Friday, 22 May 2020

कोरोना क्रांति : ताइवान के बहाने चीन को घेर रहा है अमेरिका

कोरोना महासंकट के बीच एक छोटा सा लोकतांत्रिक देश ताइवान पूरी दुनिया को दो हिस्सों में बांटने के लिए खुद को खड़ा कर लिया है। इसकी मुख्य वजह है- चीन की शह पर उसे डब्ल्यूएचओ से निकाल बाहर करना। ताइवान के उपराष्ट्रपति चेन चिएन जेन के हवाले से खबरों में कहा भी गया है कि आपदा के समय आप किसी को अनाथ कर रहे हैं। यह साफ करता है कि डब्ल्यूएचओ अपनी तटस्थ ज़िम्मेदारियों से ज़्यादा राजनीति में लिप्त है। लेकिन चीन में नेशनल पीपुल्स कांग्रेस की महत्वपूर्ण वार्षिक बैठक में ताइवान को लेकर प्रीमियर ली कचियांग ने शुक्रवार (22 मई ) को कहा कि चीन अपनी संप्रभुता को लेकर अडिग है। कहने का मतलब यह कि चीन ताइवान को लेकर जिस नीति पर पहले से काम करता आ रहा है उसमें कोई फेरबदल नहीं करेगा। अब इस पूरे प्रकरण में एक धड़ा चीन के साथ है तो दूसरा चीन के खिलाफ जिसका नेतृत्व अमेरिका कर रहा है। चीन भले ही ताइवान को अपना प्रांत मानता हो लेकिन 2.30 करोड़ की आबादी वाला ताइवान ख़ुद को एक अलग लोकतंत्र बताता है जहां साल 1949 में चीन से भागकर आए लोग बस गए थे। इसकी बुनियाद में चीन विरोध गहरे तक समाया हुआ है। जैसा कि कहा जाता है, चीन से पूरी दुनिया में फैला कोरोना वायरस चीन विरोधी देशों के लिए अचूक हथियार है। और इसी का फायदा ताइवान के साथ मिलकर अमेरिका उठाना चाह रहा है। 

दरअसल, ताइवानी उपराष्ट्रपति चेन चिएन-जेन का कहना है कि ताइवान ने 31 दिसंबर 2019 को ही विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ को चेतावनी दी थी कि कोरोना वायरस इंसान से इंसान में फैलता है। चेन ने फाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि ताइवानी डॉक्टरों ने शुरू में ही यह पता लगा लिया था कि वुहान में इस बीमारी का इलाज करने वाले डॉक्टर और दूसरे मेडिकल स्टाफ बीमार पड़ रहे हैं। लेकिन डब्ल्यूएचओ ने इस जानकारी को गंभीरता से नहीं लिया और न ही वक्त रहते इसकी पुष्टि की। बस, अमेरिका को एक सुनहरा मौका हाथ लगा एक तीर से डब्ल्यूएचओ और चीन दोनों पर निशाना साधने का। साथ ही ताइवान में घुसने का। अमरीकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, अमरीका इस बात से बेहद हैरान है कि वैश्विक स्वास्थ्य समुदाय से ताइवान की सूचना क्यों छिपाई गई। 14 जनवरी 2020 को बयान जारी कर डब्ल्यूएचओ कह रहा  था कि इस वायरस के इंसान से इंसान में ट्रांसमिशन के संकेत नहीं मिले हैं जबकि ताइवान 31 दिसंबर को ही डब्ल्यूएचओ को बता चुका था कि कोरोना इंसान से इंसान में फैलने वाला वायरस है। डब्ल्यूएचओ के इस हरकत से वक़्त और ज़िंदगियां दोनों बर्बाद हुई हैं।

अब ताइवान और डब्ल्यूएचओ की तू-तू मैं-मैं को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की सारी इंद्रियां एकदम से जागृत हो गईं। उन्हें लगा कि इससे बेहतर मौका चीन और डब्ल्यूएचओ को घेरने का तथा ताइवान के दिल में जगह बनाने का नहीं हो सकता है। क्योंकि इसी बीच त्साई इंग वेन एक बार फिर से ताइवान की राष्ट्रपति चुनी गईं। अमेरिका ने लगे हाथों जीत का बधाई संदेश देने में देर नहीं की। वेन का जीतना और अमेरिकी का बधाई संदेश दोनों ही चीन को नागवार गुजरा। फिर उसे यह भी लगा कि कोरोना वायरस के खिलाफ चीन की तुलना में बहुत अच्छे से लड़ने पर ताइवान का प्रभुत्व कहीं बढ़ने न लगे, इसलिए दबाव बनाकर चीन ने उसे विश्व स्वास्थ्य संगठन से बाहर निकलवा दिया। इसको लेकर चीन लंबे अरसे से दावा कर रहा था कि ताइवान कोई अलग संप्रभु देश नहीं बल्कि उसी का एक हिस्सा है। लेकिन, इस दावे के बावजूद बरसों से ताइवान संगठन में था। जब चीन व ताईवान के रिश्ते अच्छे थे, तब 2009 से 2016 के बीच ताईवान ऑब्ज़र्वर के तौर पर डब्ल्यूएचओ का हिस्सा रहा। अब अमेरिका व उसके समर्थक देश ताइवान को संगठन में शामिल किए जाने के पक्ष में आकर चीन के खिलाफ रणनीति तैयार कर रहे हैं। 

अब ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि ताइवान का भविष्य क्या होगा और भारत की भूमिका क्या होनी चाहिए? अमेरिका और उसके समर्थक भले ही ताइवान को बाहर करने के डब्ल्यूएचओ के कदम को गलत ठहरा रहे हों, लेकिन उनका असली मकसद डब्ल्यूएचओ और चीन पर वैश्विक दबाव बनाकर अपना उल्लू सीधा करना ज़्यादा है, ताइवान से हमदर्दी रखना कम। ऐसे में सीएनए की रिपोर्ट को आधार मानें तो लैटिन अमेरिका के आर्थिक रूप से कमजोर समझे जाने वाले अधिकतम 15 देश ताइवान के समर्थन में आ सकते हैं। बाकी कोई देश ताइवान की सीट के लिए चीन से सीधे दुश्मनी मोल नहीं लेगा। हालांकि यह सच बात है कि त्साई इंग-वेन के हाल में दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने से चीन की मुश्किलें बढ़ी हैं क्योंकि त्साई चीन की 'एक राष्ट्र' की परिकल्पना में ताइवान को देखने की हमेशा से विरोधी रही हैं और ताइवान के स्वतंत्र देश के दर्जे के लिए लड़ती रही हैं। त्साई की दोबारा जीत के पीछे चीन के खिलाफ डटकर मुकाबला बड़ी वजह रही है। 2016 में पहली बार त्साई के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही चीन ताइवान के खिलाफ दबाव बना रहा था। अब अगर ताइवान अमेरिका और ब्रिटेन जैसे बड़े देश को समर्थक के तौर पर चीन के खिलाफ जुटाने में सफल रहा तो यह चीन के लिए बड़ी मुश्किल होगी। 

