के लिए विचारधारा को ताख पर रखा। दरअसल, बाला साहेब ठाकरे ने महाराष्ट्र के स्थानीय लोगों यानी मराठी मानुष या कहिए मराठी अस्मिता की रक्षा के लिए 19 जून 1966 को शिवसेना की नींव रखी थी। ठाकरे मूल रूप से कार्टूनिस्ट थे और राजनीतिक विषयों पर तीखे कटाक्ष करते थे। अगर आपको याद हो तो शिवसेना के गठन के समय बाला साहेब ठाकरे ने नारा दिया था, 'अंशी टके समाजकरण, वीस टके राजकरण' (80 प्रतिशत समाज और 20 फीसदी राजनीति)। लेकिन भूमिपुत्र, मराठी मानुष या मराठी अस्मिता का मुद्दा लंबे समय तक चल नहीं सका। फिर शिवसेना ने हिन्दुत्व के मुद्दे को अपना लिया जिसके सहारे वह आगे बढ़ती रही। सिर्फ महाराष्ट्र की बात करें तो शिवसेना ने पहली बार महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 1990 में लड़ा जिसमें उसके 52 विधायकों ने जीत हासिल की। भाजपा के साथ 1989 में गठबंधन किया जो 2014 तक चला। 2014 का विधानसभा चुनाव दोनों दलों ने एक दूसरे से अलग होकर लड़ा। उसके बाद दोनों पार्टियों ने मिलकर प्रदेश में सरकार जरूर बनाई, लेकिन मुद्दों पर टकराव की बुनियाद भी इसी दौर में फली-फुली। 2018 के अंत में उद्धव ठाकरे ने अयोध्या में रामलला के दर्शन कर राम जन्मभूमि मुद्दे को हवा दी थी। 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ मिलकर शिवसेना ने चुनाव जरूर लड़ा और इन्हीं दोनों दलों को जनादेश भी मिला लेकिन 'मुख्यमंत्री हमारा होगा' को लेकर दोनों दलों ने हिन्दुत्व की डोर तोड़ दी। शिवसेना ने मराठा राजनीति के भीष्म पितामह शरद पवार की उस एनसीपी से हाथ मिला लिया जिसने कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। और अंतत: महा अघाड़ी विकास (शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस) की सरकार बन गई। जिद्द पूरी करते हुए शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बन गए। अब जो लोग हिन्दूवादी शिवसेना की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठा रहे हैं उन्हें अपना राजनीतिक ज्ञान बढ़ाना चाहए और जानना चाहिए कि शिवसेना ने इस तरह के कदम कोई पहली बार नहीं उठाए हैं।
53 साल के राजनीतिक सफर में कई ऐसे मौक आए जब शिवसेना और कांग्रेस ने एक-दूसरे को सहयोग किया। साल 1967 को याद करें जब पार्टी की स्थापना के एक साल ही हुए थे, शिवसेना की पहली चुनावी रैली में कांग्रेस नेता रामाराव अदित पहुंचे थे। 'बाल ठाकरे एंड द राइज ऑफ शिवसेना' में भी इस बात का उल्लेख है। रामाराव अदिक और बाला साहेब ठाकरे पुराने दोस्त थे। किताब के मुताबिक, ठाकरे ने उस वक्त कांग्रेस-शिवसेना गठबंधन पर कहा भी था कि हम कम्युनिस्टों को हराने के लिए साथ आ रहे हैं। इतना ही नहीं, 1966 में बाल ठाकरे ने जब शिवसेना नाम की पार्टी बनाई थी तो ऐसा कहा जाता है कि उनको महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक का समर्थन हासिल था, जिस वजह से शिवसेना को वसंत सेना भी कहा जाता था। 1971 में शिवसेना ने अपना पहला चुनाव के. कामराज की कांग्रेस सिंडिकेट के साथ मिलकर लड़ा था। ये अलग बात थी कि बाद में इंदिरा वाली कांग्रेस का गुट ही असली कांग्रेस के रूप में अस्तित्व में आया। जब आपातकाल का दौर आया तो बाल ठाकरे ही इकलौते विरोधी नेता थे जिन्होंने इंदिरा द्वारा लगाए गए आपातकाल का खुलकर समर्थन किया था। ठाकरे तो यहां तक कहते सुने गए थे कि मैं लोकशाही नहीं, बल्कि ठोकशाही पर विश्वास करता हूं। थॉमस हेनसेन की लिखी किताब 'वेजेस ऑफ वायलेंस : नेमिंग एंड आइडेंटिटी इन पोस्टकोलोनियल बॉम्बे' के मुताबिक, ठाकरे ने आपातकाल का समर्थन करते हुए कहा था कि इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल इसलिए लगाया, क्योंकि देश में फैली अस्थिरता से निपटने का यही एकमात्र उपाय है। 