Saturday, 25 April 2020

कोरोना क्रांति : बिल गेट्स की ये चार बातें बहुत कुछ कह रही हैं

How to fight future pandemics हेडलाइंस से माइक्रोसॉफ्ट के सह संस्थापक बिल गेट्स ने द इकोनॉमिस्ट में जो आर्टिकल लिखा है उसमें बहुत सारी बातें कही गईं हैं लेकिन उनमें से चार अहम बातों का जिक्र करना यहां बेहद जरूरी है। ये बातें आने वाले वक्त यानी आफ्टर कोरोना दुनिया कैसी होगी को लेकर जाने-अनजाने में कई तरह के संकेत भी देता है और कुछ सवाल भी खड़े करता है। 

पहली बात बिल गेट्स ने कोरोना वैक्सीन को लेकर कही है। इसमें गेट्स का कहना है- जब इतिहासकार कोविड-19 महामारी पर किताब लिखेंगे तो जो हम अब तक जीते रहे हैं, वह हिस्सा एक तिहाई के आसपास ही होगा। किताब की कहानी का बड़ा हिस्सा उस पर होगा, जो आगे होना है। यूरोप के अधिकांश हिस्से, पूर्वी एशिया और उत्तरी अमेरिका में इस महामारी का चरम संभवत: इस महीने के आखिर तक बीत जाएगा। कई लोगों को उम्मीद है कि कुछ हफ्तों में चीजें वैसी ही हो जाएंगी, जैसी बीते दिसंबर में थीं। लेकिन दुर्भाग्य से, ऐसा नहीं होगा। बिल गेट्स कहते हैं- I believe that humanity will beat this pandemic, but only when most of the population is vaccinated. Until then, life will not return to normal. मुझे भरोसा है कि मानवता इस महामारी को हरा देगी, लेकिन यह तभी होगा जब अधिकतर जनसंख्या को वैक्सीन लगा दी जाएगी। तब तक जिंदगी सामान्य ढर्रे पर नहीं लौट सकेगी।

दूसरी अहम बात गेट्स ने कोरोना महामारी के बाद आने वाले वक्त में जो महामारी आएगी उसके बारे में की है। बिल गेट्स का कहना है कि 2021 के मध्य यानी जून 2021 के बाद दुनियाभर में उपलब्ध संस्थानों में वैक्सीन बन रही होंगी। अगर ऐसा होता है तो यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी जब मानव पहली बार इतनी तेजी से एक नई बीमारी को पहचानने और फिर उसके खिलाफ प्रतिरक्षण का काम करेगा। वैक्सीन पर प्रगति के अलावा इस महामारी की जो बड़ी मेडिकल उपलब्धियां होंगी वह जांच के क्षेत्र में होगी। अगली बार जब कोई नया वायरस उभरेगा तो लोग संभवत: उसकी घर पर वैसे ही जांच कर सकेंगे, जैसे आज प्रेगनेंसी टेस्ट करते हैं। बस उन्हें अपनी नाक के भीतर से स्वैब लेना होगा।

तीसरी अहम बात जो बिल गेट्स ने अपने इस आर्टिकल में की है वह संयुक्त राष्ट्र जैसा एक नया संगठन बनाने को लेकर है। गेट्स का कहना है कि कोविड-19 के बाद दुनियाभर के नेताओं को अगली महामारी रोकने के लिए यूएन जैसा संस्थान बनाना चाहिए। यह राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक संगठनों का मिश्रण होना चाहिए। आज के युद्ध अभ्यासों की तरह ये संगठन नियमित तौर पर ‘जीवाणु अभ्यास’ भी करेंगे। इससे जब कभी किसी चमगादड़ या पक्षी से मनुष्यों पर कोई नया वायरस कूदेगा तो हम तैयार रहेंगे। ये संगठन हमें इस बात के लिए भी तैयार करेंगे कि अगर कोई अपनी लैब में किसी संक्रामक बीमारी को तैयार करके हथियार की तरह उसका इस्तेमाल करता है, तो उससे कैसे निपटना है।

चौथी और अंतिम महत्वपूर्ण बात में बिल गेट्स यह भी कहते हैं कि कोरोना महामारी ने हमें दिखा दिया है कि वायरस सीमा कानूनों का पालन नहीं करते हैं और हम सब माइक्रोस्कोपिक जीवाणुओं के एक नेटवर्क से आपस में जुड़े हुए हैं। इतिहास हमेशा एक तय ढर्रे पर नहीं चलता। लोग तय करते हैं कि कौन सी दिशा लेनी है और वे गलत मोड़ भी ले सकते हैं। गेट्स का दावा है कि 2021 के बाद के साल बहुत कुछ 1945 के बाद के सालों जैसे ही होंगे। लेकिन आज की सबसे ज्यादा समानता 10 नवंबर 1942 से हो सकती है। जब ब्रिटेन ने युद्ध में पहली जमीनी लड़ाई जीती थी और विंस्टन चर्चिल ने एक भाषण में घोषणा की- This is not the end. It is not even the beginning of the end. But it is, perhaps, the end of the beginning. यह अंत नहीं है। यह अंत की शुरुआत भी नहीं है। लेकिन यह शायद शुरुआत का अंत है।

बिल गेट्स का यह आर्टिकल 23 अप्रैल 2020 को द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित हुआ है। इससे पहले भी गेट्स ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर कोरोना वायरस को लेकर कई बातें कही हैं जिसके बारे में हम अगले ब्लॉग में बात करेंगे कि काफी हद तक वो घटित भी हुई हैं। लेकिन फिलहाल हम यह सवाल आप प्रबुद्ध पाठकों पर छोड़ते हैं कि कोरोना महामारी के बाद जो वक्त आने वाला है वह कैसा होगा, दुनिया कैसी होगी, इस सबका आंकलन और वह भी सत्य के बेहद करीब, बिल गेट्स कैसे बता पा रहे हैं?

