Saturday, 14 October 2017

2019 में रंग लाएगी राहुल की ये तरकीब

लोकसभा चुनाव 2019 के फाइनल की जंग के लिए गुजरात और हिमाचल प्रदेश में सेमीफाइनल का दौर शुरू हो चुका है। खास बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बीच गुजरात विधानसभा चुनाव में फाइनल का रिहर्सल भी शुरू हो गया है। गुजरात में जीत और हार जिसकी भी हो, लेकिन ऐसा लगता है कि चुनाव नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के चेहरे को ही आगे कर लड़ा जा रहा है मानों इन्हीं में से कोई एक गुजरात का मुख्यमंत्री बनने वाले हों। राहुल गांधी के लिए चाहे गुजरात चुनाव हो या फिर लोकसभा-2019 का चुनाव, खोने के लिए कुछ भी नहीं है। कांग्रेस को इन दोनों चुनावों में जो भी हासिल होगा, तय है पहले से बेहतर ही होगा क्योंकि कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन अब और खराब क्या हो सकता है। यह नरेंद्र मोदी और भाजपा के शाह भी जान रहे हैं कि गुजरात और देश दोनों ही स्थानों पर भाजपा नीत सरकार का प्रदर्शन जनता के मनोनुकूल नहीं दिख रहा है। इस बीच कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी ने चुनावी शतरंज की बिसात पर कुछ ऐसी चालें चली हैं जिससे नरेंद्र मोदी की भाजपा गुजरात विधानसभा और लोकसभा चुनाव में चारों खाने चित्त हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं।

सोशल मीडिया अबकी राहुल के लिए वरदान
सोशल मीडिया का जो प्लैटफॉर्म 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए वरदान साबित हुआ वहीं सोशल प्लैटफार्म गुजरात विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव 2019 में नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। 'विकास पागल हो गया है' हैशटैग ने भाजपा कैंप में खलबली मचा रखी है। ऊपर से बेरोजगारी, नोटबंदी, जीएसटी और रियल एस्टेट रेगुलेशन डिवेलपमेंट ऐक्ट ने पूरे देश में मंदी का माहौल बनाया है और इसमें सोशल मीडिया ने कांग्रेस के पक्ष में जबरदस्त तरीके से माहौल बनाया है। अगर आपको याद हो तो 2014 में नरेंद्र मोदी ने जिस विकास के मुद्दे को चुनाव जीतने का हथियार बनाया था उसमें सोशल मीडिया ने अहम भूमिका निभाई थी और वही विकास आज अगर पागल हो गया है तो लोगों का भाजपा और नरेंद्र मोदी से मोह भंग होना स्वाभाविक है क्योंकि सवाल पूछने वाले तो पूछेंगे कि नरेंद्र मोदी में इतनी भी प्रशासनिक क्षमता नहीं कि विकास को तीन साल भी ठीक से संभाल नहीं पाए। कहने का मतलब यह कि नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता पाने के लिए विकास शब्द का इस्तेमाल किया और लोगों ने उसपर भरोसा किया। यह सब कुछ हवा में एक जुमले की तरह था। इसकी कोई वास्तविक हैसियत नहीं थी, लेकिन आज की तारीख में कांग्रेस और राहुल गांधी सोशल मीडिया पर जिस तरह से विकास को लेकर मोदी सरकार पर हमले कर रहे हैं वो एक सच्चाई है ना कि जुमला। देश की जनता को यह मसहूस हो रहा है कि राहुल जो बात कर रहे हैं वह हमारा वर्तमान है। इसलिए संभव है 2019 आते-आते 'विकास' इतना पागल हो जाए कि 125 करोड़ लोगों की ताकत वाला देश 'विकास' का पागलपन ठीक करने की जिम्मेदारी राहुल गांधी की कांग्रेस को सौंप दे।

राहुल का नरम हिन्दुत्व कार्ड भी मोदी पर भारी
गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी ने राज्य में जब चुनाव अभियान की शुरुआत राहुल गांधी के जरिए की तो उन्होंने सबसे पहले द्वारकाधीश में जाकर पूजा-अर्चना की। श्रीकृष्ण के चरणों में शीश झुकाकर माथे पर तिलक लगाए अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर कीं। गुजरात दौरे के दरम्यान वह तमाम दूसरे मंदिरों में भी गए और आने वाले दिनों में भी इस काम को करते रहने की योजना है। दरअसल यह राहुल की कांग्रेस की रणनीति का दूसरा हिस्सा है। हाल के वर्षों में कांग्रेस पर जो सबसे बड़ा आरोप लगा था वह यही था कि यह पार्टी अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण करती है। यह आरोप गुजरात में भारी ना पड़े इसलिए राहुल गांधी के जरिये कांग्रेस ने नरम हिंदुत्व का दांव खेला है। नरेंद्र मोदी की भाजपा इससे बेहद घबराई हुई है। क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खुद का हिन्दुत्व का सबसे बड़ा झंडाबरदार मानता है। आरएसएस को लगता है कि हिन्दुत्व पर उनका पेटेंट है और हिन्दुत्व की राजनीति करने का अधिकार सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के पास है। लेकिन आरएसएस और भाजपा की दिक्कत यह है कि ये लोग कट्टर हिन्दुत्व की राजनीति करने लगे जो 125 करोड़ की जनता को पसंद नहीं। 2014 में लोगों ने मोदी की भाजपा को वोट इसलिए किया था कि मोदी सरकार हिन्दुत्व को विकास से जोड़कर जीने का एक बेहतरीन हथियार हर भारतवासी के हाथों में सौपेंगे, लेकिन तीन साल में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बड़ी साफ सी बात है कि कट्टरता किसी भी चीज में अच्छी नहीं होती तो फिर हिन्दुत्व के लिए कैसे अच्छी हो सकती। राहुल गांधी ने इसीलिए चुपके-चुपके नरम हिन्दुत्व का कार्ड खेल दिया है और आगे आने वाले दिनों में इस और मजबूती से पेश किया जाएगा।

राहुल की साफगोई से मोदी हो जाएंगे चित्त!
लाखों लोगों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भी मुद्दे को घुमा-फिरा कर इस तरह से पेश करते हैं कि जुमला भी सच जैसा लगने लगता है। देश और दुनिया में घूम-घूम कर नरेंद्र मोदी ने इस बात को स्थापित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी कि पिछले 70 वर्षों में देश में कोई काम नहीं हुआ। लेकिन अब जब कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी देश-दुनिया में घूम-घूम कर मोदी सरकार के साथ-साथ कांग्रेस समेत देश की तमाम सरकारों की बात कर रहे हैं तो अमेरिका से लेकर गुजरात तक लोग कहने लगे हैं कि राहुल की साफगोई का कोई जवाब नहीं। अभी हाल ही में राहुल जब अमेरिकी दौरे पर कैलिफोर्निया और प्रिंसटन विश्वविद्यालय में छात्रों से बात की और कई इंटरव्यू दिए तो पश्चिमी मीडिया ने माना कि राहुल अपने देश भारत की जमीनी हकीकत को नरेंद्र मोदी के मुकाबले बेहतर तरीके से समझते हैं। राहुल की छवि इस रूप में सामने आई कि वह कांग्रेस के गुलाम नहीं हैं। बेरोजगारी के मुद्दे पर राहुल ने कांग्रेस को भी उतना ही दोषी ठहराया जितना मोदी सरकार को। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान भी राहुल मोदी सरकार की आलोचना तो कर रही रहे हैं, साथ ही कांग्रेस को भी क्लीनचिट नहीं दे रहे। कुल मिलाकर कांग्रेस जनता के बीच राहुल गांधी की छवि कुछ इस तरह का बनाना चाहती है कि राहुल सीधा सोचते हैं। उनकी सोच और नीति में किसी तरह की राजनीति नहीं, जुमलेबाजी नहीं। मोदी की सत्ता इस बात से डरी हुई है कि अगर लोगों के दिल और दिमाग में यह बात घर कर गई कि नरेंद्र मोदी नीत भाजपा की सरकार सिर्फ चुनाव जीतने की राजनीति करती है जुमलों के जाल में फंसाकर तो फिर क्या होगा?

बहरहाल, नरेंद्र मोदी और भाजपा के मुकाबले राहुल गांधी और कांग्रेस की चुनावी रणनीति और नई-नई चालें जारी रहीं तो देश में बड़ा राजनीतिक उलटफेर हो सकता है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में फर्क को समझने की जरूरत है। हमें इस बात को स्वीकार करना होगा कि 2014 में जब नरेंद्र मोदी चुनाव के मैदान में उतरे थे तो तब देश में कांग्रेस की सत्ता थी और वो भी 10 साल से। मोदी के हाथ 'विकास' का अमोघ अस्त्र हाथ लग गया था जिसके कंधे पर बैठकर वो नैया पार कर गए। लेकिन आज परिस्थितियां बिलकुल उलट है। जिस विकास को आगे कर नरेंद्र मोदी ने जनता से सैकड़ों वादे कर सत्ता संभाली उसे डिलीवर करने की जब बारी आयी तो भाजपा के नेता व कार्यकर्ता यह कहकर बचकानी हरकत करने लगे कि वो तो जुमला था। चाहे वह कालाधन को विदेश से लाने की बात हो, हर साल 2 करोड़ लोगों को रोजगार देने का हो, महंगाई कम करने का हो हर मोर्चे पर सरकार पिछड़ती नजर आ रही है। ऊपर से नोटबंदी और जीएसटी की मार ने आम आदमी और व्यापारी वर्ग की कमर तोड़ दी है। तो ऐसे में राहुल गांधी के लिए 2019 का चुनाव इस मायने में आसान हो गया है कि 2014 की मोदी की लाठी से ही राहुल की कांग्रेस के लिए मोदी की भाजपा को चारों खाने चित्त करने का अवसर है।

Tuesday, 3 October 2017

न्यू इंडिया के सपने की हकीकत

2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने जो वायदे देश की जनता से किए थे, अगर उसे भी पूरा करने में सरकार सफल रही तो खुद-ब-खुद नया भारत यानी न्यू इंडिया बन जाएगा। एक सुरक्षित, समृद्ध और मजबूत राष्ट्र बनाने का लक्ष्य नया नहीं है। सभी सरकारें सबके लिए रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, बिजली, स्वास्थ्य आदि मुहैया कराने पर जोर देती है और फिर हर प्रधानमंत्री ने अतीत में किसानों की आय बढ़ाने, युवाओं को रोजगार देने, भ्रष्टाचार और आतंकवाद से मुक्ति दिलाने, सामाजिक सद्भाव और सीमा सुरक्षा मजबूत करने का वादा किया है। फर्क सिर्फ इतना है कि अन्य प्रधानमंत्रियों के मुकाबले प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी लोगों को यह यकीन दिलाने में कामयाब दिख रहे हैं कि न्यू इंडिया का यह विजन उनकी पहुंच में है और यदि लोग उनके साथ मिलकर मतलब 2019 में उनकी सरकार को दोबारा चुनते हैं तो इस लक्ष्य को पाना आसान होगा।

न्यू इंडिया मतलब नया भारत। एक ऐसा भारत जहां कोई गरीब नहीं हो, कोई भूखा न हो, कोई अनपढ़ न हो, कोई बेरोजगार न हो, सर्वधर्मसम्भाव का मान हो, जय जवान-जय किसान का नारा बुलंद हो। आजादी के इन 70 सालों में एक के बाद एक आने वाली और जाने वाली सरकारें यह तो करती रही हैं। ऐसा भी नहीं है कि आजादी के समय जो भारत हमें मिली थी, जिस रूप में मिली थी उससे कहीं बेहतर भारत में आज हम रह रहे हैं, लेकिन कहते हैं कि बदलाव हमेशा अपने साथ कुछ विकृतियां भी लाती हैं और यही ध्यान रखने की होती है किसी भी सरकार और देशवासियों के लिए कि बदलाव को स्वीकार कर सामूहिक प्रतिबद्धता के साथ विकृतियों के खिलाफ लड़ाई लड़ें। यहीं आकर सब गड़बड़ हो जाती है। एक ओर जनता जहां अपनी सामूहिकता और प्रतिबद्धता को भूल जाती है और सरकार अपनी सत्ता को बचाने के लिए वोट बैंक की राजनीति में उलझ जाती है, अपनी प्रतिबद्धता को आगे के लिए टाल देती है।

