Friday, 9 October 2020

अब कौन नापेगा भारतीय राजनीति का तापमान?


फरकिया वाली खगड़िया के बेहद दुरुह इलाके शहरबन्नी से निकलकर दिल्ली की सत्ता यानी रायसीना हिल्स तक का सफर अपने संघर्ष के बूते तय करने का नाम है रामविलास पासवान जो अब हमारे बीच नहीं रहे। भारत की राजनीति में ‘मौसम वैज्ञानिक' के नाम से मशहूर रामविलास पांच दशक तक बिहार और देश की राजनीति में एक ध्रुवतारा की तरह चमकते रहे। दो बार लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक मतों से जीतने का विश्व रिकॉर्ड बनाने और देश के आधा दर्जन प्रधानमंत्रियों की कैबिनेट की शोभा रहे इस दलित मसीहा के बारे में कहा जाता है कि राजनीति की नब्ज पर उनकी पकड़ इस कदर मजबूत थी कि एक वक्त में उन्हें यूपीए में शामिल कराने के लिए सोनिया गांधी खुद चलकर उनके घर पर दस्तक दी थीं। 

‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ इस कहावत को चरितार्थ करने वाले मृदुभाषी रामविलास पासवान के छह प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने की कहानी भी बड़ी अजब गजब है। 1996 से 2015 तक केन्द्र में सरकार बनाने वाले सभी राष्ट्रीय गठबंधन चाहे यूपीए हो या एनडीए का वह हिस्सा बने रहे। इसी कारण लालू प्रसाद ने उनको ‘मौसम विज्ञानी’ का दर्जा भी दिया था। अब तो वह खुद भी स्वीकारने लगे थे कि वह जहां रहते हैं सरकार उन्हीं की बनती है। मतलब राजनीतिक मौसम का पुर्वानुमान लगाने में वे माहिर थे। समाजवादी पृष्ठभूमि के बड़े नेताओं में रामविलास की अपनी एक पहचान थी। 

जब सत्ता की चाबी लगी थी हाथ, लेकिन...

फरवरी 2005 की बात है जब बिहार की सत्ता की चाबी उनके हाथ लगी थी, लेकिन...। साल 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी बनाने के बाद फरवरी 2005 में पहली बार उनकी पार्टी बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ी थी तो 29 विधायक जीतकर आए थे। किसी दल को बहुमत नहीं होने के कारण सरकार नहीं बन रही थी। पासवान अगर उस वक्त नीतीश कुमार के साथ या लालू प्रसाद का साथ दे देते तो प्रदेश में सरकार बन सकती थी। मगर उन्होंने शर्त रख दी कि जो पार्टी अल्पसंख्यक को मुख्यमंत्री बनाएगी, उनकी पार्टी उसी का साथ देगी। और उनकी इस शर्त पर कोई खरा नहीं उतरा। सूबे को दोबारा चुनाव में जाना पड़ा। बाद में उसी साल अक्टूबर-नवम्बर में हुए चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए को बहुमत मिला और सरकार बनी। कहते हैं कि रामविलास पासवान की वह सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी और उसके बाद कभी भी उनकी पार्टी का प्रदर्शन उस रूप में नहीं कर पाई कि बिहार की सत्ता में अहम भूमिका निभा पाएं। 

2009 में जब हार गए थे लोकसभा चुनाव

2004 के लोकसभा चुनाव में रामविलास जीते, लेकिन 2009 में वह हार गए। 2009 में पासवान ने लालू प्रसाद की पार्टी राजद के साथ गठबंधन किया था। पूर्व गठबंधन सहयोगी कांग्रेस को छोड़कर। 33 वर्षों में पहली बार वे हाजीपुर से जनता दल के रामसुंदर दास से चुनाव हार गए थे। उनकी पार्टी लोजपा 15वीं लोकसभा में कोई भी सीट जीतने में सफल नहीं रही। साथ ही उनके गठबंधन के साथी और उनकी पार्टी भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई और 4 सीटों पर सिमट गई। उस वक्त लालू यादव के सहयोग से वह राज्यसभा में पहुंचे थे। बाद में हाजीपुर क्षेत्र से 2014 के चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वह फिर से एनडीए में आ गए और संसद में पहुंकर मंत्री बने। उसी चुनाव में बेटा चिराग भी पहली बार जमुई से सांसद बना।   

साल 1983 में बनाई थी दलित सेना

वर्ष 1975 में जब भारत में आपातकाल की घोषणा की गई तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 1977 में रिहा होने पर वे जनता पार्टी के सदस्य बन गए और पहली बार इसके टिकट पर हाजीपुर से संसद पहुंचे। इस चुनाव में उन्होंने सबसे अधिक अंतर से चुनाव जीतने का विश्व रिकॉर्ड अपने नाम किया। वे 1980 और 1984 में हाजीपुर निर्वाचन क्षेत्र से 7वीं लोकसभा के लिए चुने गए। 1983 में उन्होंने दलित मुक्ति और उसके कल्याण के लिए एक संगठन दलित सेना की स्थापना की। 1989 में लोकसभा के लिए फिर से चुने गए और उन्हें विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में केंद्रीय श्रम और कल्याण मंत्री बनाया गया। उसी समय मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की गईं। 1996 में उन्होंने लोकसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन का भी नेतृत्व किया, क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा राज्यसभा के सदस्य थे। उसी साल वे पहली बार केंद्रीय रेल मंत्री बने। उन्होंने 1998 तक उस पद को संभाला। इसके बाद वे अक्टूबर 1999 से सितंबर 2001 तक केंद्रीय संचार मंत्री रहे, जब उन्हें कोयला मंत्रालय में स्थानांतरित किया गया और वे इस पद पर अप्रैल 2002 तक बने रहे। मगर इसी बीच 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) बनाने के लिए वे जनता दल से अलग हो गए। 2004 के लोकसभा चुनावों के बाद पासवान यूपीए में शामिल हो गए और यूपीए सरकार में उन्हें रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय और इस्पात मंत्रालय में केंद्रीय मंत्री बनाया गया। हाजीपुर में रेलवे का जोनल कार्यालय खुलवाना और केन्द्र सरकार में अंबेडकर जयंती पर छुट्टी घोषित करावाने का श्रेय रामविलास पासवान को जाता है।

पहली बार 1969 में लड़े थे चुनाव

पांच दशकों में रामविलास पासवान 8 बार लोकसभा के सदस्य रहे। पासवान उस वक्त बिहार विधानसभा के सदस्य बन गए थे, जब लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार अपने छात्र जीवन में ही थे। इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी वाली कांग्रेस सरकार से लड़ने से लेकर अगले पांच दशकों तक पासवान कई बार कांग्रेस के साथ, तो कभी खिलाफ चुनाव लड़ते रहे और जीतते रहे। 1977 के लोकसभा चुनाव में ही हाजीपुर सीट से जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़े पासवान ने चार लाख से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था। इसके बाद 2014 तक उन्होंने आठ बार आम चुनावों में जीत हासिल की। रामविलास पासवान का राजनीतिक सफर 1969 में तब शुरू हुआ था, जब वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर खगड़िया जिले के सुरक्षित सीट अलौली से कांग्रेस के मिश्री सदा को हराकर बिहार विधानसभा पहुंचे थे। 1974 में राज नारायण और जेपी के प्रबल अनुयायी के रूप में लोकदल के महासचिव बने। वे व्यक्तिगत रूप से राज नारायण, कर्पूरी ठाकुर और सत्येंद्र नारायण सिन्हा जैसे आपातकाल के प्रमुख नेताओं के करीबी रहे हैं।

दो शादी से तीन बेटी और एक बेटा

खगड़िया में एक दलित परिवार में 5 जुलाई 1946 को जन्मे रामविलास पासवान राजनीति में आने से पहले बिहार प्रशासनिक सेवा में अधिकारी थे। पासवान ने इमरजेंसी का पूरा दौर जेल में गुजारा। इमरजेंसी खत्म होने के बाद पासवान छूटे और जनता दल में शामिल हो गए। उनका पैतृक गांव खगड़िया जिले के अलौली स्थित शहरबन्नी गांव है। उनकी शादी 1960 में राजकुमारी देवी के साथ हुई थी। बाद में 1981 में पहली पत्नी को तलाक देकर दूसरी शादी 1983 में पंजाबी महिला रीना शर्मा से की। देश की राजनीति में इतना लंबा वक्त गुजार चुके रामविलास पासवान की निजी जिंदगी परदे में ही रही। उनकी निजी जिंदगी पर बातें तभी हुई जब विवाद हुए। पासवान ने दो शादियां की थीं। उनकी पहली पत्नी राजकुमारी से दो बेटियां हैं, जबकि दूसरी पत्नी रीना से एक बेटा चिराग पासवान और एक बेटी है। पहली पत्नी अब भी उनके गांव शहरबन्नी में ही रहती हैं और इन दिनों बीमार भी हैं। रामविलास ने कोसी कॉलेज खगड़िया और पटना यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की थी। पटना विश्वविद्यालय से उन्होंने एमए और लॉ ग्रेजुएट की डिग्री ली थी।

Friday, 25 September 2020

कोरोना महामारी के बीच बिहार में सत्ता संग्राम-2020 का शंखनाद


आखिरकार लंबे इंतजार के बाद कोरोना काल में सबसे बड़े चुनाव संग्राम के तौर पर बिहार में विधानसभा चुनाव का ऐलान हो ही गया। लंबे इंतजार की बात हम यहां इसलिए कर रहे हैं क्योंकि 2015 में चुनाव तारीखों का ऐलान 9 सितंबर को ही कर दिया गया था। चुनाव आयोग की घोषणा के मुताबिक, 243 सीटों पर तीन चरणों में 28 अक्टूबर, 3 नवंबर और 7 नवंबर को मतदान कराया जाएगा। 10 नवंबर मंगलवार को नतीजों की घोषणा की जाएगी। इसकी घोषणा आज यानी शुक्रवार दोपहर मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने किया। नजर मध्यप्रदेश की 28 विधानसभा सीटों समेत देशभर की 56 अलग-अलग सीटों पर उपचुनाव की घोषणा पर भी थी लेकिन इस पर फैसला 29 नवंबर तक के लिए टाल दिया गया है। क्यों टाला गया इसे आप बखूबी समझ सकते हैं।

14 नवंबर को दीपावली से चार दिन और 18 नवंबर से शुरू होने वाले छठ पर्व से 8 दिन पहले यह साफ हो जाएगा कि बिहार में अगली सरकार किसकी बनेगी। मौजूदा विधानसभा का टर्म 29 नवंबर 2020 तक है। चुनाव आयोग के मुताबिक, 243 सीटों पर इस बार के चुनाव में 7.29 करोड़ लोग वोट डाल सकेंगे। इनमें 3 करोड़ 85 लाख पुरुष और 3.39 करोड़ महिला वोटर हैं। पिछले विधानसभा चुनाव के वक्त 6 करोड़ 70 लाख वोटर थे। कुल 42 हजार पोलिंग बूथ पर 1 लाख 73 हजार वीवीपैट का इस्तेमाल किया जाएगा। 

चुनाव आयोग ने आज जो सबसे बड़ी घोषणा की वह यह कि कोरोना की वजह से मतदान की समयावधि में एक घंटे का इजाफा किया गया है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को छोड़कर सामान्य इलाकों में सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे के बीच वोटिंग होगी। एक पोलिंग बूथ पर 1500 की जगह 1000 वोटर ही आएंगे। कोरोना के मरीज वोटिंग के दिन आखिरी घंटे में ही वोट डाल पाएंगे। कोरोना की वजह से कुछ खास इंतजाम भी किए गए हैं। मसलन, चुनाव में 46 लाख मास्क, 7.6 लाख फेस शील्ड, 23 लाख जोड़ी हैंड ग्लव्स और 6 लाख पीपीई किट्स का इस्तेमाल होगा। नामांकन के दौरान उम्मीदवार 5 की जगह 2 ही गाड़ियां साथ ले जा सकेंगे।

पहला चरण : 28 अक्टूबर को 71 सीटों पर मतदान
कहलगांव, सुल्तानगंज, अमरपुर, धोरैया (एससी),  बांका, कटोरिया (एसटी), बेलहर, तारापुर, मुंगेर, जमालपुर, सूर्यगढ़, लखीसराय, शेखपुरा, बारबीघा, मोकामा, बाढ़, मसौढ़ी (एससी), पालीगंज, बिक्रम, संदेश, बराहरा, आरा, अगियांव (एससी), तरारी, जगदीशपुर, शाहपुर, ब्रह्मपुर, बक्सर, दुमरांव, रायपुर (एससी), मोहनिया (एससी), भभुआ, चैनपुर, चेनारी (एससी), सासाराम, करगहर, दिनारा, नोखा, डेहरी, काराकट, अरवल, कुर्था, जहानाबाद, घोसी, मखदूमपुर (एससी), गोह, ओबरा, नबीनगर, कुटुम्बा (एससी), औरंगाबाद, रफीगंज, गुरुआ, शेरघाटी, इमामगंज (एससी), बाराचट्टी (एससी), बोध गया (एससी), गया टाउन, टीकरी, बेलागंज, अतरी, वजीरगंज, राजौली (एससी), हिसुआ, नवादा, गोबिंदपुर, वारसलीगंज, सिकंदरा (एससी), जमुई, झाझा, चकाई।  

दूसरा चरण : 3 नवंबर को 94 सीटों पर मतदान
नौतन, चनपटिया, बेतिया, हरसिद्धि (एससी), गोविंदगंज , केसरिया, कल्याणपुर, पिपरा, मधुबन, शिवहर, सीतामढ़ी, रुन्नीसैदपुर, बेलसंड, मधुबनी, राजनगर (एससी), झंझारपुर, फूलपारस, कुशेश्वरस्थान (एससी), गौरा बौरम, बेनीपुर, अलीनगर, दरभंगा ग्रामीण, मीनापुर, कांटी, बरुराज, पारू, साहेबगंज, बैकुंठपुर, बरौली, गोपालगंज, कुचाइकोट, भोरे (एससी), हथुआ, सीवान, ज़िरादेई, दरौली (एससी), रघुनाथपुर, दरौंदा, बरहरिया, गोरैयाकोठी, महराजगंज, एकमा, मांझी, बनियापुर, तरैया, मढ़ौरा, छपरा, गरखा (एससी), अमनौर, परसा, सोनपुर, हाजीपुर, लालगंज, वैशाली, राजा पाकर (एससी), राघोपुर, महनार, उजियारपुर, मोहिउद्दीननगर, विभूतिपुर, रोसरा (एससी), हसनपुर, चेरिया-बरियारपुर, बछवारा, तेघरा, मटिहानी, साहेबपुर कमाल, बेगूसराय, बखरी (एससी), अलौली (एससी), खगड़िया, बेलदौर, परबत्ता, बिहपुर, गोपालपुर, पीरपैंती (एससी), भागलपुर, नाथनगर, अस्थावन, बिहारशरीफ, राजगीर (एससी), इस्लामपुर, हिलसा, नालंदा, हरनौत, बख्तियारपुर, दीघा, बांकीपुर, कुम्हरार, पटना साहिब, फतुहा, दानापुर, मनेर, फुलवारी (एससी)।   

तीसरा चरण : 7 नवंबर को 78 सीटों पर मतदान
वाल्मीकि नगर, रामनगर (एससी), नरकटियागंज, बगहा, लौरिया, सिकटा,  रक्सौल, सुगौली, नरकटिया, मोतिहारी, चिरैया, ढाका, रीगा, बथनाहा (एससी), परिहार, सुरसंड, बाजपट्टी, हरलाखी, बेनीपट्टी, खजौली, बाबूबरही, बिस्फी, लौकहा, निर्मली, पिपरा, सुपौल, त्रिवेणीगंज (एससी), छातापुर, नरपतगंज, रानीगंज (एससी), फारबिसगंज, अररिया, जोकीहाट, सिकटी, बहादुरगंज, ठाकुरगंज, किशनगंज, कोचाधामन, अमौर, बैसी, कस्बा, बनमनखी (एससी), रूपौली, धमदाहा, पूर्णिया, कटिहार, कदवा, बलरामपुर, प्राणपुर, मनिहारी (एससी), बरारी, कोरहा (एससी), आलमनगर, बिहारीगंज, सिंहेश्वर (एससी), मधेपुरा, सोनबरसा (एससी), सहरसा, सिमरी बख्तियारपुर, महिषी, दरभंगा, हायाघाट, बहादुरपुर, क्योटी, जाले, गायघाट, औराई, बोचहां (एससी), सकरा (एससी), कुढ़नी, मुजफ्फरपुर, महुआ, पातेपुर (एससी), कल्याणपुर (एससी), वारिसनगर, समस्तीपुर, मोरवा, सरायरंजन।