Saturday, 18 April 2020

मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आप अपने होने का वजूद खो चुके हैं

मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! कोरोना महामारी के वैश्विक महासंकट और देश के अंदर 21 दिन के कंप्लीट लॉकडाउन के बाद एक बार फिर जब 19 दिन की इसकी मियाद बढ़ा दी गई है के बीच हम भारत के लोग आपसे कहना चाहते हैं कि अब आप अपने होने का वजूद खो चुके हैं। हमें अपनी सरकार की नीति और नीयत दोनों पर संदेह होने लगा है और चूंकि आप ही हमारी सरकार के मुखिया हैं, लिहाजा हम भारत के 130 करोड़ लोगों का दर्द आपको ही समझना था। अब इसे देशवासियों की नियति कहें या जाने-अनजाने में प्रधानसेवक होने के नाते आपके द्वारा उठाए गए गलत कदमों का दंश, दोनों ही परिस्थितियों में इसका खामियाजा वही जनता भुगत रही है जिसे आप देश और दुनिया में बार-बार अपनी ताकत बताते रहे हैं। इसीलिए एक लंबे कालखंड के बाद हम भारत के लोग आपको बताना चाहते हैं कि आज आपकी ताकत उस मुश्किल दौर में पहुंच गई है जहां से उसे उबारना कठिन ही नहीं असंभव भी है, क्योंकि आप अपने होने का वजूद जो खो चुके हैं।

आज जब हम लॉकडाउन-2.0 की परिस्थिति में जीने को अभिशप्त हैं, सरकार की नीति और नीयत पर संदेह करने के वजहों की फेहरिस्त तो बहुत लंबी है, लेकिन हम यहां सिर्फ कोरोना महासंकट से निपटने के लिए लॉकडाउन की परिस्थिति की ही बात करेंगे कि इस दौर में सरकार की जिम्मेदारी व जवाबदेही क्या होनी चाहिए थी और क्या वह अपनी इस जिम्मेदारी व जवाबदेही के धर्म को निभाने में जनता की उम्मीदों पर खरी उतरी? हालांकि हम भारत के लोग आज जिन परिस्थितियों में जीने को अभिशप्त हैं उसके पीछे सरकार द्वारा आर्थिक क्रांति का हवाला देते हुए नोटबंदी और जीएसटी लागू करने का फैसला भी उतना ही जिम्मेदार है जितना वैश्विक महामारी कोरोना महासंकट के बीच कंप्लीट लॉकडाउन का फैसला और वो भी नोटबंदी की तर्ज पर सिर्फ चार घंटे की मोहलत के साथ। यहां हम सिर्फ 2020 की बात करते हैं जब 30 जनवरी को देश के सबसे समृद्ध प्रदेश केरल में कोरोना से संक्रमित पहले मरीज की एंट्री हुई थी। मीडिया में जो रिपोर्ट प्रकाशित हुई है, उसके मुताबिक यह मरीज चीन के उसी वुहान प्रांत से आया था जहां सबसे पहले (नवंबर-दिसंबर 2019) कोरोना ने दस्तक दी थी और फिर इतनी बड़ी तबाही के रूप में इसने विस्तार लिया जिसकी जद में अमेरिका, इटली, स्पेन, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस समेत दुनियाभर के 200 से अधिक देश इसमें समा गए। 30 जनवरी से पहले जापान और अमेरिका में कोरोना का संक्रमण फैल चुका था। आगे बढ़ने से पहले यहां कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा सांसद राहुल गांधी के दो अहम ट्वीट का जिक्र करना जरूरी होगा। 31 जनवरी को पहले ट्वीट में राहुल गांधी ने कोरोना संकट का जिक्र करते हुए लिखा था- In China, the Coronavirus has killed hundreds of people. My thoughts are with the families of the victims & the millions who have been forced into quarantine to prevent the spread of the virus. May they find the courage & strength to persevere through this terrible ordeal. उसके बाद 12 फरवरी को दूसरे ट्वीट में कोरोना संकट से जुड़े एक न्यूज लिंक को शेयर करते हुए राहुल गांधी ने लिखा था- The Corona Virus is an extremely serious threat to our people and our economy. My sense is the government is not taking this threat seriously. Timely action is critical. पूरा देश जानता है, राहुल गांधी को पूरी की पूरी तंबूपरस्त मीडिया, अफवाहबाज मीडिया और सोशल मीडिया ने पप्पू बनाकर एक तरह से विपक्ष की आवाज को ही खत्म कर दिया है ताकि सरकार से न कोई सवाल कर पाए और न ही उसे उसकी जिम्मेदारी व जवाबदेही का अहसास करा सके। लेकिन हम भारत के लोग जो आपकी भी ताकत हैं, इस बात को समझते हैं और इस बात का जिक्र आपसे करना चाहते हैं कि एक दूरदर्शी पप्पू (राहुल गांधी) की बात को ही सरकार अगर समय रहते समझ लेती तो शायद देश की अर्थव्यवस्था का पहिया रोकने की नौबत नहीं आती। कंप्लीट लॉकडाउन की परिस्थिति में हम नहीं जी रहे होते।

मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! 
कोरोना महासंकट के बीच राष्ट्र के नाम चौथे संबोधन में आपने बहुत सारे दावे किए और देशवासियों को सप्तपदी के तहत सात वचन निभाने की शपथ भी दिलाई। लेकिन कभी अकेले में अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने की कोशिश जरूर करियेगा कि आपने जो भी दावे किए वह कितना सच है और फिर जो वचन निभाने के लिए अपनी जनता से हामी भरवाई वो काम किसका है- आपका या फिर हम भारत के लोगों का? हम भारत के लोग आज आपसे पूछना चाहते हैं, कुछ सवाल करना चाहते हैं कोरोना को लेकर, लॉकडाउन को लेकर, लॉकडाउन-2.0 की परिस्थिति को लेकर।

1. आपने इस बात का दावा किया कि कोरोना की भयावहता का अंदाजा लगाते हुए हमने काफी पहले इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया था जिसकी वजह से दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले जनहानि काफी कम हुई है। हम भारत के लोग आपसे जानना चाहते हैं कि भारत में कोरोना संक्रमित पहले केस की एंट्री और राहुल गांधी के दोनों ट्वीट से पहले कोरोना से निपटने के लिए सरकार ने क्या तैयारी की थी?

2. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! इस तथ्य को आप भी मानेंगे कि कोरोना महामारी हमारे देश में बाहर के देशों से आया। यहां तक कि जिन जमातियों पर संक्रमण फैलाने का आरोप मढ़कर देश की सोशल मीडिया और तंबूपरस्त मीडिया द्वारा समाज में लगातार नफरत फैलाई जा रही है, वो भी चीन समेत अन्य कई देशों से मार्च के शुरूआती हफ्तों में भारत में एंट्री ली थी। कनिका कपूर जैसे ताकतवर हजारों लोगों की एंट्री भी देश के अंदर 30 जनवरी के बाद ही हुई थी। अगर आपकी तैयारी चाक-चौबंद थी तो हजारों जमाती और कनिका कपूर जैसी हस्तियों को देश के अंदर कोरोना फैलाने की छूट किसने दी? आखिर किसकी शह पर जमाती मरकज में सालाना जलसा करते रहे और कनिका कपूर जैसी दिग्गजों की पार्टी होती रही जिसमें सत्ता से जुड़े सैकड़ों लोगों का जमावड़ा लगा?

3. देश में कोरोना संकट लगातार गहरा रहा था और आप अमेरिकी भगवान डोनाल्ड ट्रम्प के स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए खड़े थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ से चेतावनियां जारी होने के बावजूद ट्रम्‍प के स्‍वागत में गुजरात में हज़ारों लोगों को जुटाया गया। तब तक अमेरिका में कोरोना फैलने की खबर हमें मिल चुकी थी। ट्रम्प ने अपने देश को तो डुबोया ही, हमें भी अपनी चपेट में ले लिया। आज इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? पूरी सरकार गुजरात से लेकर नई दिल्ली के लुटियन जोन तक ट्रम्प के स्वागत में जुटी थी और तभी राजधानी दिल्ली सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था। हमारे हिन्दू और मुसलमान भाईयों का कत्ल हो रहा था। घर जलाए जा रहे थे, दुकानें जलाई जा रही थी। लेकिन आपने उस वक्त भी खामोशी की चादर ओढ़े रखी। आखिर क्यों? कोरोना अपना खौफनाक जाल बिछा रहा था और देश के सैकड़ों रहनुमा देश की संसद में एनपीआर, एनआरसी, शाहीनबाग और सांप्रदायिक दंगे को लेकर तू-तू मैं-मैं कर रहे थे। देश में कोरोना फैल रहा था और सत्ताधारी पार्टी मध्यप्रदेश में तख्तापलट करने में जुटी थी। आपने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का ऐलान किया था और एक दिन बाद शिवराज सरकार शपथ ले रही थी जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग की कोई परवाह नहीं की गई। अगर आपने समय रहते सतर्कता बरती थी तो ये सब किसके इशारे पर होता रहा?

4. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! अगर आपकी तैयारी चाक-चौबंद थी तो हम भारत के लोग आपसे जानना चाहते हैं कि देश में 1 मार्च को कोरोना के 3 केस थे, बालकनी से ताली व थाली बजाने के दिन 22 मार्च को 396 केस और 25 मार्च को जिस दिन कंप्लीट लॉकडाउन-1 शुरू हुआ, 606 संक्रमित मरीज देश में कहां से आए? आज जब हम कंप्लीट लॉकडाउन के एक्सटेंशन फेज में हैं, कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 13 हजार के पार हो चुकी है। देश के 27 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों के 388 जिलों में फैले कोरोना संक्रमण से मौत का आंकड़ा 500 के पार कैसे पहुंच गया? अगर आपको याद हो तो 27 फरवरी 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गाइडलाइन जारी करते हुए कहा था- दुनियाभर में पीपीई किट का भंडारण पर्याप्त नहीं है और लगता है कि जल्द ही गाउन और गोगल्स (चश्में) की आपूर्ति भी कम पड़ जाएगी। गलत जानकारी और भयाक्रांत लोगों में खरीददारी की होड़ के साथ ही कोविड-19 के बढ़ते मामलों से दुनिया में पीपीई की उपलब्धता कम हो जाएगी। डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइन में बताया गया था- पीपीई किट (पर्सनल प्रोटेक्ट‍िव एक्व‍िपमेंट किट) का मतलब है : गाउन, बूट, कैप, एन 95 मास्क, ग्लब्स और गॉगल्स। इसके बावजूद भारत सरकार ने घरेलू पीपीई किट के निर्यात पर रोक लगाने में 19 मार्च तक का समय लगा दिया। देश इस मुद्दे पर आपका स्पष्टीकरण चाहता है क्योंकि आज हम चीन से पीपीई किट का आयात कर रहे हैं जिससे संक्रमण का खतरा और गहराने का अंदेशा है।