1977 में बाला साहेब ने बीएमसी चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मुरली देवड़ा का समर्थन किया था। उसी साल हुए आम चुनाव में शिवसैनिकों ने कांग्रेस का प्रचार भी किया था। 1980 में इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनते ही महाराष्ट्र की सरकार को बर्खास्त कर दिया और यहां दोबारा चुनाव कराए। इन चुनावों में कांग्रेस ने अब्दुल रहमान अंतुले को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया था। अंतुले और ठाकरे अच्छे दोस्त थे। इसलिए ठाकरे ने चुनाव में अपने उम्मीदवार नहीं उतारे और कांग्रेस का समर्थन किया। शिवसेना और कांग्रेस की दोस्ती राष्ट्रपति चुनाव में भी साथ दिख चुकी है। 2007 में शिवसेना ने एनडीए समर्थित भैरो सिंह शेखावत की जगह यूपीए की उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल का समर्थन किया था। इसी तरह से 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में शिवसेना ने यूपीए के प्रणब मुखर्जी का समर्थन किया था। राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद प्रणब मुखर्जी बाल ठाकरे से मिलने उनके घर मातोश्री भी गए थे।
इतना ही नहीं, वो शिवसेना जो अपनी कट्टर विचारधारा और मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ बयान देने के लिए जानी जाती है, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन कर एक जमाने में राजनीति के बड़े सूरमाओं को हैरत में डाल दिया था। पत्रकार प्रकाश अकोलकर ने शिवसेना पर लिखी अपनी किताब 'जय महाराष्ट्र' में लिखा है कि 1970 के दशक में मुंबई मेयर का चुनाव जीतने के लिए शिवसेना ने मुस्लिम लीग के साथ भी तालमेल किया था। हिंदू हृदय सम्राट के रूप में प्रसिद्धि पा चुके बाला साहेब ठाकरे ने मुस्लिम नेता गुलाम मोहम्मद बनातवाला के साथ स्टेज भी साझा किया था। उस वक्त की राजनीतिक कहानी पर भरोसा करें तो मुस्लिम लीग नेता गुलाम मोहम्मद बनातवाला को शिवसेना खासकर बाल ठाकरे का प्रबल आलोचक माना जाता था। लेकिन शिवसेना ने अपना मेयर बनाने के लिए मुस्लिम लीग से गठबंधन कर मदद ली थी। तब शिवसेना और मुसलमानों के साथ आने को एक बड़े मास्टर स्ट्रोक की तरह देखा गया था। कहने का तात्पर्य यह कि सत्ता के लिए जो पार्टी मुस्लिम लीग को अपना सकती है तो फिर कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिलाने पर सवाल उठाने का कोई मतलब नहीं रह जाता है।
बहरहाल, शिवसेना ने धर्मनिरपेक्ष दलों से गठबंधन कर सरकार जरूर बनाई है, लेकिन इस बात का उल्लेख पार्टी ने कहीं नहीं किया है कि हम हिन्दुवादी नहीं हैं। हर हिन्दू जन्म से हिन्दूवादी होता है। भाजपा की थिंकटैंक आरएसएस भी कहती है कि हिन्दुस्तान में रहने वाला हर इंसान हिन्दू है। ऐसे में यह मानना कि भाजपा से अलग होने पर पार्टी के अंदर जो हिन्दुत्व की अवधारणा है वह खत्म हो जाती है, ठीक तो नहीं ठहराया जा सकता है। शिवसेना ही क्यों, कांग्रेस, समेत कोई भी गैर भाजपाई दल यह नहीं कह सकता कि वह हिन्दुत्व में भरोसा नहीं रखती। हिन्दुत्व कोई राजनीतिक विचारधारा तो है नहीं। जब हिन्दुत्व एक दर्शन है, जीवन जीने का तरीका है तो फिर इसपर बहस की कोई गुंजाइश बचती नहीं है। रही बात धर्म निरपेक्ष या पंथ निरपेक्ष होने की तो इसका जिक्र भारतीय संविधान की प्रस्तावना में है और पूरा देश धर्मनिरपेक्षता की डोर से बंधा है। क्या भाजपा यह दावा कर सकती है कि वह धर्मनिरपेक्ष पार्टी नहीं है। तो फिर शिवसेना की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल कैसे खड़ा किया जा सकता है।