2015 में पांच चरणों में कराया गया था मतदान
2015 के चुनाव में चुनाव आयोग ने बिहार में पांच चरणों में चुनाव कराया था, जिसकी तारीखों का ऐलान 9 सितंबर को ही कर दिया गया था। नतीजे 8 नवंबर को आए थे। इस चुनाव में महागठबंधन को बहुमत मिली थी। 2015 के चुनाव में पहले चरण यानी 12 अक्टूबर को बांका, भागलपुर, बेगूसराय, जमुई, खगड़िया, लखीसराय, मुंगेर, नवादा, समस्तीपुर और शेखपुरा की 49 सीटों पर चुनाव हुआ था। दूसरे चरण में 16 अक्टूबर को अरवल, औरंगाबाद, गया, जहानाबाद, कैमूर, रोहतास की 32 सीटों पर चुनाव हुआ था। तीसरे चरण में 28 अक्टूबर को भोजपुर, बक्सर, नालंदा, पटना, सारण, वैशाली की 50 सीटों पर चुनाव हुआ था। चौथे चरण में 1 नवंबर को गोपालगंज, पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, मुफ्फरपुर, शिवहर, सीतामढ़ी, सीवान की 55 सीटों पर चुनाव हुआ था। आखिरी चरण यानी 5 नवंबर को अररिया, दरभंगा, कटिहार, किशनगंज, मधेपुरा, मधुबनी, पुर्णिया, सहरसा, सुपौल की 57 सीटों पर चुनाव हुआ था। वोटों की गिनती 8 नवंबर को हुई थी। तब 243 सीट वाली बिहार विधानसभा में महागठबंधन के खाते में 178 सीटें आई थी जिसमें आरजेडी को 80, जेडीयू को 71 और कांग्रेस को 27 सीटों पर जीत मिली थी। जबकि एनडीए के खाते में 58 सीटें आई थी, जिसमें भाजपा को 53, लोजपा को 2, रालोसपा को 2 और हम को एक सीट पर जीत मिली थी।

2019 का लोकसभा चुनाव परिणाम 

2019 में हुए लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 में 39 सीटें एनडीए को मिली थीं। सिर्फ एक सीट पर कांग्रेस का उम्मीदवार जीता था। लोकसभा के नतीजों को अगर विधानसभा क्षेत्र के हिसाब से देखें तो एनडीए को 223 सीटों पर बढ़त मिली थी। इनमें से 96 सीटों पर भाजपा तो 92 सीटों पर जेडीयू आगे थी। लोजपा 35 सीटों पर आगे थी। एक सीट जीतने वाला महागठबंधन विधानसभा के लिहाज से 17 सीटों पर आगे था। इनमें 9 सीट पर राजद, 5 पर कांग्रेस, दो पर हम (सेक्युलर) जो अब एनडीए का हिस्सा हैं और एक सीट पर रालोसपा को बढ़त मिली थी। अन्य दलों में दो विधानसभा क्षेत्रों में एआईएमआईएम और एक पर सीपीआई एमएल आगे थी।

2020 के मुख्यमंत्री पद के दावेदार

नीतीश कुमार : 2010 के चुनाव में नीतीश एनडीए की ओर से तो 2015 में महागठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद का चेहरा थे। इस बार फिर वो एनडीए की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा हैं। पिछले 15 साल से राज्य में नीतीश की पार्टी सत्ता में है। इनमें 14 साल से ज्यादा नीतीश ही मुख्यमंत्री रहे हैं।
तेजस्वी यादव : महागठबंधन की ओर से इस बार तेजस्वी यादव चेहरा हो सकते हैं। लालू यादव के जेल जाने के बाद महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी राजद का चेहरा तेजस्वी ही हैं। हाल ही में, राजद के पार्टी कार्यालय के बाहर चुनाव से जुड़ा जो पोस्टर लगाया गया उसमें अकेले तेजस्वी नजर आ रहे थे। पार्टी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का चेहरा पोस्टर से गायब था।

2020 चुनाव के बड़े मुद्दे क्या हैं?

इन चुनावों में कोरोना बड़ा मुद्दा होगा। तेजस्वी यादव कोरोना को लेकर लगातार सरकार पर हमला कर रहे हैं। कोरोनाकाल में नीतीश कुमार के घर से बाहर नहीं निकलने को भी उन्होंने मुद्दा बनाया है। वहीं, नीतीश की ओर से सरकार द्वारा पिछले छह महीने में उठाए कदमों को गिनाया जा रहा है। केंद्र सरकार के कृषि से जुड़े दो नए बिल भी इन चुनावों में बड़ा मुद्दा बनेगा। राजद बेरोजगारी के मुद्दे को लगातार उठा रही है। प्रधानमंत्री के जन्मदिन को राजद ने राष्ट्रीय बेरोजगारी दिवस के रूप में मनाया। नीतीश सरकार लॉकडाउन के दौरान बिहार लौटे प्रवासी मजूदरों से बिहार में ही रोजगार देने का दावा कर रही है। जेडीयू और भाजपा जहां पिछली केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से किए गए कामों को गिना रही है वहीं, राजद पिछले 15 साल में किए विकास के दावों को लगातार चुनौती दे रहा है। लॉकडाउन के दौरान बिहार लौटे प्रवासी मजदूरों का मुद्दा भी इस चुनाव में अहम होगा। सरकार जहां इन्हें प्रदेश में ही हर संभव मदद देने की बात कर रही है वहीं, विपक्ष प्रवासियों के लिए समुचित इंतजाम नहीं करने पर सवाल उठा रहा है। इसके अलावा पिछले 30 साल से चुनावी मुद्दा रहा राम मंदिर भाजपा के लिए इस बार भी बड़ा मुद्दा रहेगा। फर्क सिर्फ इतना होगा कि इस बार भाजपा इसके शिलान्यास को अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर गिनाएगी।

चुनाव प्रचार के प्रमुख चेहरे

नरेंद्र मोदी : भाजपा ने 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद से हर चुनाव में मोदी ही भाजपा के लिए प्रचार का प्रमुख चेहरा रहे हैं। उनकी रैलियां भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने का बड़ा जरिया रही हैं। कोरोना की वजह से इस बार बड़ी रैलियां होना मुश्किल है। ऐसे में मोदी की वर्चुअल रैलियां मतदाताओं पर कितना असर डालती हैं ये देखना होगा।
नीतीश कुमार : जेडीयू और उससे पहले समता पार्टी के दौर से ही नीतीश हर चुनाव प्रचार में पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा रहे हैं। इस चुनाव में एनडीए गठबंधन उनके ही चेहरे पर चुनाव लड़ रहा है।
तेजस्वी यादव : चुनावी राजनीति में महज पांच साल का अनुभव रखने वाले तेजस्वी यादव के हाथ में इस बार के चुनाव प्रचार की कमान होगी। राजद के गठन के बाद ये पहला विधानसभा चुनाव होगा जब पार्टी लालू के बिना लड़ेगी।
राहुल गांधी : राहुल गांधी भले कांग्रेस अध्यक्ष नहीं हैं लेकिन, चुनाव प्रचार में वो कितने सक्रिय रहते हैं इस पर नजर रहेगी। प्रियंका गांधी के चुनाव प्रचार पर भी सभी की नजर रहेगी। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की तबियत को देखते हुए पार्टी राहुल और प्रियंका गांधी को आगे कर सकती है।
चिराग पासवान : लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान चुनाव प्रचार में अपनी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा होंगे। एनडीए युवाओं और दलितों को लुभाने के लिए उनका इस्तेमाल कर सकता है। हालांकि, पासवान और उनकी पार्टी की ओर से जिस तरह सीटों के लेकर बयान आ रहे हैं उससे तय है कि एनडीए में सीटों का बंटवारा इतना आसान नहीं होने वाला है।
कन्हैया कुमार : भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पोस्टर बॉय कन्हैया कुमार अपनी पार्टी के साथ-साथ महागठबंधन के भी प्रमुख चुनाव प्रचारक के तौर पर नजर आएंगे। बिहार चुनाव के मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अगर कोई चुनौती देने वाला नेता है तो वह कन्हैया कुमार ही होंगे।

Wednesday, 22 July 2020

नई वैश्विक व्यवस्था : खतरनाक साजिश है एजेंडा-21

कुछ साल पहले एक फिल्म आने वाली थी जिसका नाम था ए ग्रे स्टेट (A Grey State)। इस फिल्म के माध्यम से आज कोरोना महामारी की आड़ में जो कुछ भी हो रहा है वह फिल्मकार ने बताने की कोशिश की थी, लेकिन दुर्भाग्य से फिल्म के रिलीज होने से पहले ही फिल्म के निर्माता-निर्देशक डेविड क्रौली की हत्या हो गई। ऐसा माना जा रहा है की डीप स्टेट ने उसकी हत्या करवा दी थी। उनकी पत्नी और बच्ची को भी मार दिया गया क्योंकि डेविड क्रौली इस फिल्म के माध्यम से बताना चाहते थे कि किस तरह से सभ्रांत वर्ग यानी एलीट क्लास दुनिया को अपनी मुट्ठी में रख रहे हैं। इतना ही नहीं, जो आज के हालात बन रहे हैं ये डेविड क्रौली ने उस वक्त ही बता दिए थे कि किस तरह से लोगों को नियंत्रण में रखने के लिए टीकाकरण या वैक्सीन का सहारा लिया जाएगा, आरएफआईडी (RFID) चिप्स तक लगाईं जाएंगी, जिसे 'मार्क ऑफ द बीस्ट' भी बोला जा रहा है। हो सकता है इसी वजह से डीप स्टेट को यह अच्छा नहीं लगा होगा और उन्होंने फिल्म के रिलीज होने से पहले ही क्रौली कि हत्या करवा दी। इस फिल्म से ताल्लुक रखने वाली ज्यादातर जानकारी इंटरनेट से सेंसर कर दी गई। बात यहीं से शुरू होती है नई वैश्विक व्यवस्था यानी न्यू वर्ल्ड आर्डर की और यही है एजेंडा- 21 जिसकी समय सीमा 2020 से 2030 तक है। हम सबको खासतौर पर हम भारत के लोगों को इस बात को लेकर सतर्कता बरतनी चाहिए कि कुछ कुलीन, सभ्रांत या एलीट लोग हैं जो पूरी दुनिया को नियंत्रण में रखते हैं। हम सबको भले ही ऐसा लगता हो कि सरकारों के हाथ में ताकत होती है, लेकिन हकीकत यह है कि असली ताकत और नियंत्रण तो कुछ सीक्रेट सोसाइटी या कुलीन लोगों के हाथों में ही होती है और उनके ही निर्णय पूरी दुनिया को मानने होते हैं। अभी जो ये कोरोना वायरस की खबरें लगातार आ रही हैं उसको देखते हुए ऐसा लगने लगा है कि न्यू वर्ल्ड आर्डर यानी नई वैश्विक व्यवस्था का असली रूप जल्द ही हम सबके सामने होगा। 

दरअसल, अभी जो दुनियावी ताकतें काम कर रही हैं वह अलग-अलग जगहों पर विभाजित हैं, लेकिन जब नई वैश्विक व्यवस्था पूरी तरह से अपने प्रभाव में आ जाएगी तो ये शक्तियां पूरी तरह से एक ही संगठन के हाथों में चली जाएंगी जो टॉप लेवल से सभी चीजों को नियंत्रित करेगी। यही वह संगठन है जो एलीट क्लास यानी कुलीन वर्ग का होगा। मसलन क्राउन कॉरपोरेशन, बड़े बैंक संगठन जैसे कि रॉकफेलर या रॉथचाइल्ड इत्यादि या इलुमिनाटी समाज जो 300 लोगों की सुपरपावर कमेटी है, इनके हाथों में भी ये ताकत हो सकती हैं और इन्ही की 'हां या ना' से दुनिया के सारे फैसले किए जाएंगे। नई वैश्विक व्यवस्था को वास्तविक रूप से शैतानों की सभ्यता भी कहा जा रहा है। इसका मतलब यह नहीं है कि टॉप लेवल पर कोई शैतान बैठा हुआ है, लेकिन ये जो एलीट क्लास होता है ये किसी शैतान से कम भी नहीं होता है। इनके इरादे कभी नेक नहीं होते हैं। ये पूरी दुनिया पर अपना नियंत्रण चाहते हैं और हमें गुलाम बनाकर रखना चाहते हैं। इसीलिए न्यू वर्ल्ड ऑर्डर यानी नई वैश्विक व्यवस्था की स्थापना की जा रही है। इस नई वैश्विक व्यवस्था के साथ-साथ एक एजेंडा 2030 को भी स्थापित करने पर काम बहुत तेजी से चल रहा है जिसे एजेंडा-21 भी बोला जा रहा है। यह तो बहुत ही ज़्यादा खतरनाक है। 

हम भारत के अधिकांश लोग जिन्हें इस बारे में अंदाजा नहीं है उनको जानना चाहिए कि एजेंडा-21 जिसे 2030 तक पूरी तरह से लागू करने की योजना है उसके तहत होगी- एक ग्लोबल सरकार, एक ग्लोबल मुद्रा, एक ग्लोबल सेंट्रल बैंक जिसमें एक ग्लोबल कैशलेस सिस्टम होगा, एक ग्लोबल सेना होगी, पूरी शिक्षा व्यवस्था ऑनलाइन होगी। मतलब यह कि सारी चीजें एक ही ग्रुप के हाथों में होगी और वही ऊपर से सब-कुछ नियंत्रित करेगा। इसके साथ-साथ टीकाकरण यानी वैक्सीनेशन अनिवार्य कर दी जाएगी जिसका मतलब यह है कि आपको वैक्सीन लगवानी ही होगी। अगर आप वैक्सीन नहीं लगवाते हैं तो ये आपको कोई काम नहीं करने देंगे या फिर आपके काम में इतना रोड़ा अटका दिया जाएगा कि आपके लिए वैक्सीन लेना मजबूरी हो जाएगी। यहां यह भी जानना जरूरी है कि ये वैक्सीन बहुत ही ज्यादा घातक है और किसी भी सूरत में इंसानी ताकत के लिए ठीक नहीं है। जो विकसित देश हैं, वहां कोरोना वैक्सीन का खूब विरोध किया जा रहा है। लेकिन हमारे देश में ऐसा कुछ नहीं हो रहा और कुछ होने भी नहीं जा रहा है। जिस बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन और माइक्रोसॉफ्ट कंपनी के स्वामी बिल गेट्स को पश्चिमी देशों में कोरोना और वैक्सीनेशन को लेकर पूरी तरह से एक्सपोज किया जा रहा है, उनके खिलाफ दर्जनों मुकदमें दर्ज किए गए हैं, हमारे देश में उस शख्स की पूजा की जा रही है। देश की मुख्यधारा की मीडिया में भी इस तरह की कोई खबर सामने नहीं आ रही है क्योंकि मुख्यधारा की मीडिया भी कहीं न कहीं बिल गेट्स जैसे एलीट क्लास के लोगों के नियंत्रण में है और उनका एकमात्र काम सिर्फ झूठ बोलना, प्रोपगेंडा फैलाना है। भारत में अगर कोई पत्रकार या मीडिया इस तरह की बात करता है तो उसे मानसिक रूप से दिवालिया करार दे दिया जाता है।

दरअसल, एजेंडा-21 के तहत आपको वैक्सीन लगाया जाएगा और उसके जरिये और ज्यादा बीमारियां आपकी बॉडी में इंजेक्ट कर दी जाएंगी। कहा तो ये भी जा रहा है कि इसी वैक्सीन के जरिये आपकी बॉडी में एक माइक्रो-चिप्स भी आने वाले वक्त में लगाई जा सकती हैं। इसी आरएफआईडी चिप्स के बारे में मैंने शुरू में जिक्र किया है। अगर आप गूगल सर्च करेंगे तो आपको पता चलेगा कि इसकी शुरुआत स्वीडन में हो चुकी है। इस चिप के जरिये हर व्यक्ति का पूरा ट्रैक रिकॉर्ड रखा जाएगा ताकि उसे जरूरत के हिसाब से नियंत्रित किया जा सके। जिस चिप की आज तक आपको जरूरत नहीं थी उसको अब आपके शरीर में डाला जाएगा और आप खुशी-खुशी इसे स्वीकार भी करेंगे। एजेंडा-21 के तहत ही 5G के टॉवर भी लगाने का काम शुरू हो चुका है। 5G के बारे में यह बात जानना जरूरी है कि टॉवर में इतनी घातक फ्रीक्वेंसी की किरणें निकलेंगी जिससे कैंसर जैसी बीमारी होने का खतरा बहुत बढ़ जाएगा। 5G की फ्रीक्वेंसी दुनिया की समृद्ध सेना और बड़ी-बड़ी स्टॉक एक्सचेंज में अपनी जानकारी इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल करती रही हैं। अब उसे अगर आम लोगों की सोसाइटी में लाया जाएगा तो बड़े स्तर पर दुनियावी सेहत को नुकसान होगा। यह बात सच है कि इससे इंटरनेट की स्पीड कई गुना बढ़ जाएगी, लेकिन यह भी सच है कि आपके हाथों में जो आरएफआईडी माइक्रो-चिप डाली जाएगी वह भी 5G से ही कंट्रोल होगा। दुनिया के कई देशों में इसका जबरदस्त विरोध किया जा रहा है, लेकिन हमारे देश में अभी तक इस बारे में लोगों को एक तो ज्यादा जानकारी नहीं है और दूसरा इस तरह की मानसिकता दिल और दिमाग में बैठ गई है कि देखा जाएगा, झेल लिया जाएगा। 