5. कोरोना वॉरियर्स के सम्मान और उनकी हौसलाअफजाई के लिए आपने देशवासियों से बालकनी में खड़े होकर ताली-थाली बजाने और घर की बत्ती बुझाकर दीया या टॉर्च जलाने के लिए कहा था। एकजुटता का शक्ति प्रदर्शन कर हम भारत के लोगों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और तब आपका सीना भी गर्व से फूल गया था। लेकिन उसके बाद जो कुछ हुआ उसकी कल्पना शायद आपने नहीं की होगी। हैल्थ सेक्टर, लॉ एंड आर्डर और मीडिया से जुड़े कोरोना वॉरियर्स के साथ क्या बर्ताव लोगों ने किया इस बारे में आपने अपनी दूरदर्शिता का इस्तेमाल नहीं किया। सोशल डिस्टेंसिंग की आड़ में पूरे देश में सामाजिक विभाजन होने लगा और समाज इन कोरोना वॉरियर्स से खुद को अलग करने लगा। शायद आप भी सोशल डिस्टेंसिंग और फिजिकल डिस्टेंसिंग के फर्क को नहीं समझ पाए। दूसरी बात, जब हैल्थ सेक्टर से जुड़े लोगों ने पीपीई किट की कमी से आपको, सरकारी महकमा को अवगत कराने की कोशिश की, वॉर विद्आउट वीपन्स की बात की तो उन्हें सरकार के लोगों ने ही प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। आखिर इस तरह के हालात और अव्यवस्था से निपटने की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या आप कहने की स्थिति में हैं कि यह सब सरकार की जवाबदेही में नहीं आता है।

6. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आपने अपने संबोधन में गरीबों और मजदूरों को अपना 'परिवार' बताया, लेकिन कितने गरीबों और मजदूरों तक आपने अपने भरोसे की पहुंच बनाई? पहली बार लॉकडाउन से पहले अगर आप गरीब मजदूरों को इस बात का भरोसा दिला पाते कि सरकार आपके द्वार होगी तो शायद देश के अलग-अलग महानगरों व शहरों में रह रहे लाखों मजदूरों का सैलाब सड़कों पर नहीं उमड़ता। हजारों की संख्या में ये मजदूर अपने गांव की तरफ पैदल चलकर पलायन की राह नहीं अपनाते। इन्‍हीं गरीबों के बीच अल्‍पसंख्‍यकों की भी भारी आबादी इस देश में है। इस दौरान कुछ तथाकथित दक्षिणपंथी संगठनों ने मिलकर जिस तरह के हमले इनपर किए हैं वह शर्मनाक है। सपाट भाषा में कहें तो देश की कुछ फासीवादी ताकतें कोरोना संकट की आड़ में ग़रीब अल्पसंख्यक आबादी को निशाना बनाने का कोई मौका नहीं चूक रही हैं। यहां तक कि तंबूपरस्त मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक जनभावनाओं को भड़काने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं और आपकी सरपरस्ती में चल रही सरकार उस बेलगाम तंबूपरस्त मीडिया, सोशल मीडिया और फासीवादी ताकतों को खुली छूट दे रखी है। ग्राउंड जीरो से जो रिपोर्ट्स आ रही हैं उसमें ये भी देखा जा रहा है कि सरकारी राशन की पहुंच सत्ताधारी पार्टी अपने कोर वोट बैंक तक ही सीमित रख रही हैं। कोरोना की टेस्टिंग और टेस्ट किट के मामले में भी पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है। आपने बुजुर्गों का विशेष ख्याल रखने की बात भी कही लेकिन उन बुजुर्गों का ख्याल कौन रखेगा जिनकी कीमोथैरेपी होती है, उन बुजुर्गों का ख्याल कौन रखेगा जिनका साप्ताहिक डायलिसिसि होता है, जो किडनी के मरीज हैं, दिल के मरीज हैं, डायबिटिक हैं। इन बुजुर्गों को अस्पताल में गंभीर बीमारियों के उपचार की सुविधा नहीं मिल पा रही है। आखिर इन सब हालातों की जिम्मेदारी कौन लेगा?

7. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आपका कहना है, आर्थिक संकट कोरोना की वजह से पैदा हुआ है और इससे बचना नामुमकिन था। यह भी सच नहीं है। भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में 2019 के तीसरे क्‍वार्टर से ही खतरनाक संकट पैदा हो चुका था जो नोटबंदी और जीएसटी की वजह से पहले से ही धीरे-धीरे इस स्तर तक पहुंचा था। कोरोना का पहला केस आने से पहले ही ऑटोमोबाइल सेक्‍टर, टेक्‍सटाइल सेक्‍टर, रियल एस्टेट में मंदी साफतौर पर देखी जा सकती थी। सारी मैन्‍युफैक्‍चरिंग गतिविधियां सिकुड़ रही थी और वैश्विक रेटिंग एजेंसियों ने आने वाले वित्त वर्ष में भारत की आर्थिक वृद्धि दर का आंकलन पहले से कम करके 4 प्रतिशत से भी नीचे रहने का अनुमान लगाया था। कोरोना महामारी से पहले ही कई करोड़ लोगों की नौकरियां जा चुकी थीं।  निश्चित तौर पर कोरोना संकट के कारण आर्थिक संकट महासंकट का रूप ले चुका है और इसकी मुख्य वजह देश में कंप्लीट लॉकडाउन का फैसला है। पहले हमारी अर्थव्यवस्था धीमी हुई और लॉकडाउन से तो यह पूरी तरह ठप ही हो गई। 21 दिन के लॉकडाउन में सरकार ने इसको लेकर कोई रोडमैप नहीं बनाया। आपकी मोदीनॉमिक्स का सारा तजुर्बा रेत पर बने महल की तरह ढह गया। बावजूद इसके हम भारत के लोग इस बात को जानना चाहते हैं कि आप देशवासियों को बताएं कि आपने अपने छह साल के कार्यकाल में पेट्रोल और डीजल से कितनी कमाई की? आपने सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियों की बोली लगाकर कितनी कमाई की? और आज की तारीख में भारत सरकार के राजकोष में कितना धन जमा है?

बहरहाल, लॉकडाउन-1 के 20 दिन बाद जब लोगों को यह पता चला कि 14 अप्रैल सुबह 10.30 बजे आप फिर से देशवासियों को संबोधित करेंगे तो लोग उम्मीदों की टकटकी लगाकर आपको सुनने के लिए बेसब्री से इंतजार करने लगे। क्या बुजुर्ग, क्या जवान, क्या बच्चे, क्या गरीब-क्या अमीर और सबसे ज्यादा मध्य व निम्न मध्य वर्ग सभी आपके मुखाबिंद से उम्मीदों के, राहतों के दो बोल सुनने के लिए पूरी रात जागकर गुजार दी थी। लेकिन जब आपकी पाठशाला टेलीविजन पर शुरू हुई तो आपके संबोधन के 24वें मिनट तक सब यही कह रहे थे कि उन्हें 19 दिन का एक और लॉकडाउन भी स्वीकार है। उन्हें पक्का भरोसा था कि मोदी जी आज राहत का बड़ा पिटारा जरूर खोलेंगे क्योंकि 130 करोड़ देशवासियों की ताकत लेकर आप जीते जो हैं। सच मानिए मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आपने खुद को प्रधानसेवक कहा था, आपने खुद को देश का चौकीदार कहा था, लोग आपके ऊपर बहुत भरोसा करते थे और इस वक्त तक कर भी रहे थे, लेकिन जैसे ही आपने अपने संबोधन के 25वें मिनट में कोरोना संकट से निपटने के लिए सप्तपदी (हिन्दू विवाह पद्धति में अग्नि की साक्षी मानकर नवविवाहित जोड़े को जिन सात फेरों में बांधा जाता है और फिर वो जन्म-जन्मांतर एक-दूसरे के हो जाते हैं) के तहत सात वचन निभाने का वादा मांगने लगे तो लोगों के सब्र का बांध टूट गया। उस वक्त उनकी बेचैनी व बेबसी को उनकी आंखों में झांककर सहज ही महसूस किया जा सकता था। शायद आपने महसूस नहीं किया क्योंकि आप प्रधानसेवक और चौकीदार से मिस्टर प्राइम मिनिस्टर जो हो चुके हैं, क्योंकि आप अपने होने का वजूद जो खो चुके हैं।

Wednesday, 8 April 2020

कोरोना संकट : नोटबंदी की तर्ज पर लॉकडाउन गलत

कोरोना महामारी के जिस संकटपूर्ण दौर से हमारा देश इस वक्त गुजर रहा है, बार-बार बापू का देश को दिया वो जंतर याद आ रहा है जिसमें उन्होंने कहा था- 'तुम्हें एक जंतर दे रहा हूं। जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो यह कसौटी आजमाना। जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा? क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा?'

ऐसे में बड़ा सवाल यह कि क्या सरकार ने कंप्लीट लॉकडाउन का ऐलान करने से पहले समाज के सबसे गरीब और कमजोर तबके की शक्ल को याद किया था और अपने दिल से पूछा था कि जो कदम वह उठाने जा रहा है उसका अंजाम क्या होगा? क्या सरकार ने इस ऐलान से पहले देशभर में फैले प्रवासी मजदूरों की कोई फिक्र की थी? क्या सरकार ने कंप्लीट लॉकडाउन के बाद पैदा होने वाले मानवीय महासंकट की परिस्थिति का अंदाजा लगाया था? इन सभी सवालों का एक जवाब है- बिल्कुल नहीं। और यह सरकार की बड़ी चूक के रूप में सामने आई।

