Wednesday, 8 April 2020

कोरोना संकट : नोटबंदी की तर्ज पर लॉकडाउन गलत

कोरोना महामारी के जिस संकटपूर्ण दौर से हमारा देश इस वक्त गुजर रहा है, बार-बार बापू का देश को दिया वो जंतर याद आ रहा है जिसमें उन्होंने कहा था- 'तुम्हें एक जंतर दे रहा हूं। जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो यह कसौटी आजमाना। जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा? क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा?'

ऐसे में बड़ा सवाल यह कि क्या सरकार ने कंप्लीट लॉकडाउन का ऐलान करने से पहले समाज के सबसे गरीब और कमजोर तबके की शक्ल को याद किया था और अपने दिल से पूछा था कि जो कदम वह उठाने जा रहा है उसका अंजाम क्या होगा? क्या सरकार ने इस ऐलान से पहले देशभर में फैले प्रवासी मजदूरों की कोई फिक्र की थी? क्या सरकार ने कंप्लीट लॉकडाउन के बाद पैदा होने वाले मानवीय महासंकट की परिस्थिति का अंदाजा लगाया था? इन सभी सवालों का एक जवाब है- बिल्कुल नहीं। और यह सरकार की बड़ी चूक के रूप में सामने आई।

याद कीजिए 8 नवंबर 2016 की रात 8.00 बजे का वो वक्त जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में नोटबंदी का ऐलान किया था और फिर 24 मार्च 2020 की रात 8.00 बजे का ये वक्त जब पीएम मोदी ने कोरोना महामारी से बचने के लिए पूरे देश में कंप्लीट लॉकडाउन का ऐलान किया। नोटबंदी और कंप्लीट लॉकडाउन की जब आप तुलना करेंगे तो एक बात दोनों ही ऐलान में समान हैं और वो है सिर्फ चार घंटे की मोहलत। कहने का मतलब यह कि नोटबंदी और कंप्लीट लॉकडाउन में जमीन-आसमान का फर्क है लेकिन हमारे प्रधानमंत्री ने देश को भरोसे में लिए बिना नोटबंदी की तर्ज पर ही पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा कर दी, बिना इस बात का अनुमान लगाए कि देश में 80 करोड़ से अधिक की आबादी के पास शायद हफ्ते भर का भी राशन नहीं होता है।

हमारे देश के तमाम बड़े शहरों में ऐसा एक बड़ा तबका है जो रोज़ाना की मज़दूरी पर अपने जीवन का पहिया चलाता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के आंकड़ों पर भरोसा करें तो भारत में कम से कम 90 फीसदी लोग गैर-संगठित क्षेत्रों में काम करते हैं। ये लोग सिक्योरिटी गार्ड, सफाई करने वाले, रिक्शा चलाने वाले, रेहड़ी लगाकर सामान बेचने वाले, कूड़ा उठाने वाले और घरों में नौकर के रूप में काम करते हैं। इनमें से ज़्यादातर लोगों को पेंशन, बीमार होने पर अवकाश, पेड लीव और किसी भी तरह का बीमा नहीं मिलता है। कई लोगों के बैंक अकाउंट तक नहीं हैं। ऐसे में इनकी और इनके परिवार की ज़िंदगी उसी नकद आमद पर टिकी होती है जिसे ये पूरे दिन काम करने के बाद घर लेकर जाते हैं। इनमें से बड़ी आबादी प्रवासी मजदूरों की भी हैं।

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) का अध्ययन बताता है कि बड़े शहरों में कमाने-खाने वाली आबादी में से 29 फीसदी लोग दिहाड़ी मजदूर होते हैं। वहीं, उपनगरीय इलाकों की खाने-कमाने वाली आबादी में दिहाड़ी मजदूरों की संख्या 36 फीसदी है। गांवों में ये आंकड़ा 47 फीसदी है जिनमें से ज़्यादातर खेतिहर मजदूर हैं। अगर आप दिल्ली की बात करें तो यहां की कमाने-खाने वाली आबादी में दिहाड़ी मजदूरों की संख्या 27 फीसदी है। लॉकडाउन की वजह से काम नहीं मिलने के कारण इनमें से ज़्यादातर मजदूरों के हाथ और जेबें एक तरह से खाली थीं। ऐसे में ये मजदूर गांव जाना चाहते थे क्योंकि वहां शहरों के मुकाबले बेहतर सामाजिक संबंध और सामुदायिक जीवन होता है जो कि उनके गुजर-बसर के लिए बेहतर संभावनाएं दिखाता है।

साल 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि 37 फीसदी से ज़्यादा भारतीय एक कमरे के घरों में रहते हैं। वहीं, 32 फीसदी भारतीय दो कमरों के घरों में रहते हैं। और इनकी असलियत में जब आप झांकने की कोशिश करेंगे तो ये एक या दो कमरों के घर ज़्यादातर झुग्गियां और झोपड़ियां होती हैं जिनमें औसतन 5-6 लोगों वाले मध्य और निम्न आयवर्ग वाले परिवार रहते हैं। ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग की बात कागजों में की जा सकती है। इसे अमल में लाना तकनीकी रूप से संभव नहीं है। यहां ये भी नहीं भूलना चाहिए कि साल 2011 की जनगणना ये भी बताती है कि भारत में चार फीसदी लोग ऐसे हैं जो कि बेघर हैं। न तो उनके पास बालकनी है और ना दरवाजे जहां वो थाली बजा सकें और दिए जला सकें। आज जब हम 9 साल बाद की परिस्थितियों की बात कर रहे हैं, ये बेघरों की बड़ी आबादी एक अदद छत कहां से लाए।

प्रधानमंत्री ने 24 मार्च को जब 21 दिनों के लिए लॉकडाउन की घोषणा की तो उन्होंने ये सारी बातें नहीं समझाई थीं। जबकि उन्हें लोगों को आश्वस्त करना चाहिए था, लोगों में इस बात का भरोसा जगाना चाहिए था कि सरकार ने उनके रहने और खाने-पीने की पूरी व्यवस्था करने के बाद लॉकडाउन का फैसला लिया है। आपको राज्यों के मुख्यमंत्री, सभी सांसदों, विधायकों, सर्वदलीय नेताओं और विशेषज्ञों से राय-मशविरा करने के बाद एक रोडमैप बनाकर लॉकडाउन का फैसला लेना चाहिए था। दुर्भाग्य से हमारी सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया और नोटबंदी की तर्ज पर 130 करोड़ के देश में कंप्लीट लॉकडाउन का एकतरफा ऐलान कर दिया। जब हालात बिगड़े तब असलियत समझ में आई लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और लाखों प्रवासी मजदूरों का हुजूम दिल्ली, मुंबई, पुणे, चंडीगढ़ समेत देश के तमाम महानगरों व शहरों की सड़कों पर उमड़ पड़ा। हजारों मजदूर पत्नी-बच्चों के साथ शहर से अपने-अपने गांव की तरफ निकल पड़े लंबे सफर पर। कितनों ने बीच सड़क पर जान तक गंवा दी। कहने का मतलब यह कि अचानक लॉकडाउन के सरकारी फैसले से गरीब, हाशिये पर मौजूद लोग और जोखिम में आने वाले तबकों पर सबसे बुरा असर पड़ा। वो लोग अब सरकार से पूछ रहे हैं कि इस तरह के कड़े कदम उठाने से पहले इसका अंजाम क्या होगा इसपर आपने चर्चा क्यों नहीं की थी?

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