जहां तक भारत की भूमिका का सवाल है तो पिछले कुछ हफ्तों में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान और न्यूज़ीलैंड ने अमेरिका के सुर में सुर मिलाते हुए कहा है कि विश्व स्वास्थ्य सभा में ताइवान को ऑब्ज़र्वर का दर्जा मिलना चाहिए। इस पर चीन का रुख ये था कि पश्चिमी देश कोरोना से लड़ने में अपनी नाकामी को छिपाने के लिए ताइवान पर राजनीति कर रहे हैं। अब इन गुटीय वैश्विक कूटनीति की जमीन पर भारत को अपने पुराने रूख पर ही कायम रहना चाहिए था। लेकिन मोदी सरकार ने अपनी नीति में बदलाव करते हुए दो ऐसे काम एक साथ किए जिससे चीन का अपरोक्ष तौर पर नाराज होना स्वाभाविक था। पहला... डब्ल्यूएचओ की जो बैठक अभी हाल ही में संपन्न हुई उसमें कोरोना महासंकट को लेकर अमेरिका जिस तरह से चीन पर आरोप लगा रहा है और जांच के लिए जिन 62 देशों ने मिलकर एक प्रस्ताव पारित करवाया उसमें भारत भी शामिल हो गया। दूसरा...त्साई इंग-वेन ने दो दिन पहले ताइवान के राष्ट्रपति पद की दोबारा शपथ ली। इस शपथ ग्रहण कार्यक्रम में भाजपा के दो सांसदों, मीनाक्षी लेखी और राहुल कस्वान ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हिस्सा लिया और वेन को बधाई दी। लेखी और कस्वान समेत दुनियाभर के 41 देशों के कुल 42 गणमान्य हस्तियों ने इस कार्यक्रम में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शिरकत की। इस बात को जानते हुए कि चीन ताइवान को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा नहीं देता है और उसे अपना ही एक हिस्सा बताता है।

अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मोदी सरकार ने ताइवान के प्रति अपनी नीति बदल दी है? सवाल के पीछे की सबसे बड़ी वजह यह है कि 2016 में जब त्साई ने पहली बार राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी तब मोदी सरकार ने न्योता मिलने के बावजूद अपने किसी सांसद को ताइवान नहीं भेजने का फैसला किया था। लेकिन इस बार के शपथ ग्रहण समारोह में लेखी और कस्वान के अलावा भारत-ताइपे एसोसिएशन के कार्यकारी महानिदेशक सोहंग सेन ने भी हिस्सा लिया। ताइपे में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। संयुक्त राष्ट्र के 194 सदस्य देशों में से 179 देशों का ताइवान के साथ राजनयिक संबंध हैं, लेकिन भारत अब तक इससे बच रहा था। चीन ने शपथ ग्रहण समारोह में भारतीय सांसदों की आभासी उपस्थिति पर तो कोई अलग से बयान नहीं दिया, लेकिन ताइवानी राष्ट्रपति को बधाई संदेश देने वाले विदेशी नेताओं की निंदा जरूर की है। लेकिन इस बीच चीन और नेपाल की सीमा पर जिस तरह की मुश्किलें खड़ी की जा रही हैं, आप दावे के साथ यह नहीं कह सकते कि इसमें चीन की भूमिका नहीं है।

Saturday, 16 May 2020

प्रवासी मजदूरों को रौंद रहा सत्ता का अहंकार

बेचता यूं ही नहीं है आदमी ईमान को,
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को।

सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिए,
गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरख़्वान को।
(अदम गोण्डवी)

कोरोना का काल, लॉकडाउन की मार और सत्ता का अहंकार जब अपने चरम पर हो तो प्रवासी मजदूरों के विस्थापन का सैलाब निश्चित रूप से पूरे समाज और देश को तहस-नहस कर देता है। अगर हम कोरोना को कुदरत का कहर मानें तो जाहिर तौर पर हमारा आपका इसके ऊपर वश नहीं, लेकिन लॉकडाउन की मार और सत्ता का अहंकार तो हम सबने खड़ा किया है। इसकी कीमत आज मजदूर वर्ग चुका रहा है, कल मध्यम वर्ग चुकाएगा और फिर परसों मुट्ठीभर अमीर वर्ग। तय मानिए बचेगा कोई नहीं।

कोरोना महासंकट के बीच एक और काली रात जो कुछ वक्त में गुजरने वाली थी लेकिन, इसे मजदूरों की बदकिस्मती कहें या काल की कुचाल, उनके नसीब में सुबह का सूरज देखना नहीं था क्योंकि शायद वो मजदूर थे और मजबूर भी। जिंदगी की अंगड़ाई, मौत की आहट को नहीं भांप सकी। काली रात ने चंद लम्हों में सब कुछ खत्म कर दिया। जी हां! हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में शनिवार तड़के 3:30 बजे हाईवे पर दो ट्रकों की टक्कर की जिसमें करीब 24 मजदूरों की मौत हो गई और कई दर्जन जख्मी हो गए। इन ट्रकों में सवार सभी मजदूर इसी देश के थे। मध्य प्रदेश के छतरपुर में भी एक सड़क हादसा हुआ जिसमें चार महिलाओं समेत 6 मजदूरों की मौत हो गई। इस तरह से बीते 8 दिनों में चार और बड़े हादसे हुए जिसमें 32 अन्य मजदूरों की मौत हो चुकी है। 8 मई को महाराष्ट्र में औरंगाबाद के पास रेलवे ट्रैक पर 16 प्रवासी मजदूरों की मालगाड़ी की चपेट में आने से वीभत्स मौत की घटना को कौन भुला सकता है। अब मैं आपको कुछ ऐसी तस्वीरों से रू-ब-रू कराना चाहूंगा जो काफी वायरल हुए हैं। यहां इसका जिक्र इसलिए जरूरी है ताकि समाज, देश और सत्ता को समझ में आ सके कि मजदूर होने की उसे कितनी कीमत चुकानी पड़ती है। 



कोरोना संकट में लॉकडाउन के बीच एक बेबस और मजलूम पिता की मजबूरी कैसे ईमान को डिगा देती है...कैसे उसे कसूरवार बना देती है, इसे बरेली के मोहम्मद इकबाल की इस चिट्ठी से महसूस किया जा सकता है। इकबाल का कसूर सिर्फ इतना है कि उसने दिव्यांग बेटे को 1150 किमी दूर ले जाने के लिए साइकिल चुरा ली। लेकिन दूसरी तरफ साइकिल मालिक के नाम चिट्ठी भी छोड़ी, जिसमें लिखा कि मैं आपका कसूरवार हूं, लेकिन मजदूर हूं और मजबूर भी। मैं आपकी साइकिल लेकर जा रहा हूं। मुझे माफ कर देना...