याद कीजिए 8 नवंबर 2016 की रात 8.00 बजे का वो वक्त जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में नोटबंदी का ऐलान किया था और फिर 24 मार्च 2020 की रात 8.00 बजे का ये वक्त जब पीएम मोदी ने कोरोना महामारी से बचने के लिए पूरे देश में कंप्लीट लॉकडाउन का ऐलान किया। नोटबंदी और कंप्लीट लॉकडाउन की जब आप तुलना करेंगे तो एक बात दोनों ही ऐलान में समान हैं और वो है सिर्फ चार घंटे की मोहलत। कहने का मतलब यह कि नोटबंदी और कंप्लीट लॉकडाउन में जमीन-आसमान का फर्क है लेकिन हमारे प्रधानमंत्री ने देश को भरोसे में लिए बिना नोटबंदी की तर्ज पर ही पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा कर दी, बिना इस बात का अनुमान लगाए कि देश में 80 करोड़ से अधिक की आबादी के पास शायद हफ्ते भर का भी राशन नहीं होता है।

हमारे देश के तमाम बड़े शहरों में ऐसा एक बड़ा तबका है जो रोज़ाना की मज़दूरी पर अपने जीवन का पहिया चलाता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों पर भरोसा करें तो भारत में कम से कम 90 फीसदी लोग गैर-संगठित क्षेत्रों में काम करते हैं। ये लोग सिक्योरिटी गार्ड, सफाई करने वाले, रिक्शा चलाने वाले, रेहड़ी लगाकर सामान बेचने वाले, कूड़ा उठाने वाले और घरों में नौकर के रूप में काम करते हैं। इनमें से ज़्यादातर लोगों को पेंशन, बीमार होने पर अवकाश, पेड लीव और किसी भी तरह का बीमा नहीं मिलता है। कई लोगों के बैंक अकाउंट तक नहीं हैं। ऐसे में इनकी और इनके परिवार की ज़िंदगी उसी नकद आमद पर टिकी होती है जिसे ये पूरे दिन काम करने के बाद घर लेकर जाते हैं। इनमें से बड़ी आबादी प्रवासी मजदूरों की भी हैं।

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) का अध्ययन बताता है कि बड़े शहरों में कमाने-खाने वाली आबादी में से 29 फीसदी लोग दिहाड़ी मजदूर होते हैं। वहीं, उपनगरीय इलाकों की खाने-कमाने वाली आबादी में दिहाड़ी मजदूरों की संख्या 36 फीसदी है। गांवों में ये आंकड़ा 47 फीसदी है जिनमें से ज़्यादातर खेतिहर मजदूर हैं। अगर आप दिल्ली की बात करें तो यहां की कमाने-खाने वाली आबादी में दिहाड़ी मजदूरों की संख्या 27 फीसदी है। लॉकडाउन की वजह से काम नहीं मिलने के कारण इनमें से ज़्यादातर मजदूरों के हाथ और जेबें एक तरह से खाली थीं। ऐसे में ये मजदूर गांव जाना चाहते थे क्योंकि वहां शहरों के मुकाबले बेहतर सामाजिक संबंध और सामुदायिक जीवन होता है जो कि उनके गुजर-बसर के लिए बेहतर संभावनाएं दिखाता है।

साल 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि 37 फीसदी से ज़्यादा भारतीय एक कमरे के घरों में रहते हैं। वहीं, 32 फीसदी भारतीय दो कमरों के घरों में रहते हैं। और इनकी असलियत में जब आप झांकने की कोशिश करेंगे तो ये एक या दो कमरों के घर ज़्यादातर झुग्गियां और झोपड़ियां होती हैं जिनमें औसतन 5-6 लोगों वाले मध्य और निम्न आयवर्ग वाले परिवार रहते हैं। ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग की बात कागजों में की जा सकती है। इसे अमल में लाना तकनीकी रूप से संभव नहीं है। यहां ये भी नहीं भूलना चाहिए कि साल 2011 की जनगणना ये भी बताती है कि भारत में चार फीसदी लोग ऐसे हैं जो कि बेघर हैं। न तो उनके पास बालकनी है और ना दरवाजे जहां वो थाली बजा सकें और दिए जला सकें। आज जब हम 9 साल बाद की परिस्थितियों की बात कर रहे हैं, ये बेघरों की बड़ी आबादी एक अदद छत कहां से लाए।

प्रधानमंत्री ने 24 मार्च को जब 21 दिनों के लिए लॉकडाउन की घोषणा की तो उन्होंने ये सारी बातें नहीं समझाई थीं। जबकि उन्हें लोगों को आश्वस्त करना चाहिए था, लोगों में इस बात का भरोसा जगाना चाहिए था कि सरकार ने उनके रहने और खाने-पीने की पूरी व्यवस्था करने के बाद लॉकडाउन का फैसला लिया है। आपको राज्यों के मुख्यमंत्री, सभी सांसदों, विधायकों, सर्वदलीय नेताओं और विशेषज्ञों से राय-मशविरा करने के बाद एक रोडमैप बनाकर लॉकडाउन का फैसला लेना चाहिए था। दुर्भाग्य से हमारी सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया और नोटबंदी की तर्ज पर 130 करोड़ के देश में कंप्लीट लॉकडाउन का एकतरफा ऐलान कर दिया। जब हालात बिगड़े तब असलियत समझ में आई लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और लाखों प्रवासी मजदूरों का हुजूम दिल्ली, मुंबई, पुणे, चंडीगढ़ समेत देश के तमाम महानगरों व शहरों की सड़कों पर उमड़ पड़ा। हजारों मजदूर पत्नी-बच्चों के साथ शहर से अपने-अपने गांव की तरफ निकल पड़े लंबे सफर पर। कितनों ने बीच सड़क पर जान तक गंवा दी। कहने का मतलब यह कि अचानक लॉकडाउन के सरकारी फैसले से गरीब, हाशिये पर मौजूद लोग और जोखिम में आने वाले तबकों पर सबसे बुरा असर पड़ा। वो लोग अब सरकार से पूछ रहे हैं कि इस तरह के कड़े कदम उठाने से पहले इसका अंजाम क्या होगा इसपर आपने चर्चा क्यों नहीं की थी?