इसे समझने के लिए इस कहानी को याद करना होगा। बात 1965 की है जब एक अमरिकी अखबार को दिए इंटरव्यू में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अमेरिका द्वारा वियतनाम में चलाए गए युद्ध को आक्रामक कार्य बताया था। शास्त्री जी की यह टिप्पणी तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन को नागवार गुजरी थी कि एक भूखा राष्ट्र अमेरिका को आक्रमणकारी कैसे कह सकता है? गुस्से में अमेरिका ने भारत को खाद्यान्न निर्यात पर पाबन्दी लगा दी। भारत की मुश्किलें बढ़ गईं। इस दौरान एक समय ऐसा आ गया था जब देश में मात्र सात दिनों का खाद्य भंडारण बाकी रह गया था। बढ़ते खाद्य संकट को देखते हुए शास्त्री जी ने देशवासियों से सोमवार को उपवास रखने की अपील की थी। साथ ही देश में खाद्य आत्म-निर्भरता लाने में किसानों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को समझाते हुए उन्होंने 'जय जवान जय किसान' का लोकप्रिय नारा उद्घोषित किया था। देश की जनता शास्त्री जी के एक आह्वान पर मुट्ठी बांध ली थी और हरित क्रांति तथा श्वेत क्रांति के रास्ते हमारा देश खाद्य व दुग्ध उत्पादन में इतना आत्मनिर्भर हो गया कि भारत खाद्यान्न का निर्यात करने लगा।

तो ये होती है जनता की सामूहिकता और सरकार की प्रतिबद्धता। आज देश की हालत यह है कि खेत में किसान अपनी जान देने को मजबूर हैं तो सरहद पर जवान आतंकवादियों के हाथों मर रहे हैं। किसान और जवान का इस तरह से मरना किसी भी राष्ट्र की सेहत के लिए बहुत ही खराब स्थिति होती है। अगर किसान नहीं बचे तो देश की 125 करोड़ जनता का पेट कौन भरेगा? सरहद की सुरक्षा में तैनात जवान अगर इसी तरह से आतंकियों के हाथों मरते रहे तो जब चीन या पाकिस्तान हमले कर देगा तो कौन लड़ेगा देश के लिए? और फिर इस हालात में न्यू इंडिया तो बनेगा लेकिन वह कैसा न्यू इंडिया बनेगा इसकी कल्पना से भी रूह कांप जाती है। इसलिए सरकार को यह तय करना होगा कि जिस नए भारत का सपना आजादी के वीर सपूतों ने देखा था उस सपने को साकार करने के लिए, एक नया भारत बनाने के लिए किसान और जवान दोनों की ताकत को बढ़ाना होगा। रोटी, कपड़ा और मकान के बाद शिक्षा का अधिकार, रोजगार की गारंटी, बेहतर स्वास्थ्य सेवा, महिलाओं की सुरक्षा, जातीय संघर्ष को जड़ से मिटाना और सामाजिक सद्भाव ये ऐसे बुनियादी मसले हैं जिसको मजबूती देकर हम एक नए भारत का निर्माण कर सकते हैं। अगर सरकार ऐसा कर सकी तो बाकी की समस्याएं मसलन महंगाई, गरीबी, भ्रष्टाचार, बिचौलिया संस्कृति आदि खुद-ब-खुद सुसाइड कर लेंगे।

लेकिन, राजनीतिक दलों पर पैनी नजर रखने वाली संस्था एडीआर ने कॉरपोरेट फंडिग के जो तथ्य देश के सामने रखे हैं वह इन्हीं राजनीतिक दलों में से बनी सरकार पर सवालिया निशान लगाती है कि क्या ये 'नया भारत' बनाएंगे? रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 के आम चुनाव में राजनीतिक दलों को जितना पैसा कॉरपोरेट फंडिंग से मिला उतना पैसा उससे पहले के 10 साल में नहीं मिला। एडीआर के मुताबिक, 2004 से 2013 के बीच कॉरपोरेट ने 460 करोड़ 83 लाख रुपये राजनीतिक दलों को फंडिंग किया। वहीं 2013 से 2015 के बीच कॉरपोरेट ने 797 करोड़ 79 लाख रुपये राजनीतिक दलों को फंडिंग किया। ध्यान रखिएगा कि ये आंकडे सिर्फ राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के हैं। यानी भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस पार्टी, एनसीपी और वामपंथी दलो को दिये गये फंड। एडीआर की इस रिपोर्ट से ही ये सच भी निकला है कि 80 फीसदी से ज्यादा कॉरपोरेट फंडिंग भाजपा को मिल रही है। अप्रैल 2012 से अप्रैल 2016 के बीच 956 करोड़ 77 लाख रुपये की कॉरपोरेट फंडिग हुई। इसमें से 705 करोड़ 81 लाख रुपये भाजपा के पास गये। 198 करोड़ 16 लाख रुपये कांग्रेस के पास गये।

यहां जिस पार्टी की सरकार 'न्यू इंडिया' की बात कर रही है उसी पार्टी को सबसे ज्यादा कॉरपोरेट चंदा मिल रहा है तो मेरा सवाल यह कि अगर कॉरपोरेट से इतना चंदा लेकर धन और बल की ताकत पर चुनाव जीतने का खेल जो राजनीतिक दल कर रही है उसकी कीमत भी तो सरकार को इन कॉरपोरेट घरानों को चुकानी होगी। क्योंकि ये कॉरपोरेट घराने चंदा समाजसेवा और जनकल्याण की नीतियों के लिए तो नहीं देते हैं। वो चंदा सिर्फ इसलिए देते हैं क्योंकि जब उस पार्टी की सरकार बनती है तो उससे अपने माफिक नीतियां बनवाकर अत्यधिक मुनाफा कमा सकें। लोकतंत्र में जब चुनाव होते हैं तो मतदाता यह देखता है कि कौन सा राजनीतिक दल और उसका नेता जनहित और देशहित में बेहतर साबित हो सकता है। कहने का मतलब यह कि चुनाव में हार और जीत का आधार उसका काम होता है। लेकिन बदलते भारत में जब चुनाव धनबल की ताकत से लड़ा जाने लगे तो तय मानिए कि देश उल्टी दिशा में चलने लगा है। चुनाव में जीत या हार अगर कॉरपोरेट तय करने लगे तो समझिए देश का विनाश तय है, वक्त जो भी लगे। फिर ये कहने में कोई गुरेज नहीं कि इस हालात में 'न्यू इंडिया' का सपना तो कभी पूरा नहीं होने वाला।

Sunday, 1 October 2017

इन नीतियों से PM मोदी का कोई वास्ता नहीं

इसी साल जून महीने में एक खबर निकलकर आई थी कि मनमोहन सरकार के कार्यकाल में मंत्रियों और सांसदों ने पंचसितारा होटलों के बिल पर 10 साल में 19.77 करोड़ रुपए खर्च किए वहीं वर्तमान मोदी सरकार के मंत्रियों और सांसदों ने पिछले एक साल में ही इन पर 25 करोड़ रुपये खर्च कर दिए। नियमों के मुताबिक, सांसदों को शपथ लेने के दिन से रहने के लिए आवास उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी होती है। अगर आवास न भी उपलब्ध हो तो उन्हें स्टेट गेस्ट हाउस या फिर अशोका, जनपथ या सम्राट जैसे सरकारी होटलों में ठहराया जाता है। ऐसे में मोदी सरकार के मंत्री और हाउस कमेटी के चेयरमैन अर्जुन राम मेघवाल का यह जवाब कि वर्तमान लोकसभा में पहली बार 330 सांसद ऐसे हैं जिनका दिल्ली में कोई आवास नहीं है, ऐसे में होटल्स का बिल बढ़ना स्वभाविक है, बचकाना सा लगता है।

कल्याणकारी राज्य में भरोसा नहीं
दरअसल, मोदी सरकार ऐसी कोई नीति बनाने में भरोसा नहीं रखती जिसके तहत मंत्रियों और सांसदों की सुख-सुविधाओं में कटौती की बात हो। मोदी सरकार अपनी हर नीति में गरीबों के कल्याण की बात करती है, लेकिन यहां भी थोड़ी गहराई में जाकर इसकी छानबीन करें तो पाएंगे कि मोदी सरकार की कोई भी नीति गरीबों के कल्याण के लिए नहीं होती। दरअसल नरेंद्र मोदी कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में विश्वास ही नहीं रखते। इस बात का संकेत उन्होंने शुरू में ही मनरेगा का मजाक उड़ाकर दे दिया था। देश के सवा सौ करोड़ भाईयों-बहनों को सरकार ने बीच बाजार में लाकर खड़ा कर दिया जिसकी समझ में ये नहीं आ रहा कि आगे बढूं या पीछे की तरफ लौट जाऊं। क्योंकि आगे कुआं दिख रहा है तो पीछे खाई। विचलित मन:स्थिति के बीच खड़ा जनमानस अपना सब कुछ सरकार को समर्पित कर जिंदगी को दांव पर लगा चुका है।

गरीबों के पैसे से गरीबों की योजनाएं

जनधन योजना इस सरकार के व्यापार का पहला चरण था जब गरीबों की जेब से पैसा निकालकर बैंकों के हवाले किया गया। बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भी गरीबों के कल्याण की योजना बताई और लोगों ने इसे मान भी लिया। इसके बाद नोटबंदी दूसरा चरण था ताकि ज्यादा से ज्यादा डिजिटल मनी को बढ़ावा मिले और कॉरपोरेट घरानों को अतिरिक्त व्यापार। उनके बाजार का तीसरा चरण जीएसटी के रूप सामने आया और चौथा चरण पेट्रोल और डीजल पर बेहिसाब टैक्स। ऐसी और भी कई स्कीमें हैं जिसे पीएम मोदी ने सफलतापूर्वक लागू किया और इसे गरीबों के कल्याण से जोड़ दिया। जबकि हकीकत में यह बाजार का कंसालिडेशन था।

डिजिटल मनी से पूंजीपतियों की चांदी
अर्थशास्त्र का सिद्धांत कहता है कि एक खुदरा बाजार संगठित व्यापार के लिए हमेशा नुकसानदेह होता है इसलिए बाजार जितना संगठित हो वह व्यापारियों के लिए बहुत मुनाफे का सौदा होता है। जब इस दुनिया में नोट के रूप में करेंसी आयी थी तब उसका भी यही मकसद था कि लोग जिस तरह से आपस में लेनदेन करते हैं उससे बाजार कभी पूंजीपतियों के हवाले नहीं हो पायेगा। डिजिटल मनी उससे भी आगे का कदम है जो बाजार को पूंजीपतियों के हवाले करने में मदद पहुंचाएगा। पहले नोट के कारण बाजार में जो छुटभैये पैदा हो गये थे डिजिटल मनी और जीएसटी उनको साफ कर देंगें।

विपन्न लोगों का संपन्न देश होगा भारत
प्रधानमंत्री मोदी देश में ऐसी आर्थिक नीति लागू कर रहे हैं जिससे देश तो मजबूत होता दिख रहा है लेकिन लोग लगातार कमजोर होते जा रहे हैं। देश की समृद्धि का ग्राफ ऊपर उठेगा लेकिन लोगों की समृद्धि का ग्राफ लगातार नीचे चला जाएगा। देश में एक लाख लखपति पैदा होने की बजाय सौ करोड़पति पैदा हो जाएंगे जिससे ऊपर से देखने पर देश आंकड़ों में बहुत समृद्ध नजर आयेगा, आधारभूत ढांचा भी विकसित होता चला जाएगा लेकिन आम आदमी की मुश्किलें बढ़ती जाएंगी। पहले भारत संपन्न लोगों का विपन्न देश था लेकिन मोदी का कार्यकाल खत्म होते-होते भारत विपन्न लोगों का संपन्न देश बन जाएगा।

बहरहाल, शुरू में जो बातें की गईं कि मोदी राज में मंत्रियों और सांसदों की सुख-सुविधाओं में किसी तरह की कटौती की बात करना सरकार की नीति का हिस्सा नहीं है वह तभी सफल हो पाएगा जब कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को कुंद कर देंगे। मोदी सरकार ने बड़े ही होशियारी से गरीबों को नाम पर जनकल्याण योजनाएं बनाकर गरीबों से ही पैसे वसूलकर बैंकों और सरकार के खजाने भर लीं और उसे खुद की सुख सुविधाओं पर खर्च करने में उड़ा रही है या फिर कॉरपोरेट घरानों के कर्जों का सेटलमेंट करने में लगा रही है।

Saturday, 12 August 2017

पीएम मोदी की ये कैसी नाइंसाफी?