अब आते हैं एजेंडा-21 की सबसे भयानक साजिश पर। जो भी लोग नई वैश्विक व्यवस्था और एजेंडा-21 के पीछे काम कर रहे हैं उनका मकसद 2030 तक दुनिया की 75 से 80 फीसदी जनसंख्या को मिटा देना है यानी खत्म कर देना है। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है। यह जॉर्जिया के गाइड स्टोन पर बड़े-बड़े अक्षरों में और कई भाषाओं में साफ-साफ लिखा हुआ है। उनका मिशन है कि पूरी दुनिया की जनसंख्या को 50 करोड़ के अंदर लाना है। इसका मतलब यह हुआ कि जो एलीट क्लास या सबसे ऊपर बैठी शैतानों की फौज है उसे दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने के लिए छोटी जनसंख्या वाली दुनिया चाहिए क्योंकि वर्तमान में 760 करोड़ की बड़ी जनसंख्या वाली दुनिया को कंट्रोल करना बहुत मुश्किल काम होगा। इसलिए एजेंडा-21 की थिंकटैंक यही चाहेगी कि दुनिया की 80 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या का अस्तित्व ही खत्म हो जाए और दुनिया की पूरी जनसंख्या का सर्वाधिक हिस्सा भारत और चीन में है। तो इस परिस्थिति में हम भारत के लोगों को ये तय करना होगा कि इस 80 प्रतिशत मिटने वाली जनसंख्या में होना चाहेंगे या नहीं। कहने का मतलब यही है कि अब हम सबका अस्तित्व खतरे में है।

कोरोना वायरस निश्चित रूप से एजेंडा-21 यानी नई वैश्विक व्यवस्था को लागू करने का एक जरिया या हिस्सा हो सकता है- इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। यही वायरस एक तरह से बायोलॉजिकल वर्ल्ड वॉर को भी जन्म दे सकता है। यह महामारी कोई प्राकृतिक प्रकोप नहीं बल्कि जानबूझकर पैदा किया गया मानवजनित वायरस है जो युद्ध करने के लिए बनाया गया है ताकि अर्थव्यवस्था को धराशायी किया जा सके और लोगों में डर पैदा कर उसकी मजबूरी का पूरी तरह से इस्तेमाल किया जा सके। और लोगों की ऐसी ही परिस्थितियों के बीच नई वैश्विक व्यवस्था को लागू कर दिया जाएगा। दुनिया से लोकतंत्र खत्म हो जाएगा और कुलीन तंत्र की स्थापना हो जाएगी। मेरे आलेख के रूप में ये पूरी कहानी आपको बहुत हद तक काल्पनिक लग सकती है, दंतकथा जैसी लग सकती है, लेकिन कोरोना से पहले और कोरोना के बाद की दुनिया को जब आप समझने की कोशिश करेंगे, जो चीजें जीवन में घटित हो रही हैं उस सबको जब आप कनेक्ट करने की कोशिश करेंगे तो शायद आप यह अहसास कर पाएंगें कि वाकई यह सब होने जा रहा है।

Thursday, 2 July 2020

भारतीय रेल ने भी पकड़ ही ली 'निजीकरण' की ट्रेन

अंदेशा तो पहले से ही था, लेकिन अब वह पूरी तरह से होने जा रहा है। हम बात कर रहे हैं भारतीय रेल के निजीकरण की। मुझे याद है 22 नवंबर 2019 शुक्रवार का वो दिन जब रेल मंत्री पीयूष गोयल ने राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान सवालों का जवाब देते हुए कहा था कि रेलवे भारत और देशवासियों की संपत्ति है और आगे भी रहेगी। गोयल ने रेलवे के निजीकरण की संभावाओं को खारिज करते हुए तब कहा था कि सरकार रेलवे का निजीकरण नहीं कर रही है, बल्कि यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने के लिए निजी कंपनियों से कॉमर्शियल और ऑन-बोर्ड सेवाओं की आउटसोर्सिंग कर रही है। मालिकाना हक रेलवे के पास ही रहेगा। हम केवल लाइसेंस दे रहे हैं। हमारे देश की जनता बहुत भोली है। मंत्री जी का संसद में दिया बयान सुन लिया, समझ लिया और मान लिया। लेकिन सरकार कहां मानने वाली। वक्त का इंतजार किया और कोरोना महामारी व लॉकडाउन के दौरान आपदा एक्ट का फायदा उठाते हुए यात्री ट्रेन सेवा के संचालन के लिए पहली बार खुले तौर पर निजी कंपनियों के दरवाजे खोल दिए। इसके तहत देश में 109 गंतव्य मार्गों पर निजी कंपनियां यात्री ट्रेनों का संचालन कर सकेंगी। सरकार का अनुमान है कि इसमें 30 हजार करोड़ रुपये का निवेश हो सकता है। हालांकि इसकी शुरूआत तो तभी हो गई थी जब आईआरसीटीसी ने सरकारी पटरी पर पहली निजी ट्रेन तेजस का संचालन शुरू किया था।

दरअसल, मोदी सरकार का यह फैसला उस बिबेक देबरॉय समिति की उस रिपोर्ट का हिस्सा है जिसे वर्ष 2014 में रेलवे बोर्ड ने प्रमुख रेल परियोजनाओं के लिये संसाधन जुटाने और रेलवे बोर्ड के पुनर्गठन के लिए सुझाव देने को कहा था। इसका साथ दिया नीति आयोग ने भी। देबरॉय समिति ने वर्ष 2015 में अपनी रिपोर्ट पेश की थी जिसमें रेल के डिब्बों तथा इंजन के निजीकरण की बात साफतौर पर कही गई थी। समिति ने कहा था कि रेलवे के बुनियादी ढांचे के लिए एक अलग कंपनी का निर्माण करना चाहिए और ट्रेनों के संचालन का काम निजी हाथों में सौंपा जाना जरूरी है। रेलवे में निचले स्तर पर विकेंद्रीकरण की जरूरत पर भी समिति ने जोर दिया है। साथ ही नई लाइनों के निर्माण में रेलवे को राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करने की सलाह दी है।

बहुत से लोगों को सरकार का यह फैसला आज अच्छा लग रहा होगा, लेकिन आने वाले वक्त में अच्छे स्कूल और अस्पताल की तरह कहीं आना-जाना भी आपकी जेब से दूर हो जाएगा क्योंकि निजी कंपनियों का एक ही लक्ष्य होता है मुनाफा कमाना और रेलवे में लाभ कमाने का सबसे आसान तरीका होता है यात्री किराये में इजाफा करना जो पिछले पांच साल से सरकार ने अपरोक्ष तौर पर लगातार किया भी। लेकिन जब यह काम निजी कंपनियां करेंगी तो जनता की आवाज और उसका दर्द नक्कारखाने में तूती की आवाज बन जाएगी। क्योंकि निजी कंपनियां अपने व्यवहार में अप्रत्याशित होती हैं और इनमें जवाबदेही की भारी कमी होती है। उनकी जवाबदेही रेल यात्रियों के प्रति नहीं होगी बल्कि उनकी जेब से वसूली जाने वाली किराया से उनकी कंपनी को कितना मुनाफा पहुंचाना है उसकी चिंता करना महत्वपूर्ण होता है। एक और बात जो काफी महत्वपूर्ण है वह यह है कि रेलवे विशुद्ध तौर पर आम आदमी की जिंदगी को जीता है। सरकार के पास जब तक इसका स्वामित्व है, वह नफा-नुकसान की परवाह किए बिना राष्ट्रव्यापी पहुंच प्रदान करती है लेकिन निजीकरण में यह गुंजाइश खत्म हो जाएगी और उन्हें जिस क्षेत्र से मुनाफा नहीं होगा उस मार्ग पर ट्रेनों का संचालन बंद कर देंगे।

बहरहाल, यात्री ट्रेनों के संचालन के लिए पहली बार भारतीय रेलवे ने निजी निवेश का रास्ता साफ कर दिया है और सरकार के इस कदम के साथ ही रेलवे का 167 साल का इतिहास बदलने जा रहा है। साल 1853 में भारत में शुरू हुई व्यावसायिक ट्रेन सेवा अमेरिका, चीन और रूस के बाद दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है और इसी नेटवर्क के जरिये भारतीय रेलवे प्रतिदिन करीब ढाई करोड़ लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है। इस कार्य को अंजाम देने के लिए उसके पास तकरीबन 13 लाख कर्मचारी हैं। हालांकि वर्ष 2019 में ही लखनऊ से नई दिल्ली के बीच भारत की पहली प्राइवेट ट्रेन तेजस एक्सप्रेस की शुरुआत हो गई थी जिसे रेलवे में निजीकरण की दिशा में पहला बड़ा कदम माना गया था, लेकिन आज जब हम कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के दौर से गुजर रहे हैं, देश में आपदा एक्ट लगा हुआ है और इसकी आड़ में सरकार उन सारे एजेंडा को पूरा कर लेना चाहती है जिसपर उसे लगता है कि इसके खिलाफ जनता की आवाज उठ सकती हैं। आखिर भारतीय रेल को देश की लाइफ लाइन जो कहा जाता है।

Saturday, 20 June 2020

चीन के खिलाफ ये कर पाए तो पलट सकती है बाजी

भारत-चीन के बीच हिंसक झड़प और उससे उपजे तनाव के बाद देश में चीनी उत्पादों के बहिष्कार करने का जो सैलाब उमड़ा हुआ है उसकी पृष्टिभूमि में 18 जून को एक खबर आई कि अमेजन इंडिया पर वनप्लस प्रो-8 की सेल चंद मिनटों में ही खत्म हो गईं। अमेजन ने इस बात की जानकारी तो नहीं दी कि सेल कितने मिनट में खत्म हुई, लेकिन इस दौरान इस चाइनीज हैंडसेट की सभी यूनिट्स बिक गईं। वाकई हम भारत के लोग इमोशन में अजब-गजब तरीके से सोच लेते हैं और मशाल लेकर निकल पड़ते हैं कि आज तो सारे चीनी प्रोडक्ट्स को आग के हवाले करके रहेंगे। लेकिन जब उस आग में मेड इन चाइना मोबाइल, लैपटॉप, टैबलेट और घर के दीवारों की शोभा बढ़ा रहे एचडी एलईडी स्मार्ट टीवी को डालने की बारी आती है तो होश फाख्ता हो जाते हैं कि अरे, इसके बिना तो जिंदगी ही बेनूर हो जाएगी। तो फिर हारकर चीनी तानाशाह शी जिनपिंग के पुतले को आग के हवाले कर हम अपना गुबार निकाल लेते हैं और यह मान लेते हैं कि हमने चीन को युद्ध में परास्त कर दिया। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है जिसे देश की जनता समझ नहीं पाती है। वह ये भी नहीं समझ पाती कि चीन बार-बार हमारी पीठ में छूरा घोंपता है तो हमारी सरकार चीनी सामान का आयात बंद क्यों नहीं कर देती। और अगर आयात बैन नहीं कर सकती तो फिर सरकार हमें आत्मनिर्भर भारत का पाठ क्यों पढ़ा रही है?

दरअसल, भारत और चीन के बीच गलवान घाटी में पिछले दिनों हुए खूनी टकराव ने एक बार फिर से भारत में चीनी कंपनियों के बिजनेस और दबदबे को लेकर विमर्श को उभार दिया है। लोग सीधे तौर पर सोच लेते हैं कि भारत चीन के लिए एक बहुत बड़े बाजार के रूप में है और अगर भारत सरकार उसके सामान को आयात करना बंद कर दे तो चीन की आर्थिक कमर टूट जाएगी। लेकिन हम उन तथ्यों से अनजान हैं कि चीन की कंपनियों के सस्ते उत्पादों ने भारत में अपनी जड़ें इस कदर जमा ली हैं कि उनको उखाड़ पाना बेहद मुश्किल है। सच बात तो यह है कि भारत किसी भी देश का इंपोर्ट या एक्सपोर्ट को बंद नहीं कर सकता। इसकी वजह विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) है। डब्ल्यूटीओ के नियमों के मुताबिक, किसी देश की सरकार आयात या निर्यात को एकदम से बंद नहीं कर सकती। अगर ऐसा होने लग जाए तो ग्लोबलाइजेशन ही खत्म हो जाएगा। दिक्कत की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो कुछ कहते हैं लगो उसे समझ नहीं पाते हैं। उनका कहना है कि देश आत्मनिर्भर बने। इसका मतलब किसी का बहिष्कार करना नहीं होता है। ग्राहक और कंपनी अपने स्तर से चाहें तो कर सकते हैं, लेकिन डब्ल्यूटीओ से बंधी सरकार ऐसा नहीं कर सकती। दूसरी बात यह है कि चीनी कंपनियों के प्रोडक्ट्स की घुसपैठ भारत के बाजार में इस कदर हो चुकी है उससे निकलना कठिन ही नहीं असंभव जैसा है। इस समझने के लिए इन आंकड़ों पर गौर फरमाना जरूरी है कि ताकि हम जान सकें कि चीन की किन कंपनियों की भारत में किस सेक्टर में कितनी हिस्सेदारी है और अगर उनको हटा दिया जाए तो भारत के पास उसका क्या विकल्प हो सकता है...

1. स्मार्टफोन की बात करें तो भारत में इसका बाजार 2 लाख करोड़ रुपए का है और इसमें 72 प्रतिशत हिस्सा चीनी कंपनियों के प्रोडक्ट का है। अगर आप विकल्प की बात करेंगे तो इस मामले में भारत के पास कोई ऑप्सन नहीं है। क्योंकि चीन के ब्रांड हर प्राइस सेगमेंट में और आरएंडडी में काफी आगे हैं।

2. भारत में टेलीविजन का बाजार करीब 25,000 करोड़ रुपए का है। इसमें चीनी कंपनियों की स्मार्ट टीवी की हिस्सेदारी 42 से 45 प्रतिशत है। नॉन स्मार्ट टीवी की हिस्सेदारी 7-9 प्रतिशत है। भारत इस बाजार को तोड़ तो सकता है, लेकिन यह काफी महंगा पड़ेगा। क्योंकि भारत की तुलना में चीन की स्मार्ट टीवी 20-45 प्रतिशत तक सस्ती है और भारतीय खरीददार की जेब इसके लिए तैयार नहीं है।

3. भारत में टेलीकॉम इक्विपमेंट का बाजार 12,000 करोड़ रुपए का है। इसमें चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत के आसपास है। इस बाजार को भी भारत तोड़ सकता है, लेकिन यह भी काफी महंगा पड़ेगा। इसी तरह से होम अप्लायंसेस की बात करें तो इस सेगमेंट का मार्केट साइज 50 हजार करोड़ रुपए का है। इसमें चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 10-12 प्रतिशत है। भारत के लिए इस बाजार को भी अपने कब्जे में किया जा सकता है, लेकिन चीन के बड़े ब्रांड काफी सस्ते में भारत में उपलब्ध हैं।

4. ऑटो कंपोनेंट सेगमेंट का मार्केट भारत में 57 अरब डॉलर का है। इसमें चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी 26 प्रतिशत है। भारत के लिए इस बाजार को तोड़ना बहुत ही मुश्किल है। क्योंकि आरएंडी पर काफी पैसा खर्च करना होगा जिसके लिए भारत की कंपनियां तैयार नहीं है। यही हालत सोलर पावर मार्केट का है। इस मार्केट का साइज 37 हजार 916 मेगावाट का है। इसमें चीन की कंपनियों का हिस्सा 90 प्रतिशत है। भारत के लिए यह इसलिए मुश्किल है क्योंकि घरेलू स्तर पर उत्पादन काफी कमजोर है और विकल्प बना भी लिया तो चीन की तुलना में काफी महंगा होगा।

5. अब बात करते हैं दवा कारोबार की। भारत में फार्मा एपीआई का मार्केट साइज 2 अरब डॉलर का है। इसमें चीन की कंपनियों की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत है। फार्मा सेक्टर के जानकारों का कहना है कि इस मार्केट में चीन को पछाड़ना नामुमकिन है। क्योंकि अन्य सोर्स काफी महंगे हैं और साथ ही रेगुलेटरी मुश्किलें भी गंभीर हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अभी भी कोरोना महामारी से निपटने के लिए कई अहम उपकरणों जैसे कि इंफ़्रा रेड थर्मामीटर, पल्स ऑक्सीमीटर आदि चीन से ही मंगाए जा रहे हैं।

