Saturday, 18 April 2020

मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आप अपने होने का वजूद खो चुके हैं

मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! कोरोना महामारी के वैश्विक महासंकट और देश के अंदर 21 दिन के कंप्लीट लॉकडाउन के बाद एक बार फिर जब 19 दिन की इसकी मियाद बढ़ा दी गई है के बीच हम भारत के लोग आपसे कहना चाहते हैं कि अब आप अपने होने का वजूद खो चुके हैं। हमें अपनी सरकार की नीति और नीयत दोनों पर संदेह होने लगा है और चूंकि आप ही हमारी सरकार के मुखिया हैं, लिहाजा हम भारत के 130 करोड़ लोगों का दर्द आपको ही समझना था। अब इसे देशवासियों की नियति कहें या जाने-अनजाने में प्रधानसेवक होने के नाते आपके द्वारा उठाए गए गलत कदमों का दंश, दोनों ही परिस्थितियों में इसका खामियाजा वही जनता भुगत रही है जिसे आप देश और दुनिया में बार-बार अपनी ताकत बताते रहे हैं। इसीलिए एक लंबे कालखंड के बाद हम भारत के लोग आपको बताना चाहते हैं कि आज आपकी ताकत उस मुश्किल दौर में पहुंच गई है जहां से उसे उबारना कठिन ही नहीं असंभव भी है, क्योंकि आप अपने होने का वजूद जो खो चुके हैं।

आज जब हम लॉकडाउन-2.0 की परिस्थिति में जीने को अभिशप्त हैं, सरकार की नीति और नीयत पर संदेह करने के वजहों की फेहरिस्त तो बहुत लंबी है, लेकिन हम यहां सिर्फ कोरोना महासंकट से निपटने के लिए लॉकडाउन की परिस्थिति की ही बात करेंगे कि इस दौर में सरकार की जिम्मेदारी व जवाबदेही क्या होनी चाहिए थी और क्या वह अपनी इस जिम्मेदारी व जवाबदेही के धर्म को निभाने में जनता की उम्मीदों पर खरी उतरी? हालांकि हम भारत के लोग आज जिन परिस्थितियों में जीने को अभिशप्त हैं उसके पीछे सरकार द्वारा आर्थिक क्रांति का हवाला देते हुए नोटबंदी और जीएसटी लागू करने का फैसला भी उतना ही जिम्मेदार है जितना वैश्विक महामारी कोरोना महासंकट के बीच कंप्लीट लॉकडाउन का फैसला और वो भी नोटबंदी की तर्ज पर सिर्फ चार घंटे की मोहलत के साथ। यहां हम सिर्फ 2020 की बात करते हैं जब 30 जनवरी को देश के सबसे समृद्ध प्रदेश केरल में कोरोना से संक्रमित पहले मरीज की एंट्री हुई थी। मीडिया में जो रिपोर्ट प्रकाशित हुई है, उसके मुताबिक यह मरीज चीन के उसी वुहान प्रांत से आया था जहां सबसे पहले (नवंबर-दिसंबर 2019) कोरोना ने दस्तक दी थी और फिर इतनी बड़ी तबाही के रूप में इसने विस्तार लिया जिसकी जद में अमेरिका, इटली, स्पेन, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस समेत दुनियाभर के 200 से अधिक देश इसमें समा गए। 30 जनवरी से पहले जापान और अमेरिका में कोरोना का संक्रमण फैल चुका था। आगे बढ़ने से पहले यहां कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा सांसद राहुल गांधी के दो अहम ट्वीट का जिक्र करना जरूरी होगा। 31 जनवरी को पहले ट्वीट में राहुल गांधी ने कोरोना संकट का जिक्र करते हुए लिखा था- In China, the Coronavirus has killed hundreds of people. My thoughts are with the families of the victims & the millions who have been forced into quarantine to prevent the spread of the virus. May they find the courage & strength to persevere through this terrible ordeal. उसके बाद 12 फरवरी को दूसरे ट्वीट में कोरोना संकट से जुड़े एक न्यूज लिंक को शेयर करते हुए राहुल गांधी ने लिखा था- The Corona Virus is an extremely serious threat to our people and our economy. My sense is the government is not taking this threat seriously. Timely action is critical. पूरा देश जानता है, राहुल गांधी को पूरी की पूरी तंबूपरस्त मीडिया, अफवाहबाज मीडिया और सोशल मीडिया ने पप्पू बनाकर एक तरह से विपक्ष की आवाज को ही खत्म कर दिया है ताकि सरकार से न कोई सवाल कर पाए और न ही उसे उसकी जिम्मेदारी व जवाबदेही का अहसास करा सके। लेकिन हम भारत के लोग जो आपकी भी ताकत हैं, इस बात को समझते हैं और इस बात का जिक्र आपसे करना चाहते हैं कि एक दूरदर्शी पप्पू (राहुल गांधी) की बात को ही सरकार अगर समय रहते समझ लेती तो शायद देश की अर्थव्यवस्था का पहिया रोकने की नौबत नहीं आती। कंप्लीट लॉकडाउन की परिस्थिति में हम नहीं जी रहे होते।

मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! 
कोरोना महासंकट के बीच राष्ट्र के नाम चौथे संबोधन में आपने बहुत सारे दावे किए और देशवासियों को सप्तपदी के तहत सात वचन निभाने की शपथ भी दिलाई। लेकिन कभी अकेले में अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने की कोशिश जरूर करियेगा कि आपने जो भी दावे किए वह कितना सच है और फिर जो वचन निभाने के लिए अपनी जनता से हामी भरवाई वो काम किसका है- आपका या फिर हम भारत के लोगों का? हम भारत के लोग आज आपसे पूछना चाहते हैं, कुछ सवाल करना चाहते हैं कोरोना को लेकर, लॉकडाउन को लेकर, लॉकडाउन-2.0 की परिस्थिति को लेकर।

1. आपने इस बात का दावा किया कि कोरोना की भयावहता का अंदाजा लगाते हुए हमने काफी पहले इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया था जिसकी वजह से दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले जनहानि काफी कम हुई है। हम भारत के लोग आपसे जानना चाहते हैं कि भारत में कोरोना संक्रमित पहले केस की एंट्री और राहुल गांधी के दोनों ट्वीट से पहले कोरोना से निपटने के लिए सरकार ने क्या तैयारी की थी?

2. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! इस तथ्य को आप भी मानेंगे कि कोरोना महामारी हमारे देश में बाहर के देशों से आया। यहां तक कि जिन जमातियों पर संक्रमण फैलाने का आरोप मढ़कर देश की सोशल मीडिया और तंबूपरस्त मीडिया द्वारा समाज में लगातार नफरत फैलाई जा रही है, वो भी चीन समेत अन्य कई देशों से मार्च के शुरूआती हफ्तों में भारत में एंट्री ली थी। कनिका कपूर जैसे ताकतवर हजारों लोगों की एंट्री भी देश के अंदर 30 जनवरी के बाद ही हुई थी। अगर आपकी तैयारी चाक-चौबंद थी तो हजारों जमाती और कनिका कपूर जैसी हस्तियों को देश के अंदर कोरोना फैलाने की छूट किसने दी? आखिर किसकी शह पर जमाती मरकज में सालाना जलसा करते रहे और कनिका कपूर जैसी दिग्गजों की पार्टी होती रही जिसमें सत्ता से जुड़े सैकड़ों लोगों का जमावड़ा लगा?