इस तस्वीर में पूर्णिया जिले की मुख्तारा खातून की पीड़ा भी लॉकडाउन के कारण मजदूरी पर आए संकट की कहानी है। एक कामगार की पत्नी की बेबसी है और एक मां की दारुण कथा भी। पर परेशानियां अभी शुरू हुई थी, मुख्तारा के सामने पति नूरजामी बेहोश पड़ा था। कपड़े से ढंका हुआ। गुड़गांव से जब वह परिवार समेत अपने गांव के लिए निकला तो लखनऊ के पास ट्रक ने नूरजामी को टक्कर मार दी, जिससे उसका पैर टूट गया। 


ऐसी तस्वीरों को देखना मन-मस्तिष्क में दर्द पैदा करता है, विचलित करता है, लेकिन इस वक्त का सच भी यही है। विस्थापन का दर्द समेटे जितने भी मजदूर एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हैं, उनके बच्चों के चेहरे मुरझाए और आंखें सूखे हुए दिखेंगे। आखिर दर्द बयां भी वह किससे करें। यह तस्वीर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की है। यह बच्चा पत्थर पर बैठा था। मां की गोद की आदत तो जैसे छूट सी गई। अब तो पत्थर पर भी नींद आ जाती है।  

न जाने ऐसी कितनी तस्वीरें अलग-अलग जगहों से निकलकर हमारे और आपके बीच में आ रही हैं। क्या किसी को गुस्सा नहीं आता है? मैं आप सबसे पूछना चाहता हूं कि इसे बेदिल सत्ता और समाज की साजिश नहीं कहें तो और क्या कहें? यहां एक बार फिर अदम गोंडवी की लिखी वो कविता याद आ रही है जो सत्ता और कुंठित मानसिकता वाले समाज पर करारा प्रहार है...

आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
अपने शाहे-वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे

तालिबे शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे
आए दिन अख़बार में प्रतिभूति घोटाला रहे

एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छह चमचे रहें, माइक रहे और माला रहे

लेकिन अदम गोंडवी की इन पंक्कियों को भी हुक्मरानों को नहीं भूलना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है...

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है,
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है।

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी,
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है।

बहरहाल, कोरोना महासंकट और लॉकडाउन के बीच प्रवासी मजदूरों के विस्थापन से देश में बड़ा संकट पैदा होने वाला है। उद्योग धंधे ठप्प पड़े हैं और जब इन्हें शुरू किया जाएगा तब इन्हें मजदूरों के अभाव का सामना करना पड़ेगा। मजदूरों को घर से वापस लाना बेहद मुश्किल काम होगा क्योंकि इन दो महीनों में जिस तरह की मुश्किलों से वो गुजरे हैं, उन्हें काम पर वापस लाना आसान नहीं होगा। इसका असर उत्पादन पर पड़ेगा। कहने का मतलब यह कि मांग और आपूर्ति का जो मूलभूत सिद्धांत है उसे फिर से व्यवहारिक तौर पर अर्थव्यवस्था की पटरी पर लाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी। मोदी सरकार 20 लाख करोड़ का जो विशेष आर्थिक पैकेज लेकर आई है उससे किसका भला हो रहा है या आने वाले वक्त में किसका भला होगा, यह कहना बहुत मुश्किल है। लेकिन इतना तय मानिए कि यह मांग को किसी भी रूप में नहीं बढ़ाएगा। और जब किसी भी प्रोडक्ट की मांग खड़ी नहीं होती है तो उस प्रोडक्ट के उत्पादन का कोई मतलब नहीं। 

सरकार को सबसे पहले इन प्रवासी मजदूरों और मध्यम वर्ग की मुश्किलों को दूर करने की दिशा में कदम उठाने चाहिए थे जो नहीं हो पाया। प्रवासी मजदूरों की बात करें तो उसे राशन, मकान का किराया और घर भेजने के लिए थोड़ी नकदी की व्यवस्था कर दी जाती तो उन्हें पलायन का दर्द नहीं सहना पड़ता और आने वाले वक्त में उद्योग धंधों को शुरू करने में भी मुश्किल नहीं होती। मध्यम वर्ग की बात करें तो उनकी नौकरियां जा रही हैं। सेलरी कटौती हो रही है। ऐसे में सरकार की तरफ से उन्हें तत्काल राहत के तौर पर ईएमआई से छूट, बच्चों की स्कूल फीस में रियायत देने का पब्लिक स्कूलों को निर्देश दिया जाना चाहिए था। लेकिन इस मोर्चे पर भी सरकार ने कुछ नहीं किया। सवाल है कि सारी समस्याओं का समाधान बैंक से लोन लेना तो हो नहीं सकता है। कहने का मतलब यह कि सरकार अपनी जेब से लोगों को राहत देने के लिए कुछ भी देने को तैयार नहीं है। जो कुछ दे रही है वो किसी न किसी तरीके से सरकार की पूर्व में घोषित सरकारी योजनाओं का ही हिस्सा है।