उपरोक्त तमाम तथ्यों का निष्कर्ष यही है कि हमें जो प्रोडक्ट बाजार में 10 रुपए में मिल रहा है, वही प्रोडक्ट अगर चीन 5 से 6 रुपए में देने के लिए बैठा है और ऊपर से हमारे देश की 85 प्रतिशत आबादी की प्रति व्यक्ति आय इतनी कम है कि वह चाहकर भी चाइनीज प्रोडक्ट को अपनी जिंदगी से बाहर नहीं कर सकता। कहने का मतलब यह कि अगर हम बेहतरीन फीचर्स वाले स्मार्टफोन और स्मार्ट टीवी के स्क्रीन पर खेलना बंद करने की ठान लें तो चीन से हारी बाजी को पलटा जा सकता है। क्योंकि स्मार्टफोन और स्मार्ट टीवी ने जिंदगी को गुलाम बना लिया है। हर शख्स घर में आटा से पहले मोबाइल में डाटा है कि नहीं इसकी चिंता पहले करता है और यहीं से शुरू होती है हमारी हार का सिलसिला। और इस वक्त कोरोना काल में जिस तरह से हर कोई लॉकडाउन की मार झेल रहा है, वर्क फ्रॉम होम में जिस तरह से मोबाइल और कंप्यूटर उसकी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन गया है, चीनी उत्पाद को भारतीय बाजार से बेदखल करने की सोच को जमीन पर उतारना चांद को छूने जैसा ही है। 

चीन-भारत व्यापार के जानकारों की बात करें तो इस बात को वो भी मानते हैं कि चीन से व्यापारिक प्रतिबंध तोड़ने और उनके सामानों के आयात को लेकर उपजा विरोध सही है, लेकिन वो इस बात से भी इत्तफाक रखते हैं कि हमें इससे पहले अपने देश के व्यावहारिक अड़चनों को दूर करना होगा। उसे कई स्पेशल इकोनॉमिक जोन तैयार करने होंगे ताकि हम पहले आत्मनिर्भर बनें। ऐसे जोन में सस्ती जमीन उपलब्ध कराकर सरकार उद्यमियों को जीएसटी में डिस्काउंट देकर, टैक्स हॉलिडे प्रदान करे, श्रम कानूनों को आसान बनाए तो इस तरह से धीरे-धीरे हम आत्मनिर्भर हो सकते हैं और चीन के ऊपर हमारी निर्भरता समाप्त हो सकती है। लेकिन इस काम में लंबा वक्त लगेगा। 1962 के बाद से हमारी सरकारों ने इस दिशा में काफी काम किया भी, लेकिन जबसे हमने नेहरू की मिक्स्ड इकनॉमी को छोड़कर पूंजीवादी आर्थिक उदारीकरण के दौर में प्रवेश किया और पिछले एक दशक में जिस तरह से डिजिटलाइजेशन के मकड़जाल में खुद को फंसाया, हमारी निर्भरता चीन पर लगातार बढ़ती गई। आर्थिक उदारीकरण और डिजिटलाइजेशन के दौर में जब शॉर्टकट तरीके से हम भारत के लोग चांद को छूने की कोशिश करने लगे तो इसी दौर में हमने अपनी आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को भी भुला दिया। उसका नतीजा ये हुआ कि आज तमाम अंग्रेजी दवाओं के लिए चीनी कच्चा माल और वैक्सीनेशन के लिए बिल गेट्स की हैल्थ केयर कंपनियों पर हमारी निर्भरता उस स्तर पर पहुंच गई जहां से आत्मनिर्भर भारत की बात बेमानी सी लगती है। क्योंकि उसके पीछे की नीति और नीयत दोनों संदेह से परे नहीं है।

Thursday, 18 June 2020

खत्म होना चाहिए अब 'हिन्दी-चीनी भाई-भाई' का खेल

ये पहली बार नहीं जब चीन ने भारत को उकसाया हो। चीन में कम्युनिस्ट सरकार आने के 10 साल बाद से ही भारत-चीन के बीच सीमा विवाद शुरू हो गया था और खास बात यह भी कि इसकी शुरुआत भी चीन ने ही की थी। नतीजा ये हुआ कि भारत हिंदी-चीनी भाई-भाई करता रहा और चीन हमारी पीठ में छुरा भोंकता रहा। बात प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के पंचशील से 1962 की लड़ाई तक हो, या फिर पीएम नरेंद्र दामोदार दास मोदी के झूले से गलवान-2020 की विकट परिस्थिति हो, चीन से भारत के रिश्तों का रंग तो खून के लाल रंग के मानिंद ही रहा। हां, इसमें यह भी जानना जरूरी है कि इंदिरा गांधी एकमात्र ऐसी प्रधानमंत्री रहीं जिन्होंने कभी चीन की तरफ झांकने की कोशिश नहीं की। वह चीन की मुखर विरोधी थीं और जब तक प्रधानमंत्री रहीं, चीन राष्ट्राध्यक्ष की भारत की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं हुई। इंदिरा हमेशा अपने पिता की मौत का जिम्मेदार चीन को मानती थीं। फिलहाल इस पूरी कहानी को हम इन प्रमुख तथ्यों से समझ सकते हैं...

1. भारत और चीन के बीच 1 अप्रैल 1950 से डिप्लोमैटिक रिलेशन हैं। 1949 से लेकर 1958 तक चीन ने कभी सीमाओं को लेकर आपत्ति नहीं जताई। हालांकि, 1954 में चीन की एक किताब 'अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ मॉडर्न चाइना' में छपे नक्शे में चीन ने लद्दाख को अपना हिस्सा बताया। बाद में जुलाई 1958 में भी चीन से निकलने वालीं दो मैगजीन 'चाइना पिक्टोरियल' और 'सोवियत वीकली' में भी चीन ने अपना जो नक्शा छापा, उसमें भारतीय इलाकों को भी शामिल किया गया। भारत ने दोनों ही बार इस पर आपत्ति जताई। लेकिन, चीन ने ये कह दिया कि ये नक्शे पुराने हैं और उनकी सरकार के पास नक्शे को ठीक करने का समय नहीं है। 1954 में चीन ने उत्तर प्रदेश के बाराहोती इलाके में भारतीय सैनिकों की तैनाती पर आपत्ति जताई थी। उस वक्त उत्तराखंड नहीं था और ये इलाका उत्तर प्रदेश में था। चीन का कहना था कि बाराहोती उसका हिस्सा है, जिसे वो वू-जी के नाम से पुकारता था। इसके बाद चीन ने भारतीय इलाकों में घुसपैठ शुरू कर दी। सितंबर 1956 में चीनी सैनिकों ने अरुणाचल के शिपकी-ला इलाके में घुसपैठ की। जुलाई 1958 में चीनी सैनिकों ने लद्दाख के पास खुरनाक किले पर कब्जा कर लिया। सितंबर-अक्टूबर 1958 में चीन अरुणाचल प्रदेश के लोहित फ्रंटियर डिविजन के अंदर तक आ गया।

2. भारत को अखबार के माध्यम से पता चला कि चीन ने शिंजियांग से लेकर तिब्बत के बीच एक हाईवे बनाया। इसकी सड़क अक्साई चिन से भी गुजरी है, जो भारतीय हिस्से में है। इसकी पुष्टि करने के लिए 1958 की गर्मियों में भारत ने दो टीम अक्साई चिन भेजी। चीन ने पहली टीम को गिरफ्तार ही कर लिया। दूसरी टीम जब लौटकर आई तो उसने बताया कि शिंजियांग-तिब्बत हाईवे बनकर तैयार है और उसकी सड़क अक्साई चिन से भी गुजर रही है। इस पर भारत ने 18 अक्टूबर 1958 को चीन को लेटर भी लिखा। चीन का जवाब आया कि जो हाईवे बना है, वो पूरी तरह से चीन के हिस्से में है। पूरी स्थिति पर उस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन के राष्ट्रपति झोऊ इन-लाई को पत्र लिखा। इस पर लाई ने 23 जनवरी 1959 को जवाब दिया और सीमा विवाद का मुद्दा उठाते हुए दावा किया कि उसका 5 हजार स्क्वायर मील (करीब 13 हजार स्क्वायर किमी) का इलाका भारतीय सीमा में है। ये पहला ऐसा मौका था जब चीन ने आधिकारिक रूप से सीमा विवाद का मुद्दा उठाया। लाई ने ये भी कहा था कि उनकी सरकार 1914 में तय हुई मैकमोहन लाइन को नहीं मानती है। मैकमोहन लाइन 1914 में तय हुई थी। इसमें तीन पार्टियां थीं- ब्रिटेन, चीन और तिब्बत। उस समय ब्रिटिश इंडिया के विदेश सचिव सर हेनरी मैकमोहन थे। उन्होंने ब्रिटिश इंडिया और तिब्बत के बीच 890 किमी लंबी सीमा खींची। इसे ही मैकमोहन लाइन कहा गया। इस लाइन में अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा बताया गया था, लेकिन आजादी के बाद चीन ने दावा किया कि अरुणाचल तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा है और चूंकि तिब्बत पर अब उसका कब्जा है, इसलिए अरुणाचल भी उसी का हुआ। जबकि, भारत का कहना था कि जो भी ब्रिटिशों ने तय किया था, भारत उसी को मानेगा।


3. 3 दिसंबर 1961 को चीन ने भारत के सामने एक नया व्यापारिक समझौता पेश किया था। इस पर भारत ने साफ कर दिया कि जब तक चीन 1954 से पहले की स्थिति पर नहीं आता और अपने सैनिकों को वापस नहीं बुलाता, तब तक भारत हस्ताक्षर नहीं करेगा। इसका नतीजा ये हुआ कि भारत-चीन के बीच जो पहले व्यापारिक समझौता हुआ था, वो 23 मई 1962 को खत्म हो गया। 1959 के बाद पहली बार 8 सितंबर 1962 को चीन ने मैकमोहन लाइन को पार किया। 13 सितंबर 1962 को चीन ने फिर प्रस्ताव दिया कि अगर भारत समझौते पर हस्ताक्षर करने को तैयार होता है तो उसकी सेना 20 किमी पीछे जा सकती है। भारत इस पर बात करने को तैयार हो गया। लेकिन, 20 सितंबर को चीन के सैनिक और भारतीय सैनिकों के बीच झड़प हो गई। उसके बाद एक महीने तक बॉर्डर पर तनातनी रही और आखिरकार 20 अक्टूबर 1962 को दोनों देशों के बीच युद्ध शुरू हो गया। 22 नवंबर 1962 को युद्धविराम की घोषणा की गई।


4. 13 जून 1967 को चीन ने भारतीय दूतावास के दो अधिकारियों पर जासूसी का आरोप लगाते हुए उन्हें निष्कासित कर दिया और भारतीय दूतावास को सीज कर दिया। भारत ने भी यही किया और नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास को सीज कर दिया। हालांकि बाद में चीन ने भारतीय दूतावास के अधिकारियों को छोड़ दिया था। 11 सितंबर 1967 को चीन ने तिब्बत-सिक्किम सीमा के पास नाथू-ला में मोर्टार दागे। 1962 के युद्ध के बाद ये पहला मौका था, जब चीन ने गोलाबारी और फायरिंग की थी। इतना ही नहीं, चीन ने भारतीय सैनिकों के शव को अपने पास ही रख लिया और पांचवें दिन 15 सितंबर को वापस किया। न सिर्फ नाथू-ला बल्कि छोला के पास भी भारत-चीन के सैनिकों के बीच लड़ाई हुई। हालांकि, दोनों जगह चीनी सेना को ज्यादा नुकसान पहुंचा। नाथू-ला में भारत के 88 जवान शहीद हुए थे, जबकि चीन के 300 जवान मारे गए थे। वहीं, छोला में चीन के 40 जवानों की जान गई थी।

5. 1980 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास भारतीय सेना की तैनाती बढ़ा दी थी। साथ ही विवादित जगहों पर इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट का काम भी शुरू करवा दिया। 1984 में भारतीय सेना ने अरुणाचल प्रदेश के पास समदोरांग चू घाटी के पास पैट्रोलिंग बढ़ा दी। उसके दो साल बाद 1986 की सर्दियों में चीनी सेना भी समदोरांग चू घाटी में तैनात हो गई और वांडुंग में हेलीपैड बना दिया। चीन की इस हरकत पर उस वक्त के भारतीय आर्मी चीफ जनरल के. सुंदरजी ने इलाके में सेना तैनात कर दी। इससे चीनी सेना को पीछे जाना पड़ा था। 1987 तक चीन का रुख 1962 की तरह ही रहा और उसकी सेना बार-बार उकसा रही थी। हालांकि, उस समय विदेश मंत्री एनडी तिवारी और प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बातचीत से मसला सुलझा लिया।

6. जून 2017 में भी भारत-चीन की सेनाएं डोकलाम में 73 दिनों तक आमने-सामने थीं। दरअसल, भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों को सड़क बनाने से रोक दिया था। दोनों सेनाओं के बीच डोकलाम इलाके में तनातनी हुई थी। ये इलाका उस जगह है, जहां भारत, चीन और भूटान की सीमा मिलती है। इसे भूटान में डोकलाम और भारत में डोका-ला कहते हैं। हालांकि ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कालखंड था और है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति सी जिनपिंग कई बार मिले और झूला भी झूले लेकिन चीन कहां मानने वाला। जून 2017 के डोकलाम से जून 2020 में गलवान घाटी तक पहुंचने में चीन को सिर्फ तीन साल का वक्त लगा और अब वह एक बार फिर से 1962 जैसा युद्ध करने के लिए भारत को उकसा रहा है।

इन तमाम तथ्यों का लब्बोलुआब यह है कि पहले वह इधर-उधर की बातें करता है, तथ्यों में उलझाता है, उकसाता है, व्यापारिक समझौते का ताना-बाना बुनता है, भारत के सभी पड़ोसियों को पहले अपने आर्थिक जाल में फंसाता है, फिर उसे भारत के प्रति भड़काता है और फिर मौका पाकर पीठ पीछे हमला कर देता है। मतलब, चीनी ड्रैगन पहले शांति और दोस्ती के ठंडे पानी का दिखावा करता है, फिर आखिर में उगलता आग ही है। लिहाजा अब भारत के लिए यह जरूरी हो गया है कि हम अपनी विदेश नीति और आर्थिक नीति को रीसेट करें ताकि कम्युनिस्ट चीन जिसकी कथनी और करनी में बहुत फर्क है उसे समझने में कोई भूल न कर पाएं।

Tuesday, 16 June 2020

फिर से वही गलवान घाटी और हठ अक्साई चीन का

भारत के एक सैन्य अधिकारी और दो जवानों की जान लेने वाले चीनी ड्रैगन ने एक बार फिर उसी गलवान घाटी को चुना है जहां 1962 में भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ था और तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था- चीन ने भारत के पीठ में छूरा घोंपा है। इस बार भी लद्दाख में सीमा विवाद को शांति से सुलझाने की भारत की कोशिशों के बीच चीन ने भारत को बड़ा धोखा दिया। दरअसल, 6 जून को लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की बातचीत में दोनों पक्षों में बातचीत से विवाद सुलझाने पर सहमति बनी थी। इसी के चलते 16 बिहार रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल संतोष बाबू सोमवार रात चीनी पक्ष से बातचीत करने के लिए गए थे। पर चीन को तो गलवान में एक बार फिर भारत की पीठ में छूरा भोंकना था। गलवान घाटी के पेट्रोलिंग प्वाइंट 14 के करीब यह बातचीत चल रही थी, जब भारतीय सैन्य दलों पर हमला किया गया। भारत ने इसका जवाब तो दिया, लेकिन चीनी ड्रैगन संख्या में ज्यादा थे। इस टकराव में कर्नल संतोष बाबू, हवलदार पालानी और सिपाही कुंदन झा समेत 20 सैनिक शहीद हो गए। चीन के भी 43 सैनिकों के हताहत होने की खबर है लेकिन, चीन की ओर से इस संबंध में आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। यह टकराव करीब 3 घंटे तक चला।