जिस सामाजिक और राजनीतिक परिवेश में हम जी रहे हैं, आप देखेंगे कि कोई भी नेता हमेशा धर्म से दूर भागता है। इसलिए क्योंकि धर्म के सामने उसे आत्मग्लानि होती है। आध्यात्मिक संत ओशो भी कहते थे, 'धर्म अगर जीवन को जीने की कला है तो राजनीति जीवन कला का शरीर है। धर्म अगर प्रकाश है जीवन का तो राजनीति पृथ्वी है। शरीर न हो तो आत्मा अदृश्य हो जाती है और आत्मा न हो तो शरीर सड़ जाता है, दुर्गंध देने लगता है। ठीक इसी तरह धर्म के बिना राजनीति सड़ा हुआ शरीर हो जाती है और राजनीति से विहीन धर्म भी विलीन हो जाता है।' इस देश की दशा कुछ ऐसी ही है जहां धर्म और राजनीति एक दूसरे के खिलाफ खड़े हैं, देश हाशिये पर जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ही बात करें तो 2014 के चुनाव में देश ने जब उन्हें प्रधानमंत्री चुना था तो इसके पीछे जनता की सोच यही थी कि ये शख्स एक धार्मिक व्यक्ति है और राजनीति का मंझा हुआ खिलाड़ी भी और जब दोनों गुणों का समागम हो जाएगा तो देश तरक्की के एक्सप्रेस-वे पर चल पड़ेगा जिसे कोई रोक नहीं पाएगा। लेकिन तीन सालों में प्रधानमंत्री मोदी ऐसा करिश्मा नहीं कर पाए। उनकी पूरी ताकत चुनाव जीतने में और कांग्रेस समेत तमाम विरोधी दलों का नामो-निशान मिटाने में लग गया। धर्म से उन्होंने दूरी बना ली। यहां हम गोरक्षा की बात कर रहे हैं। उस गाय की जो धर्म से भी जुड़ा है और देश की अर्थव्यवस्था से भी। पिछले दिनों खबर आई कि मोदी सरकार ने पूरे देश में संचालित की जा रही सेना की 39 गोशालाओं को बंद करने का फैसला किया है।

सरकार के इस फैसले पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। इन गोशालाओं में देश की सबसे अच्छी नस्ल की गाय हैं और सरकार के इस फैसले से करीब 20 हजार गायों का भविष्य खतरे में पड़ गया है। साथ ही यहां काम करने वाले करीब ढाई हजार कर्मचारियों की नौकरी पर भी तलवार लटक रही है। सरकार का ये फैसला ऐसे वक्त में आया है जब मोदी सरकार गायों की सुरक्षा को लेकर निरंतर सवालों के घेरे में खड़ी है। आईसीएआर के वैज्ञानिकों ने भी इस बात को लेकर चिंता जताई है कि सैन्य गोशालाएं बंद होने के बाद इन गायों को क्या होगा। क्योंकि देश में दूसरी ऐसी कोई फर्म नहीं है जहां 20 हजार गायों को पाला जा सके। ये गायें देशभर की अन्य गायों की तुलना में सबसे ज्यादा दूध देती हैं। और गाय के दूध से बच्चों की सेहत का मामला भी तो जुड़ा होता है।

20 जुलाई 2017 को कैबिनेट कमेटी ने भारतीय सेना को निर्देश देते हुए कहा कि तीन महीने के भीतर इन गोशालाओं को बंद किया जाए। कमेटी ने आगे कहा कि सेना के जवानों के लिए दूध डेयरी से खरीदा जाए। समझा जा रहा है कि सेना को अब गोशालाएं रखने की जरूरत नहीं है। सरकार के इस फैसले को निजी मिल्क और डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के रूप में भी देखा जा रहा है। लेकिन इसके लिए जिस तरह की कीमत चुकानी पड़ेगी वह समझ से परे हैं। इन सैन्य गोशालाओं का इतिहास देखें तो इसकी शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई थी| सबसे पहली सैन्य गोशाला 1889 में इलाहाबाद में खोली गई थी। वर्तमान सैन्य गोशालाएं अंबाला (हरियाणा), बैंगडुबी (नॉर्थ बंगाल), झांसी, कानपुर, लखनऊ, मेरठ, पिमप्री (महाराष्ट्र), पानागढ़ (बंगाल) और रांची के साथ अन्य स्थानों पर हैं। सरकार के इस फैसले से अब भारत की सबसे अच्छी नस्ल की गायों के भविष्य पर भी प्रश्न चिह्न लग गया है। ये गाय सबसे ज्यादा दूध देती हैं।

बहरहाल, भारतीय सेना की 39 गौशालाओं में पल रही 20 हजार गायों और इन गौशालाओं से जुड़े करीब ढाई हजार कर्मियों को लेकर सरकार का फैसला न सिर्फ गाय और उनके रखरखाव करने वाले कर्मचारियों से नाइंसाफी है बल्कि ये नाइंसाफी सेना के उन जवानों के साथ भी है जो सरहद पर जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा करते हैं। इन गायों के दूध से सेना के जवानों और उनके घर परिवार में बच्चों की सेहत से भी जुड़ा है। कहते हैं गाय का दूध पीने से शरीर की हड्डियां मजबूत होती है। गाय के दूध का मुकाबला डेयरी का पैकेज्ड मिल्क कभी नहीं कर सकता है। इसलिए बेहतर होगा कि सरकार अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करे और संभव हो तो इन गौशालाओं का और विस्तार करे।

Thursday, 27 July 2017

अवसरवादी राजनीति से गजब की यारी

जनता दल यूनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि अवसरवादी राजनीति से उनकी गजब की यारी है। 12 साल में 6 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना वाकई कमाल की बात है। राजद-जेडीयू-कांग्रेस के त्रिगुट से बने महागठबंधन से यारी तोड़ जब नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री पद से बुधवार को इस्तीफा दिया था तो सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें ट्वीट कर भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ने के लिए बधाई दी। भारतीय राजनीति के इतिहास में शायद ऐसा पहली बार हुआ होगा जब देश के प्रधानमंत्री ने किसी मुख्यमंत्री को उसके इस्तीफा देने पर बधाई दी हो।

दक्षिणपंथी राजनीतिक को करीब से जानने वाले कहते हैं कि नीतीश कुमार की वैचारिक प्रतिबद्धता भाजपा के सांचे में ज्यादा फिट बैठती है। यह ठीक बात है कि नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक कालखंड में जो सर्वाधिक बेहतर समय गुजारे हैं उसमें अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री और फिर बिहार में भाजपा के साथ गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री बनना शामिल है। इतना वक्त भाजपा संग गुजारने के बाद भी अगर नीतीश भाजपा के पीएम उम्मीदवार बनाए जाने पर नरेंद्र मोदी का खुला विद्रोह कर बिहार में एनडीए की सरकार गिरा देते हैं तो इसे क्या कहेंगे? अगर भाजपा कार्यकर्ताओं के इतने ही स्वभाविक नेता नीतीश कुमार हैं तो भाजपा के खिलाफ 2015 के बिहार चुनाव में चारा घोटाले के जनक लालू यादव के साथ मिलकर महागठबंधन क्यों बनाया? नीतीश कुमार अगर भाजपा कार्यकर्ताओं के इतने ही स्वभाविक नेता हैं तो वह भाजपा में खुद को विलय क्यों नहीं कर देते हैं।

मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए नरेंद्र मोदी का खुला विरोध, मुख्यमंत्री बने रहने के लिए लालू यादव के साथ महागठबंधन बनाकर चुनाव जीत पीएम मोदी को अपनी ताकत का अहसास कराना और फिर कुर्सी की सलामती के लिए मोदी-शाह की जोड़ी के साथ हाथ मिलाकर लालू को उनकी औकात बताना यह तो अवसरवादी राजनीति का कोई महात्मा ही कर सकता है। लोग भले कहें कि नीतीश कुमार की राजनीतिक प्रतिबद्धता भाजपा में रचती और बसती है लेकिन सच यही है कि नीतीश कुमार की कोई राजनीतिक प्रतिबद्धता नहीं है। सत्ता में बने रहने के लिए उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता बदलती रहती है।

अगर याद हो तो अगस्त 2015 की बात है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जनता दल यूनाईटेड को जनता का दमन और उत्पीड़न पार्टी की संज्ञा दी थी। तब नीतीश ने पीएम मोदी पर पलटवार करते हुए बीजेपी (भाजपा) को बड़का झूठा पार्टी करार दिया था। तब नीतीश ने मोदी से कहा था कि भाजपा को हम लोग भारतीय जुमला पार्टी कहते थे लेकिन आप जिस स्तर पर चुनावी बातचीत को ले जा रहे हैं अब उससे काम नहीं चलने वाला है, अब उस व्याकरण के अनुसार भाजपा का नाम ‘बड़का झूठा पार्टी’ छोड़ कोई दूसरा नाम नहीं सूझ रहा है। नीतीश ने तब गुजरात दंगों का भी जिक्र किया था और कहा था कि आपने पिछली बार कह दिया कि आरजेडी ने जंगलराज फैलाया और इस वक्त बोल रहे हैं कि जेडीयू का मतलब जनता का दमन और उत्पीड़न है। आप गुजरात को क्यों भूल जाते हैं? भूल गए कि श्रद्धेय वाजपेयी जी ने आपको कहा था कि राजधर्म का पालन कीजिए?' लेकिन संयोग देखिए, नीतीश कुमार आज उसी बड़का झूठा पार्टी की गोद में जाकर बैठ गए हैं।

बिहार की चुनावी सरगर्मी के बीच अगस्त 2015 के उस दिन को याद करने का यह सही वक्त है जब नीतीश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्वीट पर तंज कसते हुए कहा था कि 'इनका तो सब कुछ ट्विटर पर है। कहते भी ट्विटर पर हैं और सुनते भी ट्विटर पर ही हैं। जब हमने जाना कि यह ट्विटर की सरकार है तो हम अपनी बात कहने के लिए ट्विटर पर चले गए। वहीं पर हमने उनसे कुछ बातें कही, मगर वहां भी नहीं सुना गया। संयोग से जब नीतीश ने बुधवार को बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो प्रधानमंत्री मोदी ने सबसे पहले ट्वीट कर नीतीश को बधाई दी। इतना ही नहीं, नीतीश ने पीएम मोदी के ट्वीट का जवाब देते हुए तहेदिल से शुक्रिया भी लिखा। इतना सब तो कोई अवसरवादी राजनीति से यारी रखने वाला ही कर सकता है।

Thursday, 29 June 2017

नीतीश की जय या विनाशकाले विपरीत बुद्धि

भाजपा द्वारा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को जब प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाए जाने की घोषणा की गई थी तो बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था, 'विनाश काले विपरीत बुद्धि'। कभी भाजपा नीत एनडीए के घटक दल रहे जेडीयू के नेता नीतीश कुमार ने तब कहा था कि विभाजनकारी तत्वों को देश स्वीकार नहीं करेगा। हालांकि नीतीश के कहे अनुसार, देश का जो भी बेड़ा गर्क हो रहा हो, लेकिन नरेंद्र मोदी के संदर्भ में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वह प्रधानमंत्री बने बैठे हैं और देश ने पूरे मनोयोग से उन्हें स्वीकार भी किया है।

कहने का मतलब यह कि नीतीश कुमार ने तब जो भविष्यवाणी की थी वह पूरी तरह से गलत साबित हुई और अब राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी एकजुटता दिखाने का वक्त था तो वही नीतीश कुमार भाजपा नीत एनडीए और नरेंद्र मोदी की गोद में जा बैठे हैं। विपक्षी उम्मीदवार के नाम का ऐलान होने तक भी इंतजार करना नीतीश ने उचित नहीं समझा और एनडीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देने की घोषणा कर डाली। जिस लालू और कांग्रेस से मिलकर बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन का वटवृक्ष खड़ा किया उसकी बुनियाद हिलाने में बिना सोचे-समझे कोई देरी नहीं की।

हकीकत में इसे ही कहते हैं 'विनाशकाले विपरीत बुद्धि', मतलब जब विनाश का वक्त करीब आता है तो कहते हैं कि बुद्धि काम करना बंद कर देती है। यदि हम इसकी व्याख्या करें तो इसका अर्थ ये निकलता है कि जब इंसान का विनाश निकट आता है तो उसकी बुद्धि उसका साथ छोड़ देती है अर्थात् विनाश तो पहले से ही सुनिश्चित होता है बस उसे बुद्धि से सहयोग प्राप्त होना होता है और उसका विनाश आसानी से संपन्न हो जाता है। व्यक्तिगत तौर पर मैं कर्म को सर्वोपरि मानता हूं लेकिन मैं ये भी मानता हूं कि बुद्धि के निष्क्रिय हो जाने से ही ऐसी स्थिति आती है। जब लोग अपने हितैषियों की बात मानना बंद कर दें, अपनी सोच को सर्वोपरि मानने लगें, अपने निकटस्थ लोगों को चोट पहुंचाने लगें तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि कुछ गड़बड़ है।

इंसान बहुत बार नकारात्मक सोच का शिकार हो जाता है और उसे पूरी कायनात उसके विरोध में षड्यंत्र करती नजर आती है। यदि कोई कार्य विफल हो जाता है तो उसके कारणों को खोजने के बजाये वह भाग्य को दोषी ठहराने लगता है और ऐसे में कोई उसे सही सलाह देने का प्रयास भी करता है तो उसे लगता है कि वह मुझे गलत सलाह दे रहा है या हमारे खिलाफ कोई साजिश रच रहा है। इस तरह से वह अपने हितैषियों से दूर होता चला जाता है और इसी दरम्यान दुश्मन सक्रिय हो जाते हैं। दुश्मन उसके चारों ओर एक कॉकस बनाकर उसे घेर लेते हैं और सलाह देने लगते हैं तो उसे लगता है कि यह तो बहुत सही सलाह दे रहा है। एक प्रकार से वह दुष्चक्र में घिर जाता है जो कि विनाश के समीप ले जाने में उसकी मदद करता है और इसी पूरी प्रक्रिया को समझाने की कोशिश में तुलसीदास एक पंक्ति में लिख गए- 'विनाशकाले विपरीत बुद्धि'।