Friday, 1 May 2020

कोरोना क्रांति : खतरे में मजदूर और उसका 8 घंटा

आज एक मई है जिसे पूरी दुनिया 'अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस' के रूप में याद करती है। यह वही तारीख है जब 1886 में एक नारा गढ़ा गया था- 'आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे अपनी मर्जी का!' और इसी नारे के साथ अमेरिका के 13 हजार से अधिक व्यापारिक प्रतिष्ठानों में काम करने वाले करीब तीन लाख मजदूर अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए सड़कों पर उतर आए थे। कहते हैं कि 'आठ घंटे का आंदोलन' इन मजदूरों के पांच दशक के संघर्षों की गाथा का चरम था। कारवां आगे बढ़ता गया। 4 मई को शिकागो के समूचे औद्योगिक और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के लाखों मजदूर काम रोक कर शाम को हे मार्केट स्क्वायर पर एकत्र हुए। जैसा कि आमतौर पर होता है, मज़दूरों की इस अभूतपूर्व एकजुटता को देखकर पूंजीपतियों के बीच हड़कंप मच गया। सत्ता भी चौंक गई। आनन-फानन में 176 पुलिसकर्मियों का एक दल भेजा गया। लेकिन मजदूरों का शांतिपूर्ण आंदोलन चलता रहा। मजदूरी के प्रिय नेता ऑगस्ट स्पाइस भाषण समाप्त कर चुके थे। इसी बीच पुलिस की दखलंदाजी शुरू होती है। अचानक एक बम फूटता है। फिर क्या था, पुलिस की गोलियों की अंधाधुंध बौछारें शुरू हो गईं। आठ पुलिस समेत सैकड़ों मजदूर उस रक्तरंजित हमले में मारे एग। सैकड़ों ज़ख़्मी हो गए। फिर सत्ता के दमन का अगला पाखंड शुरू हुआ। आठ मज़दूर नेताओं के जो 'आठ घंटे आंदोलन' के लोकप्रिय नेता थे ऊनके ऊपर मुकदमे का खेल शुरू हो गया। अल्बर्ट पार्सन्स, ऑगस्ट स्पाइस, सैम्युअल फ़िल्डेन, ऑस्कर निब्बे, माइकल श्वाब, जॉर्ज एंगेल, एडोल्फ फ़िशर और लुई लिंग को गिरफ्तार कर लिया गया। उनपर कत्ल का मुकदमा शुरू हुआ। उसे जज और जूरी की अदालत में जिसके बारे में खबरें उस समय के अधिकांश निष्पक्ष पत्रकारों द्वारा की गई रिपोर्टिंग की वजह से अखबारों की सुर्खियां बनी कि, 'जज पक्षपाती है और जूरी का गठन बड़े व्यवसायिक घरानों से की गई है जिससे यह पूरा का पूरा न्यायिक कार्य महज दिखावा और मज़ाक़ है।' फिर वही हुआ जो निरंकुश सत्ता में होता है- अभियुक्तों के भाषणों, पत्र-पत्रिकाओं, अख़बारों में प्रकाशित उनके लेख, बयान आदि को आधार बनाकर अदालत और जूरी का फैसला आया जिसमें अभियुक्तों में से पांच क्रांतिकारी नेताओं पार्सन्स, एंगेल, स्पाइस, फ़िशर और लुई लिंग को फांसी की सज़ा सुनाई गई और शेष तीन श्वाब, निब्बे और फ़िल्डेन को 15-15 साल के जेल की सजा। उसके बाद जुलाई 1889 में सोशलिस्ट और लेबर पार्टी के 20 देशों के प्रतिनिधियों ने पेरिस में एक बैठक की। इस दौरान सेकेण्ड इंटरनेशनल का गठन किया गया जो 1889 से 1916 तक अस्तित्व में रही। 1889 में सेकेण्ड इंटरनेशनल की इसी पेरिस बैठक में रेमंड लाविग्ने ने एक प्रस्ताव के माध्यम से 'हे मार्केट शहीदों' की स्मृति में हर वर्ष एक दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया गया जिसे बाद सेकेण्ड इंटरनेशनल कांग्रेस ने 1891 में आधिकारिक रूप से 1 मई को मजदूर दिवस की मान्यता दे दी। भारत की बात करें तो यहां 1 मई 1923 को पहली बार मजदूर दिवस मनाया गया था। सिंगारवेलु चेट्टियार देश के कम्युनिस्टों में से एक तथा प्रभावशाली ट्रेड यूनियन और मज़दूर तहरीक के नेता थे। उन्होंने अप्रैल 1923 में भारत में मई दिवस (मजदूर दिवस) मनाने का सुझाव दिया था।

इस ऐतिहासिक घटनाक्रम का उल्लेख यहां हमने दो वजहों से किया है। पहला यह कि बहुत से लोगों खासकर आज की युवा पीढ़ी जो सोशल मीडिया में वायरल तथ्य को ही इतिहास मानने की भूल कर बैठता है, उन्हें पता होना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस का इतिहास कितना रक्तरंजित है। मजदूर दिवस या श्रमिक दिवस कोई ऐसे ही नहीं मनाता है। इस दिवस के पीछे मजदूरों ने बड़ी कुर्बानियां दी हैं। दूसरा अहम तथ्य जिसको लेकर हम यहां विस्तार से बात करना चाहते हैं वह है 'आठ घंटे का आंदोलन'। 1886 में मजदूर आंदोलन की जो बुनियाद रखी गई थी उसके मूल में असली बात यही थी- 'आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे हमारी मर्जी का!' हालांकि इन मजदूरों की और भी कई मांगें थी, लेकिन सबसे प्रमुख मांग '8 घंटे का कार्य दिवस' को वैधानिक रूप से मान्यता दिलाने की थी। दुर्भाग्य से भारत समेत पूरी दुनिया में मजदूरों के काम करने के घंटे को लेकर बहस फिर से छिड़ने लगी हैं क्योंकि हालात एक बार फिर से 1886 के पहले जैसी होती दिख रही है। कोरोना संकट के बीच मजदूरों की जिंदगी तो खतरे में पड़ी ही है, साथ ही उसके 8 घंटे के कार्यदिवस पर भी सरकार और कॉरपोरेट का हथौड़ा चलने वाला है। फैक्ट्रियों से लेकर बड़े-बड़े कॉरपोरेट दफ्तरों तक में 8 घंटे के कार्यदिवस को आईना दिखाया जा रहा है और कहा जाता है कि दफ्तर में आने का समय होता है, जाने का नहीं। कुछ बड़े कॉरपोरेट ऑफिस में '9 घंटे का कार्यदिवस' को कानूनी जामा भी पहना दिया गया है लेकिन यहां भी यह कार्यदिवस कहीं-कहीं 12 घंटे तक हो जाता है जिसे आपस की रजामंदी के आधार पर चलाया जा रहा है। 12 घंटे तक काम करने की परिस्थिति तमाम मजदूर चाहे वह शारीरिक श्रम से जुड़ा हो या फिर मानसिक श्रम से, उसे शारीरिक, आर्थिक, पारिवारिक और सामाजिक तौर पर लगातार तोड़ रहा है। उसके अस्तित्व को नष्ट कर रहा है। लेकिन वह विवश है क्योंकि उसने अपनी एकजुटता का जो ताना-बाना था उसे खुद ही छिन्न-भिन्न कर दिया है। वह कॉर्ल मार्क्स का वह नारा भुला दिया- दुनिया के मजदूरों एक हो, तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं और पाने के लिए पूरी दुनिया।