गलवान घाटी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर स्थित है। बगल में गलवान नदी बहती है। यह वही अक्साई चिन का इलाका है जिसे चीन ने अपने कब्जे में ले रखा है और इसी अक्साई चीन को लेकर भारतीय गृह मंत्री अमित शाह ने चीन को ललकारते हुए आर्टिकल 370 को खत्म करने के बहस के दौरान संसद में कहा था कि अक्साई चीन और पाक अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और हम इसे लेकर रहेंगे। भारत के प्रति चीन की नजरें तभी से वक्री हो गई हैं और कोरोना काल में ताइवान को लेकर भारत ने जिस तरह की कूटनीति रास्ते को अख्तियार किया वह आग में घी का काम किया। फिर से आते हैं गलवान पर। गलवान नदी काराकोरम रेंज की पूर्वी छोर समांगलिंग से निकलती है। फिर पश्चिम में बहते हुए श्योक नदी में मिल जाती है। गलवान घाटी का पूरा इलाका रणनीतिक रूप से भारत के लिए काफी अहम है। क्योंकि भारतीय सैनिक गलवान नदी में भी नाव के जरिए नियमित गश्त करते हैं, ताकि चीन के अतिक्रमण को रोका जा सके। इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो आप यह जान सकेंगे कि गलवान नदी का नाम गुलाम रसूल गलवान के नाम पर रखा गया है। रसूल गलवान लेह के रहने वाले थे। माना जाता है कि उन्होंने ही इस नदी को खोजा था और उन्हीं के नाम पर इस घाटी का नाम भी पड़ा। 1899 में इस नदी का पता लगाया गय था। गलवान घाटी भी अक्साई चिन क्षेत्र में है। इसके पश्चिमी इलाके पर 1956 से ही चीन अपने कब्जे का दावा करता आ रहा है। 1960 में अचानक गलवान नदी के पश्चिमी इलाके, आसपास की पहाड़ियों और श्योक नदी घाटी पर चीन अपना दावा करने लगा था। लेकिन भारत लगातार कहता रहा है कि अक्साई चिन उसका इलाका है। इसके बाद 1962 में भारत-चीन के बीच युद्ध हुआ था।

1962 में चीन के भारतीय इलाकों पर कब्जों के दावों के बाद दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के सामने आ गई थीं। दरअसल, भारतीय गोरखा सैनिकों ने 4 जुलाई 1962 को घाटी में पहुंचने के लिए एक पोस्ट बनाई थी। इस पोस्ट ने समांगलिंग के एक चीनी पोस्ट के कम्युनिकेशन नेटवर्क को काट दिया जिसे चीन ने अपने ऊपर हमला बताया था। इसके बाद चीनी सैनिकों ने गोरखा पोस्ट को 100 गज की दूरी पर घेर लिया था। भारत ने चीन को धमकी दी थी कि वह इसे किसी भी कीमत पर खाली कराकर रहेगा। इसके बाद भारत ने चार महीने तक इस पोस्ट पर हेलिकॉप्टर के जरिए खाद्य और सैन्य सप्लाई जारी रखी थी। 20 अक्टूबर 1962 को भारत-चीन युद्ध शुरू हुआ। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने इसी गालवन पोस्ट पर भारी गोलीबारी और बमबारी के लिए एक बटालियन भेजा था। इस दौरान यहां 33 भारतीय मारे गए थे, कई कंपनी कमांडर और अन्य लोगों को चीनी सेना ने बंदी बना लिया था। इसके बाद से चीन ने अक्साई-चिन पर अपने दावों वाले पूरे क्षेत्र पर कब्जा कर लिया।

एक बार फिर चीन ने जिस तरीके से गलवान नदी के किनारे स्थित गलवान घाटी से युद्ध की भूमिका बांधी है, भारत को इसे हल्के में लेना बड़ी भूल होगी। एक ऐसा वक्त जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस के महासंकट से जूझ रहा है, बावजूद इसके चीन अगर भारत को ललकार रहा है तो भारत को यह बात समझनी होगी कि कहीं न कहीं उसकी कूटनीति में दिक्कत है। लिहाजा मोदी सरकार को अपनी विदेश नीति को नए सिरे से सजाना और संवारना होगा। कोरोना के बाद की दुनिया और चीन की दादागिरी से कुछ इसी तरह के संदेश मिल रहे हैं।

Friday, 12 June 2020

चीन की इस खतरनाक डिप्लोमेसी से बच पाएगा भारत?

कोरोना वायरस संक्रमितों और उससे बढ़ती मौतों के बीच पड़ोसी देशों मसलन चीन, नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान आदि की हरकतों से मुश्किल दौर में फंसता जा रहा है। और इस सबके पीछे चीन की 'डेब्ट ट्रैप डिप्लोमेसी' को असली वजह बताया जा रहा है। अब सवाल यह उठता है कि 'डेब्ट-ट्रैप डिप्लोमेसी' है क्या? जब कोई देश इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के नाम पर किसी अन्य देश को पहले कर्ज देता है और फिर उस देश को एक तरह से कब्जा लेता है तो इसे 'डेब्ट-ट्रैप डिप्लोमेसी' कहते हैं। ये शब्द खासतौर पर चीन के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है। इस संबंध में चीन का तर्क यह है कि इससे छोटे और विकासशील देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत होगा, लेकिन उसके विरोधी मानते हैं कि चीन ऐसा करके छोटे देशों को अपने कब्जे में करता है। इसे श्रीलंका, नेपाल और पाकिस्तान के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है... 

साल 2005 से 2015 तक महिंदा राजपक्षे श्रीलंका के राष्ट्रपति रहे और अब प्रधानमंत्री हैं। राजपक्षे को देश में तीन दशकों से जारी गृहयुद्ध को खत्म करने का श्रेय दिया जाता है लेकिन, राजपक्षे के ही दौर में श्रीलंका सबसे ज्यादा कर्ज के बोझ में दब गया। कहा जाता है कि राजपक्षे के कार्यकाल में श्रीलंका की भारत से दूरी और चीन से नजदीकियां बढ़ीं। ये अलग बात है कि इन नजदीकियों का फायदा श्रीलंका ने कम और चीन ने ज्यादा उठाया। राजपक्षे के राष्ट्रपति रहते ही श्रीलंका में हम्बनटोटा बंदरगाह प्रोजेक्ट पर काम शुरू हुआ था। इस प्रोजेक्ट के लिए 2007 से 2014 के बीच श्रीलंका की सरकार ने चीन से 1.26 अरब डॉलर का कर्ज लिया। ये कर्ज एक बार में नहीं बल्कि पांच किस्तों में लिया गया। हम्बनटोटा बंदरगाह पहले से ही चीन-श्रीलंका मिलकर बना रहे थे। इसे चीन की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी हार्बर इंजीनियरिंग ने बनाया है और इसमें 85 प्रतिशत धन चीन के एक्जिम बैंक ने लगाया था। लगातार कर्ज लेने का नतीजा ये हुआ कि श्रीलंका पर विदेशी कर्ज बढ़ता गया। ऐसा माना जाता है कि कर्ज बढ़ने की वजह से श्रीलंका को दिसंबर 2017 में हम्बनटोटा बंदरगाह चीन की मर्चेंट पोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड कंपनी को 99 साल के लिए लीज पर देना पड़ा। बंदरगाह के साथ ही श्रीलंका को 15 हजार एकड़ जमीन भी देनी पड़ी। ध्यान देने की बात ये है कि ये जमीन भारत की सीमा से सिर्फ 150 किमी की दूरी पर है। इस पूरे घटनाक्रम को एक मिसाल के तौर पर पेश किया जाता है कि कैसे चीन पहले छोटे देश को इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर कर्ज देता है। उसे अपना कर्जदार बनाता है। और फिर उसकी संपत्ति को कब्जा लेता है।

ध्यान हो तो चीन 2013 से बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। इस प्रोजेक्ट का मकसद एशिया, यूरोप और अफ्रीका को सड़क, रेल और समुद्री मार्गों से जोड़ना है। इस पूरे प्रोजेक्ट पर एक ट्रिलियन डॉलर यानी 75 लाख करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है। चीन के इस प्रोजेक्ट को जो देश समर्थन दे रहा है, उनमें से ज्यादातर अब चीन के कर्जदार बन चुके हैं। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर या सीपीईसी भी इसी परियोजना का हिस्सा है। इस पर चीन और पाकिस्तान दोनों मिलकर काम कर रहे हैं। ये कॉरिडोर चीन के काश्गर प्रांत को पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से जोड़ता है। इसकी लागत 46 अरब डॉलर (करीब 3.50 लाख करोड़ रुपए) है। इसमें भी करीब 80 प्रतिशत खर्च अकेले चीन कर रहा है। नतीजा-पाकिस्तान धीरे-धीरे चीन का कर्जदार देश बनता जा रहा है। आईएमएफ के मुताबिक, 2022 तक पाकिस्तान को चीन को 6.7 अरब डॉलर चुकाने हैं। पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका की तरह बांग्लादेश भी चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव प्रोजेक्ट का हिस्सा है। जनवरी 2019 तक चीन और बांग्लादेश के बीच 10 अरब डॉलर का कारोबार हो रहा था। ऐसा अनुमान है कि 2021 तक दोनों देशों के बीच 18 अरब डॉलर का कारोबार होने लगेगा। बांग्लादेश का चीन के प्रोजेक्ट का हिस्सा बनना इसलिए भी चिंता पैदा करता है क्योंकि ये कोलकाता के बेहद करीब से गुजरेगा।

कुछ दिनों पहले नेपाल ने एक नया नक्शा जारी किया, जिसमें उसने लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को अपना हिस्सा बताया। फिर 13 जून को इससे संबंधित विधेयक नेपाली संसद में पेश कर पारित किया गया। पूरी दुनिया को मालूम है कि ये तीनों ही भूभाग भारत का हिस्सा रहा है। जानकारों का मानना है कि इसके पीछे भी चीन का ही हाथ है। क्योंकि, चीन नेपाल को आर्थिक मदद कर रहा है। आपको याद हो तो पिछले साल अक्टूबर में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग दो दिन के दौरे पर नेपाल गए थे। ये 23 साल बाद पहला मौका था, जब चीन के किसी राष्ट्रपति ने नेपाल का दौरा किया था। इस दौरे में जिनपिंग ने नेपाल को इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए 56 अरब नेपाली रुपए (35 अरब रुपए) की मदद देने का ऐलान किया था। 

अमेरिकी वेबसाइट हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू की रिपोर्ट बताती है कि, चीन शुरू से ही छोटे देशों को कर्ज देता रहा है। 1950 और 1960 के दशक में चीन ने बहुत से छोटे-छोटे देशों को कर्ज दिया। ये ऐसे देश थे, जहां कम्युनिस्ट सरकारें थीं। जर्मनी की कील यूनिवर्सिटी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर जून 2019 में एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट को आधार मानें तो साल 2000 से लेकर 2018 के बीच दुनिया के कई छोटे देशों पर चीन की उधारी 500 अरब डॉलर से बढ़कर 5 ट्रिलियन डॉलर हो गई है। आज के हिसाब से 5 ट्रिलियन डॉलर की गणना करें तो यह 375 लाख करोड़ रुपए होते हैं। जानकार बताते हैं कि इस समय चीन दुनिया का सबसे बड़ा लेंडर यानी लोन देने वाला देश बन गया है। इतना लोन तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक ने भी नहीं दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो दुनियाभर की जीडीपी का 6 प्रतिशत के बराबर की राशि कर्ज के रूप में चीन ने दूसरे देशों को दिया है। 

दक्षिण एशियाई देशों से इतर बात करें तो कर्ज देने के लिए चीन की पहली पसंद अफ्रीकी देश हैं। इसका कारण है कि ज्यादातर अफ्रीकी देश गरीब और छोटे हैं और विकासशील भी। अक्टूबर 2018 में आई एक स्टडी बताती है कि हाल के कुछ सालों में अफ्रीकी देशों ने चीन से ज्यादा कर्ज लिया है। 2010 में अफ्रीकी देशों पर चीन का 10 अरब डॉलर (आज के हिसाब से 75 हजार करोड़ रुपए) का कर्ज था जो 2016 में बढ़कर 30 अरब डॉलर (2.25 लाख करोड़ रुपए) हो गया। अफ्रीकी देश जिबुती, दुनिया का इकलौता कम आय वाला ऐसा देश है जिस पर चीन का सबसे ज्यादा कर्ज है। जिबुती पर अपनी जीडीपी का 80 प्रतिशत से ज्यादा विदेशी कर्ज है। इसमें भी जितना कर्ज जिबुती पर है, उसमें से 77 प्रतिशत से ज्यादा कर्ज अकेला चीन का है। 

बहरहाल, चीन की 'डेब्ट-ट्रैप डिप्लोमेसी' को भारत के संदर्भ में देखें तो यह हमारे देश की राष्ट्रीय संप्रभुता, एकता व अखंडता के लिए  बेहद खतरनाक है। कोरोना महामारी के दौर में जब पूरी दुनिया भीषण आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही है, चीन एक ऐसा अकेला देश है जिसकी जीडीपी अभी भी प्लस में है और नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों को आर्थिक सहयोग देकर भारत को घेरने की रणनीति को सफल तरीके से अंजाम दे रहा है। तो ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या भारत चीन की 'डेब्ट-ट्रैप डिप्लोमेसी' से मुकाबला करने में सक्षम है? क्या अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया समेत दुनियाभर के 62 देशों के साथ मिलकर हम चीन की भारत के प्रति वक्र दृष्टि से बच सकते हैं?

Friday, 22 May 2020

कोरोना क्रांति : ताइवान के बहाने चीन को घेर रहा है अमेरिका

कोरोना महासंकट के बीच एक छोटा सा लोकतांत्रिक देश ताइवान पूरी दुनिया को दो हिस्सों में बांटने के लिए खुद को खड़ा कर लिया है। इसकी मुख्य वजह है- चीन की शह पर उसे डब्ल्यूएचओ से निकाल बाहर करना। ताइवान के उपराष्ट्रपति चेन चिएन जेन के हवाले से खबरों में कहा भी गया है कि आपदा के समय आप किसी को अनाथ कर रहे हैं। यह साफ करता है कि डब्ल्यूएचओ अपनी तटस्थ ज़िम्मेदारियों से ज़्यादा राजनीति में लिप्त है। लेकिन चीन में नेशनल पीपुल्स कांग्रेस की महत्वपूर्ण वार्षिक बैठक में ताइवान को लेकर प्रीमियर ली कचियांग ने शुक्रवार (22 मई ) को कहा कि चीन अपनी संप्रभुता को लेकर अडिग है। कहने का मतलब यह कि चीन ताइवान को लेकर जिस नीति पर पहले से काम करता आ रहा है उसमें कोई फेरबदल नहीं करेगा। अब इस पूरे प्रकरण में एक धड़ा चीन के साथ है तो दूसरा चीन के खिलाफ जिसका नेतृत्व अमेरिका कर रहा है। चीन भले ही ताइवान को अपना प्रांत मानता हो लेकिन 2.30 करोड़ की आबादी वाला ताइवान ख़ुद को एक अलग लोकतंत्र बताता है जहां साल 1949 में चीन से भागकर आए लोग बस गए थे। इसकी बुनियाद में चीन विरोध गहरे तक समाया हुआ है। जैसा कि कहा जाता है, चीन से पूरी दुनिया में फैला कोरोना वायरस चीन विरोधी देशों के लिए अचूक हथियार है। और इसी का फायदा ताइवान के साथ मिलकर अमेरिका उठाना चाह रहा है। 

दरअसल, ताइवानी उपराष्ट्रपति चेन चिएन-जेन का कहना है कि ताइवान ने 31 दिसंबर 2019 को ही विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ को चेतावनी दी थी कि कोरोना वायरस इंसान से इंसान में फैलता है। चेन ने फाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि ताइवानी डॉक्टरों ने शुरू में ही यह पता लगा लिया था कि वुहान में इस बीमारी का इलाज करने वाले डॉक्टर और दूसरे मेडिकल स्टाफ बीमार पड़ रहे हैं। लेकिन डब्ल्यूएचओ ने इस जानकारी को गंभीरता से नहीं लिया और न ही वक्त रहते इसकी पुष्टि की। बस, अमेरिका को एक सुनहरा मौका हाथ लगा एक तीर से डब्ल्यूएचओ और चीन दोनों पर निशाना साधने का। साथ ही ताइवान में घुसने का। अमरीकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, अमरीका इस बात से बेहद हैरान है कि वैश्विक स्वास्थ्य समुदाय से ताइवान की सूचना क्यों छिपाई गई। 14 जनवरी 2020 को बयान जारी कर डब्ल्यूएचओ कह रहा  था कि इस वायरस के इंसान से इंसान में ट्रांसमिशन के संकेत नहीं मिले हैं जबकि ताइवान 31 दिसंबर को ही डब्ल्यूएचओ को बता चुका था कि कोरोना इंसान से इंसान में फैलने वाला वायरस है। डब्ल्यूएचओ के इस हरकत से वक़्त और ज़िंदगियां दोनों बर्बाद हुई हैं।