राष्ट्रपति पद के लिए जब पूरी विपक्ष एक साझा उम्मीदवार उतारने की कोशिश में था, उसी बीच उसकी एक बेहद अहम कड़ी नीतीश कुमार ने एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देकर सबको चौंका दिया। सियासी गलियारों से लेकर आमजन के बीच इस सवाल का जवाब पाने को बेताबी है कि आखिर नीतीश ने क्यों एनडीए उम्मीदवार को समर्थन देने का फैसला किया है। अगर रामनाथ कोविंद बिहार का राज्यपाल रहते राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाए गए हैं तो मीरा कुमार तो बिहार की बेटी हैं और लोकसभा की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। रामनाथ कोविंद अगर महादलित हैं तो मीरा कुमार भी दलितों की कद्दावर नेता हैं और इससे भी ऊपर आप बिहार में महागठबंधन की सरकार के नेता हैं जिसकी बुनियाद कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव ने रखी। कम से कम इतना तो आंखों में पानी रखते कि मीरा कुमार बिहार की बेटी के साथ महिला भी हैं और कांग्रेस की नेता भी। 

दरअसल, नीतीश कुमार भी अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह की तरह हर मुद्दे को सियासत के तराजू से तौलने लगे हैं। उनके लिए न तो बिहार की अस्मिता मायने रखता है, न महिला सशक्तिकरण की कोई अहमियत है और न ही राजनीतिक प्रतिबद्धता को निभाना चाहते हैं। मोदी और शाह की तरह उनके मन और मस्तिष्क में भी जीत के अहंकार की मोटी परत जमती जा रही है और सत्ता व पद के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि जिस लालू प्रसाद यादव और उनके मंत्री बेटों के साथ नीतीश को तालमेल बिठाकर सरकार चलानी पड़ रही है वह कोई आसान काम नहीं है, लेकिन यही तो आपकी राजनीतिक बुद्धिमता है और इसीलिए तो जनता की आप पसंद बने थे। लालू के दोनों बेटों को मंत्री बनाने से पहले ही यह सोचना चाहिए था कि यह बिहार के विकास के लिए ठीक नहीं होगा। तब तो मुख्यमंत्री बनने के लिए जो भी समझौता करना पड़ा आपने किया तो उससे निपटने की ताकत भी एक मुख्यमंत्री में होनी चाहिए। लालू के कुनबे की अराजकता से परेशान होकर फिर से मोदी और भाजपा नीत एनडीए के खेमे में इस उम्मीद से ताक-झांक करना कि इससे लालू और कांग्रेस को उनकी औकाद में रहेंगे यह नीतीश की बड़ी राजनीतिक भूल होगी। इससे साफ जाहिर होता है कि नीतीश दो नावों पर एक साथ सवारी करना चाहते हैं। ऐसे में इसके दुष्परिणाम से नीतीश या तो अनभिज्ञ हैं या फिर जानबूझकर ये गलती कर रहे हैं। 

दरअसल, बिहार में महादलित वोट बैंक निर्णायक भूमिका में है। संयोग से रामनाथ कोविंद महादलित श्रेणी से ही आते हैं। बिहार में लालू प्रसाद यादव के यादव-मुस्लिम गठजोड़ पर नीतीश कुमार के भारी होने की वजह महादलित वोट बैंक का उनके साथ जाना ही रहा है। नीतीश के लिए महादलित वोटों का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि उन्होंने 2014 में अपनी जगह जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाने का दांव चला था। मांझी भी महादलित श्रेणी से ही आते हैं। बाद में जब मांझी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हद पार करने लगीं तो नीतीश को उन्हें हटाने का फैसला लेना पड़ा। मांझी ने इस फैसले को महादलितों का अपमान करार दिया था। एक हद तक वह वोट बैंक नीतीश से खिसका भी। 2015 के आम चुनाव में नीतीश कुमार महागठबंधन के जरिए दोबारा सत्ता में तो आ गए लेकिन वह बैसाखी के सहारे अपनी ताकत बनाए रखने के बजाय अकेले अपने दम पर मजबूत दिखना चाहते हैं। इसके लिए एक बार फिर से उनकी नजर महादलित वोट बैंक पर है। नीतीश को लगता है कि कोविंद का समर्थन कर महादलितों से नजदीकियां बढ़ाई जा सकती हैं जिसका फायदा उन्हें भविष्य में मिलेगा।

दूसरा, बिहार चुनाव जीतने के बाद गैर भाजपाई दलों के बीच नीतीश कुमार सबसे बड़ा चेहरा बन कर उभरे हैं। उसी के मद्देनजर जब-तब उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी के मुकाबले प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की बात चलती रहती है, लेकिन नीतीश इस बात को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हैं। कांग्रेस ने अब तक इस मुद्दे पर अपना नजरिया स्पष्ट नहीं किया है। सियासी गलियारों में कहा जा रहा है कि कांग्रेस राहुल का मोह नहीं छोड़ पा रही है, नीतीश को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार मान लेने का मतलब एक तरह से राहुल गांधी का हथियार डाल देना होगा। कांग्रेस के इस रवैये से नीतीश आहत हैं और वह खास मौकों पर कांग्रेस से अपनी दूरी बनाकर दबाव की राजनीति के रूप में काम कर रहे हैं। कोविंद को समर्थन का ऐलान उनकी इसी रणनीति का हिस्सा है।

नीतीश के राजनीतिक भविष्य के लिए यह भी स्थापित होना जरूरी है कि उन्होंने मुख्यमंत्री बने रहने के लिए लालू प्रसाद यादव या कांग्रेस के सामने कोई समर्पण नहीं किया है बल्कि महागठबंधन की सरकार के मुख्तार वह खुद हैं। साझा सरकार होने के बावजूद तमाम बड़े मौकों पर अपना अलग रणनीतिक स्टैंड लेकर नीतीश यह स्थापित करने में पीछे नहीं रहे हैं कि लालू यादव या कांग्रेस उनके मास्टर नहीं हैं। नोटबंदी से लेकर राष्ट्रपति चुनाव तक पर नीतीश के फैसले इसकी मिसाल हैं। नीतीश को यह भी लगता है कि लालू यादव और उनका पूरा परिवार इस वक्त जिस तरह से सीबीआई से लेकर आयकर विभाग के घेरे में है, सरकार को गिराने जैसा कोई जोखिम लालू नहीं लेना चाहेंगे।

कहने का मतलब यह कि, लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक और पारिवारिक मजबूरी का फायदा उठाते हुए अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता को ताक पर रखकर सिर्फ 'नीतीश की जय' के लिए जिस तरह के सियासी मार्ग पर नीतीश कुमार आगे बढ़ रहे हैं वह उनके लिए 'विनाशकाले विपरीत बुद्धि' जैसा ही साबित होने वाला है। क्योंकि नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता, सुशासन बाबू, बिहार की अस्मिता, बिहार के विकास पुरूष और मोदी के खिलाफ 2019 में पीएम पद के लिए सशक्त संभावित चेहरा इन सबकी साख पर बट्टा लगाने की बड़ी गलती वाले सियासी राह पर आगे बढ़ चुके हैं। मोदी और शाह की नजर में बिहार अब प्राथमिकता में है। नीतीश को राजनीतिक रूप से कमजोर करना प्राथमिकता में हैं। रामनाथ कोविंद को नीतीश का समर्थन नोटबंदी के बाद इसकी दूसरी कड़ी है।

Sunday, 23 April 2017

अन्नदाता का दर्द और बेरहम शासक

गुलाम और आजाद भारत कई तरह के विरोध प्रदर्शनों का गवाह रहा है, लेकिन दिल्ली के जंतर मंतर, प्रधानमंत्री कार्यालय और प्रधानमंत्री आवास के बाहर अंतराल दर अंतराल ऐसा प्रदर्शन (तमिलनाडु के किसानों का आंदोलन) कभी नहीं देखा। गांधी के सत्य और अहिंसा से प्रेरित किसानों का एक महीने से अधिक समय से चला आ रहा विरोध प्रदर्शन यह जताने के लिए पर्याप्त है कि सूखा, कर्ज और बेकार की नीतियां देश के किसानों को किस तरह से लील रही हैं। कृषि विकास दर 1.2 प्रतिशत के चिंताजनक स्तर पर है और लाखों किसान कर्ज व थोड़ी सी आमदनी के चक्रव्यूह में इस कदर फंसा हुए है कि जीवन की बेहतरी अपनी जीवनलीला को खत्म करने में ही पाता है। और इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि अन्नदाता के इस दर्द को देश का प्रधानसेवक (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ना देख पा रहा है, ना सुन पा रहा है और ना महसूस कर पा रहा है।

सबसे खराब दौर में खेती और अन्नदाता
तमिलनाडु में करीब 40 प्रतिशत से अधिक लोग खेती-किसानी पर निर्भर हैं। तमिलनाडु में कम बारिश के कारण पानी की कमी, फसलों की कम कीमत, किसानों को कर्ज मिलने में होने वाली दिक्कतों ने कृषि संकट को पिछले कई दशकों के सबसे खराब दौर में पहुंचा दिया है। पिछले कुछ सालों में खराब बारिश और सूखे ने हालात ने किसानी को तहस-नहस कर दिया है और खेत बंजर हो चुके हैं। पिछले साल अक्टूबर के बाद से अब तक तमिलनाडु के सूखा प्रभावित जिलों में कर्ज के बोझ से दबे करीब 58 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। जंतर-मंतर पर जुटे करीब 100 अन्नदाता मार्च महीने में ट्रेन से दिल्ली आए थे। इसमें से हर अन्नदाता की अपनी एक दर्दनाक कहानी है कि किस तरह से सुखाड़ से बंजर होते खेत और गूंगी व बहरी केंद्र व राज्य सरकारें उनकी जिंदगी के सारे सबूत मिटाने का खेल खेल रही है।

विरोध-प्रदर्शन के तरीकों पर पर गौर कीजिए
पिछले हफ्ते दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ा ही अलग तरह का नज़ारा दिखा। 65 साल के किसान चिन्नागोदांगी पलानीसामी ने अपने राज्य तमिलनाडु में किसानों की दुर्दशा की तरफ सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपने दांतों के बीच जिंदा चूहा रखकर प्रदर्शन किया। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पलानीसामी कहते हैं, मैं और मेरे साथी किसान ये संदेश देने की कोशिश कर रहे थे कि अगर चीजें नहीं सुधरीं तो हम चूहों को खाने के लिए मजबूर हो जाएंगे।
याद रहे, दर्द की दास्तान लिए ये किसान उसी तमिलनाडु से आए हैं जिसकी गिनती भारत के सबसे विकसित सूबों में होती है। ये अन्नदाता सरकार से कोई आलीशान वातानुकूलित कोठियां नहीं मांग रहे हैं। वे तो सूखा राहत कोष बनाने, बुजुर्ग किसानों के लिए पेंशन, फसल और कृषि कर्ज की छूट, फसलों की बेहतर कीमत और उनके खेतों को सिंचाई के लिए नदियों को जोड़ने की न्यायसंगत मांग कर रहे हैं।

नहीं पसीजा देश के प्रधानसेवक का दिल
पारंपरिक सारंग जैसे वस्त्र और पगड़ी पहने इन किसानों ने मानव खोपड़ियों को खुद से बांधा है ताकि वे खुद को मृतक किसानों से जोड़ सकें। उन्होंने अपने दांतों के बीच जिंदा चूहे रखकर प्रदर्शन किये, अपने आधे सिर मुंडाकर प्रदर्शन किए, महिलाओं की पारंपरिक साड़ियां पहनकर प्रदर्शन किए, कपड़े उतारकर नग्न प्रदर्शन किया और शव यात्रा निकालकर प्रतीकात्मक अंत्येष्टि तक की. प्रदर्शनकारी अन्नदाताओं ने मिट्टी पर रखकर खाना खाया, अपना मूत्र पीकर प्रदर्शन किया तथा आगे मल खाने की धमकी दी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात नहीं करने देने से नाराज होकर उनके आवास के बाहर नग्न प्रदर्शन तक किया। लेकिन देश के प्रधानसेवक का दिल नहीं पसीजा। तो अन्नदाता को लेकर मोदी सरकार की कृषि नीति और मंशा पर सवाल उठना लाजिमी है।

प्रधानसेवक की करनी-कथनी में गहरा फर्क
लालकिले की प्राचीर से खुद को देश का प्रधानसेवक की उपाधि से विभूषित करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करनी और कथनी में गहरा फर्क है। यह हम नहीं कह रहे, बल्कि खेती-किसानी को लेकर मोदी सरकार के उपेक्षित रवैये से यह साफ जाहिर होता है। मन की बात, जनसभाओं और विदेशी यात्राओं के दौरान जहां भी मौका मिलता है, देश के किसानों की दशा और दिशा को बेहतर करने के लिए बड़ी-बड़ी बातें करने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नहीं चूकते लेकिन जब उन्हीं बातों को जमीन पर उतारने की बारी आती है तो चुप्पी साध जाते हैं। गांधी और पटेल के नाम पर राजनीतिक करने वाले पीएम मोदी अगर तमिलनाडु के इन किसानों की दर्द भरी दास्तां थोड़ा समय निकालकर सुन लेते तो इन अन्नदाताओं का कितना भला होता शायद इसका अंदाजा आपके लोगों ने नहीं लगा पाया।

प्रधानमंत्री जी! गुजरात के सूरत शहर में धूमधड़ाके के साथ 25000 बाइक सवारों की टोली के बीच 12 किलोमीटर लंबा रोड शो करने का वक्त आपके पास है, कार्यक्रम में अनाप-शनाप हुए खर्च को सहन करने की ताकत आपमें है, लेकिन उस 37 दिनों से चल रहे आंदोलन में शामिल अन्नदाताओं के लिए 10 मिनट का वक्त आपके पास नहीं है। तो क्या, अन्नदाता के प्रति आपकी बेरूखी यह कहने के लिए पर्याप्त नहीं है कि किसानों के लिए जैसा आप बोलते हैं, आपकी सोच और सरकार की नीति में कहीं भी फिट नहीं बैठती है?