3. देश में कोरोना संकट लगातार गहरा रहा था और आप अमेरिकी भगवान डोनाल्ड ट्रम्प के स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए खड़े थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ से चेतावनियां जारी होने के बावजूद ट्रम्‍प के स्‍वागत में गुजरात में हज़ारों लोगों को जुटाया गया। तब तक अमेरिका में कोरोना फैलने की खबर हमें मिल चुकी थी। ट्रम्प ने अपने देश को तो डुबोया ही, हमें भी अपनी चपेट में ले लिया। आज इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? पूरी सरकार गुजरात से लेकर नई दिल्ली के लुटियन जोन तक ट्रम्प के स्वागत में जुटी थी और तभी राजधानी दिल्ली सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था। हमारे हिन्दू और मुसलमान भाईयों का कत्ल हो रहा था। घर जलाए जा रहे थे, दुकानें जलाई जा रही थी। लेकिन आपने उस वक्त भी खामोशी की चादर ओढ़े रखी। आखिर क्यों? कोरोना अपना खौफनाक जाल बिछा रहा था और देश के सैकड़ों रहनुमा देश की संसद में एनपीआर, एनआरसी, शाहीनबाग और सांप्रदायिक दंगे को लेकर तू-तू मैं-मैं कर रहे थे। देश में कोरोना फैल रहा था और सत्ताधारी पार्टी मध्यप्रदेश में तख्तापलट करने में जुटी थी। आपने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का ऐलान किया था और एक दिन बाद शिवराज सरकार शपथ ले रही थी जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग की कोई परवाह नहीं की गई। अगर आपने समय रहते सतर्कता बरती थी तो ये सब किसके इशारे पर होता रहा?

4. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! अगर आपकी तैयारी चाक-चौबंद थी तो हम भारत के लोग आपसे जानना चाहते हैं कि देश में 1 मार्च को कोरोना के 3 केस थे, बालकनी से ताली व थाली बजाने के दिन 22 मार्च को 396 केस और 25 मार्च को जिस दिन कंप्लीट लॉकडाउन-1 शुरू हुआ, 606 संक्रमित मरीज देश में कहां से आए? आज जब हम कंप्लीट लॉकडाउन के एक्सटेंशन फेज में हैं, कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 13 हजार के पार हो चुकी है। देश के 27 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों के 388 जिलों में फैले कोरोना संक्रमण से मौत का आंकड़ा 500 के पार कैसे पहुंच गया? अगर आपको याद हो तो 27 फरवरी 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गाइडलाइन जारी करते हुए कहा था- दुनियाभर में पीपीई किट का भंडारण पर्याप्त नहीं है और लगता है कि जल्द ही गाउन और गोगल्स (चश्में) की आपूर्ति भी कम पड़ जाएगी। गलत जानकारी और भयाक्रांत लोगों में खरीददारी की होड़ के साथ ही कोविड-19 के बढ़ते मामलों से दुनिया में पीपीई की उपलब्धता कम हो जाएगी। डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइन में बताया गया था- पीपीई किट (पर्सनल प्रोटेक्ट‍िव एक्व‍िपमेंट किट) का मतलब है : गाउन, बूट, कैप, एन 95 मास्क, ग्लब्स और गॉगल्स। इसके बावजूद भारत सरकार ने घरेलू पीपीई किट के निर्यात पर रोक लगाने में 19 मार्च तक का समय लगा दिया। देश इस मुद्दे पर आपका स्पष्टीकरण चाहता है क्योंकि आज हम चीन से पीपीई किट का आयात कर रहे हैं जिससे संक्रमण का खतरा और गहराने का अंदेशा है।

5. कोरोना वॉरियर्स के सम्मान और उनकी हौसलाअफजाई के लिए आपने देशवासियों से बालकनी में खड़े होकर ताली-थाली बजाने और घर की बत्ती बुझाकर दीया या टॉर्च जलाने के लिए कहा था। एकजुटता का शक्ति प्रदर्शन कर हम भारत के लोगों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और तब आपका सीना भी गर्व से फूल गया था। लेकिन उसके बाद जो कुछ हुआ उसकी कल्पना शायद आपने नहीं की होगी। हैल्थ सेक्टर, लॉ एंड आर्डर और मीडिया से जुड़े कोरोना वॉरियर्स के साथ क्या बर्ताव लोगों ने किया इस बारे में आपने अपनी दूरदर्शिता का इस्तेमाल नहीं किया। सोशल डिस्टेंसिंग की आड़ में पूरे देश में सामाजिक विभाजन होने लगा और समाज इन कोरोना वॉरियर्स से खुद को अलग करने लगा। शायद आप भी सोशल डिस्टेंसिंग और फिजिकल डिस्टेंसिंग के फर्क को नहीं समझ पाए। दूसरी बात, जब हैल्थ सेक्टर से जुड़े लोगों ने पीपीई किट की कमी से आपको, सरकारी महकमा को अवगत कराने की कोशिश की, वॉर विद्आउट वीपन्स की बात की तो उन्हें सरकार के लोगों ने ही प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। आखिर इस तरह के हालात और अव्यवस्था से निपटने की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या आप कहने की स्थिति में हैं कि यह सब सरकार की जवाबदेही में नहीं आता है।

6. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आपने अपने संबोधन में गरीबों और मजदूरों को अपना 'परिवार' बताया, लेकिन कितने गरीबों और मजदूरों तक आपने अपने भरोसे की पहुंच बनाई? पहली बार लॉकडाउन से पहले अगर आप गरीब मजदूरों को इस बात का भरोसा दिला पाते कि सरकार आपके द्वार होगी तो शायद देश के अलग-अलग महानगरों व शहरों में रह रहे लाखों मजदूरों का सैलाब सड़कों पर नहीं उमड़ता। हजारों की संख्या में ये मजदूर अपने गांव की तरफ पैदल चलकर पलायन की राह नहीं अपनाते। इन्‍हीं गरीबों के बीच अल्‍पसंख्‍यकों की भी भारी आबादी इस देश में है। इस दौरान कुछ तथाकथित दक्षिणपंथी संगठनों ने मिलकर जिस तरह के हमले इनपर किए हैं वह शर्मनाक है। सपाट भाषा में कहें तो देश की कुछ फासीवादी ताकतें कोरोना संकट की आड़ में ग़रीब अल्पसंख्यक आबादी को निशाना बनाने का कोई मौका नहीं चूक रही हैं। यहां तक कि तंबूपरस्त मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक जनभावनाओं को भड़काने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं और आपकी सरपरस्ती में चल रही सरकार उस बेलगाम तंबूपरस्त मीडिया, सोशल मीडिया और फासीवादी ताकतों को खुली छूट दे रखी है। ग्राउंड जीरो से जो रिपोर्ट्स आ रही हैं उसमें ये भी देखा जा रहा है कि सरकारी राशन की पहुंच सत्ताधारी पार्टी अपने कोर वोट बैंक तक ही सीमित रख रही हैं। कोरोना की टेस्टिंग और टेस्ट किट के मामले में भी पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है। आपने बुजुर्गों का विशेष ख्याल रखने की बात भी कही लेकिन उन बुजुर्गों का ख्याल कौन रखेगा जिनकी कीमोथैरेपी होती है, उन बुजुर्गों का ख्याल कौन रखेगा जिनका साप्ताहिक डायलिसिसि होता है, जो किडनी के मरीज हैं, दिल के मरीज हैं, डायबिटिक हैं। इन बुजुर्गों को अस्पताल में गंभीर बीमारियों के उपचार की सुविधा नहीं मिल पा रही है। आखिर इन सब हालातों की जिम्मेदारी कौन लेगा?

7. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आपका कहना है, आर्थिक संकट कोरोना की वजह से पैदा हुआ है और इससे बचना नामुमकिन था। यह भी सच नहीं है। भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में 2019 के तीसरे क्‍वार्टर से ही खतरनाक संकट पैदा हो चुका था जो नोटबंदी और जीएसटी की वजह से पहले से ही धीरे-धीरे इस स्तर तक पहुंचा था। कोरोना का पहला केस आने से पहले ही ऑटोमोबाइल सेक्‍टर, टेक्‍सटाइल सेक्‍टर, रियल एस्टेट में मंदी साफतौर पर देखी जा सकती थी। सारी मैन्‍युफैक्‍चरिंग गतिविधियां सिकुड़ रही थी और वैश्विक रेटिंग एजेंसियों ने आने वाले वित्त वर्ष में भारत की आर्थिक वृद्धि दर का आंकलन पहले से कम करके 4 प्रतिशत से भी नीचे रहने का अनुमान लगाया था। कोरोना महामारी से पहले ही कई करोड़ लोगों की नौकरियां जा चुकी थीं।  निश्चित तौर पर कोरोना संकट के कारण आर्थिक संकट महासंकट का रूप ले चुका है और इसकी मुख्य वजह देश में कंप्लीट लॉकडाउन का फैसला है। पहले हमारी अर्थव्यवस्था धीमी हुई और लॉकडाउन से तो यह पूरी तरह ठप ही हो गई। 21 दिन के लॉकडाउन में सरकार ने इसको लेकर कोई रोडमैप नहीं बनाया। आपकी मोदीनॉमिक्स का सारा तजुर्बा रेत पर बने महल की तरह ढह गया। बावजूद इसके हम भारत के लोग इस बात को जानना चाहते हैं कि आप देशवासियों को बताएं कि आपने अपने छह साल के कार्यकाल में पेट्रोल और डीजल से कितनी कमाई की? आपने सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियों की बोली लगाकर कितनी कमाई की? और आज की तारीख में भारत सरकार के राजकोष में कितना धन जमा है?

बहरहाल, लॉकडाउन-1 के 20 दिन बाद जब लोगों को यह पता चला कि 14 अप्रैल सुबह 10.30 बजे आप फिर से देशवासियों को संबोधित करेंगे तो लोग उम्मीदों की टकटकी लगाकर आपको सुनने के लिए बेसब्री से इंतजार करने लगे। क्या बुजुर्ग, क्या जवान, क्या बच्चे, क्या गरीब-क्या अमीर और सबसे ज्यादा मध्य व निम्न मध्य वर्ग सभी आपके मुखाबिंद से उम्मीदों के, राहतों के दो बोल सुनने के लिए पूरी रात जागकर गुजार दी थी। लेकिन जब आपकी पाठशाला टेलीविजन पर शुरू हुई तो आपके संबोधन के 24वें मिनट तक सब यही कह रहे थे कि उन्हें 19 दिन का एक और लॉकडाउन भी स्वीकार है। उन्हें पक्का भरोसा था कि मोदी जी आज राहत का बड़ा पिटारा जरूर खोलेंगे क्योंकि 130 करोड़ देशवासियों की ताकत लेकर आप जीते जो हैं। सच मानिए मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आपने खुद को प्रधानसेवक कहा था, आपने खुद को देश का चौकीदार कहा था, लोग आपके ऊपर बहुत भरोसा करते थे और इस वक्त तक कर भी रहे थे, लेकिन जैसे ही आपने अपने संबोधन के 25वें मिनट में कोरोना संकट से निपटने के लिए सप्तपदी (हिन्दू विवाह पद्धति में अग्नि की साक्षी मानकर नवविवाहित जोड़े को जिन सात फेरों में बांधा जाता है और फिर वो जन्म-जन्मांतर एक-दूसरे के हो जाते हैं) के तहत सात वचन निभाने का वादा मांगने लगे तो लोगों के सब्र का बांध टूट गया। उस वक्त उनकी बेचैनी व बेबसी को उनकी आंखों में झांककर सहज ही महसूस किया जा सकता था। शायद आपने महसूस नहीं किया क्योंकि आप प्रधानसेवक और चौकीदार से मिस्टर प्राइम मिनिस्टर जो हो चुके हैं, क्योंकि आप अपने होने का वजूद जो खो चुके हैं।

1 comment:

Bhavesh Chattopadhaya said...

Congratulations Sir. Fantastic write up there's no doubt about it. Very logically synchronized, no doubt. However, the million dollar question is,is Roul Vinci dependable? What about his credibility? Does the so called 130 years old CONGRESS club believe in him? What about his biological mother Antonia Maino, Does she have any trust remaining in him?
Sir, credibility plays a major role in democracy, especially when it's one of the largest. Can you name even one, just one name in comparison to Prime minister Modi? Introspection is required I believe.

Cheers. Vande Mataram.