अब ताइवान और डब्ल्यूएचओ की तू-तू मैं-मैं को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की सारी इंद्रियां एकदम से जागृत हो गईं। उन्हें लगा कि इससे बेहतर मौका चीन और डब्ल्यूएचओ को घेरने का तथा ताइवान के दिल में जगह बनाने का नहीं हो सकता है। क्योंकि इसी बीच त्साई इंग वेन एक बार फिर से ताइवान की राष्ट्रपति चुनी गईं। अमेरिका ने लगे हाथों जीत का बधाई संदेश देने में देर नहीं की। वेन का जीतना और अमेरिकी का बधाई संदेश दोनों ही चीन को नागवार गुजरा। फिर उसे यह भी लगा कि कोरोना वायरस के खिलाफ चीन की तुलना में बहुत अच्छे से लड़ने पर ताइवान का प्रभुत्व कहीं बढ़ने न लगे, इसलिए दबाव बनाकर चीन ने उसे विश्व स्वास्थ्य संगठन से बाहर निकलवा दिया। इसको लेकर चीन लंबे अरसे से दावा कर रहा था कि ताइवान कोई अलग संप्रभु देश नहीं बल्कि उसी का एक हिस्सा है। लेकिन, इस दावे के बावजूद बरसों से ताइवान संगठन में था। जब चीन व ताईवान के रिश्ते अच्छे थे, तब 2009 से 2016 के बीच ताईवान ऑब्ज़र्वर के तौर पर डब्ल्यूएचओ का हिस्सा रहा। अब अमेरिका व उसके समर्थक देश ताइवान को संगठन में शामिल किए जाने के पक्ष में आकर चीन के खिलाफ रणनीति तैयार कर रहे हैं। 

अब ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि ताइवान का भविष्य क्या होगा और भारत की भूमिका क्या होनी चाहिए? अमेरिका और उसके समर्थक भले ही ताइवान को बाहर करने के डब्ल्यूएचओ के कदम को गलत ठहरा रहे हों, लेकिन उनका असली मकसद डब्ल्यूएचओ और चीन पर वैश्विक दबाव बनाकर अपना उल्लू सीधा करना ज़्यादा है, ताइवान से हमदर्दी रखना कम। ऐसे में सीएनए की रिपोर्ट को आधार मानें तो लैटिन अमेरिका के आर्थिक रूप से कमजोर समझे जाने वाले अधिकतम 15 देश ताइवान के समर्थन में आ सकते हैं। बाकी कोई देश ताइवान की सीट के लिए चीन से सीधे दुश्मनी मोल नहीं लेगा। हालांकि यह सच बात है कि त्साई इंग-वेन के हाल में दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने से चीन की मुश्किलें बढ़ी हैं क्योंकि त्साई चीन की 'एक राष्ट्र' की परिकल्पना में ताइवान को देखने की हमेशा से विरोधी रही हैं और ताइवान के स्वतंत्र देश के दर्जे के लिए लड़ती रही हैं। त्साई की दोबारा जीत के पीछे चीन के खिलाफ डटकर मुकाबला बड़ी वजह रही है। 2016 में पहली बार त्साई के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही चीन ताइवान के खिलाफ दबाव बना रहा था। अब अगर ताइवान अमेरिका और ब्रिटेन जैसे बड़े देश को समर्थक के तौर पर चीन के खिलाफ जुटाने में सफल रहा तो यह चीन के लिए बड़ी मुश्किल होगी। 

जहां तक भारत की भूमिका का सवाल है तो पिछले कुछ हफ्तों में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जापान और न्यूज़ीलैंड ने अमेरिका के सुर में सुर मिलाते हुए कहा है कि विश्व स्वास्थ्य सभा में ताइवान को ऑब्ज़र्वर का दर्जा मिलना चाहिए। इस पर चीन का रुख ये था कि पश्चिमी देश कोरोना से लड़ने में अपनी नाकामी को छिपाने के लिए ताइवान पर राजनीति कर रहे हैं। अब इन गुटीय वैश्विक कूटनीति की जमीन पर भारत को अपने पुराने रूख पर ही कायम रहना चाहिए था। लेकिन मोदी सरकार ने अपनी नीति में बदलाव करते हुए दो ऐसे काम एक साथ किए जिससे चीन का अपरोक्ष तौर पर नाराज होना स्वाभाविक था। पहला... डब्ल्यूएचओ की जो बैठक अभी हाल ही में संपन्न हुई उसमें कोरोना महासंकट को लेकर अमेरिका जिस तरह से चीन पर आरोप लगा रहा है और जांच के लिए जिन 62 देशों ने मिलकर एक प्रस्ताव पारित करवाया उसमें भारत भी शामिल हो गया। दूसरा...त्साई इंग-वेन ने दो दिन पहले ताइवान के राष्ट्रपति पद की दोबारा शपथ ली। इस शपथ ग्रहण कार्यक्रम में भाजपा के दो सांसदों, मीनाक्षी लेखी और राहुल कस्वान ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हिस्सा लिया और वेन को बधाई दी। लेखी और कस्वान समेत दुनियाभर के 41 देशों के कुल 42 गणमान्य हस्तियों ने इस कार्यक्रम में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए शिरकत की। इस बात को जानते हुए कि चीन ताइवान को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा नहीं देता है और उसे अपना ही एक हिस्सा बताता है।

अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मोदी सरकार ने ताइवान के प्रति अपनी नीति बदल दी है? सवाल के पीछे की सबसे बड़ी वजह यह है कि 2016 में जब त्साई ने पहली बार राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी तब मोदी सरकार ने न्योता मिलने के बावजूद अपने किसी सांसद को ताइवान नहीं भेजने का फैसला किया था। लेकिन इस बार के शपथ ग्रहण समारोह में लेखी और कस्वान के अलावा भारत-ताइपे एसोसिएशन के कार्यकारी महानिदेशक सोहंग सेन ने भी हिस्सा लिया। ताइपे में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। संयुक्त राष्ट्र के 194 सदस्य देशों में से 179 देशों का ताइवान के साथ राजनयिक संबंध हैं, लेकिन भारत अब तक इससे बच रहा था। चीन ने शपथ ग्रहण समारोह में भारतीय सांसदों की आभासी उपस्थिति पर तो कोई अलग से बयान नहीं दिया, लेकिन ताइवानी राष्ट्रपति को बधाई संदेश देने वाले विदेशी नेताओं की निंदा जरूर की है। लेकिन इस बीच चीन और नेपाल की सीमा पर जिस तरह की मुश्किलें खड़ी की जा रही हैं, आप दावे के साथ यह नहीं कह सकते कि इसमें चीन की भूमिका नहीं है।

Saturday, 16 May 2020

प्रवासी मजदूरों को रौंद रहा सत्ता का अहंकार

बेचता यूं ही नहीं है आदमी ईमान को,
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को।

सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिए,
गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरख़्वान को।
(अदम गोण्डवी)

कोरोना का काल, लॉकडाउन की मार और सत्ता का अहंकार जब अपने चरम पर हो तो प्रवासी मजदूरों के विस्थापन का सैलाब निश्चित रूप से पूरे समाज और देश को तहस-नहस कर देता है। अगर हम कोरोना को कुदरत का कहर मानें तो जाहिर तौर पर हमारा आपका इसके ऊपर वश नहीं, लेकिन लॉकडाउन की मार और सत्ता का अहंकार तो हम सबने खड़ा किया है। इसकी कीमत आज मजदूर वर्ग चुका रहा है, कल मध्यम वर्ग चुकाएगा और फिर परसों मुट्ठीभर अमीर वर्ग। तय मानिए बचेगा कोई नहीं।

कोरोना महासंकट के बीच एक और काली रात जो कुछ वक्त में गुजरने वाली थी लेकिन, इसे मजदूरों की बदकिस्मती कहें या काल की कुचाल, उनके नसीब में सुबह का सूरज देखना नहीं था क्योंकि शायद वो मजदूर थे और मजबूर भी। जिंदगी की अंगड़ाई, मौत की आहट को नहीं भांप सकी। काली रात ने चंद लम्हों में सब कुछ खत्म कर दिया। जी हां! हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में शनिवार तड़के 3:30 बजे हाईवे पर दो ट्रकों की टक्कर की जिसमें करीब 24 मजदूरों की मौत हो गई और कई दर्जन जख्मी हो गए। इन ट्रकों में सवार सभी मजदूर इसी देश के थे। मध्य प्रदेश के छतरपुर में भी एक सड़क हादसा हुआ जिसमें चार महिलाओं समेत 6 मजदूरों की मौत हो गई। इस तरह से बीते 8 दिनों में चार और बड़े हादसे हुए जिसमें 32 अन्य मजदूरों की मौत हो चुकी है। 8 मई को महाराष्ट्र में औरंगाबाद के पास रेलवे ट्रैक पर 16 प्रवासी मजदूरों की मालगाड़ी की चपेट में आने से वीभत्स मौत की घटना को कौन भुला सकता है। अब मैं आपको कुछ ऐसी तस्वीरों से रू-ब-रू कराना चाहूंगा जो काफी वायरल हुए हैं। यहां इसका जिक्र इसलिए जरूरी है ताकि समाज, देश और सत्ता को समझ में आ सके कि मजदूर होने की उसे कितनी कीमत चुकानी पड़ती है। 



कोरोना संकट में लॉकडाउन के बीच एक बेबस और मजलूम पिता की मजबूरी कैसे ईमान को डिगा देती है...कैसे उसे कसूरवार बना देती है, इसे बरेली के मोहम्मद इकबाल की इस चिट्ठी से महसूस किया जा सकता है। इकबाल का कसूर सिर्फ इतना है कि उसने दिव्यांग बेटे को 1150 किमी दूर ले जाने के लिए साइकिल चुरा ली। लेकिन दूसरी तरफ साइकिल मालिक के नाम चिट्ठी भी छोड़ी, जिसमें लिखा कि मैं आपका कसूरवार हूं, लेकिन मजदूर हूं और मजबूर भी। मैं आपकी साइकिल लेकर जा रहा हूं। मुझे माफ कर देना...



इस तस्वीर में पूर्णिया जिले की मुख्तारा खातून की पीड़ा भी लॉकडाउन के कारण मजदूरी पर आए संकट की कहानी है। एक कामगार की पत्नी की बेबसी है और एक मां की दारुण कथा भी। पर परेशानियां अभी शुरू हुई थी, मुख्तारा के सामने पति नूरजामी बेहोश पड़ा था। कपड़े से ढंका हुआ। गुड़गांव से जब वह परिवार समेत अपने गांव के लिए निकला तो लखनऊ के पास ट्रक ने नूरजामी को टक्कर मार दी, जिससे उसका पैर टूट गया। 


ऐसी तस्वीरों को देखना मन-मस्तिष्क में दर्द पैदा करता है, विचलित करता है, लेकिन इस वक्त का सच भी यही है। विस्थापन का दर्द समेटे जितने भी मजदूर एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हैं, उनके बच्चों के चेहरे मुरझाए और आंखें सूखे हुए दिखेंगे। आखिर दर्द बयां भी वह किससे करें। यह तस्वीर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की है। यह बच्चा पत्थर पर बैठा था। मां की गोद की आदत तो जैसे छूट सी गई। अब तो पत्थर पर भी नींद आ जाती है।  

न जाने ऐसी कितनी तस्वीरें अलग-अलग जगहों से निकलकर हमारे और आपके बीच में आ रही हैं। क्या किसी को गुस्सा नहीं आता है? मैं आप सबसे पूछना चाहता हूं कि इसे बेदिल सत्ता और समाज की साजिश नहीं कहें तो और क्या कहें? यहां एक बार फिर अदम गोंडवी की लिखी वो कविता याद आ रही है जो सत्ता और कुंठित मानसिकता वाले समाज पर करारा प्रहार है...

आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे
अपने शाहे-वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे

तालिबे शोहरत हैं कैसे भी मिले मिलती रहे
आए दिन अख़बार में प्रतिभूति घोटाला रहे

एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छह चमचे रहें, माइक रहे और माला रहे

लेकिन अदम गोंडवी की इन पंक्कियों को भी हुक्मरानों को नहीं भूलना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है...

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है,
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है।

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी,
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है।

बहरहाल, कोरोना महासंकट और लॉकडाउन के बीच प्रवासी मजदूरों के विस्थापन से देश में बड़ा संकट पैदा होने वाला है। उद्योग धंधे ठप्प पड़े हैं और जब इन्हें शुरू किया जाएगा तब इन्हें मजदूरों के अभाव का सामना करना पड़ेगा। मजदूरों को घर से वापस लाना बेहद मुश्किल काम होगा क्योंकि इन दो महीनों में जिस तरह की मुश्किलों से वो गुजरे हैं, उन्हें काम पर वापस लाना आसान नहीं होगा। इसका असर उत्पादन पर पड़ेगा। कहने का मतलब यह कि मांग और आपूर्ति का जो मूलभूत सिद्धांत है उसे फिर से व्यवहारिक तौर पर अर्थव्यवस्था की पटरी पर लाना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी। मोदी सरकार 20 लाख करोड़ का जो विशेष आर्थिक पैकेज लेकर आई है उससे किसका भला हो रहा है या आने वाले वक्त में किसका भला होगा, यह कहना बहुत मुश्किल है। लेकिन इतना तय मानिए कि यह मांग को किसी भी रूप में नहीं बढ़ाएगा। और जब किसी भी प्रोडक्ट की मांग खड़ी नहीं होती है तो उस प्रोडक्ट के उत्पादन का कोई मतलब नहीं। 

सरकार को सबसे पहले इन प्रवासी मजदूरों और मध्यम वर्ग की मुश्किलों को दूर करने की दिशा में कदम उठाने चाहिए थे जो नहीं हो पाया। प्रवासी मजदूरों की बात करें तो उसे राशन, मकान का किराया और घर भेजने के लिए थोड़ी नकदी की व्यवस्था कर दी जाती तो उन्हें पलायन का दर्द नहीं सहना पड़ता और आने वाले वक्त में उद्योग धंधों को शुरू करने में भी मुश्किल नहीं होती। मध्यम वर्ग की बात करें तो उनकी नौकरियां जा रही हैं। सेलरी कटौती हो रही है। ऐसे में सरकार की तरफ से उन्हें तत्काल राहत के तौर पर ईएमआई से छूट, बच्चों की स्कूल फीस में रियायत देने का पब्लिक स्कूलों को निर्देश दिया जाना चाहिए था। लेकिन इस मोर्चे पर भी सरकार ने कुछ नहीं किया। सवाल है कि सारी समस्याओं का समाधान बैंक से लोन लेना तो हो नहीं सकता है। कहने का मतलब यह कि सरकार अपनी जेब से लोगों को राहत देने के लिए कुछ भी देने को तैयार नहीं है। जो कुछ दे रही है वो किसी न किसी तरीके से सरकार की पूर्व में घोषित सरकारी योजनाओं का ही हिस्सा है।