Sunday, 5 March 2017

काशी का किस्सा : बिगड़े दूध से मक्खन नहीं निकलता

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण के मतदान से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन दिन से काशी प्रवास पर हैं। 4 मार्च से 6 मार्च के बीच काशी के मतदाताओं से रू-ब-रू होने के लिए प्रधानमंत्री ने शनिवार और रविवार को अलग-अलग इलाकों में रोड शो किया और जनसभाएं कीं। कहते हैं कि पूरी काशी नगरी केसरिया रंग में रंग गया है। चुनाव विशेषज्ञ तो यहां तक कह रहे हैं कि जितनी भीड़ पीएम मोदी के रोड शो में दिखी है अगर वह वोट में परिवर्तित हो जाता है तो कम से कम वाराणसी लोकसभा के सभी विधानसभाओं में तो भाजपा की जीत पक्की समझिए। लेकिन भाजपा के मार्गदर्शक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) का यह कहना कि, कोशिश यह की जा रही है कि बिगड़े दूध से जो भी मक्खन निकल सके, उसे निकाल लिया जाए।

तो क्या पीएम मोदी को अपने ही संसदीय क्षेत्र में भाजपा की हार का खतरा दिख रहा है? हां, इस बात की पुष्टि मोदी सरकार के मंत्री उपेंद्र कुशवाहा और भाजपा के स्टार नेता व सांसद शत्रुघ्न सिन्हा की टिप्पणी से भी होती है। वाराणसी में पीएम मोदी के रोड शो पर गहरी नाराजगी जताते हुए राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के प्रमुख और केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने शनिवार को कहा, 'मैं व्यक्तिगत रूप से महसूस करता हूं कि प्रधानमंत्री का पद इतना ऊंचा होता है कि उन्हें रोड शो नहीं करना चाहिए था। पीएम का यह रोड शो उनके पद और व्यक्तित्व की गरिमा के अनुकूल नहीं है।' अगले दिन रविवार को शत्रुघ्न सिन्हा उठ खड़े हुए और कहा, 'यह किसी किस्म की निराशा का भी संकेत देता है। यह कैसी हताशा है?' अगर आप कॉन्फिडेंट हैं, आपके पास स्टार प्रचारक हैं, जलेबी खाने वाले नेता हैं तो इस तामझाम का क्या मतलब है?'

फ्लैशबैक में जाएं तो ढाई साल पहले जब लोकसभा चुनाव लड़ने पीएम मोदी वाराणसी आए थे, तब नामांकन के बाद मुश्किल से एक बार कुछ घंटों के लिए उन्हें यहां आने की जरूरत पड़ी थी और वाराणसी की जनता ने उन्हें भारी बहुमत से जिताकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया था। आज हालत यह है कि विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशियों को जिताने के लिए उन्हें वह सब कुछ करना पड़ रहा है, जो उन्होंने खुद के लिए भी नहीं किया था। सवा सौ करोड़ देशवासी के प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश और खासतौर पर वाराणसी में भाजपा की जीत के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया है। तीन दिन तक वाराणसी में कैम्प करना, शनिवार और रविवार को सात-सात किलोमीटर लंबा रोड शो करना, केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक दर्जन से अधिक मंत्रियों को ड्यूटी लगाने को आखिर किस रूप में देखा जाए?

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा को वाराणसी के मतदाताओं पर अब वो भरोसा नहीं रहा, जो 2014 में था? तमाम राजनीतिक विश्लेषकों की राय मानें तो वो इसे प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी पर से वाराणसी की जनता का 'भरोसा उठना' बताते हैं। वह कहते हैं, देश के प्रधानमंत्री को नीतियों की बात करनी चाहिए, क्या किया और क्या करने वाले हैं, वह सब कुछ बताना चाहिए। वाराणसी के लिए उन्होंने क्या किया और क्या करने वाले हैं, यह बताना चाहिए। लेकिन प्रधानमंत्री रोड शो कर रहे हैं। आखिर रोड शो की जरूरत क्यों पड़ी? जनता तो हिसाब मांगेगी। आखिर मोदी सरकार के तीन साल होने जा रहे हैं।
दरअसल, नरेंद्र मोदी की यह पुरानी शैली रही है कि माहौल बनाकर, जुमलेबाजी कर, मतदाताओं को उंगली घुमाकर दिग्भ्रमित कर दो और फिर वोट ले लो। रोड शो के पीछे की रणनीति यही होती है। जीत हासिल करने की मोदी की इस पुरानी शैली को अखिलेश और राहुल भी खूब आजमा रहे हैं। दरअसल इस तरह की गलत परंपरा के जनक चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर हैं जिन्होंने पहले मोदी की आदत बिगाड़ी और अब राहुल और अखिलेश को उसी रास्ते पर आगे बढ़ा रहे हैं। जरा सोचकर देखिए, अगर मोदी जी ने देश के लिए कुछ अच्छा किया होता, अपने इलाके में कुछ अच्छा काम किया होता तो आज कम से कम काशी नगरी में उन्हें रोड शो की जरूरत नहीं पड़ती।

भाजपा आलाकमान अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निश्चित रूप से इस बात का भान हो गया है कि जनता उनकी जुमलेबाजी को समझ गई है। तभी तो विधानसभा चुनाव के वो उम्मीदवार जो भाजपा के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं उन्हें बिल्कुल पीछे धकेल दिया गया है। यूं कहिए कि मतदाताओं ने उनके चेहरे तक नहीं देखे। ये तो अजीब चुनाव है। लोकतंत्र की सेहत के लिए ये ठीक नहीं है। कहते हैं कि बनारस के राजनीतिक इतिहास में भी ऐसा कभी नहीं हुआ। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही एक प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में हैं।

वाराणसी भाजपा और खासतौर से नरेंद्र मोदी के लिए नाक की लड़ाई है। हर जगह जीत गए और यहां हार गए तो क्या मुंह दिखाएंगे प्रधानसेवक जी। पार्टी के लोग उनसे सवाल पूछने लगेंगे। इसलिए वह किसी भी सूरत में यहां की कम से कम भाजपा की तीन परंपरागत सीटों को बचाकर अपनी साख बचाना चाहते हैं। वाराणसी शहर क्षेत्र की ये तीनों सीटें फिलहाल भाजपा के पास हैं। शहर दक्षिणी से श्यामदेव राय चौधरी, उत्तरी से रविंद्र जायसवाल और कैंटोनमेंट से ज्योत्स्ना श्रीवास्तव भाजपा से मौजूदा विधायक हैं। शहर दक्षिणी में चौधरी की जगह इस बार आरएसएस के युवा कार्यकर्ता नीलकंठ तिवारी को टिकट दिया गया है। उत्तरी क्षेत्र से मौजूदा विधायक रवींद्र जायसवाल पर भाजपा ने एक बार फिर भरोसा किया है और कैंटोनमेंट से मौजूदा विधायक ज्योत्स्ना के बेटे सौरभ श्रीवास्तव को उम्मीदवार बनाया गया है।

भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस की मानें तो उसे भरोसा नहीं है कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी की ये कोशिशें रंग लाएंगी। संघ भी इस सच को मानता है कि पांच में से दो सीटें भी निकल जाए तो बहुत है। वाराणसी के बिगड़े हालात से भाजपा और संघ का शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह से वाकिफ है। पीएम मोदी का तीन दिन का काशी प्रवास इसी रणनीति का हिस्सा है। मोदी और शाह को लगता है कि माहौल बनाकर चुनाव जीता जा सकता है। लेकिन इन्हें ये बात समझनी चाहिए कि ये 2014 का साल नहीं है। तब जनता ने नरेंद्र मोदी पर अपना विश्वास लुटाया था। अब ढाई साल बात उसी जनता को ये लगने लगा है कि मोदी जी ने जन-विश्वास से विश्वासघात किया है।

बहरहाल, ढाई साल में बहुत कुछ बदल गया है। प्रधानमंत्री के अपने लोग भी मानने लगे हैं कि काशी में भाजपा का दूध बिगड़ चुका है और रहीम दास की मानें तो बिगड़े दूध से मक्खन नहीं निकलता, चाहे उसे कितना भी मथा जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपने लावलश्कर के साथ काशी नगरी के मतदाताओं को मथ रहे हैं। अब इसमें से कितना मक्खन निकाल पाते हैं यह तो 11 मार्च को ही पता चलेगा।

Tuesday, 28 February 2017

भाजपा के मंत्री क्यों मना रहे हैं मातम?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 403 विधानसभा सीटों में से एक भी सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया। चार चरण का चुनाव खत्म होने के बाद अचानक ऐसा क्या हो गया कि एक के बाद एक तीन-तीन भाजपा नेता व मोदी सरकार के मंत्री पार्टी की इस गलती को कोस रहे हैं और मातम मनाने की भरपूर नौटंकी भी। सबसे पहले भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और मोदी सरकार में देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह, फिर भाजपा की फायरब्रांड नेत्री उमा भारती और फिर भाजपा के मुस्लिम नेता और केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी, एक के बाद एक ये नेता उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में किसी भी मुस्लिम को पार्टी के टिकट पर उम्मीदवार नहीं बनाने के फैसले पर सवाल उठाने लगे हैं। इन नेताओं के बयान को पार्टी की मुस्लिम विरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज समझना ठीक नहीं होगा।

मोदी सरकार में मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी को इस बात का मलाल है कि भाजपा ने यूपी के चुनाव में एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया। हालांकि नकवी कह रहे हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर कमी हुई है तो भरपाई भी सूद समेत की जाएगी। उन्होंने कहा कि बीजेपी के मुस्लिमों को टिकट न देने के आधार पर केंद्र सरकार के कामकाज को नहीं आंका जाना चाहिए। उन्होंने कहा, 'भाजपा समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने में भरोसा रखती है और पार्टी की राज्य में सरकार बनने पर मुस्लिम समुदाय के लोगों को इसकी भरपाई की जाएगी। हमने सभी के सहयोग से केंद्र में सरकार बनाई। हम उत्तर प्रदेश में भी सरकार बनाएंगे।'

इससे पहले हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा की फायरब्रांड नेता और केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने 'सीएनएन-न्यूज 18' से कहा, 'मुझे सच में इस बात का दु:ख है कि हम किसी मुस्लिम प्रत्याशी को चुनाव मैदान में नहीं उतार सके। मैंने इस बारे में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य से बात की थी कि किसी प्रकार एक मुसलमान को विधानसभा में लाया जाए।'

हालांकि उमा भारती की टिप्पणी पर उनकी ही पार्टी के विनय कटियार ने सवालिया लहजे में कहा, 'जब मुसलमान हमारे लिए वोट ही नहीं करते तो हम उन्हें टिकट क्यों दें?' मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, जब ये सवाल भाजपा के यूपी अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य से पूछा गया कि भाजपा ने किसी मुसलमान को टिकट क्यों नहीं दिया? तो उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि कोई मुस्लिम कार्यकर्ता चुनाव जीतने के लायक ही नहीं था इसलिए टिकट नहीं दिया। कहने का मतलब यह कि भाजपा का 'सबका साथ-सबका विकास' का नारा सिर्फ जुमलेबाजी है। पूरे 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी के बीच से कोई एक प्रतिनिधि को भाजपा ने मौका ही नहीं दिया।

इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्री और पूर्व भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि इस चुनावी संग्राम में भाजपा को मुस्लिम प्रत्याशी उतारने चाहिए थे। टाइम्स नाउ के एडिटर राहुल शिवशंकर से खास बातचीत में राजनाथ सिंह ने कहा कि भाजपा को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुसलमान उम्मीदवारों को उतारना चाहिए था। 'हमने कई दूसरे राज्यों में अल्पसंख्यकों को टिकट दिए हैं। उत्तर प्रदेश में भी इस पर बात होनी चाहिए थी। मैं वहां नहीं था, मुझे जो पता है उसके आधार पर बोल रहा हूं। हो सकता उन्हें (भाजपा संसदीय बोर्ड को) कोई जीतने योग्य मुस्लिम उम्मीदवार नहीं मिले हों। लेकिन, मेरा मानना है कि फिर भी उन्हें (मुसलमानों को) टिकट मिलना चाहिए था।'

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी 20 प्रतिशत के करीब है। भाजपा लगातार कहती रही है कि टिकट बंटवारा योग्यता और उम्मीदवार के जीतने की संभावना के आधार पर तय होता है न कि जाति और धर्म के आधार पर। इसकी पुष्टि यूपी भाजपा के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने भी यह कहकर साफ कर दिया कि कोई मुस्लिम कार्यकर्ता चुनाव जीतने के लायक ही नहीं था। तो बड़ा सवाल यह उठता है कि पार्टी के कद्दावर नेता और मोदी सरकार के तीन-तीन वरिष्ठ मंत्री राजनाथ सिंह, उमा भारती और मुख्तार अब्बास नकवी को यूपी में चार चरणों के चुनाव संपन्न होने के बाद अचानक मुस्लिमों को चुनाव उम्मीदवार न बनाना भाजपा की गलती क्यों लग रही है?