आज जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी की वजह से लॉकडाउन और भारत कंप्लीट लॉकडाउन की परिस्थिति में जीने को अभिशप्त है, दुनियाभर की मजदूर विरोधी सोच रखने वाली सरकारें यहां तक सोचने लगी हैं कि '8 घंटा कार्यदिवस' का जो कानून 1886 से चला आ रहा है उसे बदलकर उसमें राष्ट्रवाद का घी और कानून का तड़का डालकर 12 घंटे कर दिया जाए। भारत में भी इस तरह की बात पर मंथन चल रहा है और इसको लेकर कॉरपोरेट का सरकार पर भारी दबाव है। मजदूर संगठनों को इस बारे में सोचना चाहिए और समय रहते इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ना चाहिए कि इस तरह की कोई भी पहल देश के लिए घातक होगा। वैसे ही देश में जब से आर्थिक उदारीकरण की लहर चली, भारतीय अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे गिरती गई और कोरोना के दौर में तो ठप्प ही हो गई है। उसपर अगर मजदूरों के खिलाफ काम के घंटे को लेकर विरोधी नीति सरकार के स्तर पर बनी तो फिर बहुत मुश्किल हो जाएगी। क्योंकि कोरोना की वजह से सरकार ने जिस तरह से नोटबंदी की तर्ज पर सिर्फ चार घंटे की मोहलत के साथ कंप्लीट लॉकडाउन का ऐलान कर दिया उसमें अगर किसी एक वर्ग की हालत सबसे खराब हुई है तो वह है कमजोर तबके का प्रवासी मजदूर। मजदूरों की एक ऐसी श्रेणी जिसके घर में अगले दिन का राशन नहीं होता। दिहाड़ी मजदूरी के बल पर गुजारा करने वाले इन प्रवासी मजदूरों की सुध लेने वाला कोई नहीं होता। उसके पास न तो राशन कार्ड होता है, न ही वह सरकार की किसी गरीब कल्याण योजना का हिस्सा होता है। शहर की पैमाइश में किसी की नजर पड़ गई तो ठीक वरना इनकी और इनके परिवार की जिंदगी भगवान भरोसे। बीच-बीच में ट्रेन और बस के चलने की अफवाह उड़ती है तो फिजिकल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाते हुए ये प्रवासी मजदूर इस उम्मीद में सड़कों पर निकल आते हैं कि किसी तरह से वो अपने गांव पहुंच जाएं। लेकिन वहां उन्हें बस या ट्रेन नहीं बल्कि मिलती हैं निरंकुश सत्ताधारी पुलिस की लाठियां। ऐसी सरकार से क्या हम इस तरह की उम्मीद कर सकते हैं कि आने वाले वक्त में बेबश और लाचार किस्म के मजदूरों के लिए कोई ऐसी नीति बने ताकि महा आपदा और आपात परिस्थिति में इनके जीने का आधार बने। क्या असंगठित क्षेत्र का जो सेक्टर है इसे पूरी तरह से खत्म करने के लिए दुनिया भर सकी सरकारें किसी योजना को अमली जामा पहनाने पर विचार करेगी? क्योंकि यह संकट विश्वव्यापी है। भारत का संकट थोड़ा ज्यादा है। उम्मीद तो हम यही करेंगे कि कोरोना संकट को हम कोरोना क्रांति के रूप में स्वीकार करें और आज मजदूर दिवस के प्रण लें कि आने वाले वक्त में सरकार की नीति मजदूर हितैषी हो और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए एक ऐसा रजिस्ट्रर बने जिसमें गलती से भी कोई वंचित न रहने पाए।

Saturday, 25 April 2020

कोरोना क्रांति : बिल गेट्स की ये चार बातें बहुत कुछ कह रही हैं

How to fight future pandemics हेडलाइंस से माइक्रोसॉफ्ट के सह संस्थापक बिल गेट्स ने द इकोनॉमिस्ट में जो आर्टिकल लिखा है उसमें बहुत सारी बातें कही गईं हैं लेकिन उनमें से चार अहम बातों का जिक्र करना यहां बेहद जरूरी है। ये बातें आने वाले वक्त यानी आफ्टर कोरोना दुनिया कैसी होगी को लेकर जाने-अनजाने में कई तरह के संकेत भी देता है और कुछ सवाल भी खड़े करता है। 

पहली बात बिल गेट्स ने कोरोना वैक्सीन को लेकर कही है। इसमें गेट्स का कहना है- जब इतिहासकार कोविड-19 महामारी पर किताब लिखेंगे तो जो हम अब तक जीते रहे हैं, वह हिस्सा एक तिहाई के आसपास ही होगा। किताब की कहानी का बड़ा हिस्सा उस पर होगा, जो आगे होना है। यूरोप के अधिकांश हिस्से, पूर्वी एशिया और उत्तरी अमेरिका में इस महामारी का चरम संभवत: इस महीने के आखिर तक बीत जाएगा। कई लोगों को उम्मीद है कि कुछ हफ्तों में चीजें वैसी ही हो जाएंगी, जैसी बीते दिसंबर में थीं। लेकिन दुर्भाग्य से, ऐसा नहीं होगा। बिल गेट्स कहते हैं- I believe that humanity will beat this pandemic, but only when most of the population is vaccinated. Until then, life will not return to normal. मुझे भरोसा है कि मानवता इस महामारी को हरा देगी, लेकिन यह तभी होगा जब अधिकतर जनसंख्या को वैक्सीन लगा दी जाएगी। तब तक जिंदगी सामान्य ढर्रे पर नहीं लौट सकेगी।

दूसरी अहम बात गेट्स ने कोरोना महामारी के बाद आने वाले वक्त में जो महामारी आएगी उसके बारे में की है। बिल गेट्स का कहना है कि 2021 के मध्य यानी जून 2021 के बाद दुनियाभर में उपलब्ध संस्थानों में वैक्सीन बन रही होंगी। अगर ऐसा होता है तो यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी जब मानव पहली बार इतनी तेजी से एक नई बीमारी को पहचानने और फिर उसके खिलाफ प्रतिरक्षण का काम करेगा। वैक्सीन पर प्रगति के अलावा इस महामारी की जो बड़ी मेडिकल उपलब्धियां होंगी वह जांच के क्षेत्र में होगी। अगली बार जब कोई नया वायरस उभरेगा तो लोग संभवत: उसकी घर पर वैसे ही जांच कर सकेंगे, जैसे आज प्रेगनेंसी टेस्ट करते हैं। बस उन्हें अपनी नाक के भीतर से स्वैब लेना होगा।

तीसरी अहम बात जो बिल गेट्स ने अपने इस आर्टिकल में की है वह संयुक्त राष्ट्र जैसा एक नया संगठन बनाने को लेकर है। गेट्स का कहना है कि कोविड-19 के बाद दुनियाभर के नेताओं को अगली महामारी रोकने के लिए यूएन जैसा संस्थान बनाना चाहिए। यह राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक संगठनों का मिश्रण होना चाहिए। आज के युद्ध अभ्यासों की तरह ये संगठन नियमित तौर पर ‘जीवाणु अभ्यास’ भी करेंगे। इससे जब कभी किसी चमगादड़ या पक्षी से मनुष्यों पर कोई नया वायरस कूदेगा तो हम तैयार रहेंगे। ये संगठन हमें इस बात के लिए भी तैयार करेंगे कि अगर कोई अपनी लैब में किसी संक्रामक बीमारी को तैयार करके हथियार की तरह उसका इस्तेमाल करता है, तो उससे कैसे निपटना है।

चौथी और अंतिम महत्वपूर्ण बात में बिल गेट्स यह भी कहते हैं कि कोरोना महामारी ने हमें दिखा दिया है कि वायरस सीमा कानूनों का पालन नहीं करते हैं और हम सब माइक्रोस्कोपिक जीवाणुओं के एक नेटवर्क से आपस में जुड़े हुए हैं। इतिहास हमेशा एक तय ढर्रे पर नहीं चलता। लोग तय करते हैं कि कौन सी दिशा लेनी है और वे गलत मोड़ भी ले सकते हैं। गेट्स का दावा है कि 2021 के बाद के साल बहुत कुछ 1945 के बाद के सालों जैसे ही होंगे। लेकिन आज की सबसे ज्यादा समानता 10 नवंबर 1942 से हो सकती है। जब ब्रिटेन ने युद्ध में पहली जमीनी लड़ाई जीती थी और विंस्टन चर्चिल ने एक भाषण में घोषणा की- This is not the end. It is not even the beginning of the end. But it is, perhaps, the end of the beginning. यह अंत नहीं है। यह अंत की शुरुआत भी नहीं है। लेकिन यह शायद शुरुआत का अंत है।