Monday, 6 April 2020

कोरोना संकट को कमतर आंकना बड़ी भूल

चीन में जब कोरोना वायरस कहर ढा रहा था और दुनिया के तमाम देश इस महामारी से लड़ने की तैयारियों में जुटे थे तब भारत की स्थिति इसके बिल्कुल उलट थी। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने 23 मार्च 2020 को मोदी सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए अपने एक ट्वीट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा भी कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सलाह के बावजूद वेंटिलेटर और सर्जिकल मास्क का पर्याप्त स्टाक रखने के विपरीत भारत सरकार ने 19 मार्च तक इन सभी चीजों के निर्यात की अनुमति क्यों दीं? ये खिलवाड़ किन ताक़तों की शह पर हुआ? क्या यह आपराधिक साजिश नहीं है?

अगर याद हो तो 27 फरवरी 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गाइडलाइन जारी करते हुए बताया था, दुनियाभर में पीपीई किट का भंडारण पर्याप्त नहीं है और लगता है कि जल्द ही गाउन और गोगल्स (चश्में) की आपूर्ति भी कम पड़ जाएगी। गलत जानकारी और भयाक्रांत लोगों की तीव्र खरीदारी और साथ ही कोविड-19 के बढ़ते मामलों के चलते दुनिया में पीपीई की उपलब्धता कम हो जाएगी। जैसा कि डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइन में बताया गया, पीपीई किट (पर्सनल प्रोटेक्ट‍िव एक्व‍िपमेंट किट) का मतलब है : गाउन, बूट, कैप, एन 95 मास्क, ग्लब्स और गॉगल्स। इसके बावजूद भारत सरकार ने घरेलू पीपीई के निर्यात पर रोक लगाने में 19 मार्च तक का समय लगा दिया। 18 मार्च को जनता कर्फ्यू की अपील करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से अपने घरों की बालकनी से ताली, थाली और घंटी बजाकर स्वास्थ्य कर्मचारियों की हौसला अफ़जाई करने को कहा था जबकि इसके एक दिन बाद जाकर भारत सरकार ने देश में निर्मित पीपीई किट के निर्यात पर रोक लगाई।

हालांकि सरकार ने अपने ट्विटर हैंडल पर एक पत्र जारी करते हुए राहुल गांधी के आरोपों का खंडन करते हुए कहा था कि 31 जनवरी को ही घरेलू पीपीई किट के निर्यात पर रोक लगा दी गई थी। कैरवान की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह सही है कि 30 जनवरी को भारत में कोविड-19 का पहला मामला सामने आने के बाद विदेश व्यापार निदेशालय ने सभी पीपीई के निर्यात पर रोक लगा दी थी, लेकिन 8 फरवरी को सरकार ने इस आदेश में संशोधन कर सर्जिकल मास्क और सभी तरह के दस्तानों के निर्यात की अनुमति दे दी। इसके बाद 25 फरवरी को सरकार ने उपरोक्त रोक को और ढीला करते हुए 8 नए आइटमों के निर्यात की भी मंजूरी दे दी। स्पष्ट है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिशों के बावजूद भारत सरकार ने पीपीई किट की मांग का आंकलन नहीं किया और भारतीय डॉक्टर व नर्स आज इसकी कीमत चुका रहे हैं। कोरोना मरीज की बढ़ती संख्या के बीच देश वक्त पीपीई किट के संकट का सामना कर रहा है।

आपके लिए यह जानना जरूरी है कि इस वक्त देश में डॉक्टर्स, नर्सेस और हेल्थ प्रोफेशनल्स को 7 लाख 25 हजार ओवरऑल हैजमेट सूट्स चाहिए, 60 लाख एन-95 मास्क चाहिए और एक करोड़ तीन प्लाई मास्क चाहिए। यह बात कोई और नहीं, 18 मार्च 2020 की भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की बैठक में कही गई है। तो क्या ये दोनों चीजें अपराध नहीं हैं- पहला, इन सब संसाधनों को लेकर एक महीने से अधिक का समय यूं ही गंवा दिया गया और दूसरा, इन सबका 19 मार्च 2020 तक निर्यात करते रहना?

इन बातों का जिक्र हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि स्वास्थ्य कर्मियों को कोरोना जैसी बीमारी जो संक्रमित व्यक्ति से फैलता है, चार गुना ज़्यादा ख़तरा होता है। जब डॉक्टर कोरोना जैसी भीषण संक्रामक बीमारी वाले मरीज़ का इलाज कर रहे होते हैं तो उन्हें एन-95 मास्क चाहिए होता है, उन्हें गाउन, कैप, शू कवर भी चाहिए होते हैं। अगर इन्हें ये जरूरी सामान नहीं मिल पाए तो मरीज़ों का इलाज करने वाले डॉक्टरों के संक्रमित होने की आशंका बढ़ जाएगी। लिहाजा यह ज़रूरी है कि कोरोना से जंग जीतने के लिए हैल्थ वर्करों (डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ, सफाईकर्मी) की सेहत ठीक रहे और ये तभी संभव है जब जंग से मुकाबला करने वाले सभी चिकित्सा कर्मियों को पीपीई किट मिले।