निश्चित रूप से इस बयान के पीछे यूपी चुनाव में बाकी बचे चरणों के मतदान जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी भी शामिल है, मुस्लिम मतदाताओं को भाजपा की तरफ आकर्षित करने की एक रणनीतिक चाल है। क्योंकि भाजपा आलाकमान को यह अच्छे से पता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को मुसलमान मतदाताओं ने भी बड़ी संख्या में वोट किया था। इस चुनाव में हवा का रूख भाजपा के पक्ष में नहीं दिख रहा है इसलिए भाजपा नेता इस तरह के 'सर्व-धर्म-सम्भाव' का कार्ड खेलकर और 'सबका साथ सबका विकास' के नारे को स्थापित करने की नीति के तहत इस तरह के बयान दे रहे हैं। ताकि मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में अपनी इज्जत बचा सकें।

दूसरी बात शायद भाजपा आलाकमान को यह लग रहा होगा कि चुनाव नजदीक आने पर कुछ ऐसा चमत्कारिक घटनाक्रम हो जाएगा कि बीच चुनाव में वोटों के ध्रवीकरण की लहर चल जाएगी और हिन्दुओं का करीब 80 प्रतिशत वोट का अधिक से अधिक हिस्सा भाजपा के पक्ष में आ जाएगा। लेकिन ऐसी कोई लहर नहीं चल पाने के बाद भाजपा को काफी निराशा हाथ लगी। इसलिए पार्टी ने 'सबका साथ-सबका विकास' के जुमले को एक बार फिर से उछालकर इसके तहत यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि हम मुस्लिमों के खिलाफ नहीं हैं। हम सब चाहते तो थे और पार्टी को मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारना चाहिए था।

गौर करने वाली बात यह भी है कि मुस्लिमों से सहानूभूति रखने वाले बयान पार्टी के अंदर से नहीं बल्कि मोदी सरकार के मंत्रियों की तरफ से आ रहे हैं। संकेत साफ है कि मुस्लिमों को लेकर पार्टी की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। सरकार का धर्म होता है कि देश के हर वर्ग के लोगों का समान विकास हो लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हर पार्टी अपने सिद्धांतों की राजनीति करती है और जब वह पार्टी सरकार में आती है तो अपनी उसी विचारधारा को सरकार की नीति के रूप में पेश करती है। कहने का मतलब यह कि यूपी चुनाव में मुस्लिम उम्मीदवारों की अनदेखी को लेकर जिस तरह के बयान जारी किए जा रहे हैं यह महज मुस्लिम मतदाताओं को दिग्भ्रमित करने की एक चुनावी चाल है।  

मालूम हो कि भाजपा की विरोधी पार्टियां चाहे वो सपा-कांग्रेस गठबंधन हो या फिर बसपा और राष्ट्रीय लोक दल हो, मुस्लिम वोट के सहारे ही अपनी नैया पार कराने की कोशिश में लगे हैं। यही वजह है कि इस बार के चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन ने 100 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है, वहीं मायावती ने 97 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। और चुनाव को आखिरी दो-तीन चरणों में भाजपा को भी याद आया कि हमसे गलती हो गई। हमें भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारने चाहिए थे।

Sunday, 12 February 2017

तो पलट दो सरकार को उलटा

बीते एक-दो महीने के आंकड़ों पर गौर करें तो चीनी, आटा, गेहूं, दाल ब्रेड से लेकर छोले, मूंगफली और चॉकलेट तक सभी चीजें महंगी हो गई हैं। आम बजट के बाद भी कुछ चीजों के दाम बढ़े हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के चुनाव में महंगाई कोई मुद्दा नहीं है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले चरण में वेस्ट की 73 सीटों पर मतदान के दिन तक नेता जात-पांत, सांप्रदायिक मुद्दे और स्थानीय मुद्दों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते दिखे।

इस संबंध में विपक्षी पार्टियों से आप सवाल करेंगे तो वह सत्ताधारी पार्टी पर निशाना साधता है। दूसरी तरफ केंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी कहती है कि यूपीए सरकार के मुकाबले महंगाई कम हुई है। अब कोई भी पार्टी प्रतिबद्धता के साथ पने चुनाव घोषणा पत्र में महंगाई को मुद्दा नहीं बनाता है। कहने का मतलब यह कि बढ़ती महंगाई का मुद्दा धीरे-धीरे राजनीति के परिदृश्य से गायब हो चला है। ऐसे में एक मतदाता, एक मेहनतकश जो आम आदमी भी है को यह समझना होगा कि उससे और उसके लिए बनी राजनीति और सरकार उसे संविधानप्रदत्त बुनियादी अधिकारों से वंचित न करने पाए।

याद कीजिए 2014 के लोकसभा चुनाव को जब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी यूपीए सरकार में महंगाई को मुद्दा बनाकर यह कहते नहीं थकते थे कि 'मोदी सरकार आई महंगाई गई'। भाजपा ने इस मुद्दे पर जनभावनाओं को भुनाया और जब देश में बहुमत की सरकार बन गई तो उसके बाद सर्जिकल स्ट्राइक, नोटबंदी, रेनकोट, जन्मपत्री जैसे मुद्दों में उलझाकर आम आदमी की जिन्दगी को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले महंगाई के मुद्दे को नेपथ्य के हवाले कर दिया।

दरअसल 6-7 दशक की राजनीतिक अनुभवों ने देश के राजनीतिज्ञों को यह समझा दिया है कि चुनाव मुद्दों से नहीं बल्कि समीकरणों से जीता जाता है। यह समीकरण गठबंधन की राजनीति के चलते दलीय भी हो सकता है और जातिगत भी। हर दल सस्ते और भावुकतापूर्ण नारों के साथ इसी समीकरण को धार देने में जुटा रहता है। इसलिए मुद्दे उभरते हैं अथवा उभारे जाते हैं लेकिन समय के साथ उन्हें नेपथ्य में जाते भी देर नहीं लगती है।

भारतीय रिजर्व बैंक का कहना है कि वित्त वर्ष 2017-18 में औसतन खुदरा मुद्रास्फीति 4.5 फीसदी रह सकती है, लेकिन उसे महंगाई दर के इससे ऊपर जाने का जोखिम भी दिख रहा है। इसका मतलब यह भी है कि रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में और कटौती करना संभव नहीं रह गया है और महंगाई 4.5 फीसदी के बजाय पांच फीसदी रहती है तो इसका मतलब यह है कि अगले वित्त वर्ष में वह ब्याज दरों में बढ़ोतरी भी कर सकता है।

सच पूछा जाय तो आम आदमी की जिन्दगी से ताल्लुक रखने वाले इस महंगाई को मुद्दा बनाकर सत्ता में आने वाली मोदी सरकार के लिए अब यह मुद्दा नहीं रह गया है। अगर गलती से कोई यह सवाल करता है तो सरकार और भाजपाई प्रवक्ता इसका जवाब देने के बजाय यूपीए सरकार की महंगाई से तुलना करने लगते हैं।

तो बड़ा सवाल यह कि आखिर देश का आम मतदाता कब ईवीएम की बटन दबाने के पहले खुद की जिन्दगी के बारे में सोचेगा? क्या उसे यह बात नहीं सोचनी चाहिए कि बढ़ती महंगाई उसकी थाली की रोटियों में लगातार कटौती करती जा रही है? क्या वह यह नहीं सोचेगा कि इस महीने बच्चों की स्कूल-फीस देने के लिए हो सकता है उसे घर का कोई सामान गिरवी रखना पड़े? क्या महंगाई का राजनीति के परिदृश्य से बाहर चले जाने को उसकी अंतिम विदाई मान लिया जाए?

नहीं, ऐसा कभी नहीं होना चाहिए। दरअसल सरकार चाहे कोई भी पार्टी बनाए, वास्तव में वे पूंजीपतियों की बेलगाम लूट और मुनाफे की परिस्थितियां ही तैयार करती हैं। आम मेहनतकश जनता उनकी निगाह में इंसान नहीं जानवर होते हैं जिसे रोटी, कपड़ा, मकान, इलाज और शिक्षा की जरूरत नहीं होती। बस पेट भरने के लिए मुट्ठी भर अनाज काफी होता है और वह भी गरीबी रेखा वाली शर्त पूरी करने के बाद। एक मेहनतकश अवाम के लिए इस नारकीय स्थिति से मुक्ति पाने का बस एक ही रास्ता बचता है जिसका उल्लेख अपने नाटक 'मदर' में बेर्टोल्ट ब्रेष्ट ने किया है। जरा गौर से पढ़िए और समझिए...

ग़र थाली आप की ख़ाली है
ग़र थाली आपकी ख़ाली है
तो सोचना होगा कि खाना कैसे खाओगे
ये आप पर है कि पलट दो सरकार को उलटा
जब तक कि खाली पेट नहीं भरता
अपनी मदद आप करो
किसी का इन्तजार ना करो
यदि काम नहीं है और आप हो गरीब
तो खाना कैसे होगा ये आप पर है
सरकार आपकी हो ये आप पर है
पलट दो उलटा सर नीचे और टांगें ऊपर
आप पर है कि पलट दो सरकार को उलटा
तुम पर हंसते हैं कहते हैं तुम गरीब हो
वक़्त मत गंवाओ अपने आप को बढ़ाओ
योजना को अमली जामा पहनाने के लिए
गरीब-गुरबा को अपने पास लाओ
ध्यान रहे कि काम होता रहे
होता रहे-होता रहे
जल्दी ही समय आयेगा जब वो बोलेंगे
कमजोर के आस-पास हंसी मंडरायेगी
हंसी मंडरायेगी, हंसी मंडरायेगी।

Sunday, 29 January 2017

24 साल पुराने इतिहास को दोहरा पाएंगे अखिलेश?