Friday, 1 May 2020

कोरोना क्रांति : खतरे में मजदूर और उसका 8 घंटा

आज एक मई है जिसे पूरी दुनिया 'अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस' के रूप में याद करती है। यह वही तारीख है जब 1886 में एक नारा गढ़ा गया था- 'आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे अपनी मर्जी का!' और इसी नारे के साथ अमेरिका के 13 हजार से अधिक व्यापारिक प्रतिष्ठानों में काम करने वाले करीब तीन लाख मजदूर अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए सड़कों पर उतर आए थे। कहते हैं कि 'आठ घंटे का आंदोलन' इन मजदूरों के पांच दशक के संघर्षों की गाथा का चरम था। कारवां आगे बढ़ता गया। 4 मई को शिकागो के समूचे औद्योगिक और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के लाखों मजदूर काम रोक कर शाम को हे मार्केट स्क्वायर पर एकत्र हुए। जैसा कि आमतौर पर होता है, मज़दूरों की इस अभूतपूर्व एकजुटता को देखकर पूंजीपतियों के बीच हड़कंप मच गया। सत्ता भी चौंक गई। आनन-फानन में 176 पुलिसकर्मियों का एक दल भेजा गया। लेकिन मजदूरों का शांतिपूर्ण आंदोलन चलता रहा। मजदूरी के प्रिय नेता ऑगस्ट स्पाइस भाषण समाप्त कर चुके थे। इसी बीच पुलिस की दखलंदाजी शुरू होती है। अचानक एक बम फूटता है। फिर क्या था, पुलिस की गोलियों की अंधाधुंध बौछारें शुरू हो गईं। आठ पुलिस समेत सैकड़ों मजदूर उस रक्तरंजित हमले में मारे एग। सैकड़ों ज़ख़्मी हो गए। फिर सत्ता के दमन का अगला पाखंड शुरू हुआ। आठ मज़दूर नेताओं के जो 'आठ घंटे आंदोलन' के लोकप्रिय नेता थे ऊनके ऊपर मुकदमे का खेल शुरू हो गया। अल्बर्ट पार्सन्स, ऑगस्ट स्पाइस, सैम्युअल फ़िल्डेन, ऑस्कर निब्बे, माइकल श्वाब, जॉर्ज एंगेल, एडोल्फ फ़िशर और लुई लिंग को गिरफ्तार कर लिया गया। उनपर कत्ल का मुकदमा शुरू हुआ। उसे जज और जूरी की अदालत में जिसके बारे में खबरें उस समय के अधिकांश निष्पक्ष पत्रकारों द्वारा की गई रिपोर्टिंग की वजह से अखबारों की सुर्खियां बनी कि, 'जज पक्षपाती है और जूरी का गठन बड़े व्यवसायिक घरानों से की गई है जिससे यह पूरा का पूरा न्यायिक कार्य महज दिखावा और मज़ाक़ है।' फिर वही हुआ जो निरंकुश सत्ता में होता है- अभियुक्तों के भाषणों, पत्र-पत्रिकाओं, अख़बारों में प्रकाशित उनके लेख, बयान आदि को आधार बनाकर अदालत और जूरी का फैसला आया जिसमें अभियुक्तों में से पांच क्रांतिकारी नेताओं पार्सन्स, एंगेल, स्पाइस, फ़िशर और लुई लिंग को फांसी की सज़ा सुनाई गई और शेष तीन श्वाब, निब्बे और फ़िल्डेन को 15-15 साल के जेल की सजा। उसके बाद जुलाई 1889 में सोशलिस्ट और लेबर पार्टी के 20 देशों के प्रतिनिधियों ने पेरिस में एक बैठक की। इस दौरान सेकेण्ड इंटरनेशनल का गठन किया गया जो 1889 से 1916 तक अस्तित्व में रही। 1889 में सेकेण्ड इंटरनेशनल की इसी पेरिस बैठक में रेमंड लाविग्ने ने एक प्रस्ताव के माध्यम से 'हे मार्केट शहीदों' की स्मृति में हर वर्ष एक दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया गया जिसे बाद सेकेण्ड इंटरनेशनल कांग्रेस ने 1891 में आधिकारिक रूप से 1 मई को मजदूर दिवस की मान्यता दे दी। भारत की बात करें तो यहां 1 मई 1923 को पहली बार मजदूर दिवस मनाया गया था। सिंगारवेलु चेट्टियार देश के कम्युनिस्टों में से एक तथा प्रभावशाली ट्रेड यूनियन और मज़दूर तहरीक के नेता थे। उन्होंने अप्रैल 1923 में भारत में मई दिवस (मजदूर दिवस) मनाने का सुझाव दिया था।

इस ऐतिहासिक घटनाक्रम का उल्लेख यहां हमने दो वजहों से किया है। पहला यह कि बहुत से लोगों खासकर आज की युवा पीढ़ी जो सोशल मीडिया में वायरल तथ्य को ही इतिहास मानने की भूल कर बैठता है, उन्हें पता होना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस का इतिहास कितना रक्तरंजित है। मजदूर दिवस या श्रमिक दिवस कोई ऐसे ही नहीं मनाता है। इस दिवस के पीछे मजदूरों ने बड़ी कुर्बानियां दी हैं। दूसरा अहम तथ्य जिसको लेकर हम यहां विस्तार से बात करना चाहते हैं वह है 'आठ घंटे का आंदोलन'। 1886 में मजदूर आंदोलन की जो बुनियाद रखी गई थी उसके मूल में असली बात यही थी- 'आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे हमारी मर्जी का!' हालांकि इन मजदूरों की और भी कई मांगें थी, लेकिन सबसे प्रमुख मांग '8 घंटे का कार्य दिवस' को वैधानिक रूप से मान्यता दिलाने की थी। दुर्भाग्य से भारत समेत पूरी दुनिया में मजदूरों के काम करने के घंटे को लेकर बहस फिर से छिड़ने लगी हैं क्योंकि हालात एक बार फिर से 1886 के पहले जैसी होती दिख रही है। कोरोना संकट के बीच मजदूरों की जिंदगी तो खतरे में पड़ी ही है, साथ ही उसके 8 घंटे के कार्यदिवस पर भी सरकार और कॉरपोरेट का हथौड़ा चलने वाला है। फैक्ट्रियों से लेकर बड़े-बड़े कॉरपोरेट दफ्तरों तक में 8 घंटे के कार्यदिवस को आईना दिखाया जा रहा है और कहा जाता है कि दफ्तर में आने का समय होता है, जाने का नहीं। कुछ बड़े कॉरपोरेट ऑफिस में '9 घंटे का कार्यदिवस' को कानूनी जामा भी पहना दिया गया है लेकिन यहां भी यह कार्यदिवस कहीं-कहीं 12 घंटे तक हो जाता है जिसे आपस की रजामंदी के आधार पर चलाया जा रहा है। 12 घंटे तक काम करने की परिस्थिति तमाम मजदूर चाहे वह शारीरिक श्रम से जुड़ा हो या फिर मानसिक श्रम से, उसे शारीरिक, आर्थिक, पारिवारिक और सामाजिक तौर पर लगातार तोड़ रहा है। उसके अस्तित्व को नष्ट कर रहा है। लेकिन वह विवश है क्योंकि उसने अपनी एकजुटता का जो ताना-बाना था उसे खुद ही छिन्न-भिन्न कर दिया है। वह कॉर्ल मार्क्स का वह नारा भुला दिया- दुनिया के मजदूरों एक हो, तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं और पाने के लिए पूरी दुनिया।

आज जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी की वजह से लॉकडाउन और भारत कंप्लीट लॉकडाउन की परिस्थिति में जीने को अभिशप्त है, दुनियाभर की मजदूर विरोधी सोच रखने वाली सरकारें यहां तक सोचने लगी हैं कि '8 घंटा कार्यदिवस' का जो कानून 1886 से चला आ रहा है उसे बदलकर उसमें राष्ट्रवाद का घी और कानून का तड़का डालकर 12 घंटे कर दिया जाए। भारत में भी इस तरह की बात पर मंथन चल रहा है और इसको लेकर कॉरपोरेट का सरकार पर भारी दबाव है। मजदूर संगठनों को इस बारे में सोचना चाहिए और समय रहते इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ना चाहिए कि इस तरह की कोई भी पहल देश के लिए घातक होगा। वैसे ही देश में जब से आर्थिक उदारीकरण की लहर चली, भारतीय अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे गिरती गई और कोरोना के दौर में तो ठप्प ही हो गई है। उसपर अगर मजदूरों के खिलाफ काम के घंटे को लेकर विरोधी नीति सरकार के स्तर पर बनी तो फिर बहुत मुश्किल हो जाएगी। क्योंकि कोरोना की वजह से सरकार ने जिस तरह से नोटबंदी की तर्ज पर सिर्फ चार घंटे की मोहलत के साथ कंप्लीट लॉकडाउन का ऐलान कर दिया उसमें अगर किसी एक वर्ग की हालत सबसे खराब हुई है तो वह है कमजोर तबके का प्रवासी मजदूर। मजदूरों की एक ऐसी श्रेणी जिसके घर में अगले दिन का राशन नहीं होता। दिहाड़ी मजदूरी के बल पर गुजारा करने वाले इन प्रवासी मजदूरों की सुध लेने वाला कोई नहीं होता। उसके पास न तो राशन कार्ड होता है, न ही वह सरकार की किसी गरीब कल्याण योजना का हिस्सा होता है। शहर की पैमाइश में किसी की नजर पड़ गई तो ठीक वरना इनकी और इनके परिवार की जिंदगी भगवान भरोसे। बीच-बीच में ट्रेन और बस के चलने की अफवाह उड़ती है तो फिजिकल डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ाते हुए ये प्रवासी मजदूर इस उम्मीद में सड़कों पर निकल आते हैं कि किसी तरह से वो अपने गांव पहुंच जाएं। लेकिन वहां उन्हें बस या ट्रेन नहीं बल्कि मिलती हैं निरंकुश सत्ताधारी पुलिस की लाठियां। ऐसी सरकार से क्या हम इस तरह की उम्मीद कर सकते हैं कि आने वाले वक्त में बेबश और लाचार किस्म के मजदूरों के लिए कोई ऐसी नीति बने ताकि महा आपदा और आपात परिस्थिति में इनके जीने का आधार बने। क्या असंगठित क्षेत्र का जो सेक्टर है इसे पूरी तरह से खत्म करने के लिए दुनिया भर सकी सरकारें किसी योजना को अमली जामा पहनाने पर विचार करेगी? क्योंकि यह संकट विश्वव्यापी है। भारत का संकट थोड़ा ज्यादा है। उम्मीद तो हम यही करेंगे कि कोरोना संकट को हम कोरोना क्रांति के रूप में स्वीकार करें और आज मजदूर दिवस के प्रण लें कि आने वाले वक्त में सरकार की नीति मजदूर हितैषी हो और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए एक ऐसा रजिस्ट्रर बने जिसमें गलती से भी कोई वंचित न रहने पाए।

Saturday, 25 April 2020

कोरोना क्रांति : बिल गेट्स की ये चार बातें बहुत कुछ कह रही हैं

How to fight future pandemics हेडलाइंस से माइक्रोसॉफ्ट के सह संस्थापक बिल गेट्स ने द इकोनॉमिस्ट में जो आर्टिकल लिखा है उसमें बहुत सारी बातें कही गईं हैं लेकिन उनमें से चार अहम बातों का जिक्र करना यहां बेहद जरूरी है। ये बातें आने वाले वक्त यानी आफ्टर कोरोना दुनिया कैसी होगी को लेकर जाने-अनजाने में कई तरह के संकेत भी देता है और कुछ सवाल भी खड़े करता है। 

पहली बात बिल गेट्स ने कोरोना वैक्सीन को लेकर कही है। इसमें गेट्स का कहना है- जब इतिहासकार कोविड-19 महामारी पर किताब लिखेंगे तो जो हम अब तक जीते रहे हैं, वह हिस्सा एक तिहाई के आसपास ही होगा। किताब की कहानी का बड़ा हिस्सा उस पर होगा, जो आगे होना है। यूरोप के अधिकांश हिस्से, पूर्वी एशिया और उत्तरी अमेरिका में इस महामारी का चरम संभवत: इस महीने के आखिर तक बीत जाएगा। कई लोगों को उम्मीद है कि कुछ हफ्तों में चीजें वैसी ही हो जाएंगी, जैसी बीते दिसंबर में थीं। लेकिन दुर्भाग्य से, ऐसा नहीं होगा। बिल गेट्स कहते हैं- I believe that humanity will beat this pandemic, but only when most of the population is vaccinated. Until then, life will not return to normal. मुझे भरोसा है कि मानवता इस महामारी को हरा देगी, लेकिन यह तभी होगा जब अधिकतर जनसंख्या को वैक्सीन लगा दी जाएगी। तब तक जिंदगी सामान्य ढर्रे पर नहीं लौट सकेगी।

दूसरी अहम बात गेट्स ने कोरोना महामारी के बाद आने वाले वक्त में जो महामारी आएगी उसके बारे में की है। बिल गेट्स का कहना है कि 2021 के मध्य यानी जून 2021 के बाद दुनियाभर में उपलब्ध संस्थानों में वैक्सीन बन रही होंगी। अगर ऐसा होता है तो यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी जब मानव पहली बार इतनी तेजी से एक नई बीमारी को पहचानने और फिर उसके खिलाफ प्रतिरक्षण का काम करेगा। वैक्सीन पर प्रगति के अलावा इस महामारी की जो बड़ी मेडिकल उपलब्धियां होंगी वह जांच के क्षेत्र में होगी। अगली बार जब कोई नया वायरस उभरेगा तो लोग संभवत: उसकी घर पर वैसे ही जांच कर सकेंगे, जैसे आज प्रेगनेंसी टेस्ट करते हैं। बस उन्हें अपनी नाक के भीतर से स्वैब लेना होगा।

तीसरी अहम बात जो बिल गेट्स ने अपने इस आर्टिकल में की है वह संयुक्त राष्ट्र जैसा एक नया संगठन बनाने को लेकर है। गेट्स का कहना है कि कोविड-19 के बाद दुनियाभर के नेताओं को अगली महामारी रोकने के लिए यूएन जैसा संस्थान बनाना चाहिए। यह राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और वैश्विक संगठनों का मिश्रण होना चाहिए। आज के युद्ध अभ्यासों की तरह ये संगठन नियमित तौर पर ‘जीवाणु अभ्यास’ भी करेंगे। इससे जब कभी किसी चमगादड़ या पक्षी से मनुष्यों पर कोई नया वायरस कूदेगा तो हम तैयार रहेंगे। ये संगठन हमें इस बात के लिए भी तैयार करेंगे कि अगर कोई अपनी लैब में किसी संक्रामक बीमारी को तैयार करके हथियार की तरह उसका इस्तेमाल करता है, तो उससे कैसे निपटना है।

चौथी और अंतिम महत्वपूर्ण बात में बिल गेट्स यह भी कहते हैं कि कोरोना महामारी ने हमें दिखा दिया है कि वायरस सीमा कानूनों का पालन नहीं करते हैं और हम सब माइक्रोस्कोपिक जीवाणुओं के एक नेटवर्क से आपस में जुड़े हुए हैं। इतिहास हमेशा एक तय ढर्रे पर नहीं चलता। लोग तय करते हैं कि कौन सी दिशा लेनी है और वे गलत मोड़ भी ले सकते हैं। गेट्स का दावा है कि 2021 के बाद के साल बहुत कुछ 1945 के बाद के सालों जैसे ही होंगे। लेकिन आज की सबसे ज्यादा समानता 10 नवंबर 1942 से हो सकती है। जब ब्रिटेन ने युद्ध में पहली जमीनी लड़ाई जीती थी और विंस्टन चर्चिल ने एक भाषण में घोषणा की- This is not the end. It is not even the beginning of the end. But it is, perhaps, the end of the beginning. यह अंत नहीं है। यह अंत की शुरुआत भी नहीं है। लेकिन यह शायद शुरुआत का अंत है।

बिल गेट्स का यह आर्टिकल 23 अप्रैल 2020 को द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित हुआ है। इससे पहले भी गेट्स ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर कोरोना वायरस को लेकर कई बातें कही हैं जिसके बारे में हम अगले ब्लॉग में बात करेंगे कि काफी हद तक वो घटित भी हुई हैं। लेकिन फिलहाल हम यह सवाल आप प्रबुद्ध पाठकों पर छोड़ते हैं कि कोरोना महामारी के बाद जो वक्त आने वाला है वह कैसा होगा, दुनिया कैसी होगी, इस सबका आंकलन और वह भी सत्य के बेहद करीब, बिल गेट्स कैसे बता पा रहे हैं?