Thursday, 2 April 2020

कोरोना सेंध लगाता रहा, चौकीदार सोता रहा

कोरोना वायरस ने चीन, अमेरिका, इटली, स्पेन, भारत समेत पूरी दुनिया के 200 से अधिक देशों में तबाही मचा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दावे की तर्ज पर भारतीय हुक्मरान ने भी शुरूआती दौर में यही कहा था कि कोरोना वायरस भारत में टिकने वाला नहीं है। जबकि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और सांसद राहुल गांधी इस बारे में सरकार को लगातार इस संकट से आगाह कर रहे थे। साफ है कि कोरोना महासंकट को लेकर सरकार ने लापरवाही बरती जिसका खामियाजा कम्प्लीट लॉकडाउन के रूप में आज पूरा देश भुगत रहा है। भारतीय इकनॉमी का पूरा पहिया थम चुका है।

जरा पीछे मुड़कर देखें तो भारत में कोरोना वायरस का पहला मामला 30 जनवरी 2020 को केरल में सबसे पहले सामने आया। केरल का जो मरीज कोरोना वायरस से संक्रमित बताया गया वह चीन के वुहान यूनिवर्सिटी का छात्र था। 30 जनवरी से पहले जापान और अमेरिका में कोरोना का संक्रमण फैल चुका था। याद करें तो 31 जनवरी 2020 को कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने चीन में कोरोना वायरस से पैदा होने वाले वैश्विक महासंकट की तरफ आगाह करते हुए पहला ट्वीट किया था। राहुल गांधी ने यह ट्वीट तब किया था जब दुनियाभर में एक लाख से अधिक लोग इस खतरनाक वायरस से संक्रमित हो चुके थे और चीन में 100 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके थे।

उसके बाद 12 फरवरी को दूसरे ट्वीट में राहुल ने कहा था कि कोरोना संकट हमारे देश की जनता और अर्थव्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक होने वाला है। जरूरी है कि समय रहते इस संकट से निपटने के लिए सरकार एक्शन ले। 3 मार्च को अपने तीसरे ट्वीट में राहुल गांधी ने पीएमओ इंडिया को संबोधित करते हुए एक बार फिर कोरोना वायरस की चुनौती के बारे में जिक्र करते हुए जानना चाहा था कि इस दिशा में सरकार क्या कर रही है। 5 मार्च को एक और ट्वीट में राहुल ने स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्द्धन के एक बयान की तुलना टाइटेनिक जहाज के उस कप्तान से की थी जिसने कहा था कि यात्री घबराएं नहीं, उनका शिप डूबने वाला नहीं है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने यही कहा था कि स्थिति सरकार के नियंत्रण में है। आप थोड़ा सोचकर देखिए, अगर सरकार फरवरी के महीने में ही दूसरे देशों से आने वाले लोगों पर कड़ी निगरानी रखती और देश के अंदर इसको लेकर तैयारी शुरू कर देती तो हालात इस तरह से बेकाबू नहीं होती।

अगर आप गौर करें तो कोरोना का पहला केस चीन में 1 दिसंबर 2019 को ही सामने आ गया था। 13 जनवरी को चीन के बाहर कोरोना का पहला मामला थाईलैंड में 61 वर्षीय महिला के रूप में सामने आया। 15 जनवरी को जापान में कोरोना का पहला मामला सामने आया। 21 जनवरी को अमेरिका में कोरोना वायरस का पहला मामला सामने आया। यह शख्स छह दिन पहले चीन से लौटा था। फिर 30 जनवरी को भारत के केरल में पहला केस सामने आया जो चीन के वुहान से आया। कहने का मतलब यह है कि भारत को इस संकट को समझने के लिए दो महीने का वक्त मिला लेकिन इसे समझने की जहमत नहीं उठाई गई।

देश में कोरोना संकट लगातार गहरा रहा था और आप अमेरिकी भगवान डोनाल्ड ट्रम्प के स्वागत में पलक पांवरे बिछाए खड़े थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ से चेतावनियां जारी होने के बावजूद ट्रम्‍प के स्‍वागत में गुजरात में हज़ारों लोगों को जुटाया गया। तब तक अमेरिका में कोरोना फैलने की खबर हमें मिल चुकी थी। ट्रम्प ने अपने देश को तो डुबोया ही, हमें भी अपनी चपेट में ले लिया। आज इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? पूरी सरकार गुजरात से लेकर नई दिल्ली के लुटियन जोन तक ट्रम्प के स्वागत में जुटी थी और तभी राजधानी दिल्ली सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था। हमारे हिन्दू और मुसलमान भाईयों का कत्ल हो रहा था। घर जलाए जा रहे थे, दुकानें जलाई जा रही थी। लेकिन आपने उस वक्त भी खामोशी की चादर ओढे रखी। आखिर क्यों? कोरोना अपना खौफनाक जाल बिछा रहा था और देश के सैकड़ों रहनुमा देश की संसद में एनपीआर, एनआरसी, शाहीनबाग और सांप्रदायिक दंगे को लेकर तू-तू मैं-मैं कर रहे थे। देश में कोरोना फैल रहा था और सत्ताधारी पार्टी मध्यप्रदेश में तख्तापलट करने में जुटी थी। आपने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का ऐलान किया था और एक दिन बाद शिवराज सरकार शपथ ले रही थी जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग की कोई परवाह नहीं की गई।