बिल गेट्स का यह आर्टिकल 23 अप्रैल 2020 को द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित हुआ है। इससे पहले भी गेट्स ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर कोरोना वायरस को लेकर कई बातें कही हैं जिसके बारे में हम अगले ब्लॉग में बात करेंगे कि काफी हद तक वो घटित भी हुई हैं। लेकिन फिलहाल हम यह सवाल आप प्रबुद्ध पाठकों पर छोड़ते हैं कि कोरोना महामारी के बाद जो वक्त आने वाला है वह कैसा होगा, दुनिया कैसी होगी, इस सबका आंकलन और वह भी सत्य के बेहद करीब, बिल गेट्स कैसे बता पा रहे हैं?

Saturday, 18 April 2020

मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आप अपने होने का वजूद खो चुके हैं

मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! कोरोना महामारी के वैश्विक महासंकट और देश के अंदर 21 दिन के कंप्लीट लॉकडाउन के बाद एक बार फिर जब 19 दिन की इसकी मियाद बढ़ा दी गई है के बीच हम भारत के लोग आपसे कहना चाहते हैं कि अब आप अपने होने का वजूद खो चुके हैं। हमें अपनी सरकार की नीति और नीयत दोनों पर संदेह होने लगा है और चूंकि आप ही हमारी सरकार के मुखिया हैं, लिहाजा हम भारत के 130 करोड़ लोगों का दर्द आपको ही समझना था। अब इसे देशवासियों की नियति कहें या जाने-अनजाने में प्रधानसेवक होने के नाते आपके द्वारा उठाए गए गलत कदमों का दंश, दोनों ही परिस्थितियों में इसका खामियाजा वही जनता भुगत रही है जिसे आप देश और दुनिया में बार-बार अपनी ताकत बताते रहे हैं। इसीलिए एक लंबे कालखंड के बाद हम भारत के लोग आपको बताना चाहते हैं कि आज आपकी ताकत उस मुश्किल दौर में पहुंच गई है जहां से उसे उबारना कठिन ही नहीं असंभव भी है, क्योंकि आप अपने होने का वजूद जो खो चुके हैं।

आज जब हम लॉकडाउन-2.0 की परिस्थिति में जीने को अभिशप्त हैं, सरकार की नीति और नीयत पर संदेह करने के वजहों की फेहरिस्त तो बहुत लंबी है, लेकिन हम यहां सिर्फ कोरोना महासंकट से निपटने के लिए लॉकडाउन की परिस्थिति की ही बात करेंगे कि इस दौर में सरकार की जिम्मेदारी व जवाबदेही क्या होनी चाहिए थी और क्या वह अपनी इस जिम्मेदारी व जवाबदेही के धर्म को निभाने में जनता की उम्मीदों पर खरी उतरी? हालांकि हम भारत के लोग आज जिन परिस्थितियों में जीने को अभिशप्त हैं उसके पीछे सरकार द्वारा आर्थिक क्रांति का हवाला देते हुए नोटबंदी और जीएसटी लागू करने का फैसला भी उतना ही जिम्मेदार है जितना वैश्विक महामारी कोरोना महासंकट के बीच कंप्लीट लॉकडाउन का फैसला और वो भी नोटबंदी की तर्ज पर सिर्फ चार घंटे की मोहलत के साथ। यहां हम सिर्फ 2020 की बात करते हैं जब 30 जनवरी को देश के सबसे समृद्ध प्रदेश केरल में कोरोना से संक्रमित पहले मरीज की एंट्री हुई थी। मीडिया में जो रिपोर्ट प्रकाशित हुई है, उसके मुताबिक यह मरीज चीन के उसी वुहान प्रांत से आया था जहां सबसे पहले (नवंबर-दिसंबर 2019) कोरोना ने दस्तक दी थी और फिर इतनी बड़ी तबाही के रूप में इसने विस्तार लिया जिसकी जद में अमेरिका, इटली, स्पेन, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस समेत दुनियाभर के 200 से अधिक देश इसमें समा गए। 30 जनवरी से पहले जापान और अमेरिका में कोरोना का संक्रमण फैल चुका था। आगे बढ़ने से पहले यहां कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा सांसद राहुल गांधी के दो अहम ट्वीट का जिक्र करना जरूरी होगा। 31 जनवरी को पहले ट्वीट में राहुल गांधी ने कोरोना संकट का जिक्र करते हुए लिखा था- In China, the Coronavirus has killed hundreds of people. My thoughts are with the families of the victims & the millions who have been forced into quarantine to prevent the spread of the virus. May they find the courage & strength to persevere through this terrible ordeal. उसके बाद 12 फरवरी को दूसरे ट्वीट में कोरोना संकट से जुड़े एक न्यूज लिंक को शेयर करते हुए राहुल गांधी ने लिखा था- The Corona Virus is an extremely serious threat to our people and our economy. My sense is the government is not taking this threat seriously. Timely action is critical. पूरा देश जानता है, राहुल गांधी को पूरी की पूरी तंबूपरस्त मीडिया, अफवाहबाज मीडिया और सोशल मीडिया ने पप्पू बनाकर एक तरह से विपक्ष की आवाज को ही खत्म कर दिया है ताकि सरकार से न कोई सवाल कर पाए और न ही उसे उसकी जिम्मेदारी व जवाबदेही का अहसास करा सके। लेकिन हम भारत के लोग जो आपकी भी ताकत हैं, इस बात को समझते हैं और इस बात का जिक्र आपसे करना चाहते हैं कि एक दूरदर्शी पप्पू (राहुल गांधी) की बात को ही सरकार अगर समय रहते समझ लेती तो शायद देश की अर्थव्यवस्था का पहिया रोकने की नौबत नहीं आती। कंप्लीट लॉकडाउन की परिस्थिति में हम नहीं जी रहे होते।

मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! 
कोरोना महासंकट के बीच राष्ट्र के नाम चौथे संबोधन में आपने बहुत सारे दावे किए और देशवासियों को सप्तपदी के तहत सात वचन निभाने की शपथ भी दिलाई। लेकिन कभी अकेले में अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने की कोशिश जरूर करियेगा कि आपने जो भी दावे किए वह कितना सच है और फिर जो वचन निभाने के लिए अपनी जनता से हामी भरवाई वो काम किसका है- आपका या फिर हम भारत के लोगों का? हम भारत के लोग आज आपसे पूछना चाहते हैं, कुछ सवाल करना चाहते हैं कोरोना को लेकर, लॉकडाउन को लेकर, लॉकडाउन-2.0 की परिस्थिति को लेकर।

1. आपने इस बात का दावा किया कि कोरोना की भयावहता का अंदाजा लगाते हुए हमने काफी पहले इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया था जिसकी वजह से दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले जनहानि काफी कम हुई है। हम भारत के लोग आपसे जानना चाहते हैं कि भारत में कोरोना संक्रमित पहले केस की एंट्री और राहुल गांधी के दोनों ट्वीट से पहले कोरोना से निपटने के लिए सरकार ने क्या तैयारी की थी?

2. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! इस तथ्य को आप भी मानेंगे कि कोरोना महामारी हमारे देश में बाहर के देशों से आया। यहां तक कि जिन जमातियों पर संक्रमण फैलाने का आरोप मढ़कर देश की सोशल मीडिया और तंबूपरस्त मीडिया द्वारा समाज में लगातार नफरत फैलाई जा रही है, वो भी चीन समेत अन्य कई देशों से मार्च के शुरूआती हफ्तों में भारत में एंट्री ली थी। कनिका कपूर जैसे ताकतवर हजारों लोगों की एंट्री भी देश के अंदर 30 जनवरी के बाद ही हुई थी। अगर आपकी तैयारी चाक-चौबंद थी तो हजारों जमाती और कनिका कपूर जैसी हस्तियों को देश के अंदर कोरोना फैलाने की छूट किसने दी? आखिर किसकी शह पर जमाती मरकज में सालाना जलसा करते रहे और कनिका कपूर जैसी दिग्गजों की पार्टी होती रही जिसमें सत्ता से जुड़े सैकड़ों लोगों का जमावड़ा लगा?

3. देश में कोरोना संकट लगातार गहरा रहा था और आप अमेरिकी भगवान डोनाल्ड ट्रम्प के स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए खड़े थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ से चेतावनियां जारी होने के बावजूद ट्रम्‍प के स्‍वागत में गुजरात में हज़ारों लोगों को जुटाया गया। तब तक अमेरिका में कोरोना फैलने की खबर हमें मिल चुकी थी। ट्रम्प ने अपने देश को तो डुबोया ही, हमें भी अपनी चपेट में ले लिया। आज इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? पूरी सरकार गुजरात से लेकर नई दिल्ली के लुटियन जोन तक ट्रम्प के स्वागत में जुटी थी और तभी राजधानी दिल्ली सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था। हमारे हिन्दू और मुसलमान भाईयों का कत्ल हो रहा था। घर जलाए जा रहे थे, दुकानें जलाई जा रही थी। लेकिन आपने उस वक्त भी खामोशी की चादर ओढ़े रखी। आखिर क्यों? कोरोना अपना खौफनाक जाल बिछा रहा था और देश के सैकड़ों रहनुमा देश की संसद में एनपीआर, एनआरसी, शाहीनबाग और सांप्रदायिक दंगे को लेकर तू-तू मैं-मैं कर रहे थे। देश में कोरोना फैल रहा था और सत्ताधारी पार्टी मध्यप्रदेश में तख्तापलट करने में जुटी थी। आपने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का ऐलान किया था और एक दिन बाद शिवराज सरकार शपथ ले रही थी जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग की कोई परवाह नहीं की गई। अगर आपने समय रहते सतर्कता बरती थी तो ये सब किसके इशारे पर होता रहा?

4. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! अगर आपकी तैयारी चाक-चौबंद थी तो हम भारत के लोग आपसे जानना चाहते हैं कि देश में 1 मार्च को कोरोना के 3 केस थे, बालकनी से ताली व थाली बजाने के दिन 22 मार्च को 396 केस और 25 मार्च को जिस दिन कंप्लीट लॉकडाउन-1 शुरू हुआ, 606 संक्रमित मरीज देश में कहां से आए? आज जब हम कंप्लीट लॉकडाउन के एक्सटेंशन फेज में हैं, कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 13 हजार के पार हो चुकी है। देश के 27 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों के 388 जिलों में फैले कोरोना संक्रमण से मौत का आंकड़ा 500 के पार कैसे पहुंच गया? अगर आपको याद हो तो 27 फरवरी 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गाइडलाइन जारी करते हुए कहा था- दुनियाभर में पीपीई किट का भंडारण पर्याप्त नहीं है और लगता है कि जल्द ही गाउन और गोगल्स (चश्में) की आपूर्ति भी कम पड़ जाएगी। गलत जानकारी और भयाक्रांत लोगों में खरीददारी की होड़ के साथ ही कोविड-19 के बढ़ते मामलों से दुनिया में पीपीई की उपलब्धता कम हो जाएगी। डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइन में बताया गया था- पीपीई किट (पर्सनल प्रोटेक्ट‍िव एक्व‍िपमेंट किट) का मतलब है : गाउन, बूट, कैप, एन 95 मास्क, ग्लब्स और गॉगल्स। इसके बावजूद भारत सरकार ने घरेलू पीपीई किट के निर्यात पर रोक लगाने में 19 मार्च तक का समय लगा दिया। देश इस मुद्दे पर आपका स्पष्टीकरण चाहता है क्योंकि आज हम चीन से पीपीई किट का आयात कर रहे हैं जिससे संक्रमण का खतरा और गहराने का अंदेशा है।

5. कोरोना वॉरियर्स के सम्मान और उनकी हौसलाअफजाई के लिए आपने देशवासियों से बालकनी में खड़े होकर ताली-थाली बजाने और घर की बत्ती बुझाकर दीया या टॉर्च जलाने के लिए कहा था। एकजुटता का शक्ति प्रदर्शन कर हम भारत के लोगों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और तब आपका सीना भी गर्व से फूल गया था। लेकिन उसके बाद जो कुछ हुआ उसकी कल्पना शायद आपने नहीं की होगी। हैल्थ सेक्टर, लॉ एंड आर्डर और मीडिया से जुड़े कोरोना वॉरियर्स के साथ क्या बर्ताव लोगों ने किया इस बारे में आपने अपनी दूरदर्शिता का इस्तेमाल नहीं किया। सोशल डिस्टेंसिंग की आड़ में पूरे देश में सामाजिक विभाजन होने लगा और समाज इन कोरोना वॉरियर्स से खुद को अलग करने लगा। शायद आप भी सोशल डिस्टेंसिंग और फिजिकल डिस्टेंसिंग के फर्क को नहीं समझ पाए। दूसरी बात, जब हैल्थ सेक्टर से जुड़े लोगों ने पीपीई किट की कमी से आपको, सरकारी महकमा को अवगत कराने की कोशिश की, वॉर विद्आउट वीपन्स की बात की तो उन्हें सरकार के लोगों ने ही प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। आखिर इस तरह के हालात और अव्यवस्था से निपटने की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या आप कहने की स्थिति में हैं कि यह सब सरकार की जवाबदेही में नहीं आता है।

6. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आपने अपने संबोधन में गरीबों और मजदूरों को अपना 'परिवार' बताया, लेकिन कितने गरीबों और मजदूरों तक आपने अपने भरोसे की पहुंच बनाई? पहली बार लॉकडाउन से पहले अगर आप गरीब मजदूरों को इस बात का भरोसा दिला पाते कि सरकार आपके द्वार होगी तो शायद देश के अलग-अलग महानगरों व शहरों में रह रहे लाखों मजदूरों का सैलाब सड़कों पर नहीं उमड़ता। हजारों की संख्या में ये मजदूर अपने गांव की तरफ पैदल चलकर पलायन की राह नहीं अपनाते। इन्‍हीं गरीबों के बीच अल्‍पसंख्‍यकों की भी भारी आबादी इस देश में है। इस दौरान कुछ तथाकथित दक्षिणपंथी संगठनों ने मिलकर जिस तरह के हमले इनपर किए हैं वह शर्मनाक है। सपाट भाषा में कहें तो देश की कुछ फासीवादी ताकतें कोरोना संकट की आड़ में ग़रीब अल्पसंख्यक आबादी को निशाना बनाने का कोई मौका नहीं चूक रही हैं। यहां तक कि तंबूपरस्त मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक जनभावनाओं को भड़काने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं और आपकी सरपरस्ती में चल रही सरकार उस बेलगाम तंबूपरस्त मीडिया, सोशल मीडिया और फासीवादी ताकतों को खुली छूट दे रखी है। ग्राउंड जीरो से जो रिपोर्ट्स आ रही हैं उसमें ये भी देखा जा रहा है कि सरकारी राशन की पहुंच सत्ताधारी पार्टी अपने कोर वोट बैंक तक ही सीमित रख रही हैं। कोरोना की टेस्टिंग और टेस्ट किट के मामले में भी पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है। आपने बुजुर्गों का विशेष ख्याल रखने की बात भी कही लेकिन उन बुजुर्गों का ख्याल कौन रखेगा जिनकी कीमोथैरेपी होती है, उन बुजुर्गों का ख्याल कौन रखेगा जिनका साप्ताहिक डायलिसिसि होता है, जो किडनी के मरीज हैं, दिल के मरीज हैं, डायबिटिक हैं। इन बुजुर्गों को अस्पताल में गंभीर बीमारियों के उपचार की सुविधा नहीं मिल पा रही है। आखिर इन सब हालातों की जिम्मेदारी कौन लेगा?

7. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आपका कहना है, आर्थिक संकट कोरोना की वजह से पैदा हुआ है और इससे बचना नामुमकिन था। यह भी सच नहीं है। भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में 2019 के तीसरे क्‍वार्टर से ही खतरनाक संकट पैदा हो चुका था जो नोटबंदी और जीएसटी की वजह से पहले से ही धीरे-धीरे इस स्तर तक पहुंचा था। कोरोना का पहला केस आने से पहले ही ऑटोमोबाइल सेक्‍टर, टेक्‍सटाइल सेक्‍टर, रियल एस्टेट में मंदी साफतौर पर देखी जा सकती थी। सारी मैन्‍युफैक्‍चरिंग गतिविधियां सिकुड़ रही थी और वैश्विक रेटिंग एजेंसियों ने आने वाले वित्त वर्ष में भारत की आर्थिक वृद्धि दर का आंकलन पहले से कम करके 4 प्रतिशत से भी नीचे रहने का अनुमान लगाया था। कोरोना महामारी से पहले ही कई करोड़ लोगों की नौकरियां जा चुकी थीं।  निश्चित तौर पर कोरोना संकट के कारण आर्थिक संकट महासंकट का रूप ले चुका है और इसकी मुख्य वजह देश में कंप्लीट लॉकडाउन का फैसला है। पहले हमारी अर्थव्यवस्था धीमी हुई और लॉकडाउन से तो यह पूरी तरह ठप ही हो गई। 21 दिन के लॉकडाउन में सरकार ने इसको लेकर कोई रोडमैप नहीं बनाया। आपकी मोदीनॉमिक्स का सारा तजुर्बा रेत पर बने महल की तरह ढह गया। बावजूद इसके हम भारत के लोग इस बात को जानना चाहते हैं कि आप देशवासियों को बताएं कि आपने अपने छह साल के कार्यकाल में पेट्रोल और डीजल से कितनी कमाई की? आपने सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियों की बोली लगाकर कितनी कमाई की? और आज की तारीख में भारत सरकार के राजकोष में कितना धन जमा है?

बहरहाल, लॉकडाउन-1 के 20 दिन बाद जब लोगों को यह पता चला कि 14 अप्रैल सुबह 10.30 बजे आप फिर से देशवासियों को संबोधित करेंगे तो लोग उम्मीदों की टकटकी लगाकर आपको सुनने के लिए बेसब्री से इंतजार करने लगे। क्या बुजुर्ग, क्या जवान, क्या बच्चे, क्या गरीब-क्या अमीर और सबसे ज्यादा मध्य व निम्न मध्य वर्ग सभी आपके मुखाबिंद से उम्मीदों के, राहतों के दो बोल सुनने के लिए पूरी रात जागकर गुजार दी थी। लेकिन जब आपकी पाठशाला टेलीविजन पर शुरू हुई तो आपके संबोधन के 24वें मिनट तक सब यही कह रहे थे कि उन्हें 19 दिन का एक और लॉकडाउन भी स्वीकार है। उन्हें पक्का भरोसा था कि मोदी जी आज राहत का बड़ा पिटारा जरूर खोलेंगे क्योंकि 130 करोड़ देशवासियों की ताकत लेकर आप जीते जो हैं। सच मानिए मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आपने खुद को प्रधानसेवक कहा था, आपने खुद को देश का चौकीदार कहा था, लोग आपके ऊपर बहुत भरोसा करते थे और इस वक्त तक कर भी रहे थे, लेकिन जैसे ही आपने अपने संबोधन के 25वें मिनट में कोरोना संकट से निपटने के लिए सप्तपदी (हिन्दू विवाह पद्धति में अग्नि की साक्षी मानकर नवविवाहित जोड़े को जिन सात फेरों में बांधा जाता है और फिर वो जन्म-जन्मांतर एक-दूसरे के हो जाते हैं) के तहत सात वचन निभाने का वादा मांगने लगे तो लोगों के सब्र का बांध टूट गया। उस वक्त उनकी बेचैनी व बेबसी को उनकी आंखों में झांककर सहज ही महसूस किया जा सकता था। शायद आपने महसूस नहीं किया क्योंकि आप प्रधानसेवक और चौकीदार से मिस्टर प्राइम मिनिस्टर जो हो चुके हैं, क्योंकि आप अपने होने का वजूद जो खो चुके हैं।