Saturday, 18 April 2020

मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आप अपने होने का वजूद खो चुके हैं

मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! कोरोना महामारी के वैश्विक महासंकट और देश के अंदर 21 दिन के कंप्लीट लॉकडाउन के बाद एक बार फिर जब 19 दिन की इसकी मियाद बढ़ा दी गई है के बीच हम भारत के लोग आपसे कहना चाहते हैं कि अब आप अपने होने का वजूद खो चुके हैं। हमें अपनी सरकार की नीति और नीयत दोनों पर संदेह होने लगा है और चूंकि आप ही हमारी सरकार के मुखिया हैं, लिहाजा हम भारत के 130 करोड़ लोगों का दर्द आपको ही समझना था। अब इसे देशवासियों की नियति कहें या जाने-अनजाने में प्रधानसेवक होने के नाते आपके द्वारा उठाए गए गलत कदमों का दंश, दोनों ही परिस्थितियों में इसका खामियाजा वही जनता भुगत रही है जिसे आप देश और दुनिया में बार-बार अपनी ताकत बताते रहे हैं। इसीलिए एक लंबे कालखंड के बाद हम भारत के लोग आपको बताना चाहते हैं कि आज आपकी ताकत उस मुश्किल दौर में पहुंच गई है जहां से उसे उबारना कठिन ही नहीं असंभव भी है, क्योंकि आप अपने होने का वजूद जो खो चुके हैं।

आज जब हम लॉकडाउन-2.0 की परिस्थिति में जीने को अभिशप्त हैं, सरकार की नीति और नीयत पर संदेह करने के वजहों की फेहरिस्त तो बहुत लंबी है, लेकिन हम यहां सिर्फ कोरोना महासंकट से निपटने के लिए लॉकडाउन की परिस्थिति की ही बात करेंगे कि इस दौर में सरकार की जिम्मेदारी व जवाबदेही क्या होनी चाहिए थी और क्या वह अपनी इस जिम्मेदारी व जवाबदेही के धर्म को निभाने में जनता की उम्मीदों पर खरी उतरी? हालांकि हम भारत के लोग आज जिन परिस्थितियों में जीने को अभिशप्त हैं उसके पीछे सरकार द्वारा आर्थिक क्रांति का हवाला देते हुए नोटबंदी और जीएसटी लागू करने का फैसला भी उतना ही जिम्मेदार है जितना वैश्विक महामारी कोरोना महासंकट के बीच कंप्लीट लॉकडाउन का फैसला और वो भी नोटबंदी की तर्ज पर सिर्फ चार घंटे की मोहलत के साथ। यहां हम सिर्फ 2020 की बात करते हैं जब 30 जनवरी को देश के सबसे समृद्ध प्रदेश केरल में कोरोना से संक्रमित पहले मरीज की एंट्री हुई थी। मीडिया में जो रिपोर्ट प्रकाशित हुई है, उसके मुताबिक यह मरीज चीन के उसी वुहान प्रांत से आया था जहां सबसे पहले (नवंबर-दिसंबर 2019) कोरोना ने दस्तक दी थी और फिर इतनी बड़ी तबाही के रूप में इसने विस्तार लिया जिसकी जद में अमेरिका, इटली, स्पेन, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस समेत दुनियाभर के 200 से अधिक देश इसमें समा गए। 30 जनवरी से पहले जापान और अमेरिका में कोरोना का संक्रमण फैल चुका था। आगे बढ़ने से पहले यहां कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा सांसद राहुल गांधी के दो अहम ट्वीट का जिक्र करना जरूरी होगा। 31 जनवरी को पहले ट्वीट में राहुल गांधी ने कोरोना संकट का जिक्र करते हुए लिखा था- In China, the Coronavirus has killed hundreds of people. My thoughts are with the families of the victims & the millions who have been forced into quarantine to prevent the spread of the virus. May they find the courage & strength to persevere through this terrible ordeal. उसके बाद 12 फरवरी को दूसरे ट्वीट में कोरोना संकट से जुड़े एक न्यूज लिंक को शेयर करते हुए राहुल गांधी ने लिखा था- The Corona Virus is an extremely serious threat to our people and our economy. My sense is the government is not taking this threat seriously. Timely action is critical. पूरा देश जानता है, राहुल गांधी को पूरी की पूरी तंबूपरस्त मीडिया, अफवाहबाज मीडिया और सोशल मीडिया ने पप्पू बनाकर एक तरह से विपक्ष की आवाज को ही खत्म कर दिया है ताकि सरकार से न कोई सवाल कर पाए और न ही उसे उसकी जिम्मेदारी व जवाबदेही का अहसास करा सके। लेकिन हम भारत के लोग जो आपकी भी ताकत हैं, इस बात को समझते हैं और इस बात का जिक्र आपसे करना चाहते हैं कि एक दूरदर्शी पप्पू (राहुल गांधी) की बात को ही सरकार अगर समय रहते समझ लेती तो शायद देश की अर्थव्यवस्था का पहिया रोकने की नौबत नहीं आती। कंप्लीट लॉकडाउन की परिस्थिति में हम नहीं जी रहे होते।

मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! 
कोरोना महासंकट के बीच राष्ट्र के नाम चौथे संबोधन में आपने बहुत सारे दावे किए और देशवासियों को सप्तपदी के तहत सात वचन निभाने की शपथ भी दिलाई। लेकिन कभी अकेले में अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने की कोशिश जरूर करियेगा कि आपने जो भी दावे किए वह कितना सच है और फिर जो वचन निभाने के लिए अपनी जनता से हामी भरवाई वो काम किसका है- आपका या फिर हम भारत के लोगों का? हम भारत के लोग आज आपसे पूछना चाहते हैं, कुछ सवाल करना चाहते हैं कोरोना को लेकर, लॉकडाउन को लेकर, लॉकडाउन-2.0 की परिस्थिति को लेकर।

1. आपने इस बात का दावा किया कि कोरोना की भयावहता का अंदाजा लगाते हुए हमने काफी पहले इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया था जिसकी वजह से दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले जनहानि काफी कम हुई है। हम भारत के लोग आपसे जानना चाहते हैं कि भारत में कोरोना संक्रमित पहले केस की एंट्री और राहुल गांधी के दोनों ट्वीट से पहले कोरोना से निपटने के लिए सरकार ने क्या तैयारी की थी?

2. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! इस तथ्य को आप भी मानेंगे कि कोरोना महामारी हमारे देश में बाहर के देशों से आया। यहां तक कि जिन जमातियों पर संक्रमण फैलाने का आरोप मढ़कर देश की सोशल मीडिया और तंबूपरस्त मीडिया द्वारा समाज में लगातार नफरत फैलाई जा रही है, वो भी चीन समेत अन्य कई देशों से मार्च के शुरूआती हफ्तों में भारत में एंट्री ली थी। कनिका कपूर जैसे ताकतवर हजारों लोगों की एंट्री भी देश के अंदर 30 जनवरी के बाद ही हुई थी। अगर आपकी तैयारी चाक-चौबंद थी तो हजारों जमाती और कनिका कपूर जैसी हस्तियों को देश के अंदर कोरोना फैलाने की छूट किसने दी? आखिर किसकी शह पर जमाती मरकज में सालाना जलसा करते रहे और कनिका कपूर जैसी दिग्गजों की पार्टी होती रही जिसमें सत्ता से जुड़े सैकड़ों लोगों का जमावड़ा लगा?

3. देश में कोरोना संकट लगातार गहरा रहा था और आप अमेरिकी भगवान डोनाल्ड ट्रम्प के स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए खड़े थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन की तरफ से चेतावनियां जारी होने के बावजूद ट्रम्‍प के स्‍वागत में गुजरात में हज़ारों लोगों को जुटाया गया। तब तक अमेरिका में कोरोना फैलने की खबर हमें मिल चुकी थी। ट्रम्प ने अपने देश को तो डुबोया ही, हमें भी अपनी चपेट में ले लिया। आज इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? पूरी सरकार गुजरात से लेकर नई दिल्ली के लुटियन जोन तक ट्रम्प के स्वागत में जुटी थी और तभी राजधानी दिल्ली सांप्रदायिक दंगों की आग में झुलस रहा था। हमारे हिन्दू और मुसलमान भाईयों का कत्ल हो रहा था। घर जलाए जा रहे थे, दुकानें जलाई जा रही थी। लेकिन आपने उस वक्त भी खामोशी की चादर ओढ़े रखी। आखिर क्यों? कोरोना अपना खौफनाक जाल बिछा रहा था और देश के सैकड़ों रहनुमा देश की संसद में एनपीआर, एनआरसी, शाहीनबाग और सांप्रदायिक दंगे को लेकर तू-तू मैं-मैं कर रहे थे। देश में कोरोना फैल रहा था और सत्ताधारी पार्टी मध्यप्रदेश में तख्तापलट करने में जुटी थी। आपने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का ऐलान किया था और एक दिन बाद शिवराज सरकार शपथ ले रही थी जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग की कोई परवाह नहीं की गई। अगर आपने समय रहते सतर्कता बरती थी तो ये सब किसके इशारे पर होता रहा?

4. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! अगर आपकी तैयारी चाक-चौबंद थी तो हम भारत के लोग आपसे जानना चाहते हैं कि देश में 1 मार्च को कोरोना के 3 केस थे, बालकनी से ताली व थाली बजाने के दिन 22 मार्च को 396 केस और 25 मार्च को जिस दिन कंप्लीट लॉकडाउन-1 शुरू हुआ, 606 संक्रमित मरीज देश में कहां से आए? आज जब हम कंप्लीट लॉकडाउन के एक्सटेंशन फेज में हैं, कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या 13 हजार के पार हो चुकी है। देश के 27 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों के 388 जिलों में फैले कोरोना संक्रमण से मौत का आंकड़ा 500 के पार कैसे पहुंच गया? अगर आपको याद हो तो 27 फरवरी 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गाइडलाइन जारी करते हुए कहा था- दुनियाभर में पीपीई किट का भंडारण पर्याप्त नहीं है और लगता है कि जल्द ही गाउन और गोगल्स (चश्में) की आपूर्ति भी कम पड़ जाएगी। गलत जानकारी और भयाक्रांत लोगों में खरीददारी की होड़ के साथ ही कोविड-19 के बढ़ते मामलों से दुनिया में पीपीई की उपलब्धता कम हो जाएगी। डब्ल्यूएचओ की गाइडलाइन में बताया गया था- पीपीई किट (पर्सनल प्रोटेक्ट‍िव एक्व‍िपमेंट किट) का मतलब है : गाउन, बूट, कैप, एन 95 मास्क, ग्लब्स और गॉगल्स। इसके बावजूद भारत सरकार ने घरेलू पीपीई किट के निर्यात पर रोक लगाने में 19 मार्च तक का समय लगा दिया। देश इस मुद्दे पर आपका स्पष्टीकरण चाहता है क्योंकि आज हम चीन से पीपीई किट का आयात कर रहे हैं जिससे संक्रमण का खतरा और गहराने का अंदेशा है।

5. कोरोना वॉरियर्स के सम्मान और उनकी हौसलाअफजाई के लिए आपने देशवासियों से बालकनी में खड़े होकर ताली-थाली बजाने और घर की बत्ती बुझाकर दीया या टॉर्च जलाने के लिए कहा था। एकजुटता का शक्ति प्रदर्शन कर हम भारत के लोगों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और तब आपका सीना भी गर्व से फूल गया था। लेकिन उसके बाद जो कुछ हुआ उसकी कल्पना शायद आपने नहीं की होगी। हैल्थ सेक्टर, लॉ एंड आर्डर और मीडिया से जुड़े कोरोना वॉरियर्स के साथ क्या बर्ताव लोगों ने किया इस बारे में आपने अपनी दूरदर्शिता का इस्तेमाल नहीं किया। सोशल डिस्टेंसिंग की आड़ में पूरे देश में सामाजिक विभाजन होने लगा और समाज इन कोरोना वॉरियर्स से खुद को अलग करने लगा। शायद आप भी सोशल डिस्टेंसिंग और फिजिकल डिस्टेंसिंग के फर्क को नहीं समझ पाए। दूसरी बात, जब हैल्थ सेक्टर से जुड़े लोगों ने पीपीई किट की कमी से आपको, सरकारी महकमा को अवगत कराने की कोशिश की, वॉर विद्आउट वीपन्स की बात की तो उन्हें सरकार के लोगों ने ही प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। आखिर इस तरह के हालात और अव्यवस्था से निपटने की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या आप कहने की स्थिति में हैं कि यह सब सरकार की जवाबदेही में नहीं आता है।

6. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आपने अपने संबोधन में गरीबों और मजदूरों को अपना 'परिवार' बताया, लेकिन कितने गरीबों और मजदूरों तक आपने अपने भरोसे की पहुंच बनाई? पहली बार लॉकडाउन से पहले अगर आप गरीब मजदूरों को इस बात का भरोसा दिला पाते कि सरकार आपके द्वार होगी तो शायद देश के अलग-अलग महानगरों व शहरों में रह रहे लाखों मजदूरों का सैलाब सड़कों पर नहीं उमड़ता। हजारों की संख्या में ये मजदूर अपने गांव की तरफ पैदल चलकर पलायन की राह नहीं अपनाते। इन्‍हीं गरीबों के बीच अल्‍पसंख्‍यकों की भी भारी आबादी इस देश में है। इस दौरान कुछ तथाकथित दक्षिणपंथी संगठनों ने मिलकर जिस तरह के हमले इनपर किए हैं वह शर्मनाक है। सपाट भाषा में कहें तो देश की कुछ फासीवादी ताकतें कोरोना संकट की आड़ में ग़रीब अल्पसंख्यक आबादी को निशाना बनाने का कोई मौका नहीं चूक रही हैं। यहां तक कि तंबूपरस्त मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक जनभावनाओं को भड़काने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं और आपकी सरपरस्ती में चल रही सरकार उस बेलगाम तंबूपरस्त मीडिया, सोशल मीडिया और फासीवादी ताकतों को खुली छूट दे रखी है। ग्राउंड जीरो से जो रिपोर्ट्स आ रही हैं उसमें ये भी देखा जा रहा है कि सरकारी राशन की पहुंच सत्ताधारी पार्टी अपने कोर वोट बैंक तक ही सीमित रख रही हैं। कोरोना की टेस्टिंग और टेस्ट किट के मामले में भी पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है। आपने बुजुर्गों का विशेष ख्याल रखने की बात भी कही लेकिन उन बुजुर्गों का ख्याल कौन रखेगा जिनकी कीमोथैरेपी होती है, उन बुजुर्गों का ख्याल कौन रखेगा जिनका साप्ताहिक डायलिसिसि होता है, जो किडनी के मरीज हैं, दिल के मरीज हैं, डायबिटिक हैं। इन बुजुर्गों को अस्पताल में गंभीर बीमारियों के उपचार की सुविधा नहीं मिल पा रही है। आखिर इन सब हालातों की जिम्मेदारी कौन लेगा?

7. मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आपका कहना है, आर्थिक संकट कोरोना की वजह से पैदा हुआ है और इससे बचना नामुमकिन था। यह भी सच नहीं है। भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में 2019 के तीसरे क्‍वार्टर से ही खतरनाक संकट पैदा हो चुका था जो नोटबंदी और जीएसटी की वजह से पहले से ही धीरे-धीरे इस स्तर तक पहुंचा था। कोरोना का पहला केस आने से पहले ही ऑटोमोबाइल सेक्‍टर, टेक्‍सटाइल सेक्‍टर, रियल एस्टेट में मंदी साफतौर पर देखी जा सकती थी। सारी मैन्‍युफैक्‍चरिंग गतिविधियां सिकुड़ रही थी और वैश्विक रेटिंग एजेंसियों ने आने वाले वित्त वर्ष में भारत की आर्थिक वृद्धि दर का आंकलन पहले से कम करके 4 प्रतिशत से भी नीचे रहने का अनुमान लगाया था। कोरोना महामारी से पहले ही कई करोड़ लोगों की नौकरियां जा चुकी थीं।  निश्चित तौर पर कोरोना संकट के कारण आर्थिक संकट महासंकट का रूप ले चुका है और इसकी मुख्य वजह देश में कंप्लीट लॉकडाउन का फैसला है। पहले हमारी अर्थव्यवस्था धीमी हुई और लॉकडाउन से तो यह पूरी तरह ठप ही हो गई। 21 दिन के लॉकडाउन में सरकार ने इसको लेकर कोई रोडमैप नहीं बनाया। आपकी मोदीनॉमिक्स का सारा तजुर्बा रेत पर बने महल की तरह ढह गया। बावजूद इसके हम भारत के लोग इस बात को जानना चाहते हैं कि आप देशवासियों को बताएं कि आपने अपने छह साल के कार्यकाल में पेट्रोल और डीजल से कितनी कमाई की? आपने सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियों की बोली लगाकर कितनी कमाई की? और आज की तारीख में भारत सरकार के राजकोष में कितना धन जमा है?

बहरहाल, लॉकडाउन-1 के 20 दिन बाद जब लोगों को यह पता चला कि 14 अप्रैल सुबह 10.30 बजे आप फिर से देशवासियों को संबोधित करेंगे तो लोग उम्मीदों की टकटकी लगाकर आपको सुनने के लिए बेसब्री से इंतजार करने लगे। क्या बुजुर्ग, क्या जवान, क्या बच्चे, क्या गरीब-क्या अमीर और सबसे ज्यादा मध्य व निम्न मध्य वर्ग सभी आपके मुखाबिंद से उम्मीदों के, राहतों के दो बोल सुनने के लिए पूरी रात जागकर गुजार दी थी। लेकिन जब आपकी पाठशाला टेलीविजन पर शुरू हुई तो आपके संबोधन के 24वें मिनट तक सब यही कह रहे थे कि उन्हें 19 दिन का एक और लॉकडाउन भी स्वीकार है। उन्हें पक्का भरोसा था कि मोदी जी आज राहत का बड़ा पिटारा जरूर खोलेंगे क्योंकि 130 करोड़ देशवासियों की ताकत लेकर आप जीते जो हैं। सच मानिए मिस्टर प्राइम मिनिस्टर! आपने खुद को प्रधानसेवक कहा था, आपने खुद को देश का चौकीदार कहा था, लोग आपके ऊपर बहुत भरोसा करते थे और इस वक्त तक कर भी रहे थे, लेकिन जैसे ही आपने अपने संबोधन के 25वें मिनट में कोरोना संकट से निपटने के लिए सप्तपदी (हिन्दू विवाह पद्धति में अग्नि की साक्षी मानकर नवविवाहित जोड़े को जिन सात फेरों में बांधा जाता है और फिर वो जन्म-जन्मांतर एक-दूसरे के हो जाते हैं) के तहत सात वचन निभाने का वादा मांगने लगे तो लोगों के सब्र का बांध टूट गया। उस वक्त उनकी बेचैनी व बेबसी को उनकी आंखों में झांककर सहज ही महसूस किया जा सकता था। शायद आपने महसूस नहीं किया क्योंकि आप प्रधानसेवक और चौकीदार से मिस्टर प्राइम मिनिस्टर जो हो चुके हैं, क्योंकि आप अपने होने का वजूद जो खो चुके हैं।