समाजवादी पार्टी की स्थापना के बाद तत्कालीन सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने के लिए जो प्रयोग 1993 में किया था, अखिलेश यादव 24 साल बाद 2017 के चुनाव में वही प्रयोग दोहरा रहे हैं। फर्क बस इतना है कि उस समय नेताजी मुलायम सिंह यादव ने बसपा के साथ गठबंधन किया था और इस बार अखिलेश ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है।

समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पार्टी का गठबंधन इस चुनाव में क्या गुल खिलाता है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन दोनों ही दलों की कमान इस समय युवा हाथों में है और दोनों नेताओं के रणनीतिकारों (प्रशांत किशोर और प्रो. स्टीव जार्डन) ने जिस तरह की चुनावी रणनीति को अंजाम दिया है उससे तो यही लगता है कि अखिलेश अपने पिता के लिखे इतिहास का न केवल दोहराएंगे बल्कि आगामी राजनीति की दिशा क्या होगी वह भी तय करेंगे।

मुलायम सिंह यादव ने 1993 में क्षेत्रीय पार्टियों के गठबंधन का नया प्रयोग किया था। उन्होंने बसपा के संस्थापक कांशीराम से हाथ मिलाते हुए गठबंधन की राजनीति शुरू की और इसका एलान लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में किया था। उत्तराखंड उस समय उत्तर प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था और उत्तर प्रदेश में कुल 422 विधानसभा सीटें हुआ करती थीं। मुलायम ने गठबंधन के आधार पर सपा के 256 उम्मीदवार उतारे थे और बसपा को 164 सीटें दी थीं। मुलायम का यह प्रयोग रंग लाया और उत्तर प्रदेश में सपा ने 109 और बसपा ने 67 सीटों पर जीत दर्ज की थी। गठबंधन की शर्तों के आधार पर मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने, लेकिन यह सरकार 18 माह ही चल सकी।

कांशीराम और मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक कैमिस्ट्री तब शानदार थी। तब कांशीराम ने अपने शर्तों के अनुरूप मुलायम सिंह यादव से खुद की पार्टी यानी समाजवादी पार्टी का गठन करवाया था और फिर बसपा से तालमेल भी कराया था। 1991 में कांशीराम की इटावा से जीत के दौरान मुलायम का कांशीराम के प्रति यह आदर अचानक उभर कर सामने आया था जिसमें मुलायम ने अपनी पार्टी के खास राम सिंह शाक्य की पराजय में कोई गुरेज नहीं किया था। इस हार के बाद राम सिंह शाक्य और मुलायम सिंह यादव के बीच मनुमुटाव भी हुआ, लेकिन मामला फायदे का होने के चलते शांत हो गया।

कांशीराम की इस जीत के बाद उत्तर प्रदेश में मुलायम और कांशीराम की जो जुगलबंदी शुरू हुई इसका लाभ उत्तर प्रदेश में 1993 में मुलायम सिंह यादव की सरकार के रूप में मिला, लेकिन 2 जून 1995 को हुए गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा और बसपा के बीच बढ़ी तकरार इस कदर हावी हो गई कि दोनों दल एक दूसरे को खत्म करने पर अमादा हो गए। उसके बाद मुलायम की सपा का आज तक बसपा की मायावती से गठबंधन पर कोई बात नहीं हुई।

उत्तर प्रदेश के वर्ष 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिली। मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे  अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया। अखिलेश इस समय सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। कहें तो अखिलेश ने बतौर सपा मुखिया 24 साल पहले वाला मुलायम सिंह यादव का प्रयोग दोहराया है। मगर इस बार गठबंधन बसपा से न होकर कांग्रेस से है। अखिलेश ने राष्ट्रीय पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस को 105 सीटें दी।

मुलायम-कांशीराम की तर्ज पर ही अखिलेश-राहुल ने कोई चुनावी रैली न करके रोड शो किया जिसके लिए लखनऊ को चुना गया। यह रोड शो जीपीओ स्थित गांधी प्रतिमा पर माल्यार्पण से शुरू होकर मेफेयर चौराहा हजरतगंज, नोवल्टी चौराहा, लालबाग से कैसरबाग, अमीनाबाद, नजीराबाद, नक्खास, चौक चौराहा होते हुए घंटाघर पर संपन्न हुई। रोड शो की खास बात यह रही कि जिस गांधी को मोदी सरकार और भाजपा मिटा देना चाहती है वहीं अखिलेश और राहुल ने गांधी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर पहले साझा रोड शो के माध्यम से चुनाव प्रचार अभियान को अंजाम दिया है।

Tuesday, 3 January 2017

ममता को गुस्सा क्यों आता है?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी फिर से आज गुस्से में दिखीं। नोटबंदी के बाद से जब भी ममता को गुस्सा आता है तो वह सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोलती हैं। रोज वैली चिटफंड घोटाले में टीएमसी सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय की गिरफ्तारी के बाद तृणमूल कांग्रेस ने आपात बैठक बुलाई। उनकी योजना बुधवार को विरोध-प्रदर्शन शुरू करने की है।

लाखों छोटे निवेशकों को कंगाल बना देने वाली फर्ज़ी निवेश योजना में शामिल होने के आरोप में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के वरिष्ठ नेता सुदीप बंद्योपाध्याय की गिरफ्तारी के कुछ ही मिनट बाद भाजपा के कोलकाता स्थित कार्यालय पर हमला किया गया। मां-माटी-मानुष की वकालत करने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर 'नोटबंदी के बाद तृणमूल-बंदी' का आरोप लगाया और कहा कि उनकी पार्टी पर ये अत्याचार इसीलिए किया जा रहा है, क्योंकि वह प्रधानमंत्री मोदी के नोटबंदी कदम का खुलकर विरोध कर रही है।

मालूम हो कि पिछले सप्ताह सीबीआई ने अभिनेता से राजनेता बने तृणमूल कांग्रेस नेता तापस पाल को गिरफ्तार किया था। ममता का मानना है कि ये गिरफ्तारियां प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देश पर की जा रही हैं। प्रधानमंत्री पर 'बदले की राजनीति' करने का आरोप लगाते हुए ममता ने कहा, मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देती हूं कि अगर आप समझते हैं कि आप हमारे नेताओं को गिरफ्तार करेंगे और हम चुप बैठेंगे, तो ऐसा नहीं होगा...।

दरअसल रीयल एस्टेट तथा मनोरंजन के क्षेत्र में दखल रखने वाले बंगाल के रोज़ वैली ग्रुप द्वारा चलाई जा रही अनियमित वित्तीय निवेश योजनाओं की जांच सीबीआई कर रही है। इस मामले में दो साल पहले केस दर्ज किया गया था जिसमें रोज़ वैली पर निवेशकों के लगभग 17,000 करोड़ रुपये चुराने का आरोप लगाया गया था। रोज़ वैली के स्वामित्व वाली दो कंपनियों में तापस पाल निदेशक थे। सीबीआई सूत्रों का कहना है कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने उन सवालों से बचने की कोशिश की जिनमें रोज़ वैली से उनके ताल्लुकात की प्रकृति के बारे में पूछा गया था। सुदीप बंद्योपाध्याय का कहना था कि उनके खिलाफ लगे आरोप साफ नहीं हैं।

असली सवाल यह है कि जब इस मामले में दो साल पहले केस दर्ज किया गया था तो सीबीआई आज की तारीख में कार्रवाई क्यों कर रही है। दो साल से सीबीआई क्या कर रही थी। आखिर मोदी सरकार के तीन साल होने जा रहे हैं। जब मोदी सरकार के कार्यकाल में इस मामले में मुकदमा दर्ज किया और दो साल तक सीबीआई सोती रही। अब आज जब ममता नोटबंदी को लेकर केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन चला रही है तब सीबीआई की अचानक नींद खुल गई। फिर यह संदेह ना करने की कोई गुंजाइश नहीं बचती कि ममता को शांत कराने के लिए केंद्र सरकार सीबीआई का इस्तेमाल कर रही है। इतना कुछ मोदी सरकार कर रही है और फिर कहें कि ममता को गुस्सा क्यों आता है तो मेरे हिसाब से यह सवाल करना ही गलत होगा।

Monday, 2 January 2017

क्या अब ये खेल नहीं चलेगा?

भारतीय राजनीति में भ्रष्ट आचरण के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत ने एक क्रांतिकारी फैसला सुनाते हुए धर्म, जाति और भाषा के आधार पर वोट मांगने को पूरी तरह से गैरकानूनी करार दिया है। माननीय उच्चतम न्यायालय का यह फैसला ऐसे वक्त में आया है जब उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों में कुछ ही दिनों बाद चुनाव होने हैं। राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में जहां जाति और धर्म के मुद्दे पर चुनाव लड़ा जाता है वहीं एक राज्य पंजाब है जहां अकाली दल जैसी पार्टियां भाषा के आधार पर चुनाव लड़ती रही है। तो क्या माना जाए, शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद जाति, धर्म और भाषा के आधार पर राजनीति करने वाले राजनेताओं और राजनीतिक दलों का खेल खत्म हो जाएगा?

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल करके ये सवाल उठाया गया था कि धर्म, जाति, भाषा, संप्रदाय आदि के नाम पर वोट मांगना जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत गैरकानूनी है या नहीं। जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (3) के तहत यह साफ-साफ लिखा है किसी भी चुनाव प्रत्याशी और उनके एजेंट द्वारा उसके धर्म का इस्तेमाल करके वोट मांगना भ्रष्ट आचरण माना जाएगा। इसमें एक टर्म है - 'उसका धर्म' इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को व्याख्या करनी थी कि 'उसका धर्म' का दायरा क्या है? इस दायरे में सिर्फ प्रत्याशी आते हैं या फिर उसके एजेंट और वोटर भी इस दायरे में आते हैं?

इससे पहले इस प्रकरण में आए एक फैसले में कहा गया था कि ये व्याख्या उम्मीदवार के धर्म को लेकर की गई है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून की नए सिरे से व्याख्या करते हुए उसमें मतदाताओं को भी जोड़ दिया है। अब तक इस धारा के दायरे में सिर्फ उम्मीदवार आते थे। ये फैसला इसलिए भी महत्वपू्र्ण है कि सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की बेंच में चार जज इस फैसले के पक्ष में थे जबकि तीन जज विपक्ष में थे। फैसले में कहा गया है कि धर्म को किसी भी ऐसे काम का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए जिसकी प्रकृति धर्मनिरपेक्ष हो। और चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष पद्धति है।

इस फैसले के बाद धार्मिक नेताओं की तरफ से हर चुनाव की पूर्व संध्या पर जारी होने वाली अपीलों या कहें तो व्हीप पर लगाम लगेगी। सुप्रीम कोर्ट ने नए साल पर देश में 'शुचिता की राजनीति' का जो विचार दिया है उससे धार्मिक उन्माद, जाति उन्माद, सांप्रदायिक उन्माद में निश्चित रूप से कमी आएगी। आमतौर पर चुनाव से पहले धर्म गुरु या धार्मिक नेता अपने समुदाय से किसी एक पार्टी को वोट देने की अपील करते हैं। लेकिन अब अगर कोई धार्मिक नेता किसी उम्मीदवार या पार्टी के लिए अपने समुदाय से वोट देने की अपील करेगा तो इसकी ज़िम्मेदारी उम्मीदवार पर भी आएगी। अगर किसी उम्मीदवार को इस मामले में दोषी पाया गया तो उसका चुनाव भी रद्द कर दिया जाएगा और साथ ही चुनाव आयोग पार्टियों पर भी कार्रवाई कर सकता है।

भारतीय संविधान में सबको बराबरी का अधिकार दिया गया है। इसका उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 14 में मिलता है। हालांकि अनुच्छेद 16 के सेक्शन 4ए में ये भी लिखा है कि बराबरी के अधिकार के बावजूद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के पक्ष में आरक्षण का विकल्प बनाया जा सकता है। इस देश में हमेशा से ही धर्म और जाति के आधार पर वोट मांगे जाते हैं। वोट बैंक की राजनीति में इस तरह की बात समझने वाले राजनेताओं या राजनीतिक कार्यकर्ताओं की बहुतायत है कि आदिवासियों के हितों का ध्यान एक आदिवासी मुख्यमंत्री या नेता ही रख सकता है। दलितों के हितों का ध्यान सिर्फ एक दलित मुख्यमंत्री या नेता ही रख सकता है। इसी गलत धारणा पर सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रहार किया है।

राजनीतिक दल अक्सर धर्म और जाति के आधार पर ही टिकट बांटते हैं। यहां उम्मीदवार को टिकट उसकी योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि इस आधार पर दिया जाता है कि उम्मीदवार के क्षेत्र का जातीय समीकरण क्या हैं? अगर उस क्षेत्र में मुसलमान ज्यादा हैं तो मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट मिलेगा, अगर सवर्ण ज्यादा हैं तो सवर्ण उम्मीदवार, अगर पिछड़ी जातियों की संख्या ज्यादा है, तो पिछड़ी जातियों के उम्मीदवार को टिकट दिया जाएगा। कहने का मतलब यह कि देश की राजनीतिक पार्टियों में टिकट इसी जाति, धर्म, संप्रदाय और भाषा के आधार पर बांटे जाते हैं और इसी वजह से हमारे देश में वोट बैंक की राजनीति जैसे शब्दों का प्रादुर्भाव हुआ।

उत्तर प्रदेश को ही लें तो यहां चुनाव का पूरा तंत्र ही धर्म और जाति की बैसाखी पर टिका है। आने वाले कुछ ही दिनों में उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं और यहां की कुछ राजनीतिक पार्टियों ने अपने प्रत्याशी भी घोषित कर दिये हैं। अब देखिए कैसे राजनीतिक दल, धर्म और जाति के आधार पर टिकट बांटते हैं और कैसे पूरा मीडिया धर्म और जाति का चश्मा पहनकर चुनावों से जुड़ी कवरेज करता है। बसपा ने 125 मुसलमानों को टिकट दिये हैं। इसी तरह से कांग्रेस ने इस बार उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों का वोट हासिल करने के लिए मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार शीला दीक्षित को बनाया है।

यादवों को समाजवादी पार्टी का पक्का वोटर माना जाता है। दलितों के बारे में ये मान लिया गया है कि उनका झुकाव मायावती की तरफ है। मुस्लिम वोटर कांग्रेस जैसी पार्टियों को वोट देते हैं जबकि भाजपा को सवर्ण वोटरों की पसंदीदा पार्टी कहा जाता है। ये सारे पूर्वाग्रह धीरे-धीरे बने हैं और आज की राजनीति में यह सिर चढ़कर बोल रहा है। इसके लिए राजनीतिक दल और मीडिया दोनों ही बराबर के जिम्मेदार हैं। पार्टियों के टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव जीतने के बाद मंत्रिमंडल के गठन तक में जाति, धर्म और भाषा के आधार पर संतुलन को लेकर मीडिया सबसे ज्यादा जागरूक रहती है।

अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भीम (BHIM) नाम से एक एप जारी किया था। निश्चित रूप से इस ऐप का नाम भीम रखने के पीछे दलित वोट हासिल करने की मंशा रही होगी क्योंकि भीम शब्द बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर को निरुपित करता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भीम ऐप को जारी करने के बाद अपने भाषण में भी डॉ. अंबेडकर का नाम कई बार लिया था। इस ऐप के नाम पर अगर आप गौर करें और इसके नाम पर जाए तो इसका सही नाम बिम होता क्योंकि इस ऐप का पूरा नाम है भारत इंटरफेस फॉर मनी। लेकिन भारत से दो शब्द B और H में I और M जोड़ देने से यह भीम बन गया जिसे अंबेडकर के अनुयायी सम्मान से 'जय भीम' कहते हैं।

कहने की मतलब यह कि भारतीय लोकतंत्र में चुनाव के पहले और चुनाव जीतने के बाद बनी सरकार का मुखिया अपनी राजनीति की अस्मिता को बनाए रखने के लिए अपनी सुविधा के हिसाब से जाति, धर्म और भाषा के आधार पर वोट मांगते हैं, प्रत्याशी खड़े करते हैं और फिर वोट बैंक को बनाए रखने के लिए शासन और प्रशासन में भी नीति निर्देशन कर इसका दुरुपयोग करते हैं।

ऐसे में बड़ा सवाल यह कि क्या देश की सर्वोच्च अदालत का ये आदेश जमीनी स्तर पर लागू हो पाएगा? क्या हमारे देश के नेता वोट बैंक की राजनीति से तौबा कर अपने अंदर इतनी उदारता दिखाएंगे कि विशुद्ध काम और विकास के आधार पर चुनाव लड़ सके? मेरी राय में सभी राजनीतिक दलों को सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्योंकि जाति, धर्म और भाषा के आधार पर वोट बैंक की राजनीति ने इस राष्ट्र की एकता और अखंडता तक को खतरे में डाल दिया है।

Sunday, 1 January 2017

'बबुआ' का समाजवाद!

लगता है अब वो समय आ गया है जब बॉलीवुड उत्तर प्रदेश में वंशवाद की समाजवादी राजनीति पर एक फिल्म बनाए। फिल्म का नाम होना चाहिए 'बबुआ का समाजवाद' और उसका शीर्षक गीत (टाइटल सांग) जनवादी कवि गोरख पांडेय की समाजवाद के भटकाव पर लिखी कविता से शुरू होनी चाहिए जो इस प्रकार हैं-

'समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई...
हाथी से आई, घोड़ा से आई...
लाठी से आई, डंडा से आई...
समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई...


उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ही खानदान है जो वंशवाद की राजनीति को निरंतर सींच रहा है और वह है समाजवादी पार्टी का मुलायम परिवार। इस परिवार में राजनीति एक करियर की तरह माना जाता है। मुलायम आए, शिवपाल आए और उसके बाद फिर पूरा खानदान एक के बाद एक लाइन में लग गया। पढ़ाने-लिखाने का कार्य छोड़कर प्रो. रामगोपाल भी आए। देशी और विदेशी कॉलेजों से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद बबुआ (मुलायम के बेटे अखिलेश) भी आए। फिर अखिलेश की पत्नी डिंपल भी आईं। देखते ही देखते कई दर्जन नेता इस परिवार में पैदा हो गए। कोई राष्ट्रीय अध्यक्ष बना तो कोई सांसद। कोई मुख्यमंत्री बना तो कोई मंत्री। कोई विधायक बना तो कोई जिला अध्यक्ष।

जब तक समाजवादी पार्टी पर मुलायम की पकड़ रही तब तक इस परिवारवाद की राजनीति में कोई चूं नहीं बोला। एक तरह से 'वन मैन आर्मी' की तरह मुलायम पार्टी को लेकर आगे बढ़ते रहे। जब उत्तर प्रदेश में जीते तो मुख्यमंत्री और हार गए पर राष्ट्रीय राजनीति में समय बिताने दिल्ली चले आते थे। एक समय ऐसा आया जब लगने लगा कि एक परिवार की समाजवादी पार्टी में मुलायम के बाद कौन? तो फिर बदलते राजनीतिक परिदृश्य में नेता जी ने अपने बबुआ को मैदान में उतार दिया। ऑस्ट्रेलिया के सिडनी से ताजा-ताजा लौटे थे। डिंपल से नई-नई शादी हुई थी। साल 2000 का वक्त था। कन्नौज से लोकसभा उपचनाव में मुलायम ने बबुआ को मैदान में उतार दिया। 27 साल की उम्र में चुनाव जीतकर बबुआ सांसद बन गए। फिर 2004 में दूसरी बार और 2009 में तीसरी बार बबुआ लोकसभा के लिए चुने गए।

फिर मुलायम ने बबुआ को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रचार अभियान की जिम्मेदारी सौंप दी। मुलायम को पता था कि अपने बूते तो वह यूपी की सत्ता में वापसी नहीं कर सकते हैं। इसलिए क्यों न बबुआ पर दांव खेला जाए। नेता जी का राजनीतिक अनुभव काम आया और यूथ आइकन की चमक बिखेरकर साइकिल पर सवार होकर अखिलेश पूरा प्रदेश घूम गए। लोगों ने इस युवा नेता पर भरोसा किया और पूर्ण बहुमत से समाजवादी पार्टी सत्ता में आ गई। विधायकी का चुनाव लड़े बिना अखिलेश 10 मार्च 2012 को उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी के नेता चुन लिए गए और पांच दिन बाद 15 मार्च 2012 को सूबे के सबसे युवा मुख्यमंत्री का ताज पहना। बाद में अखिलेश ने सांसदी से इस्तीफा देकर विधान परिषद से विधायक बने।

संसदीय राजनीति से लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति का यह सफर बबुआ को काफी कुछ सिखा गया। लेकिन उत्तर प्रदेश में पांच साल तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहकर जिस तरह से सत्ता की डगर को नजदीक से देखा और परखा उससे अखिलेश काफी परिपक्व राजनेता के साथ-साथ एक दबंग सुल्तान की भूमिका को भी अपने अंदर समावेशित किया। चार साल तक 'तेल देखो तेल की धार देखो' वाले फॉर्मूले पर खुद को चलाते रहे और जब लगा कि 'अब नहीं तो कभी नहीं' तो पूरी की पूरी समाजवादी राजनीति की दिशा ही बदल दी। बबुआ कब राजनेता बन गया और फिर सुल्तान इसकी नेताजी को भनक तक नहीं लगी। और जब समझ में आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पूरी पार्टी सुल्तान के कब्जे में आ चुकी थी।

मुझे नहीं मालूम कि मुलायम सिंह यादव ने अपने जीवन में कभी शतरंज खेली है या नहीं, लेकिन अखिलेश की राजनीतिक समझ बताती है कि शतरंज की बिसात पर कब कौन सा मोहरा चलना है और कब शह देकर खेल को खत्म कर देना है अच्छी तरह से पता है। हालांकि यह मानना गलत होगा कि मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक समझ कमजोर है। नेताजी का लंबा राजनीति जीवन है और सियासी सफर में काफी उठापटक उन्होंने देखे हैं। कई तरह की परिस्थितियों का सामना किया होगा। बहुत सारे फैसले मजबूरी में भी लेने पड़ते हैं। लेकिन आज की तारीख में तमाम राजनीतिक पंडित इस बात को मान रहे हैं कि अपने ही हाथों से सींचकर जिस समाजवादी पार्टी के पेड़ को बड़ा कर वटवृक्ष का स्वरूप दिया उसे ही समझने में भूल कैसे कर दी।

सोशल मीडिया में आजकल एक ई-मेल वाइरल हो रही है जिसके मुताबिक समाजवादी पार्टी में पारिवारिक नौटंकी एक सोची समझी पटकथा की परिणति है। लीक हुई एक ई-मेल के बाद यह सवाल सियासी गलियारों में बड़ी तेजा से तैर रहा है। यह ई-मेल प्रो. स्टीव जार्डिंग की बताई जा रही है। अब आप पूछेंगे कि ये प्रो. जार्डिंग कौन हैं? दरअसल स्टीव जार्डिंग हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और समाजवादी पार्टी के अहम चुनावी रणनीतिकार हैं, प्रशांत किशोर की तरह। बीते साल सितंबर 2016 में यह खबर आई थी कि सपा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के प्रचार में अहम भूमिका निभाने के लिए उन्हें किराये पर लिया है। हिलेरी क्लिंटन और अल गोर जैसी हस्तियों के लिए प्रचार का काम देख चुके स्टीव जार्डिंग के बारे में कहा जा रहा है कि स्टीव ने ही इस कथित ई-मेल में मुलायम सिंह यादव को सलाह दी कि वे एक पारिवाहिक अंतरकलह का नाटक रचे जिसमें चाचा शिवपाल खलनायक नजर आएं और अखिलेश यादव बेदाग छवि वाले नेता। 24 जुलाई 2016 को भेजी गई इस कथित ई-मेल में यह भी कहा गया है कि अखिलेश यादव को भविष्य में पार्टी के मुखिया यानी राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर प्रचारित किया जाए।

ईमानदारी से विश्लेषण किया जाए तो भले ही यह ई-मेल फर्जी हो, लेकिन इसमें जो बातें लिखी बताई जा रही है वह निश्चित रूप से सच प्रतीत हो रही है। दरअसल 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के चुनावी रणनीतिकार बने प्रशांत किशोर ने राजनीतिक दलों के नेताओं को इस बात के लिए मजबूर किया है कि चुनाव जीतने के लिए अब आपको पढ़ा-लिखा इलेक्शन स्ट्रेटजिस्ट रखना होगा जो अपेक्षित परिणाम पाने के लिए समय और परिस्थितियों के हिसाब से चीजें तय करता है, फिर उसे अंजाम तक पहुंचाता है। नरेंद्र मोदी का चुनावी अभियान हो, नीतीश कुमार का चुनावी अभियान हो या फिर अखिलेश यादव का अभियान, सभी अब काफी आधुनिक तरीके से प्रचार अभियान चलाते हैं। सोशल मीडिया का जमाना है जो विवादित मुद्दों को समाज के हर तबके में इस तरह से उछालता है कि राह चलता अनपढ़ गंवार भी ठहरकर अपना कान लगा देता है। ये आधुनिक चुनावी रणनीतिकार इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि भारतीय मतदाता गॉसिप और विवादित बयान, नौटंकी आदि में पूरी शिद्दत से उलझता है।

थोड़ा गौर से सोचिए! उत्तर प्रदेश में चुनाव होने में कुछ ही दिनों का वक्त बचा है। जो वक्त गुजर रहा है वह यह चर्चा करने और समझने में गुजारना था कि अखिलेश सरकार ने अपने कार्यकाल में जनता की भलाई के लिए क्या काम किया और कौन सा काम नहीं किया जिसका वादा उन्होंने पार्टी की मेनिफेस्टो में किया था। यह वक्त हर विधायक चाहे वो सपा का हो, बसपा का हो, भाजपा का हो या फिर कांग्रेस का हो, रिपोर्ट कार्ड पेश करने का है। खबरिया चैनल हो, अखबार हो या फिर डिजिटल मीडिया सभी को अपने-अपने तरीके से विधानसभा क्षेत्रों में जाकर सबकी रिपोर्ट कार्ड बनाकर पेश करते। लेकिन क्या ये सब हो रहा है? दरअसल अब सरकारें जनता के लिए काम कम करती हैं उसका भौकाल ज्यादा मचाती हैं। अब इस भौकाली तथ्य को कोई  समझ न ले इसी काम के लिए आजकल चुनावी रणनीतिकार रखने की परंपरा चल पड़ी है जो काफी हद तक सफल भी हो रहे हैं।

बहरहाल, उत्तर प्रदेश में 'बबुआ का समाजवाद' आ चुका है। नेताजी का समाजवाद पीछे छूट चुका है। जनेश्वर मिश्र पार्क में नए साल की पहली सुबह जिस तरह से अखिलेश ने समाजवादी पार्टी में तख्तापलट कर पार्टी की कमान अपने हाथों में ले ली है उससे साफ हो गया है कि नेताजी मुलायम सिंह यादव अब बबुआ की तरफ से दिए गए संरक्षक पद की शोभा बढ़ाएं उसी में उनकी भलाई है। पटकथा के मुताबिक फिल्म पूरी हो चुकी है। हां! फिल्म के टाइटल सांग जिसे गोरख पांडे की कविता से शुरू करने की हमने सलाह दी है उसमें कुछ समाजवादी दर्शन की पंक्तियां जोड़ना चाहें तो इस काम में जरूर मेहनत करें।